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चश्‍मा उतारने के लिए


(शरद पूर्णिमा की चांदनी में करे यह प्रयोग)

(परम पूज्य संत श्री आशारामजी महाराज के सत्संग से)

गाय का घी + शहद + त्रिफला (समान मात्रा में) मिश्रण करके शरद पूर्णिमा को चंद्रमा की चांदनी में रात भर रखो…. |

सुबह कांच की बरनी में रखो | दस ग्राम सुबह और दस ग्राम शाम को चालीस दिन तक दिन खाओ…. । मैंने तो साठ दिन खाया, चश्‍मा उतर गया | 

कैसे पायें मधुमेह (Diabetes) से छुटकारा ?


वर्तमान में वैश्विक समस्या बनी हुई बीमारियों में से एक है मधुमेह । हम यहाँ मधुमेह में हितकर आहार-विहार, परहेज एवं ऐसा लाभदायी उपाय बता रहे हैं जो बिल्कुल निरापद है एवं जिसे सभी कर सकते हैं ।

कैसा हो आहार-विहार ?

हितकारी आहारः कड़वे व कसैले रसयुक्त एवं पचने म  हलके पदार्थ हितकारी हैं । प्रोटीन्स का सेवन पर्याप्त मात्रा में करें । विटामिन्स, खनिज तत्त्वों एवं रेशों से भरपूर सब्जियाँ व फल तथा देशी गाय के दूध का सेवन भी यथोचित मात्रा में करना आवश्यक है । एक वर्ष पुराने अनाज का सेवन उत्तम है । करेला, मेथी, सेम की फलियाँ, भिंडी, परवल, सहजन, बथुआ, लौकी, तोरई, जमीकंद (सूरन), कुम्हड़ा, पत्तागोभी, फूलगोभी, बैंगन आदि सब्जियों एवं चुकन्दर, खीरा, ककड़ी, टमाटर, मूली, अदरक, लहसुन आदि का सेवन हितकारी है । अनाजों में जौ, ज्वार, रागी, गेहूँ एवं दालों में मूँग, चना, मसूर आदि तथा सूखे मेवों में अखरोट व बादाम एवं फलों में जामुन, अंगूर, संतरा, मोसम्बी, स्ट्रॉबेरी, रसभरी हितकर हैं । देशी गाय का घी तथा हल्दी, मेथीदाना, अलसी, आँवला व नींबू का आहार में समावेश करें । काली मिर्च, राई, धनिया, जीरा, मिर्च लौंग का यथायोग्य उपयोग कर सकते हैं ।

हितकारी विहारः चरक संहिता के अनुसार विविध प्रकार के व्यायाम विशेषतः तेज गति से चलने का व्यायाम तथा योगासन, प्राणायाम एवं सूर्यनमस्कार करना हितकारी है । सुबह शाम एक-एक घंटा तेजी से चलें । कृश व दुर्बल रोगी यथाशक्ति हलक व्यायाम करें ।

किससे करें परहेज ?

आचार्य चरक लिखते हैं-

आस्यासुखं स्वप्नसुखं दधीनि ग्राम्यौदकानूपरसाः पयांसि ।

नवान्नपानं गुडवैकृतं च प्रमेहहेतुः कफकृच्च सर्वम् ।।

सतत सुखपूर्वक बैठे रहना, अति नींद लेना अर्थात् शारीरिक परिश्रम का अभाव, दही व दूध का अधिक सेवन, किसी भी प्रकार के मांसाहार का सेवन, नया अन्न (नया अनाज) व नया जल (वर्षा आदि का), गुड़, चीनी, मिश्री, मिठाइयाँ तथा कफ बढ़ाने वाले सभी पदार्थों (भात, खीर आदि) का अति सेवन प्रमेह के हेतु हैं । (प्रमेह रोग के 20 प्रकारों में से मधुमेह एक है ।) अतः इनका त्याग करना चाहिए । (चरक संहिता)

मधुमेह के लिए अऩुभूत रामबाण प्रयोग – पूज्य बापू जी

आधा किलो करेले काटकर किसी चौड़े बर्तन में रख के खाली पेट 1 घंटे तक कुचलें । 2-3 दिन में मुँह में कड़वापन महसूस होगा । 7 दिन खड़े-खड़े न कुचल सकें तो बीच में 5-10 मिनट कुर्सी पर बैठकर भी चालू रखें । करेले पके, बासी, सस्ते वाले भी फायदा करेंगे ही ।

इंसुलिन के इंजेक्शन लेने वाले को भी इस 7 दिन के प्रयोग से सदा के लिए आराम हो गया व छूट गयी सारी दवाइयाँ ! मात्र कुछ दिन शाम को आश्रम में मिलने वाली ‘मधुरक्षा टेबलेट’ नामक अचूक औषधि का प्रयोग करें ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 32 अंक 312

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इन्द्रियों से भी ब्रह्मरस पिला दें ऐसे माधुर्य-अवतार


पूज्य  बापू जी

(शरद् पूर्णिमाः 5 अक्तूबर 2017)

शरद् पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है। माना जाता है कि इस रात्रि को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है। इससे चित्त को शांति मिलती है और पित्त का प्रकोप भी शांत होता है। मनुष्य को चाहिए कि वह इस महत्त्वपूर्ण रात्रि की चाँदनी का सेवन करे। महर्षि वेदव्यास जी ने ‘श्रीमद्भागवत’ के दसवें स्कन्ध में शरद् पूर्णिमा की रात्रि को अपनी पूर्ण कलाओं के साथ धरती पर अवतरित परब्रह्म श्रीकृष्ण के महारासोत्सव की रात्रि कहा है। शरद पूर्णिमा की रात्रि को चन्द्रमा की शीतलतारूपी अमृतवर्षा की तरह भगवान श्रीकृष्ण ने भी अपनी रासलीला में धरती पर भक्तिरस छलकाया था। इस रासलीला में हजारों धनभागी गोपियों ने योगेश्वर श्री कृष्ण के सान्निध्य में भक्तिरस की प्यालियाँ पीकर अपने जीवन को धन्य किया था।

हम लोग जो चित्रों आदि में श्रीकृष्ण के इर्द-गिर्द गोपियों को देखते हैं, नृत्य देखते हैं, वह तो श्री कृष्ण की महिमा का बिल्कुल बाह्य रूप है। वास्तव में तत्त्वरूप से तो श्रीकृष्ण परात्पर ब्रह्म हैं, सच्चिदानंद ब्रह्म हैं।  विकारी मनुष्य को श्री कृष्ण की रासलीला विकाररूप दिखे तो यह उसकी दुर्मति है। बोलते हैं, ‘चीर-हरण लीला में भगवान ने गोपियों के कपड़े हर लिये….।’ इसका अर्थ भी आता है कि जब गुरु की कृपा होती है तब हृदय का आवरण भंग होता है, पर्दा हटता है और तब जीवात्मा-परमात्मा की मुलाकात होती है। श्रीकृष्ण ने चीर-हरण लीला की अर्थात् गोपियों के हृदय का आवरण भंग किया। अपना सच्चिदानंद स्वभाव तो अंतरात्मा होकर बैठा था और जीव बेचारा उसे इधर-उधर ढूँढ रहा था। वह अज्ञान का आवरण हटा, इसका नाम है चीर-हरण।

‘गो’ माना इन्द्रियाँ। इन्द्रियों के द्वारा जो भगवद्-रस पी ले वह ‘गोपी’। जो आँखों से भी भगवान के प्रेमरस को पीते हैं, बंसी से भी उनके प्रेमरस का पान करते हैं, भगवान को छूकर जो हवा आती है, भगवान को छू के जो भगवद्-तत्त्व को स्पर्श की हुई आह्लादिनी, मधुमय सुगंध आती है, उसका भी जो रसपान करते हैं – ऐसे इन्द्रियों के द्वारा भगवान के आनंद रस को पीने की क्षमतावाले जीव हैं ‘गोपी’।

गोपियों के बीच में कृष्ण रास करते, सबकी तरफ तिरछी नज़र से देखते। सौ-सौ गोपियों का एक-एक घेरा और उसमें श्रीकृष्ण। प्रत्येक को लगे कि ‘मेरी ओर देख रहे हैं।’ फिर श्रीकृष्ण ने संकल्प किया और रास का दूसरा रूप हुआ तो दो गोपियों के बीच एक कृष्ण थे। फिर रासलीला में यह एहसास हुआ कि एक-एक गोपी के साथ एक-एक कृष्ण हैं।

जैसे नरकासुर के वध के बाद सोलह हजार कन्याओं के साथ विवाह के लिए श्रीकृष्ण सोलह हजार बन गये थे और सोलह हजार गर्गाचार्य बना दिये थे, ऐसा ही शरद पूनम की रात को हुआ। स्थूल दृष्टि से देखा जाय तो श्रीकृष्ण ने जितनी गोपियाँ थीं उतने रूप धारण कर लिये थे। जैसे आप एक व्यक्ति होते हुए भी स्वप्न में अनेक व्यक्तियों का रूप धारण कर लेते हैं। आज का कलियुग का आदमी स्वप्न में एक में से अनेक बनता है कि नहीं ? बनता है। ऐसे ही जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के मूल हैं, वे सच्चिदानंद परमात्मा अंतःकरण में एक में से अनेक बनाकर दिखाते हैं। बाहर की सृष्टि में भी यह लीला माधुर्य-अवतार का प्रसाद है ! विषय-विकारों और इन्द्रियों के सुखों में जो लोग फँस रहे हैं उनको भी ब्रह्मसुख की झलकें मिलें इसलिए यह अवतार की लीला थी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2017, पृष्ठ संख्या 20 अंक 297

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