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Self Realization

तो आप न चाहो तो भी भगवान मिल जायेंगे – पूज्य बापू जी


संसार की वासना छोड़ना कठिन है तो क्या वह पूरी करना आसान है ? नहीं, संसार को पाना कठिन है । मैं तो कहता हूँ कि भगवान को पाना कठिन लगता है लेकिन संसार को पाना असम्भव है । लगता है कि पा लिया, पा लिया, पा लिया…. पर आ-आ के चला जाता है, ठहरेगा नहीं । भगवान को छोड़ना असम्भव है । जिसको छोड़ना असम्भव है उससे प्रीति करके उसको ठीक से पहचानो और जिसको पाना असम्भव है उससे ममता हटाकर उसका सदुपयोग करो, बस हो गया काम । तो जहाँ से मन को हटाना चाहते हैं उसको नापसंद कर दो और जहाँ लगाना चाहते हैं उसको पसंद कर लो – एक बात । दूसरी बात – अपने में जो कमियाँ दिखती हैं ‘वे अपने में हैं’ ऐसा मानने की गलती न करो, मन में है, बुद्धि में है, शरीर में है.. उनको निकालने के लिए सत्संग का आश्रय लो, सत्प्रवृत्ति का आश्रय लो । सत्संग और सत्प्रवृत्ति में लगेंगे तो कुसंग और कुप्रवृत्ति से जो गलतियाँ हो रही हैं उनसे बचाव हो जायेगा ।

जो नहीं कर सकते हैं अथवा जिसको किये बिना चल सकता है उससे अपने को बचा लो । और जहाँ ममता फँसी है – पैसे में, पत्नी में, शरीर में…. वहाँ से उसे ऐसे नहीं मिटा सकते, ममता से ममता हटेगी । तो भगवान में ममता रख दो – ‘जो चेतन है वह मेरा है, जो ज्ञानस्वरूप है वह मेरा है, जो सुखस्वरूप है, साक्षीस्वरूप है, अविनाशी है, अमर है वह मेरा है, जो नित्य है, जो चिद्घन चैतन्य है वह मेरा है, जो कभी न बदले वह मेरा है, जो आनंदस्वरूप है, प्रेमस्वरूप है वह मेरा है, कीट-पतंग के अंदर जिसकी चेतना खिलवाड़ कर रही है वह मेरा है । ॐ’….’

‘घर मेरा है, बेटा मेरा है, 10-20 मेरे हैं…’ ऐसी सीमित ममता क्यों, यहाँ तो करोड़ों मेरे हैं, ऐसा कर ले न भाई ! ममता का विस्तार कर ले । अपना जहाँ मिलता है वहाँ मजा आता है – अपना बेटा मिल गया, अपना परिचित मिल गया – पति, पत्नी, मित्र पैसा या अपनी चाही वस्तु मिल गयी तो आनंद आता है ।

तो अपना तो वही परमात्मा है और जब वह जहाँ-तहाँ मिलने लग जायेगा यानी सभी को गहराई में जब अपने प्रिय परमात्मा को देखने की दृष्टि बन जायेगी तो आपका अविकम्प योग हो जायेगा । जब ध्यान में बैठोगे तो मन एकाग्र और ध्यान खुला तो अभी जैसा बताया वैसा भगवद्-चिंतन…. बड़ा आसान तरीका है, बड़ा सरल तरीका है ! नदी बह रही है, उधर ही नदी के पानी के साथ चलते-चलते जाओ, आप न चाहो तो भी समुद्र आ जायेगा । ऐसे ही आप ऐसा चिंतन करो तो तो आप न चाहो तो भी भगवान मिल जायेंगे ।

चित्त चेतन को ध्यावे तो चेतनरूप भयो है ।

शत्रु का चिंतन करने से मन गंवा होता है, अशुभ का चिंतन करने से अशुभ होता है, शुभ का चिंतन करने से शुभ होता है और भगवान का चिंतन करने से मन भगवन्मय हो जाता है । अभद्र में भद्र का चिंतन करो, अशुभ में भी शुभ की गहराई देखो, अमंगल में भी मंगल को देखो । क्या जरा-जरा बात में फरियाद ! क्या जरा-जरा बात में दुःखी होना ! क्या जरा-जरा बात में इच्छा का गुलाम बनना ! ‘ठीक है, इसका बढ़िया मकान है तो उस बढ़िया मकान में जो रह रहा है वहाँ भी वही रह रहा है, यहाँ भी वही रह रहा है । ॐ….’ खुशी मनाओ, आनंद लो । अपना मकान बन जाय तो बन जाय लेकिन दूसरे का बढ़िया मकान देखकर ईर्ष्या न करो, वासना न करो । प्रारब्ध में होगा, थोड़ा पुरुषार्थ होगा… हो गया तो हो गया बस !

चिंतन की धारा ऊँची कर दो, उद्देश्य ऊँचा कर लो, संग ऊँचा कर लो, प्राप्ति ऊँची हो जायेगी आप न चाहो तो भी ! परमात्म-चिंतन, परमात्म-अनुभव का उद्देश्य और उद्देश्य के अनुकूल संग कर लो तो न चाहने पर भी परमात्म-अनुभव हो जायेगा ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2021, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 338

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क्यों आते हैं कष्ट-मुसीबतें ? – पूज्य बापू जी


ईश्वरप्राप्ति के लिए जो भी सह लिया थोड़ा है । ईश्वर का इतना बड़प्पन है कि उसके लिए कुछ भी सहो, बहुत थोड़ा है । मीराबाई ने सहा, शबरी ने बहुत सहा फिर भी थोड़ा है ।

कोई बेवकूफ हो तो वह दुःख कहीं भी बना लेगा कि ‘हम तो दुःखी हैं ।’ उसका दुःख तो ब्रह्मा जी भी नहीं मिटा पायेंगे । जिसको फरियाद की आदत है उसका ईश्वर के रास्ते चलना सम्भव नहीं । फरियादी जीवन अपने-आपके लिए मुसीबत है और दूसरों के लिए भी ।

कष्ट तुम्हारी महिमा बताने को आते हैं कि ‘संसार की इच्छा करोगे तो लो यह हम (कष्ट) मिल रहे हैं पर हम फिर टिकते नहीं हैं, चले जाते हैं और तुम ज्यों-के-त्यों ! तुम कितने अमर हो, चेतन हो, ज्ञानस्वरूप हो किंतु हमको (कष्टों को) महत्त्व देते हो तो हमारा महत्त्व बढ़ जाता है और हमारी उपेक्षा करते हो तो फिर तुम मौज में रहते हो ।’

कष्ट तुम्हारा प्रभाव जगाने को आते हैं कि ‘भाई ! देखो, तुम कितने प्रभावशाली हो ! हमसे प्रभावित होते हो तो हम बड़े हो जाते हैं, नहीं तो हमारी उपेक्षा कर देते हो तो तुम ज्यों-के-त्यों !’

तो आप कष्टों के स्वामी हुए कि नहीं हुए ? फिर स्वामी होकर इनसे काहे को डरना, दबना अथवा अनुचित कर्म करना ?

आपके जीवन में जब कष्ट, विरोध-बाधाएँ आ जायें तो आप फरियाद मत करना कि ‘हम भगवान का भजन करते हैं और मुसीबत आ गयी ।’ मुसीबत आयी तो है लेकिन वह हर मुसीबत को कुचलने का सामर्थ्य जगाने के लिए आयी है, जन्म-मरण के चक्र को तोड़ने का सामर्थ्य जगाने के लिए आयी है – इस बात पर आप दृढ़ रहें । आप हिम्मत मत हारना, प्रह्लाद की नाईं अडिग रहना, मीराबाई की तरह अडिग रहना ।

ऐसा दुःख या परेशानी कोई नहीं है जिसमें हमारा कल्याण न छिपा हो । इसलिए कभी भी दुःख और परेशानी आयें तो समझ लेना विधाता का विधान है । ये हमारा कल्याण करने के लिए आये हैं, आसक्ति छुड़ाने को आये हैं, संसार से मोह-ममता छुड़ाने को आये हैं । ‘वाह प्रभु, वाह तेरी जय हो !’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2021, पृष्ठ संख्या 2 अंक 338

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…तो उसी समय आत्मसाक्षात्कार ! – पूज्य बापू जी


अधार्मिक लोग तो दुःखी हैं ही लेकिन धार्मिक भी परेशान हैं, रीति-रिवाज, रस्म में, किसी धारणा में, किसी मान्यता में इतने बँध गये कि हृदय में विराजता जो एकदम नकद आत्मानंद है उसका उनको पता ही नहीं । उनकी ऐसी कुछ मान्यता हो गयी कि ‘ऐसा होगा, ऐसा होगा… तब ज्ञान होगा । कुछ ऐसा-वैसा बनेगा, कोई समाधि लगेगी तब प्रभु मिलेगा ।’ अरे, प्रभु तेरे से एक पलभर भी दूर नहीं । कुछ लोग सोचते हैं कि ‘धड़ाक धूम होगा….. कोई घोर तपस्या करेगा तब ईश्वर मिलेगा….’ और महापुरुषों के जीवन-चरित्र पढ़ते हैं कि फलाने महाराज ने 12 वर्ष तप किया, बाद में आत्मसाक्षात्कार हुआ… फलाने बाबा जी 7 वर्ष घोर तपस्या की फिर उनको ईश्वर मिला… तो आप भी ऐसा मान बैठते हैं कि ‘कुछ घोर तपस्या करेंगे फिर ईश्वर मिलेगा….’ परन्तु ऐसी बात नहीं है । वह कभी तुम्हारे से बिछुड़ा नहीं । यदि समर्थ सदगुरु मिल जाते हैं और तुम्हारी तैलीय बुद्धि ( वह बुद्धि जिसमें संकेतमात्र ऐसे फैल जाता है जैसे पानी से भरी थाली में डली तेल की एक बूँद पूरी थाली में फैल जाती है । तैलीय बुद्धि वाले को सद्गुरु ने कोई संकेत किया तो उसकी बुद्धि में फैल जाता है । फिर वह एकांत में अभ्यास करके पूर्ण स्थिति में पहुँच जाता है । एकांतवास, अल्पाहार, भगवद्-चिंतन…. श्रीयोगवासिष्ठ महारामायण में महर्षि वसिष्ठ जी कहते हैं- “एक प्रहर (अर्थात् 3 घंटे) शास्त्र-विचार, एक प्रहर सद्गुरु-सेवा, एक प्रहर प्रणव (ॐकार) जप और एक प्रहर ध्यान करे । इन साधनों से हे राम जी ! उसे शीघ्र ही भगवत्प्राप्ति हो जाती है ।”) है तो चट मंगनी, पट ब्याह !

मूवा पछीनो वायदो नकामो, को जाणे छे काल ।

आज अत्यारे अब घड़ी साधो, जोई लो नकदी रोकड़ माल ।।

अर्थात् मरने के बाद का वादा व्यर्थ है, कल का किसको पता है ? साधो ! आज, अभी इसी क्षण देख लो नकद माल ।

मान्यताओं ने आपको परमात्मा से दूर कर दिया । ऐसा कुछ सुन बैठे हैं, ऐसा कुछ समझ बैठे हैं, ऐसा कुछ देख बैठे हैं कि जिससे सब समझा जाता है, जिससे सब देखा जाता है वह नहीं दिखता, बाकी सब दिखता है । ॐॐॐ… कुछ सोचो मत । भगवान की भी इच्छा मत करो । इच्छामात्र हट यी तो उसी समय आत्मसाक्षात्कार ! नेति नेति नेति नेति नेति…. यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं करते-करते…. पुत्र तुम्हारा है ? बोलो, नहीं । पत्नी तुम्हारी है ? नहीं । पैसा तुम्हारा है ? नहीं । शरीर तुम्हारा है ? नहीं । मन तुम्हारा है ? नहीं । बुद्धि तुम्हारी है ? नहीं । चित्त तुम्हारा है ? नहीं । कार तुम्हारी है ? अरे, शरीर ही हमारा नहीं तो कार हमारी कैसे है ? दुकान तुम्हारी है ? नहीं । तुम्हारा यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं, यह नहीं…. हटाते जाओ, हटाते जाओ…. हटा-हटा कर सब हटा दो, जो हटाने वाला बचेगा वह आत्मा है, वह नहीं हटता । देखे हुए को, सुने हुए को – दोनों को हटाते जाओ, देखे हुए – सुने हुए दोनों हट गये तो जिससे सब हट उसमें शांत….

वह ज्यों का त्यों हस्तामलकवत् (हाथ पर रखे आँवले की तरह सुस्प्ष्ट एवं प्रत्यक्ष) भासेगा । भासेगा किसको ? उसी को…. स्वयं को स्वयं भासेगा !

यह भगवान के दर्शन से भी ऊँची बात है । ठाकुर जी का दर्शन हो जाय, अल्लाह का दर्शन हो जाय तो भी व्यक्ति रोयेगा लेकिन आत्मसाक्षात्कार करेगा तो फिर रोना-धोना गया । फिर अल्लाह स्वयं बन जायेगा, ठाकुर जी स्वयं बन जायेगा । फिर तुम्हारे को छूकर जो हवा चलेगी न, वह भी लोगों के पाप नष्ट कर देगी । तुम्हारी जिन पर दृष्टि पड़ेगी वे भी प्रणाम करने के पात्र हो जायेंगे । तुम्हारी दृष्टि जिन पर बरसेगी उऩके आगे यमदूत कभी नहीं आयेगा तुम ऐसे पवित्र हो जाओगे ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 5, अंक 333

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