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रामराज्य की स्थापना कैसे हो ?


श्री राम नवमीः 13 व 14 अप्रैल 2019

रामायण का आध्यात्मिक अर्थ बताने वाले संत कहते हैं कि दस इन्द्रियों में रमण करने वाला जो दशरथ ‘जीव’ है, वह कहता है कि “अब इस हृदय-गादी पर जीव का नहीं, राम का राज्य होना चाहिए ।” गुरु बोलते हैं कि “हाँ, करो !” गुरु जब रामराज्य की हामी भरते हैं तो दशरथ को खुशी होती है लेकिन रामराज्य होने के पहले दशरथ कैकेयी की बातों में आ जाते हैं ।

दशरथ की 3 रानियाँ बतायी गयी हैं – कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी अर्थात् सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण । जब रजोगुण और सत्वगुण में से हटकर दशरथरूपी जीव तमोगुण में फँसता है, कैकेयी अर्थात् कीर्ति में, वासना में फँसता है तो रामराज्य के बदले राम-वनवास होता है तो दशरथ भी चैन से नहीं जी सकता है । और समाज में देखो, कोई दशरथ चैन से नहीं है । ज्यादा या कम धनवाला, ज्यादा या कम पढ़ा, मोटा अथवा पतला, नेता या जनता…. सब बेचैन हैं । क्यों ? कि राम-वनवास है ।

आत्माराम से मुलाकात हेतु….

राम जी के साथ सीता जी थीं । ‘राम’ माने ‘ब्रह्म’ और ‘सीता’ माने ‘वृत्ति’ । राम के करीब हैं सीता किन्तु उनकी नज़र स्वर्ण-मृग पर जाती है । राम को बोलती हैं- “मुझे वह मृग ला दो !” जब सोने के मृग पर तुम्हारी वृत्तिरूपी सीता जाती है तो उसका राम से वियोग हो जाता है । सोने के मृग अर्थात् धन-दौलत पर जब व्यक्ति का चित्त जाता है तब वह आत्माराम से विमुख हो जाता है । फिर लंका अर्थात् स्वर्ण मिलता है लेकिन शांति नहीं मिलती है । उसी वृत्ति को यदि राम जी का मिलन कराना हो तो बीच में हनुमानजी चाहिए ।

जाम्बवंत को बुलाया, इसको बुलाया, उसको बुलाया… कोई बोलता है, ‘एक योजन कूदूँगा’, कोई दो योजन कहता है…. हनुमान जी 100 योजन समुद्र कूद गया । नापा जाय तो दक्षिण भारत के सागर-किनारे से लंका 100 योजन नहीं है परंतु शास्त्र की बातें गूढ़ हैं । जीवन जो 100 वर्षों वाला है, उसके रहस्य को पाने के लिए छलाँग मारने का अभ्यास और वैराग्य हो । हनुमान जी को अभ्यास व वैराग्य का प्रतीक कहा गया है । हनुमान जी सीता जी को राम जी से मिला देंगे अर्थात् अभ्यास और वैराग्य – ये वृत्ति को ब्रह्म में विलीन कर देंगे ।

वृत्ति को मजबूत बनाने के लिए….

राम जी उत्तर में हुए और रावण दक्षिण की तरफ । उत्तर ऊँचाई है और दक्षिण निचाई है । इसका तात्त्विक अर्थ है कि मनुष्य की वृत्तियाँ शरीर के निचले हिस्से में रहती हैं । जब वह काम से घिर जाता है, क्रोध से भर जाता है तो सीता अर्थात् उसकी वृत्ति नीचे आ जाती है । सीता जब रावण के करीब होती है तो ज्यादा बेचैन होती है । वह ज्यादा समय वहाँ ठहर नहीं सकती है । काम के करीब व्यक्ति की सीतारूपी वृत्ति ज्यादा समय ठहर नहीं सकती है । चित्त में काम आ जाता है तो बेचैनी आ जाती है, जब ‘राम’ आ जाता है तो आनंद-आनंद हो जाता है । रावण की अशोक वाटिका में सीता जी नजरकैद हैं लेकिन सीता में निष्ठा है तो रावण अपना मनमाना कुछ कर नहीं पाता है । ऐसे ही वृत्ति में यदि दृढ़ता है, आत्माराम के प्रति पूर्ण आदर है तो काम व्यक्ति को नचा नहीं सकता है । जैसे सीता के संकल्प को मजबूत बनाने के लिए जप, तप, स्वाध्याय, सुमिरन चाहिए ऐसे ही इन चित्तवृत्ति को दृढ़ बनाने के लिए साधन-भजन चाहिए ।

रावण कैसे मरेगा ?

रावण मर नहीं रहा था । विभीषण से पूछा गया कि “कैसे मरेगा ?”

बोलेः “जब तक आपका बाण रावण की नाभि में नहीं लगेगा तब तक वह नहीं मरेगा ।” अर्थात् कामनाएँ नाभिकेन्द्र में रहती हैं । योगी जब कुंडलिनी योग करते हैं तो मूलाधार चक्र में स्पंदन होता है, फिर स्वाधिष्ठान चक्र में खिंचाव होता है । जन्म जन्मांतरों की जो वासनाएँ, कामनाएँ हैं उनको धकेलने के लिए चित्तवृत्ति अर्थात् जो सीता माता है वह डाँटती-फटकारती है । जब डाँट-फटकार चालू होती है तो साधक के शरीर में क्रियाएँ होने लगती हैं । कभी रावण का प्रभाव दिखता है तो कभी सीता का । साधक के जीवन में कभी कामनाओं का तो कभी सद्विचारों का प्रभाव दिखता है ।

सीता जी को राम के करीब लाना है तो बंदर, रीछ – सभी साथ देते हैं । गिलहरियाँ भी साथ देने लगीं, रेती के कण उठाकर समुद्र में डालने लगीं । तुम यदि अपनी वृत्ति को परमात्मा के रास्ते लगाते हो तो प्रकृति और वातावरण तुम्हें अनुकूलता व सहयोग भी देते हैं । तुम यदि भोग की तरफ होते हो तो वातावरण तुम्हें नोच भी लेता है ।

उससे बड़ा दिन कोई नहीं !

जब तक राम नहीं आये थे तब तक अयोध्या सूनी थी । ‘राम जी आ रहे हैं’ – ऐसी सूचना जब अयोध्यावासियों ने सुनी तो नगर को सजाया है, साफ-सफाई की है । राम आने को होते हैं तो साफ-सफाई पहले हो जाती है । ऐसे ही जब परमात्म-साक्षात्कार होता है तो तुम्हारे चित्तरूपी, देहरूपी नगर के कल्मष पहले कट जाते हैं, पाप, मल1, विक्षेप2 – सब हट जाते हैं । तुम स्वच्छ, पवित्र हो जाते हो । राम जब नगर में प्रवेश करते हैं वह दिन दीपावली का दिन माना जाता है । लौकिक दीवाली व्यापारी पूजते हैं लेकिन साधक की दीवाली तो तब है जब हृदय छुपे हुए जो आत्माराम ‘काम’ के करीब गये हैं वृत्तिरूपी सीता को छुड़ाने के लिए, वे अपने सिंहासन पर आ जायें, अपने स्वरूप में जागृत हो जायें । बड़ा दिन तो वह है जब बड़े-में-बड़े परमात्म-तत्त्व का ज्ञान हो, उससे बड़ा दिन कोई नहीं ।

1 चित्त की मलिनता, जो कि काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों आती है ।

2 चित्त की चंचलता ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2019, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 315

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रामायण तात्विक अर्थ


Audio : https://media.ashram.org/hariomaudio_satsang/Ramayan-Tatvik-Arth.mp3

 

 

पाप का फल ही दुख नहीं है । पुण्यमिश्रित फल भी विघ्न है । ऐसा कौन सा इंसान है जिसको  संसार में विघ्न नहीं है।  तो भगवान महा पापी होंगे इसलिए उनको दुख आया होगा,  14 साल वन में गए।  यदि पाप का फल ही दुख होता तो राज्यगद्दी की तैयारिया हो रही है और तुरिया बज रही है नगाड़े गुनगुना रहे है और राज्याभिषेक की जगह पर अब कैकेयी का मंथरा  की चाबी  चली और रामजी को बोलते है वनवास । एक तरफ तो राज्याभिषेक की तैयारी और दूसरी तरफ वनवास का सुनकर जिनके चेहरे पर जरा करचली नहीं पड़ती,  जिनके चित्त में जरा क्षोभ नहीं होता, राज्याभिषेक को सुनकर जिनके चित्त में हर्ष नहीं होता और वनवास सुनकर जिनके चित्त में शोक नहीं होता,  ऐसे जो अपने आप मे  ठहरे है वे ही तो रामस्वरूप है ।  ऐसे राम को हजार हजार प्रणाम । ॐ…  ॐ….  ॐ…  ॐ…  ॐ…  ।

दस इन्द्रियों के बीच रमण  करने वाला दशरथ (जीव) कहता है कि अब इस हृदय गादी पर जीव का राज्य नहीं, राम का राज्य होना चाहिए और गुरु बोलते है कि हाँ ! करो । गुरु जब राम राज्य का हुंकारा भरता है तो दशरथ को खुशी होती है लेकिन राम राज्य होने के पहले दशरथ, कैकेयी की मुलाक़ात मे आ जाता है । दशरथ की तीन  रानिया बताई, कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी । सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण । जब  सत्वगुण में से,  रजो गुण मे से हटकर दशरथ (जीव),  तमोगुण में, जाता है, रजोगुण में, तमोगुण में, फँसता है, तमस मिश्रित रजस में फँसता है, कैकेयी अर्थात कीर्ति में, वासना में फँसता है तो रामराज्य होने के बदले में  राम वनवास हो जाता है।  राम का राज्य नहीं,  राम वनवास ! ओर सब है राम ही जा रहे है । फिर रामायण के आध्यात्मिक कथा का अर्थ लगाने वाले महापुरुष लोग, आध्यात्मिक रामायण का अर्थ बताने वाले संत लोग कहते है, दशरथ छटपटाता है । राम वनवास होता है तो दशरथ भी चैन से नहीं जी सकता है और समाज में देखो !  कोई दशरथ चैन से नहीं है, सब बेचैन है । ज्यादा धन वाला-कम धन वाला, ज्यादा पढ़ा- कम पढ़ा,  अधिक मित्रों वाला- कम मित्रोंवाला, मोटा अथवा पतला, नेता अथवा जनता,  देखो !  सब बेचैन है ।  क्यों ? कि  राम वनवास है । कथा का दूसरा पॉइंट यह बता रहा है कि रामजी के साथ सीताजी थी । लक्ष्मण जी थे । राम माने ब्रह्म, सीता माने वृत्ति । राधा माने धारा, श्याम माने ब्रह्म । राधेश्याम….  सीताराम….. ।  

सीता माने वृत्ति, राम के करीब है लेकिन सीता की नजर स्वर्ण के मृग पर जाती है और राम को बोलती है ला दो । जब सोने के मृग पर तुम्हारी सीता जाती है तो उसे राम का वियोग हो जाता है । सोने के मृग पर, धन दौलत पर जब हमारा चित्त जाता है तो अंदर आत्माराम से हम विमुख हो जाते है, फिर लंका मिलती है, स्वर्ण मिलता है, लेकिन शांति नहीं मिलती । उसी वृत्ति को यदि राम की मुलाक़ात करानी हो तो बीच मे हनुमानजी चाहिए । सौ  वर्ष आयुष वाला जीवन, उस जीवन को परमात्मा के लिए छलांग मार दे,  उस जीवन के भोग विलास से छ्लांग मार दे ।  जामवंत को बुलाया, उसको बुलाया, उसको बुलाया । कोई बोलता है एक  योजन कूदूंगा, कोई बोलता है दो योजन । हनुमानजी सौ योजन समुद्र कूद गए । माप करेंगे तो भारत के किनारे से लंका सौ योजन नहीं है लेकिन शास्त्र की कुछ गूढ़ बाते है । जीवन जो सौ वर्ष वाला है उस जीवन के रहस्य को पाने के लिए, छलांग मारने का अभ्यास और वैराग्य हो । हनुमानजी को अभ्यास और वैराग्य का प्रतीक कहा , जो  सीताजी को रामजी से मिला देगा । रामजी उत्तर भारत मे हुए और रावण दक्षिण  की तरफ । उत्तर ऊँचाई है और दक्षिण नीचाई है । ऐसे ही हमारी वृत्तियाँ शरीर के नीचे हिस्से मे रहती है । और जब हम काम से घिर  जाते  है तो हमारी आँख की पुतली नीचे आ जाती है । जब हम क्रोध से भर जाते है तो हमारी सीता नीचे आ जाती है और सीता जब रावण के करीब  होती है तो बेचैन होती है, ज्यादा समय  रावण के वहाँ ठहर नहीं सकती । काम के करीब हमारी सीता ज्यादा समय ठहर नहीं सकती । चित्त मे काम आ जाता है, बेचैनी आ जाती है और लेकिन  चित्त में राम आ जाता है तो आनंद आनंद आ जाता है । रावण की अशोक वाटिका मे सीताजी नजर कैद है लेकिन सीता में यदि निष्ठा है तो रावण अपना मनमाना कुछ कर नहीं सकता है। ऐसे ही हमारी वृत्ति मे यदि दृढ़ता है राम के प्रति पूर्ण आदर है तो काम हमे नचा नहीं सकता । उस दृढ़ता के लिए साधन और भजन है।  चित्तवृति को दृढ़ बनाने के लिए, सीता के संकल्प को मजबूत बनाने के लिए तप चाहिए ,जप चाहिए, स्वाध्याय चाहिए, सुमिरन चाहिए ।  

जब कामनाएँ सताने लगे, नरसिंह भगवान ने जैसे कामना के पुतले को फाड़ दिया ऐसे ही काम को चीर दे, नरसिंह अवतार का चिंतन करने से फायदा होता है । इस कथा की आध्यात्मिक शैली को जानने वाले संतों का ये भी मानना है कि रावण मर नहीं रहा था और विभीषण से पूछा कि कैसे मरेगा ? बोले डुंटी  (नाभि ) में आपका बाण जब तक नहीं लगेगा तब तक वो रावण नहीं मरेगा अर्थात कामनाए नाभि केंद्र मे रहती है । योगी जब कुण्डलिनि योग करते है तो मूलाधार चक्र मे जंपिंग होता है और फिर स्वाधीस्थान चक्र मे खिंचाव होता है, पेट अंदर आता है बाहर जाता है, साधक लोग, तुम लोगो को भी अनुभव है । वो जन्म जन्मांतरों को कामनाए है, वासनाए है, उनको धकेलने के लिए हमारी चित्तवृत्ति हमारी जो सीता माता है, उस काम को धकेलने के लिए डांटती फटकरती है और जब डांट फटकार चालू होती है तो साधक के  शरीर मे क्रियाए होने लगती है। देखो समन्वय हो रहा है कथा का और कुण्डलिनि योग का । कभी कभी तो रावण का प्रभाव दिखता है और कभी कभी सीताजी का प्रभाव दिखता है । दोनों की लड़ाई चल रही है है । कभी कभी तो साधक के जीवन मे कामनाओं का प्रभाव दिखता है और कभी कभी तो सद्विचारों का प्रभाव दिखता है। अयोध्या को कहा कि नौ द्वार थे  । ऐसे ही तुम्हारा शरीर रूपी अयोध्या है, इसमे भी नौ द्वार है और नौ द्वार में जीने वाला ये जीव जो दशरथ है, राम को वनवास कर दिया कैकेयी के कारण, छटपटा के प्राण त्याग कर देता है । राम राम कही राम  हाय राम …. तव विरह में तन तजी राज=हू गयो सुरधाम । जब सीताजी को राम के करीब लाना है तो बंदर भी साथ देते है । रीछ भी साथ देते है । और तो क्या भी खिचकुलिया भी साथ देने लगी कण कण उठा कर रेती का और समुद्र मे डालने लगी तुम यदि रामजी और सीता की मुलाक़ात के रास्ते चलते हो, तुम्हारी वृत्ति को परमात्मा की ओर लगाते हो तो पृकृति और वातावरण तुम्हें अनुकूलता भी देता है, सहयोग भी देता है और तुम  यदि भोग कि तरफ होते हो तो वातावरण तुम्हें नोच भी लेता है ।

अयोध्या सुनी सुनी थी तब तक, जब तक राम नहीं आए जब राम आ रहे है, ऐसे खबर सुनी अयोध्या वासियो ने तो नगर को सजाया और नगरवासियों ने साफ सफाई की । राम आने को है, राम आने को होते है तो साफ सफाई पहले हो जाती है ऐसे ही तुम्हारा चित्त रूपी नगर अथवा देह रूपी नगर, जब परमात्म साक्षात्कार होता हो तो कल्मष तुम्हारे पहले कट जाते है। तुम्हारे पाप तुम्हारा मल, विक्षेप हट जाता है। तुम स्वच्छ पवित्र हो जाते हो  और राम जब नगर मे प्रवेश करते है वो दिन दीवाली का दिन माना जाता है। लौकिक दीवाली व्यापारी पूजते है लेकिन साधक की दिवाली तब है जब हृदया मे छुपे हुए राम जो है न,  काम के करीब गए है सीता को छुड़ाने के लिए,  वो राम जब अपने सिंहासन पर आ जाए और अपने स्वरूप मे जाग्रत हो जाए उस दिन साधक की दिवाली। बड़ा दिन तो वह है कि बड़े मे बड़ा जब परमात्वतत्व का ज्ञान हो  उससे बड़ा दिन कोई नहीं । लब पर किसी का नाम लूँ तो तेरा नाम आए । ॐ …. ॐ  

….फिर आपकी बुद्धिरूपी कौसल्या के यहाँ राम प्रकटेंगे


-पूज्य बापू जी

(श्रीरामनवमीः 25 मार्च 2018)

दशरथ व कौसल्या के घर राम प्रकट हुए।

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।

कोसल देश की वह कौसल्या…. अर्थात् योगः कर्मसु कौशलम्। कुशलता पूर्वक कर्मवाली मति कौसल्या हो जायेगी और कौसल्या के यहाँ प्रकटेंगे दीनदयाला। इस कुशल मति का हित करने वाले सच्चिदानंद राम प्रकट होंगे। दस इन्द्रियों में रमण करने वाले जीव दशरथ हैं। दशरथ को रामराज्य की इच्छा हुई कि ‘अब बाल पक गये हैं…. कितना भी देखा, सुना, भोगा लेकिन आखिर क्या ?…. अब राम राज्य हो।’ दशरथ चाहते हैं रामराज्य। दस इन्द्रियों में रत रहने वाला जीव विश्रांति चाहता है वृद्धावस्था में, सुख शांति चाहता है, झंझटों से उपरामता चाहता है।

रामराज्य की तैयारियाँ हो रही हैं, राज्याभिषेक की शहनाइयाँ बज रही हैं, मंगल गीत गाये जा रहे हैं लेकिन दस इन्द्रियों में रत जीव की रामराज्य की तैयारियाँ होते-होते यह दशरथ कैकयी के कहे सुने मं आ जाता है अर्थात् कामनाओं के जाल में फँस जाता है। रामराज्य की जगह राम-बनवास हो जाता है। तड़प-तड़पकर यह दशरथ संसार से विदाई लेता है। यह दशरथ का जीवन, कौसल्या का जीवन आपके जीवन से जुड़ा है, राम का अवतरण आपके अंतर्यामी राम से जुड़ा है। राम करें कि आपको राम का पता चल जाय।

रमन्ते योगिनः यस्मिन् स रामः।

जिनमें योगी लोगों का मन रमण करता है वे हैं रोम-रोम में बसने वाले अंतरात्मा राम। वे कहाँ प्रकट होते हैं ? कौसल्य् की गोद में, लेकिन कैसे प्रकट होते हैं कि दशरथ यज्ञ करते हैं अर्थात् साधन, पुण्यकर्म करते हैं और उस साधन पुण्य, साधन यज्ञ से उत्पन्न वह हवि बुद्धिरूपी कौसल्या लेती है और उसमें सच्चिदानंद राम का प्राकट्य होता है। आपकी मतिरूपी कौसल्या के स्वभाव में राम प्रकट हों। वे राम कैसे दीनदयालु हैं ? ब्रह्मांडों में व्याप्त सच्चिदानंद नररूप में लीला करते हैं।

नराणामयनं यस्मात्तेन नारायणः स्मृतः। (वायु पुराणः 5.38)

नर-नारियों के समूह में जो सच्चिदानंद परमात्मा व्याप रहा है उसे ‘नारायण’ कहते हैं। रोम-रोम में रम रहा है इसलिए उसे ‘राम’ भी कहते हैं।

अर्जुन ने श्रीकृष्ण से प्रश्न किया था कि ‘प्रभु ! आपमें प्रीति कैसे हो और आपको हम कैसे जानें ?’ तब भगवान ने करूणा करके कहाः

एतां विभूतिं योग च मम यो वेत्ति तत्त्वतः।

सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।। (गीताः 10.7)

जो मनुष्य मेरी इस विभूति (भगवान का ऐश्वर्य) को और योग (अनंत, अलौकिक सामर्थ्य) को तत्त्व से जानता है अर्थात् दृढ़ता से स्वीकार कर लेता है वह अविचल भक्तियोग से युक्त हो जाता है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है।

एक तो भगवान की विभूति और दूसरा भगवान का योग – इन दोनों को इस व्यापक, साकार संसार में निहारने का नजरिया आ जाय। सही नजरिया खो जाता है तो जीव आसुरी वृत्ति का आश्रय लेता है। कहता हैः ‘कुछ भी करो, सुखी हो जाओ। कुछ भी बोलो, सुखी हो जाओ। कुछ भी खाओ, सुखी हो जाओ।….’ अंत में बेचारा दुःखी हो जाता है। वही बोलो जो बोलना चाहिए, वही सोचो जो सोचना चाहिए, वही करो जो करना चाहिए, वही पाओ जिसे पाने के बाद कुछ पाना बाकी  नहीं रहता।

जो बिछड़े हैं प्यारे से,

दर बदर भटकते फिरते हैं।

उस प्यारे रोम-रोम में रमने वाले सच्चिदानंद से जो बिछुड़े हैं वे सोचते हैं, ‘यहाँ जाऊँ तो सुखी हो जाऊँ, यूरोप जाऊँ तो सुखी हो जाऊँ…..’ लाला ! तू एक ऐसी जगह जा कि जहाँ जाने के बाद तेरी दृष्टि ही लोगों को सुखी कर दे। ऐसा है तेरा सच्चिदानंद रामस्वरूप ! तू उसमें जा। उसमें जाने की बुद्धि ले आ। कैसे मिलेगी ? योगः कर्मुस कौशलम्। कर्म करने में कुशलता रखने से। कैसा कर्म ? स्वाद के लिए कर्म नहीं अपितु शाश्वत सुख के लिए कर्म हो तो आपका योग कुशलतापूर्वक हो जायेगा और फिर आपकी बुद्धिरूपी कौसल्या के यहाँ राम प्रकटेंगे।

बच्चा है न, उसके सामने लॉलीपॉप, चॉकलेट, बिस्कुट, हीरे-मोती, जवाहरात रख दो तो वह क्या करेगा ? हीरे-मोती, जवाहरात छू के छोड़ देगा और लॉलीपॉप, चॉकलेट जल्दी सुख का आभास देने वाले हैं, जल्दी ललक पैदा करने वाले हैं उनमें फँसेगा क्योंकि बुद्धि अकुशल है। वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब उसके आगे, तुम्हारे आगे मैं हीरे जवाहरात रख दूँ और लॉलीपॉप, चॉकलेट रख दूँ तो तुम क्या उठाओगे मुझे पता है। आपकी जैसे इस जगत में बुद्धि कुशल हुई, वैसे इस जगत की गहराई में आत्मिक जगत है, उसका ज्ञान पाने में बुद्धि का कुशल हो जाना मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है।

तीन जगत हैं। एक यह जो आँखों से दिखता है, इसे स्थूल जगत कहते हैं। दूसरा वह है जो इन आँखों और इन्द्रियों से नहीं दिखता फिर भी उसकी सत्ता के बिना यह शरीर और इन्द्रियाँ चल नहीं सकतीं। वह दिव्य जगत है। तीसरा होता है तात्त्विक जगत। यह सर्वोपरि सत्ता है जिससे स्थूल और दिव्य दोनों जगत संचालित होते हैं। आपके कर्मों में कुशलता आयेगी तो आप लौकिक कर्म करते हुए भी दिव्य जगत और फिर तात्त्विक जगत में प्रवेश पा लोगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 12 अंक 303

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