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अद्भुत था गुरु अर्जुन देव जी का अपने गुरु के प्रति हृदयस्‍पर्शी भाव


गुरु के चरण कमल में आत्मसमर्पण करना यह शिष्य का आदर्श होना चाहिए। गुरु की कृपा अखूट असीम और अर्वननीय है। श्री गुरु अर्जुन देव जी भी एक बार गुरु से बिछोह के दौर से गुजरे थे। विरह के दौर से गुजरे उनके गुरु श्री रामदास जी ने उन्हें किसी विवाह उत्सव पर स्वयं से दूर लाहौर भेज दिया। साथ ही यह आज्ञा भी दी कि जब तक वापस लौटने का संदेश ना मिले तब तक वहीं ठहर कर संगत की अगुवाई करना ।गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर श्री अर्जुन देव जी लाहौर आ गए ।कुछ दिनों के पश्चात उत्सव संपन्न हुआ। दिन बीतने लगे सप्ताह बीता और अब तो एक महीना बीतने को था। परंतु गुरु दरबार से ना कोई बुलावा आया ना कोई संदेश.. अब क्या था उनका मन अकुलाने लगा विरह वेदना तीव्र से तीव्रतर होने लगी। रह रहकर मन में यही भाव तरंगें उठती कि, गुरूवर मैं यहां निपट अकेला हूं। कैसे बताऊं कि तुम बिन मेरे दिन कैसे गुजरते हैं। तुम्हारी जुदाई मुझे कितना सताती है। यहां एक एक पल एक एक कल्प जैसा लग रहा है, मानो मेरा जीवन ही ठहर गया हो ।अब और विलंब ना करो.. सच्चे बादशाह.. मुझे वापस बुला लो.. दोबारा अपने चरणों में स्थान दे दो। जब स्थिति असहनीय हो गई, तो उन्होंने इन भावों को शब्दबध्द करके अपने गुरु को एक पत्र लिखा। मेरा मन लोचे गुरुदर्शन ताई बिलप करे चात्रिक के नाई।अर्थात जैसे एक चातक पक्षी दिन रात पृथ्वी जल स्त्रोतको त्याग कर सिर्फ और सिर्फ स्वाति नक्षत्र की बूंद की आस में प्यासा रहता है। वैसे ही मेरा मन भी गुरुदेव… आपके दर्शन के लिए तड़प रहा है।ओ तो गुरु निराकार रूप में शिष्य के ह्रदय मंदिर में सदा समाए होते हैं। सुक्ष्म स्पंदन बनकर उसकी सांसों में रमण करते रहते हैं ।राइभर की भी दूरी नहीं है। परंतु फिर भी शिष्य गुरू के साकार मुरत को निहारना चाहता है। उनकी आंखें ना जाने.. क्यों.. शिष्यों की आंखें ना जाने क्यों.. सदा गुरु दरश को बावरी रहती हैं।किसीने एक शिष्य से पूछ ही लिया कि एक बार गुरु दरशन कर लेने बाद, बार-बार.. फिर फिर से.. देखना आवश्यक है क्या?शिष्य ने कहा है “हा.. है ।”क्यों कि यह हर क्षण नूतन होने वाला सौंदर्य है। जितनी बार देखता हूं उतनी बार मुझे गुरु के रूप में नई छवि ,नई शोभा का दर्शन होता है। बाबा फरीद जी कहते हैं.. *कागा करंग ढंढोलिया सगला खाईया मासु* ए कागा तु चाहे तो मेरे शरीर की बूटी बूटी नोच ले परंतु मेरी आंखों को बख्श देना इनको मत छेड़ना क्योंकि.. *ए दोई नयना मती छुवहु पीर देखन की आस*मैंने इन्हे गुरु के दीदार के लिए बड़ा सहेज कर रखा है। इनमें हर पल गुरु दर्शन की प्यास बनी हुई है।सचमुच गुरू भक्ति के मार्ग पर इन भावुक आंखों की भूमिका भी बड़ी निराली है । जब गुरू सामने होते हैं तो यह उनके दरस का आनंद लेती हैं। और जब गुरु दूर जाते हैं तो यही उनकी बाट जोहती है। उनकी विरह मे छम छम बरसात करती हैं।इस विषय में मस्त मलंग संत रामतीर्थ जी ने भी खूब कहा कि, यदि लूटना हो तुझे वर्षा का मजा तो आ मेरी आंखों में बैठ जा यहां काले भूरे और लाल तरह-तरह के बादल सदा झड़ी लगाए रहते हैं। यू तो प्रेम की सबसे उँची स्थिति यह मानी जाती है कि प्रिय के बिछुड़ते ही प्राण छुट जाए ईसी ओर लक्ष्य करके माता सीता जी कहती है..कि हे प्रभु आप अलग होते ही मुझे मर जाना चाहिए था लेकिन हे नाथ! यह तो मेरे नेत्रों का अपराध है, *नाथ सु नयन ही कोआपराधा* यही मेरे प्राणों को हठपूर्वक बांधे हुए है क्योंकि इन्हें पुनः आपको देखने की लालसा है। आपके लीलाओं के दर्शन की लालसा है ।आगे कहती है माता सीता कि हे प्रभु ! यह रूई जैसा शरीर कबका विरह अग्नि में सांसों की हवा पाकर भस्म हो चुका होता लेकिन इन आँखों ने इसे बचाए रखा है।ये निरतंर आपके याद मे रोती रहती है। इनसे निकलते अश्रु धारा शरीर को विरह अग्नि में जलने नही देती इसलिए मेरे प्राण निकल नहीं पातेनयन स्रवही जन निज हित लागी जरेए न पाव देह बिरहागी।। कैसा ह्रदय स्पर्शी और भावपूर्ण चित्रण है यह भावों कि ऐसी उच्चावस्था है जहां आँखे बोला करती है। अब आँखों के पास शब्द तो है नहीं इसलिए आप आँसू बहाकर ये अपनी व्यथा कहा करती है। यह गति बुल्लेशाह की भी हुई जब उनके गुरू हजरत इनायत उनसे रुठ गए। उन वियोग के क्षणों में उनकी आंखों पर क्या क्या गुजरी वे एक काफी के माध्यम से बड़ा सुदंर बया करते हैं किहुजरु पीर अँखीया वीच रड़के। दुख दिया वागंन फोड़े मै रोवा तैनु याद करके।।तेरी याद में रो रो कर मेरी आँखें फोड़े की तरह दुखने लगी है। साईं मैं रो-रोकर अंधा हो चुका हूं क्योंकि तेरे बिना बस रोना ही रोना है। *जदु मीठ्ठी नींदे सोंदी है खुदाई, सौह रब दी ना अख कदे लाई, मै रोवा तैनु याद करके।* आधी रात के समय जब सारा संसार सो जाता है सभी नींद में मग्न होते है देखो तब भी ये आंखें तेरी याद में रोती रहती है । इन नैनों में नींद कहां और यदी भुल से कभी नींद आने भी लगती है तो तेरी याद इन्हें ताना देती है। बस यहीं था तेरा मुर्शीद से इश्क.. कल तक तो तुम दीदार के लिए रोती थी आज गुरु से दूर होते ही उनमे बैरन नींद को जगह दे दी।एक बार किसी भावुक गोपी ने स्वप्न में प्रभु के दर्शन किए। सुबह ऊस गोपी ने स्वप्न मिलन की घटना दुसरी गोपी को सुनाई उस प्रेम में गोपी ने कहा धन्य हो गोपी जो तुम स्वप्न में तुम प्रभु से मिल लेती हो। परंतु यहां तो यहां तो प्राण प्यारे कन्हैया के जाने के बाद बैरन नींद भी छोड़ कर चली गयी है। *कही चुरा ले चोर न कोई दर्द तुम्हारा याद तुम्हारी इसलिए जाग कर जीवन भर आँसुओं ने की पहरेदारी।*विरह की यह भाव अवस्था बुद्धि का विषय नहीं है। इसे समझने के लिए तर्कयुक्त बुद्धि नहीं प्रेम भरा ह्रदय चाहिए यही कारण था कि उद्धव जी की शास्त्र विद बुद्धि ब्रज की सीधी साधी गोपियों के निश्चल प्रेम के आगे हार गई।वे रोती हुई गोपीयो के लिए प्रभु कृष्ण का संदेश लेकर आए थे उनके सिर पर ज्ञान की गठरी थी तो गोपीयो के आँखों मे विरह वेदना का नीर। वे अपने ज्ञान वैराग्य और तर्को से गोपीयो की गीली पलके सुखा देना चाहते थे। परंतु हुआ कुछ उलटा ही गोपियों ने ही उनके ह्रदय की खाली गागर में प्रेम का जल भर दिया। उनके जीवन में भक्ति व प्रेम का नया अध्याय खोल दिया। उन्होंने वापस मथुरा पहुंच कर प्रभु कृष्ण को उलाहवना देते हुए कहा कि आपने गोपियों को क्या दिया ? सिर्फ आँसू प्रभु यह ठीक नहीं किया आपने। वे आपसे कितना प्रेम करती हैं और आप उन्हें दर्द देते है।तब प्रभु श्रीकृष्ण ने भक्तिपद का एक मार्मिक सत्य उजागर किया। हे उधव! तुम क्या जानो मैंने गोपियों को क्या दे दिया है, मेरे खजाने का सबसे अनमोल रत्न है वीरह इसे ही मैंने उन पर वार दिया। वस्तुतः सत्य यही है कि, जिसपर तुम हो रीझते उसे क्या देते यदुवीर,* *रोना-धोना ,सिसकना ,आंहो की जागीर। भला यह कैसी तुकबंदी रोना-धोना, और जागीर । बात समझने वाली है दरअसल विरह अग्नि के समान होता है यू तो अग्नि का स्वभाव होता है जलाना परंतु विरह एक ऐसी अग्नि है जिसमे तपीश नही शीतलता है आँच नही ठंठक है। तभी तो विरह की अवस्था में भी परम आनंद का अनुभव होता है। आंखों से बरसते आंसुओं में भी अलौकिक रस भरा होता है।इसलिए विरह निःसंदेह एक शिष्य..एक भक्त के लिए सबसे अमुल्य नीधि है। बाबा फरीद कहते हैं विरहा तु सुलतानु विरह तो शाहों का शाह है।निर्मल और पवित्र कर देने वाली सबसे उँची भावना है।फरीदा जिस तनु बिरह जाहु न उपजे सो तन जानू मसानजिस ह्रदय मे विरह नहीं वह मानव स्मशान के तरह है।बेजान और निष्प्राण है ।इसलिए धन्य है वे भक्तजन जिनके भीतर प्रभु… गुरू विरह उमड़ती है।धन्य है वे आंखें जो गुरूप्रेम मे रोया करती हैं। वह ह्रदय जिससे प्रेम रस की धाराएं फुटा करती है वे आहे जो पल प्रतिपल गुरू को पुकारा करती है।

ऐसा ज्ञान पक्का हो जाये तो मौज ही मौज हो जायेगी


भगवतगीता के छठे अध्याय के 31 वें श्लोक में भगवान कहते हैं :

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।

बड़ी ऊँची बात भगवान कहते हैं, दुनिया के किसी पंथ और मजहब में ऐसी बात नहीं मिलेगी: 

‘‘मेरे में एकीभाव से स्थित हुआ जो योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है वह सब-कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरे में ही बर्ताव कर रहा है अर्थात वह पुरूष सर्वथा मेरे में ही स्थित है।’’   

 बहुत सूक्ष्म बात है, आम-आदमी न भी समझ सके फिर भी इस बात को सुनना तो बडा पुण्यदायी है। ‘‘मेरे में एकीभाव से स्थित हुआ जो योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है वह सब-कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरे में ही बर्ताव करता है अर्थात वह सर्वथा मेरे में ही रहता है, स्थित है।’’   

मरने के बाद भगवान मिलेंगे, ये बात दूसरी है लेकिन यहाँ जीते-जी ‘भगवान में आप और आपमें भगवान’- ऐसा अनुभव करने की बात गीता कहती है। ये भगवान का अनुग्रह है।

अनुग्रह किसको बोलते है? ‘अनु’ माना ‘पीछे’, ‘ग्रह’ माना ‘जो पकड़ ले’।  आप जा रहे हैं और आपका ऐसा कुछ रास्ता है कि आपके परम हितैषी मित्र चाहते हैं कि‍ ये चले जाएंगे, उधर ये हो रहा है, वो हो रहा है, कहीं फँस न जाए। आपको कल समझाया।  किसी के द्वारा आपको समझाया गया, फिर भी आप जा रहे हैं और वो चुपके से पीछे आकर आपको दो भुजाओं में जकड़ ले, पकड़ ले, पता ही न चले, उसको बोलते हैं ‘अनुग्रह’। ‘अनु’ माना ‘पीछे’, ‘ग्रह’ माना ‘ग्रहण कर ले, पकड़ ले’।  

तो ये भगवान का…  ‘गीता’ भगवान का ‘अनुग्रह’ है, ‘धरती’ भगवान का ‘अनुग्रह’ है, ‘जल’ भगवान का ‘अनुग्रह’ है।  भगवान ‘अनुग्रह’ करते हैं तो भगवान के उपजाये हुए पाँच भूत भी भगवान के अनुग्रह के भाव से संपन्न है।  पृथ्वी कितनी कृपा करती है कि‍ हमको ठौर देती है और हम धान बोते हैं और अनंत गुना करके देती हैं।  चाहे उस पर गंदगी फेंको, चाहे खोदो, चाहे कुछ करो लेकि‍न पृथ्‍वी मनुष्यों को, जीवों को अनुग्रह करके ठौर देती है, रहने की जगह देती है, धन-धान्य, अन्न-फल आदि देती हैं। ऐसे ही ‘पृथ्‍वी’ पर अनुग्रह कर रहा है ‘जल’। ‘जल’ भी हम पर अनुग्रह कर रहा है और ‘पृथ्‍वी’ को भी स्थित रखता है। ‘जल’ पर अनुग्रह है ‘तेज’ का,  ‘तेज’ पर अनुग्रह है ‘वायु’ का और ‘वायु’ पर अनुग्रह है ‘आकाश’ का…  ‘आकाश’ उसको ठौर देता है और ‘वायु’ उसमें ही विचरण करता है और ‘आकाश’ पर अनुग्रह है ‘प्रकृति’ का और ‘प्रकृति’ भगवान की ‘शक्ति’ है। भगवान की शक्ति और भगवान दिखते दो हों फिर भी एक हैं। जैसे ‘पुरूष’ और ‘पुरूष’ की ‘शक्ति’ भिन्न नहीं हो सकती। भई आप तो रोज का दिहाड़ी का साठ रूपया दीजिये और आपकी शक्ति का सौ रूपया अलग, ऐसा नहीं होता। कोई भी पुरूष अपनी ‘शक्ति’ अपने से ‘अलग’ दिखा नहीं सकता। जय रामजी की… । ‘आप’ में जो ‘शक्ति’ है, ‘आप’ अलग हो जायें और ‘शक्ति’ अलग हो जाये, ये नहीं होता।

तो शक्ति और शक्तिवान एक, ऐसे भगवान और भगवान की शक्ति, आद्यशक्ति जिसको ‘जगदम्बा’ भी कहते हैं,  ‘काली’ भी कहते हैं, ‘भगवती’ भी कहते हैं, वैष्णव लोग जिसे ‘रा…धा’ कहते हैं, वैष्णव लोग जिसे ‘श्री’ कहते हैं। ‘श्री’ भगवान की अभिन्न शक्ति है और भगवान की अभिन्न शक्ति जो ‘श्री’ देवी हैं वो ‘राधा’ हैं।  ‘रा…धा’ उलटा दो तो ‘धा…रा’। आपके अंतरात्‍मा की जो सुरता है, जो धारा है वो अंतरात्‍मा से अलग नहीं हो सकती। अब उस धारा को केवल ठीक से समझ कर ठीक से बहने दो तो आपको ‘धारा’ कृष्ण से मिला देगी। अगर धारा को ठीक से समझा नहीं, ठीक से बहाया नहीं तो वो धारा आपको चौरासी लाख जन्मों में घुमाएगी। वो लोग सचमुच में महा अभागे हैं जिनको सत्संग नहीं मिलता।  

जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना… जिन्होंने मनुष्य जीवन पाकर अपने कानों से भगवतकथा नहीं सुनी उनके कान साँप के बिल जैसे हैं।

संत तुलसीदासजी कहते हैं : 

                    जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहि‍ भवन समाना।। 

                         जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।।

जो भगवदगुणगान नहीं करते उनकी जिव्‍हा मेंढक की जिव्‍हा जैसी है । मनुष्य में दो शक्ति है- एक देखने की शक्ति और दूसरी चिंतन करने की शक्ति। आप भगवान के श्रीविग्रह को देखो। भगवान की करुणा कृपा से ये पाँचभूत कितने-कितने उदार हैं उनको देखो।  कल-कल, छल-छल बह रहा है जल, उसमें देखो कि भगवतीय अनुग्रह ही तो बह रहा हैं।  इसी जल से औषधि‍याँ बनती है, इसी जल से अन्न बनता है, इसी जल से गन्‍ना बनता है और इसी जल से मिर्च बनती है। यह भगवान का जल पर अनुग्रह है और जल का हम पर अनुग्रह है। वाह प्रभु! तेरी लीला अपरंपार है… आप हो गये – यो मां पश्यति सर्वत्र… 

       आँख बंद करके भगवान का ध्यान करनेवाले योगियों की तरह आप सब समाधि लगाओं, ये संभव नहीं लेकिन योगियों को जो फल मिलता है वह फल आपको खुली आँख, खेत-खली, मकान-दुकान और घर में, जहाँ-तहॉं आपको फलित हो जायेगी, ऐसा ज्ञान बता रहे हैं.. कृष्ण।  

हवा लगी, आहा..  ठंडी हवा लगी, उसके बदले में क्या दिया?  ये वायुदेव का अनुग्रह है और वायु में चलने की सत्ता का अनुग्रह मेरे प्रभु का है। मेरे रब तेरी जय हो… ।  गरमी लगी तो हाय! गरमी। लू आ रही है, सर्दी के बाद गर्मी आती है, शरीर में जो कफ जमा हो गया है नाडियों में, उसको पिघलाने के लिये । तो वायु को गरम करके बाहर आयें तो तेरी लीला अपरंपार है ।  जय रामजी बोलना पडेगा ।  

नन्हा-मुन्ना:  पापा…  माँ…  अरे मेरे बेटे…, बेटे को स्नेह तो करो लेकिन बेटे के दिल में तो धडकनें तुम्‍हारे परमेश्वर की ही है, वो परमेश्वर तुम्‍हारा माँ बोल रहा है, मैं तो प्रभु तेरी माँ हूँ, ऐसा विचार करो  । तो मुन्ने की माँ होकर, ममता करके, मुन्ना बड़ा होगा.. डॉक्टर बनेगा…  लोगों का शोषण करेगा..  मर्सीडिस लायेगा…  ऐसी दुआ करने की जरूरत ही नहीं । बच्चा बड़ा बनेगा… और सब में अपने पिया को देखेगा। अभी तो वो बच्चा मेरा नारायण रूप है… मेरा रामजी रूप है… मेरा तो बच्चा । वहां ममता नहीं भगवान की प्रीति करो, वो आपका भजन हो गया, बच्चे को प्यार करना भी आपका भजन बन गया, जय रामजी बोलना पड़ेगा।

चलो तो चलें जरा आसमान देखें, नजदीक जाकर निहारे…

आसमान में सब तारा..   तारों का चाँद भी तू…  

तेरा मकान आला…  जहाँ-तहॉं बसा है तू...

चलो तो चलें जरा बाजार देखें, बाजार जाकर निहारे…

बाजार में सब आदम... आदम का दम भी तू,

तेरा मकान आला…  जहाँ-तहॉं बसा है तू...

मेरे रब तेरी जय हो… कहीं जाटरूप तो कहीं बनियारूप, कहीं वकीलरूप तो कहीं नेतारूप तो कहीं जनता रूप, कहीं चोररूप तो कहीं सिपाहीरूप । तेरे क्‍या-क्‍या रूप और क्या क्या लीला है। हे मेरे प्रभु तेरी जय हो ।  आपके बाप का जावे क्या और भजन होवे पूरा, तेल लगे न फिटकरी..  रंग चोखो आवे, चोखो रंग आवे चोखो… ।  आप एक बात पक्की मान लो कि आप संसार में भैंसे की नाईं बोझा ढोने के लिये पैदा नहीं हुए, आप संसार में पच मरने के लिये, चिंता की चक्‍की में पिस मरने के लिए नहीं आए, आप टेंशन के शिकार होने के लिये संसार में नहीं आए।  हाय! हाय! हाय! हाय! कमाय! खाय! कमाया खाया… धरा और मृत्यु का झटका लगा और मर गये और प्रेत होकर भटके, मर गये और भैंसे बन गये, मर गये और किसी योनि में चले गये, इसलिए आप संसार में नहीं आए हैं।  आप तो संसार में आए कि संसार का कामकाज करते हुए, संसार के स्वामी की सत्ता से सब करते है, और उसी की सत्ता से उसी को देखकर खुशहाल होते हुए उससे निहाल हो जाने के लिये आए हैं।  ये पक्का कर लो।

A WILL WILL FIND A WAY... जहाँ चाह, वहॉं राह...

आप अपना हौंसला बुलंद और ईरादा शुद्ध कर लो बस।  घर से निकले, इरादा किया मंच पर पहुंचेंगे, सत्‍संग में पहुंचेगें तो आ गये न, ऐसे ही जीवन में ईरादा बना लो, परमात्मा तक पहुंचेंगे, परमात्मा का सुख उभारेंगे, परमात्मा का ज्ञान पाएंगे, परमात्मा का आनंद पाएंगे और अंत में परमात्मा से एक हो जाएंगे। ऐसा निर्णय करने से आपका तो भला हो जाएगा, आपके जो दीदार करेगा उसका भी पुण्य उभरने लग जायेगा। भाई साहब ऐसी बढि़या बात है… जय रामजी की।  

सासु कहती है- ये क्या जाने, कल की छोरी, मेरे बेटे को क्या रूचता है और क्या खाने से बेटा बीमार होता है, और क्या खाने से तंदरुस्त होता है ! हॅूं..  चल दूर बैठ! मैं खाना बनाती हूँ, बेटे इसके हाथ का मत खाना… छिनाल का। मैं देती हॅूं बनाकर…।  बहू कहती है- चल री बुढिया, तुझे क्या पता, ये तो मेरा प्राणनाथ है, मेरा पति है, मैं इससे शादी करके आयी हूँ, तेरे साथ थोड़ी शादी की है मैनें। हम और हमारे पति.. हम खाएंगे-पीएंगे, मौज करेंगे, तू जल्‍दी मर…। ननंद कहती है कि भाभी! ऐसा बक मत नहीं तो तेरी चोटी खींच लूंगी, मेरे भैया को तो मैं जानती  हूँ।  

अब भैया को तो प्यार तो  बहन भी करती है, भैया को प्यार तो माँ भी करती है, उसी व्यक्ति को प्यार पत्नी भी करती है, लेकिन अपना भेद बनाकर…। सासू-बहू, ननंद-भाभी लड़ाई-झगड़ा करती है… अपनी संकीर्णता है। जय राम जी की। जो व्यक्ति तेरा, ननंद का भैया है वही भाभी का पति है और वही माँ का बेटा है। ऐसे ही वही सभी का है बाप, सभी का बेटा, सभी का मित्र और सभी का साथी है, ऐसा ज्ञान जब पक्का हो जाए तो मौज ही मौज हो जाए।  

चलो तो चलें जरा बाजार देखें

बाजार में सब आदम, आदम का दम भी तू

तेरा मकान प्यारा, आला! सबमें बसा है तू

चलो तो चलें जरा किश्‍ती देखें दरिया में

दरिया में मिले राहिब, राहिब का रब भी तू

तेरा मकान आला, जहा तंहा बसा है तू

कीड़ी में तू नानो लागे, हाथी में तू मोटो क्यूं

बण महावत ने माथै बैठो, हाँकण वालो तू को तू

ऐसो खेल रच्‍यो मेरे दाता, जहाँ देखूँ वहाँ तू को तू

बण बालक ने रोवा लाग्‍यो…  उंवाँ… उंवाँ… उंवाँ…. अरे रे रे रे… ये देखो चुहिया! क्‍या नाम है गुगलु… ये देख ले! वो रोनेवाले में भी तू बैठा है और चुप कराने वाले में कौन बैठा है..

बण बालक ने रोवा लाग्‍यो, छानो राखण वालो तू

ले झोली ने मागण लाग्यों… ऐ बेन… रोटी टुकडा दे दे… भूखी-प्यासी हॅूं… ऐ भईया आजा…  इधर ले ये मोहनथाल…. ले जा…  मेरी बहू को मत बताना नहीं तो मरे को डांट देगी… आजकल की पढ़ाई की लडकियाँ…  ये सासू की इज्‍जत नहीं करती… फिर बोलेगी इतना सारा दे दिया… बेटी तू भूखी है न.. लेजा.. लेजा… अपने बच्चों को खिलाना, लेजा मोहनथाल लेजा…  पर बहू को मत बताना, चुपके से ले जा, ये पांच रुपये ले जा.. ।

वो भि‍खारन मैं भी तू बैठा है और वो सासू में भी तू बैठा है और वो जिससे लड़ रही है उस बहू में भी तू बैठा है…।  लड़नेवाला-डरनेवाला मन अलग-अलग है लेकिन मन की गहराई में सत्ता देनेवाला वो एक ही है। पंखे अलग-अलग कंपनी के, फ्रीज अलग-अलग घर के और लाईट और  बल्ब अलग-अलग है लेकिन पावरहाउस का करंट एक का एक । ऐसे सब के पावरहाउसों का पावरहाउस परब्रह्म परमात्मा रोम-रोम में रम रहा है, वो सच्चिदानंद परमात्मा एक का एक।  

          घने जंगल से जा रहे हो, डर लगता है कहीं आ न जाए कोई लूटनेवाला, मारनेवाला, कोई शेर और वरगड़ा लेकिन पास में, साथ में अगर एक बंदूकधारी साथ में चलता है न, तो हौंसला बढ़ जाता है कि क्‍या कर लेगा कोई भी जानवर, आदमी क्या कर लेगा, संतरी मेरे साथ है। एक संतरी चार पैसे का साधन लेकर चलता है तो हिम्मत आ जाती है, ऐसे विश्वनीयंता परमात्मा मेरा आत्‍मा है… भगवान मेरे साथ हैं… हरि ॐ…  हरि ॐ…  करके तू आगे बढ़ता चला जा तो कितना भला हो जाएगा। जो संतरी का,  मंत्री का, कोई इसका-उसका सहारा ढूंढते है और अंदर वाले का खयाल नहीं रखते उनका फि‍र कभी भी बुरा हाल हो जाता है। जय रामजी की। और जो अंदर वाले परमात्मा से मेल जोड़ करके फि‍र मंत्री-संतरी से मिलते है फिर वो तो काम ठीक रहता है ।  

कबीरा यह जग आय केबहुत से कीने मीत

इस दुनिया में आकर बहुत ही यार-दोस्त बनाए, बहुतों को रीझाया, बहुतों को मस्का मारा..

कबीरा यह जग आय केबहुत से कीने मीत

जिन्ह दिल बाँधा एक से वो सोए निश्चिंत… तो  आप एक दिल से बांधो ।  

ॐ… ॐ… ॐ… ॐ… ॐ…

अनुभव न होने के तीन कारण


जिन चीजों को महत्व नही देना चाहिए उन चीजों को महत्व दे रखा है। जिन कर्मों को महत्व नही देना चाहिए उन कर्मों को महत्व दे रखा है। जिस व्यवहार को महत्व कम देना चाहिए उसको हमने अधिक दे रखा है इसलिए हमारा इन्द्रियाँ मन और बुद्धि परमात्मा में स्थिर नही हो पाती। ध्यान से सुनना, आप ध्यान करना मत, सुनना ध्यान से… आत्मसाक्षात्कार करने में अथवा अपने में ईश्वर है उसका अनुभव करने में तीन बातें अड़चन करती है बस! केवल तीन बातें!
पहली बात है जीने की इच्छा … आप जीने की इच्छा न करेंगे तभी भी जिएँगे भैया! श्रीराम! कथा ध्यान से सुने! इधर उधर न देखे।
एक तो जीने की इच्छा, दूसरा – करने की इच्छा और तीसरा- पाने की इच्छा … ये तीन चीजें जो है इंसान को ईश्वर… है तो इंसान ईश्वर, है तो आत्मा परमात्मा!
नानक तुमसे बड़े नही थे, कृष्ण तुमसे बड़े नही थे, कबीर तुमसे बड़े नही थे, लीलाशाह साँई तुमसे बड़े नही थे, और तुम उनसे छोटे नही हो। लेकिन छोटे तुम रह गए और वे बड़े हो गए। कारण एक ही है, इन तीन चीजों को वो लोग समझ गए, अपन लोग नही समझते!
जीने की इच्छा… शरीर में ममता…जीने की इच्छा…दूसरा – करने की इच्छा, तीसरा- पाने की इच्छा…ये जो तीन इच्छाएँ है –
जीने की इच्छा,करने की इच्छा और पाने की इच्छा…इसीसे आदमी अपने केंद्र से बाहर आ जाता है। श्रीराम! अगर ये तीन इच्छाएँ जितने अंश में कम उतने अंश में आदमी महान हो जाएगा। और अगर ये इच्छाएँ तीनों भीतर से चली गई तो आदमी आदमी के रूप में तो दिखेगा लेकिन उसके द्वारा परमात्मा अटखेलियाँ करेगा!
बाहर से तो कार कार दिखेगी लेकिन अंदर इंजिन बदल जाएगा। ऐसे ही वो आदमी तो आदमी दिखेगा, व्यक्ति तो व्यक्ति दिखेगा लेकिन अंदर जीव की जगह पर ईश्वर अटखेलियाँ करेगा!
नानक जब घर छोड़ के गए, साधन भजन करके आत्मज्ञान पाकर आए तो उसका बाप बोलता था कि इसको तो मैं जानता हूँ, ये तो मुझे ????
नही..मॉडल… कालू कहता था ये तो नानक है …मॉडल नानक का है लेकिन अब वो नानक को नानक न समझो, गुरु नानक समझो तो कल्याण होगा।
देवहूति ने अपने पुत्र के अंदर , कपिल मुनि के अंदर भगवान के गीत सुने और उनका उपदेश सुनकर माता देवहूति गदगद हो गई , आत्माराम को प्राप्त हो गई। उसके नेत्रों से जो जल चला वो जल की बूँदे जहाँ पड़े , जहाँ जल के बिंदू पड़े वो सिध्दपुर में बिंदु सरोवर नाम से प्रसिद्ध हुए। श्रीराम!
ये आत्म खजाना ऐसा है कि नही देखता है कि सामने वाला बेटा है कि बाप है, पापी है कि पुण्यात्मा है, पढ़ा लिखा है कि अनपढ़ है, इतना महापापी…साढ़े साठ बैल गाड़ियाँ भर जाए इतने जनेऊ द्विजातियों
के उतरवा लिए थे…वालिया लुटारा..लूटता था लोगों को…जो मर जाते थे उनके जनेऊ साढ़े सात बैल गाड़ियाँ भर जाए उतने इकट्ठे हुए थे, साधु और ब्राह्मणों को भी छीन लेता था,द्विजों को मार देता था। ऐसा वालिया लुटारा वाल्मिकी ऋषि बन सकता है, तो तुम्हारे घर का कोई कुटुंबी या तुम आत्मज्ञान पा लो इसमें कोई कठिनाई नही है भैय्या! श्रीराम!
चिंता ऐसी डाकिनी काटी कलेजा खाय
साँई बेचारा क्या करे कबतक कथा सुनाए?
ॐ ॐ ॐ
मैं वो पंडित की कथा कहूँगा …श्रीराम!
देवशर्मा नाम के पंडित बडी मधुर कथा करते थे। भगवत की सप्ताह करे,कभी देवी भागवत की करे, कभी रामायण करे, कभी महाभारत की कथा करे, पंडित का गुजारा था कथा करना। गुजारा कथा को बना लेना एक बात है लेकिन कथा से थाक उतार देना अपना और दूसरों का वो दूसरी बात है, श्रीराम! कथा…उसको उल्टा दो तो थाक। पंडित थे, व्याख्या करते थे,उसमें बहुत लोग सुनने को आते थे। एक समय की बात है,पुरुषोत्तम मास की , पंडित ने एक महिने की कथा रखी,पुराण रखा। सुनते-सुनते जो श्रोता थे उसमें एक कोई साधक पहुँच गया। और साधक ने देखा कि पंडितजी व्याख्या तो बहुत करते है लेकिन अंदर जगे है कि नही ? जो अंदर जगा हुआ होता है न उसके पास व्याख्या कैसी भी हो लेकिन प्रश्न का उत्तर संतोषकारक आएगा ,उसको देखकर हृदय में शांति आएगी। जो ब्रह्मज्ञानी संत है वो बोलेंगे न भले ग्रामटिकल भूल हो, किस्से कहानियाँ पंडित जैसी न हो फिर भी सच्चे संत जब बोलते है न तो हृदय को शांति मिलती है।श्रीराम! श्रद्धा रखके सुनो तो!
उस पंडित को कोई व्यापारी आ गया.. खांड-वांड बेचता होगा या कुछ बेचता होगा …मुझे पता नही वो खांड बेचता था कि इधर उधर देखता था लेकिन था जरूर कोई ऐसा व्यापारी।श्रीराम! उस ???
ने क्या किया बेचारे ने,पंडित से प्रश्न पूछा कि “महाराज, आप बोलते है पाप नही करो
तो पाप जनमता कैसे है?पाप का बाप क्या है?” बपहि चला जाए तो बेटे पैदा ही न होंगे! पंडित ने कहा “अच्छा,मैं कल जवाब दूँगा।” पाप का बाप…Who is the father of the paap? पाप का पिता कौन? अब पंडितजी ने ऐसा कोई शास्त्र- वास्त्र में ऐसा कोई ऐसा याद उसको रहा नही। रात को घर गया, पोथियाँ-वोथियाँ देखी,दो-दो चश्मे चढ़ाता था पंडित, कभी दूर का पढ़ने का,कभी नजीक का पढ़ने का ..रात का ११-१२ बज गए महाराज! पंडित को कोई ऐसा मिला ही नही कि पाप का बाप कौन है। पंडित से पूछा- लोभ का बाप कौन है?पाप का बाप कौन है? पंडित जी ने पोथे- वोथे खोले,पता नही चला। सुबह को भी अपना नियम-वियम करा और पाप का बाप कौन?पाप का बाप कौन ?कुछ लगा नही हाथ! आखिर वो कथा करने को जा रहे थे…हररोज जहाँ से गुजरते थे रास्ते में एक सुंदर सुहावना चौखट लगा हुआ सुंदर घर था लेकिन घर के अंदर रहने वाली व्यक्ति असुंदर थी,वेश्या थी। उसके कृत्य असुंदर थे, उसका मकान बड़ा सुंदर था, श्रीराम! मकान सुंदर होनेसे जरूरी नही कि वो व्यक्ति सुंदर रहती है और मकान असुंदर होने से जरूरी नही कि व्यक्ति असुंदर रहती है। ऐसे ही तुम्हारा ये चेहरा- मकान सुंदर होने से तुम्हारी बुद्धि सुंदर है ये जरूरी नही है और चेहरा असुंदर होने से तुम्हारा अंदर वाला असुंदर है ऐसी भी बात नही! तो महाराज! वो वेश्या को होता था कि इतने पाप करती है तो रोज ये पंडित जब पसार होते है न, भगवान की कथा करने को जाते है तो इनके दिमाग में भगवान तो है न कि भगवान की कथा करूँगा! तो वेश्या प्रतिदिन उस पंडित का दर्शन करती थी। पंडित कथा में जाए तब भी दर्शन करे और कथा से लौटे तब भी दर्शन करे। जब सुबह का समय था और रात के संध्या के समय तो वेश्या को पता नही चला कि पंडित के दिमाग में कोई उलझन है..लेकिन सुबह जब जा रहे थे तब उलझन बढ़ गई थी। वेश्या ने भाँप लिया क्योंकि पुरुषों से उनका संपर्क होता है और मनोवैज्ञानिक हिस्सा भी उसका विकसित होता है, श्रीराम! वैश्या ने देख लिया कि पंडित उदास हो के जा रहे है। बोली “पंडितजी , नमस्कार! “
बोले “नमस्कार! “
बोली “आज उदास होके जा रहे है!”
बहुत हाजीजी की तब पंडित ने कहा कि किसीने सवाल पूछा है-“पाप का बाप कौन है?” उसका उत्तर नही आ रहा है। उसी सोच विचार में जा रहे है। जरूरी नही कि पंडित के मुँह से ही शास्त्र निकले, कभी कभी वेश्या के मुँह से भी भगवान चाहे तो शास्त्र निकालता है,वो समर्थ है! जरूरी नही कि मैं बोलू और शास्त्र हो, कभी कभी
आप बोले और शास्त्र हो सकता है, जय रामजी की! महाराज ! वेश्या के मुँह से शास्त्र तो क्या निकले, वेश्या के व्यवहार से शास्त्र निकला। वेश्या ने प्रणाम किया, बोले
” महाराज! ये तो जरासी बात है। पाप का बाप कौन आपको पता नही?”
बोले “नही!मुझे पता नही।”
बोले “महाराज! तो फिर आज कथा जाकर क्या करोगे?थोड़े लेट चले जाना,मैं आदमी भेज देती हूँ वो लोग कीर्तन करेंगे। और १ घँटा,२ घँटा श्याम की कथा बढा देना। दिन की कथा पावन करो…कृपा करो आज मेरा घर पावन करो आप।”
सौ का नोट धर दिया पंडितजी के चरणों में…घर पावन करो। पंडित ने देखा रुपया, आठ आना बहुत देते है, सौ रुपया दे रही है
एक मिनट घूम के निकल जाऊँगा ,लोग देखेंगे तो नही! आटा माँग के बाहर !
बोले, “बाहर क्या जाते हो?अब आए हो ,आज मेरे घर का कुछ… सीधा मैं देती हूँ …आप ही बनाकर भोजन कर लो।”
सौ का नोट और रख दिया!
पंडित ने देखा सीधा बना के खाने में सौ रुपया दक्षिणा मिलती है…सीधा बनाने को ही जा रहे थे, बोले “नाथ! आज तो पक्की रसोई है! पक्की रसोई में तो कोई ????
होती नही।मेरे को संकल्प है कि मैं बनाऊँ और आप खा लोगो।क्योंकि पक्की रसोई है पानी तो डालना नही! दूध से आटा गुंदूँगी ,पूरी तलूँगी, सीरा बनाऊँगी तो वो भी दूध से, सबकुछ दूध से होगा…पक्की रसोई है!” सौ रुपया धर दिया!
महाराज! आटा गूंद लिया, वेश्या ने भोजन बनाया…अब बोले “पंडितजी!मैंने आजतक न जाने कितने पाप कर्म किए और तुम कितने धर्मात्मा! मेरे घर को पावन किया, अब मेरे रसोई को पावन कर रहे हो , अब मेरे हाथों को पावन करो..मेरी इच्छा है कि अपने हाथ से आपके मुँह में ग्रास रखूँ!”
सौ का नोट धर दिया और ग्रास मुँह में धरने लगी, पंडित ने मुँह खोला और दे तमाचा! This is the father of the paap! पाप का बाप ये है लोभ! पंडित है, छूते नही, ये नही करते,वो नही करते , किसीके घर नही रहते, रसोई में नही खाते लेकिन तीन नोटों ने तुम्हारा सबकुछ पोथियों में रख दिया! ” जय रामजी की!
ये केवल एक पंडित नही , हम लोग दुकान पे बैठ के भी तो पंडित के भाई होते है भैय्या! जो चिंता बढ़ जाती है न हमारे पास अनुचित धन आता है। श्रीराम! जब बीमारियाँ बढ़ने लगे तो समझ जाना अनुचित धन आया है। चिंता बढ़ जाए तो समझ लेना पाप का बाप आया है…ॐ ॐ ॐ… इसीलिए नाव में पानी भर जाए तो दोनों हाथ धो लेने चाहिए और घर में धन आ जाए तो भी दोनो हाथ से सत्कर्म में लगाए। तो इन्द्रियाँ फिर आपकी संयत रहेगी, मन शांत रहेगा और बुद्धि परमात्मा में स्थिर होगी। श्रीराम!
धन आता है तो आदमी बेफाम होने लगता है, धन आता है तो आदमी की विलासिता बढ़ जाती है, धन आता है तो आदमी बाहर से तो बलवान दिखता है लेकिन अंदर से खोखला होता जाता है। जितना आदमी धनवान अधिक उतना अंदर से खोखला अधिक! श्रीराम! जय रामजी की! जितना धनवान अधिक उतना अंदर से खोखला अधिक…हाँ! उस धन के साथ अगर राम नाम धन है तो, उस धन के साथ अगर गुरुओं का ज्ञान का धन है तो और बात है लेकिन नही तो महाराज! जितना धन और सत्ता बढ़ती है उतना आदमी अंदर से कंगाल हो जाता है और इन्द्रियाँ और मन उसकी बेफाम हो जाती है! श्रीराम!