046 ऋषि प्रसादः अक्तूबर 1996

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

शरीर की अमूल्य निधिः आँख


नगरी नगरस्येव रथस्येव रथी यथा। स्वशरीरस्य मेधावी कृत्येष्ववहितो भवत्।। (चरक संहिता) जैसे नगरपति नगर के योगक्षेम और वाहन चालक वाहन की सुरक्षा और सही राह पर चलाने के प्रति सदैव सतर्क रहता है वैसे ही मेधावी व्यक्ति अपने शरीररूपी नगर और जीवन की यात्रा कराने वाले वाहन की देखरेख और सुरक्षा करने तथा इसे सही …

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काम-क्रोध से बचो – पूज्य पाद संत श्री आशारामजी बापू


अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से प्रश्न कियाः अथ केन प्रयुक्तोઽयं पापंच चरति पूरूषः। अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः।। ʹहे कृष्ण ! फिर यह पुरुष स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्कार से लगाये हुए के सदृश किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?ʹ (गीताः3.36) भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः। महाशनो महापाप्मा …

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ईश्वरीय विधान का आदर


पूज्यपाद संत श्री आशारामजी बापू एक होता है ऐहिक विधान और दूसरा होता है ईश्वरीय विधान। ऐहिक विधान का निर्माण ऐहिक लोगों द्वारा होता है और इसमें भिन्नता होती है। अलग-अलग राष्ट्र अपने-अपने हिसाब से अपना विधान बनाते हैं। ऐहिक विधान बनाने वाले कभी गलती भी कर लेते हैं और अमल कराने वाले भी कई …

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