आप भी यह कला सीख लो – पूज्य बापू जी

Rishi Prasad 267 Mar 2015

आप भी यह कला सीख लो – पूज्य बापू जी


(श्री हनुमान जयंतीः 4 अप्रैल)
हनुमानजी के पास अष्टसिद्धियाँ, नवनिधियाँ थीं लेकिन हनुमान जी को तड़प थी पूर्णता की, परमेश्वर-तत्त्व के साक्षात्कार की। जो सृष्टि के आदि में था, अभी हैं और महाप्रलय के बाद में भी रहेगा, उस परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिए हनुमान जी राम की सेवा में लग गये… बिनशर्ती शरणागति ! हनुमानजी साधारण नहीं थे, बालब्रह्मचारी थे। राम जी और लखनजी को कंधे पर उठाकर उड़ान भरते थे। रूप बदलकर राम जी की परीक्षा ले रहे थे और ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।’ ऐसे कर्मनिष्ठ भी थे। हनुमानजी निःस्वार्थ कर्मयोगी भी थे, भक्त भी थे, ज्ञानिनामग्रगण्यम्….. ज्ञानियों में अग्रगण्य माने जाते थे लेकिन उऩ्होंने भी इस तत्त्वज्ञान को पाने के लिए रामजी की बिनशर्ती शरणागति स्वीकार की।
हनुमानजी के जीवन में मैनाक-सुवर्ण के पर्वत का लोभ नहीं, संग्रह नहीं और त्याग का अहंकार नहीं है। जो सुवर्ण के पर्वत को त्याग सकता है, वही सोने की लंका से सकुशल बाहर भी आ सकता है।
हनुमान जी की शीघ्र प्रसन्नता के लिए
ऐसे हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न हो इसके लिए आप उऩकी बाह्य आकृति की वांछा (इच्छा) छोड़कर वे जिस अंतर्यामी राम में शांत होते थे, विश्रांति पाते थे, उस अपने आत्मदेव में विश्रांति पाने की कला सीख लो। सूर्यदेव को प्रसन्न करना हो तो भी, देवी-देवताओं को प्रसन्न करना है तो भी और आपको देखकर लोग प्रसन्न हो जायें ऐसा चाहते हों तो भी यही कुंजी है, ‘गुरुचाबी’ है जो सारे ताले खोल देती है। रात को सोते समय अपने आत्मा में विश्रान्ति पाओ, सुबह उठते समय अपने आत्मदेव में….. और बाहर व्यवहार करते-कराते भी आत्मविश्रांति….. ॐ आनन्द….. ॐ शांति…. ॐॐ
ऊठत बैठत आई उटाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने।
सूझबूझ उधर बनी रहे, महत्त्व उसका बना रहे।
अपने भक्त को बतायी थी यह साधना
गुजरात के जूनागढ़ निकटवर्ती धंधुसर गाँव में एक संत रहते थे। उनका नाम था उगमशी। उनको हनुमान जी के प्रति आस्था थी। हनुमानजी का ध्यानादि धरते थे। उस आस्था ने हनुमानजी को प्रकट कर दिया।
हनुमानजी पधारे तो उगमशी महाराज ने उनकी स्तुति की और कहाः “आप ही मेरे गुरुजी है….” तो हनुमानजी ने उनको मंत्र दिया। मुझे इस बात का बड़ा आश्चर्य होता है कि हनुमानजी रामभक्त हैं।
‘प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।’ हमने सुना है कि हनुमानजी ‘राम-राम’ जपते हैं लेकिन हनुमान जी ने उगमशी को यह ‘सोऽहम्’ की साधना बतायी। वे ऊँचे पात्र रहे होंगे। हनुमानजी ने कहा कि “श्वास अंदर जाय तो ‘सोऽ’ और बाहर आये तो ‘हम्’।” हालाँकि यह हनुमानजी ने बतायी इसलिए साधना महत्त्वपूर्ण है – ऐसा नहीं, यह साधना तो अनादिकाल की है। यह तो बड़े-बड़े योगी लोग जानते हैं, करते हैं। लेकिन हनुमानजी जैसे रामभक्त भी अपने प्रिय भक्त को ‘सोऽहम्’ की साधना बताते हैं तो मुझे लगा कि आशारामभी यह साधना जानते हैं तो अब अपने भक्तों को बताने में देर क्या करना ?
‘सोऽहम्’ की साधना से वे उगमशी बड़े उच्च कोटि के संत हो गये, तो मैं भी चाहता हूँ कि मेरे साधक भी उच्च कोटि के हो जायें, श्वासोच्छ्वास में इस साधना का आरम्भ कर दो आज से। इस साधना के प्रभाव से संत उगमशी ने अपने आत्मवैभव को पाया। उनकी वाणी हैः
सोऽहम् मंत्र दियो सदगुरु ने, मेरे सदगुरु पवनकुमार।
कहे उगमशी जति परतापे, ये भवसागर तारणहार।।
जपो मन अजपा समरणसार (सुमिरनसार)…….
उगमशी कहते हैं कि उनको ‘सोऽहम्’ मंत्र सदगुरु पवनकुमार अर्थात् हनुमान जी ने दिया। जति परतापे…. वे जति अर्थात् ब्रह्मचारी हैं। ये भवसागर तारणहार अर्थात् जन्म मरण से मुक्त करने वाली साधना है, आम आदमी के लिए नहीं है।
तुम्हारे जीवन में जो बदल रहा है, उसमें विशेषता प्रकृति की है। जैसे मन, बुद्धि, अहंकार, पंचभौतिक शरीर बदलता है तो ये प्रकृति के हैं लेकिन जो अबदल है, वह परमात्मा है। मन बदला, बुद्धि बदली, शरीर बदला… उन सबको तुम जान रहे हो। तो जो जान रहा है वह मेरा आत्मा-परमात्मा है। श्वास अंदर जाय तो ‘सोऽ’ बाहर आये तो ‘हम्’। बहुत ऊँची, जल्दी ईश्वरप्राप्ति कराने वाली साधना है। हनुमान जयंती पर इन बातों को ध्यान में रखना।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2015, पृष्ठ संख्या 12, 13 अंक 267
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