Monthly Archives: October 2019

भोजन में उपयोगी बर्तनों का स्वास्थ्य पर प्रभाव


भोजन की शुद्धि,  पोष्टिकता व हितकारिता हेतु जितना ध्यान हम भोज्य पदार्थों आदि पर देते हैं, उतना ही ध्यान हमें भोजन बनाने, परोसने, रखने व करने वाले बर्तनों पर भी देना चाहिए । बर्तनों के गुण-दोष भोजन में आ जाते हैं । अतः कौन से बर्तन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और कौन से लाभकारी हैं, आइये जानें-

1 नॉन स्टिक बर्तनः शहरों में रहने वाले अधिकांश लोग भोजन बनाने के लिए नॉन स्टिक बर्तनों का उपयोग करने लगे हैं । ये स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक होते हैं । इन बर्तनों पर कलई करने हेतु टेफ्लॉन का प्रयोग होता है जो अधिक तापमान पर एक प्रकार की गैस छोड़ता है, जिससे टेफ्लॉन-फ्लू (बुखार, सिरदर्द जैसे लक्षण) होने की आशंका बढ़ती है तथा फेफड़ों पर बहुत विपरीत परिणाम होता है । International Journal of Hygiene and Environmental Health में छपे एक शोध के अनुसार नॉन स्टिक बर्तनों में उपयोग किये जाने वाले टेफ्लॉन को बनाने में परफ्लोरोओक्टेनोइक एसिड रसायन का उपयोग होता है । अमेरिका में इसका उपयोग बंद करने पर कम वज़न के शिशुओं का जन्मना और उनमें तत्संबंधी मस्तिष्क-क्षति की समस्या में भारी कमी हुई है ।

2 एल्यूमिनियम के बर्तनः नमकवाले खाद्य पदार्थों के अधिक समय तक सम्पर्क में आने से यह धातु गलने लगती है तथा भोजन में मिलकर शरीर में आ के जमती जाती है । एल्यूमिनियम की अधिक मात्रा शरीर में जाने से कब्ज, चर्मरोग्, मस्तिष्क के रोग, याद्दाश्त की कमी, अल्जाइमर्स डिसीज, पार्किन्सन्स डिसीज जैसे रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है ।

3 स्टेनलेस स्टील के बर्तनः इनमें भोजन बना व खा सकते हैं लेकिन इनसे काँसा, पीतल आदि की तरह कोई अन्य लाभ नहीं मिलते ।

4 ताँबे के बर्तनः ये आकर्षक व टिकाऊ होते हैं । रात को ताँबे के बर्तन में पानी रख के सुबह पीना स्वास्थ्य हेतु अत्यंत लाभदायी है । मधुमेह के रोगियों को ताँबे के बर्तनों में रखे पानी का उपयोग करना लाभदायी है । इनमें खट्टे या नमक वाले पदार्थ न पकायें, न रखें ।

5 काँसे के बर्तनः इनमें भोजन करना बुद्धिवर्धक, रुचिकर, रोगप्रतिकारक शक्तिवर्धक, रक्तशुद्धिकर व रक्तपित्तशामक होता है । इन बर्तनों में खट्टी चीजें पकानी व रखनी नहीं चाहिए क्योंकि वे इनसे रासायनिक क्रिया करके विषैली हो जाती हैं । टूटा हुआ अथवा दरारवाला कांस्यपात्र घर में होना अशुभ माना जाता है । चतुर्मास में काँसे के पात्र में भोजन नहीं करना चाहिए ।

6 पीतल के बर्तनः पीतल ऊष्मा का सुचालक होने से इसके बर्तन भोजन पकाते हेतु उपयुक्त हैं । इसके लिए कलई किया हुआ पीतल का पात्र अच्छा होता है । बिना कलई किये हुए पीतल के बर्तनों में खट्टे पदार्थ बनाना व रखना हानिकारक है । पीतल के पात्र में भोजन करना कृमि व कफनाशक है ।

7 लोहे के बर्तनः इन पात्रों में भोजन बनाना बलवर्धक, लौह तत्त्व-प्रदायक तथा सूजन, रक्ताल्पता व पीलिया दूर करने वाला होता है । खट्टे पदार्थों को छोड़ के अन्य पदार्थ लोहे के पात्रों में रखना व बनाना उत्त्म है । इनमें दूध उबालना स्वास्थ्यप्रद है । लौकिक दृष्टि से तो उपरोक्त बात है और ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 84, श्लोक 4-5) के अनुसार लोहे के पात्र में दूध, दही, घी आदि जो कुछ रखा जाय वह अभक्ष्य हो जाता है ।

लोहे के पात्र में भोजन बना सकते हैं लेकिन इनमें भोजन करने से बुद्धि का नाश होता है ।

8 मिट्टी के बर्तनः ये भोजन पकाने के लिए उपरोक्त सभी बर्तनों की अपेक्षा उत्तम माने जाते हैं । इनमें भोजन पकाने से वह अधिक स्वादिष्ट व सुगंधित होता है । मिट्टी के पात्र में दही जमाने से वह कम खट्टा होता है । इनमें भोजन बना तो सकते हैं लेकिन भावप्रकाश ग्रंथ के अनुसार इनमें भोजन करने से धन का नाश होता है ।

मिट्टी से बनने के कारण इन बर्तनों की सरंचना वैसी ही होती है जैसी हमारे शरीर के लिए आवश्यक है । मिट्टी में मैंगनीज, मैग्नेशियम, लौह, फॉस्फोरस, सल्फर व अन्य अनेक खनिज पदार्थ उचित मात्रा में होते हैं । इनमें भोजन बनाने में समय थोड़ा ज्यादा लग सकता है पर उत्तम स्वास्थ्य के लिए भोजन धीरे-धीरे ही पकाया जाना हितकारी है ।

9 पत्तों से बने भोजन-पात्र (पत्तल आदि) इनमें भोजन करना जठराग्निवर्धक, रुचिकर तथा विष व पापनाशक होता है ।

10 प्लास्टिक के बर्तनः इन बर्तनों से किसी भी खाद्य व पेय पदार्थों का संयोग स्वास्थ्य हेतु हितकारी नहीं है । कठोर प्लास्टिक में बी.पी.ए. (Bisphenol A ) जैसा विषैला पदार्थ होता है, जिसकी कम मात्रा भी कैंसर, मधुमेह, रोगप्रतिकारक शक्ति के ह्रास और समय से पूर्व यौवनावस्था प्रारम्भ होने का कारण बन सकती है । अतः इनके उपयोग से बचें ।

11 सोने-चाँदी के पात्रः इनमें भोजन करना त्रिदोषशामक, आँखों के लिए हितकर तथा स्वास्थ्यप्रद होता है ।

इन बातों का भी रखें ख्याल

1 पानी पीने के लिए ताँबे व काँच के पात्रों का उपयोग करना चाहिए । इनके अभाव में मिट्टी के पात्र उपयोगी है, वे पवित्र एवं शीतल होते हैं । घी काँच के पात्र में रखना चाहिए ।

2 टूटे हुए, दरारवाले तथा जिसमें खड्डे पड़े हों अथवा छिद्र हों ऐसे पात्र में भोजन नहीं करना चाहिए ।

3 टूटे-फूटे बर्तनों या अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2019, पृष्ठ संख्या 30,31 अंक 322

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

समय रहते उनसे जगदीश्वर की मुलाकात का पाठ पढ़ लें-पूज्य बापू जी


एक बार सूफी संत मौलाना जलालुद्दीन अपने शिष्यों के बीच बैठे थे । सब कीर्तन ध्यान की मस्ती में मस्त थे । किसी कॉलेज के प्रोफेसर अपने मित्रों के साथ घूमते-घामते वहाँ आ पहुँचे । उन्होंने सुना था कि ‘यहाँ ध्यान, साधना कराने वाले और आत्मविद्या का प्रसाद बाँटने वाले एक अलमस्त फकीर और उनके शिष्य रहते हैं ।’ वे लोग कुतूहलवश ही  वहाँ जा पहुँचे ।

देखा कि मौलाना 50-60 साल की उम्र के लगते हैं और अपने शिष्यों को आत्ममस्ती में मस्त बना रहे हैं । कोई नाच रहा है, कोई हँस रहा है, कोई काँप रहा है, कोई घूम रहा है, कोई चुप होकर बैठा है ।

यह सब देखकर उन्होंने अपनी मति से संत को और उनके व्यवहार को तौलना शुरु किया ।

एक ने कहाः “अजीब फकीर हैं ये ! किस ढंग से सबको मस्त बना रहे हैं !”

दूसरे ने कहाः “अरे ! यह आदमी खतरनाक मालूम होता है । सबको पागल बना रहा है ।”

तीसरे ने कहाः “यह कोई ध्यान है ? ध्यान में कभी हिलचाल होती है ? नाचना-गाना होता है ? ध्यान तो चुपचाप बैठकर किया जाता है ।”

चौथे ने कहाः “कुछ भी हो लेकिन ये लोग मस्ती तो ले रहे हैं । ध्यान कैसा होता है, यह तो हमें पता नहीं पर ये लोग कुछ अजीब मस्ती में मस्त हैं । इनका रोम-रोम खुशी की खबरें दे रहा है ।”

तब किसी ने कहाः “जिस विषय का पता न हो उस विषय में बोलना बेवकूफी है । चलो, बेकार में समय मत गँवाओ ।”

उस वक्त वे मूर्ख लोग अपना-अपना अभिप्राय देकर चलते बने । फिर कुछ महीनों के बाद स्कूल-कॉलेज की छुट्टियाँ आयीं । तब उनको हुआः ‘चलो, वहीं चलें ।’ वे लोग फिर से गये पर शिष्य होकर नहीं, साधक हो के नहीं, केवल दर्शक हो के गये ।

जो लोग दर्शक होकर महापुरुषों के द्वार पर जाते हैं, उनकी जैसी-जैसी मान्यताएँ होती हैं वैसा-वैसा अर्थ वे निकालते हैं । वे लोग संत-दर्शन का या संत के ज्ञान का कुछ फायदा नहीं ले पाते हैं । जो लोग प्यास लेकर जाते हैं, जिज्ञासा ले के जाते हैं उनमें कुछ सात्त्विकता होती है जिससे ऐसे लोगों को लाभ भी होता है ।

प्रोफेसर और उनके साथी विद्वता का भूत अपनी खोपड़ी में रखकर संत के पास पहुँचे । इस बार उन्होंने देखा कि संत के सामने लोग बड़ी शांति से बैठे हैं । न कोई नाच रहा है, न गा रहा है, न हँस रहा है, न रो रहा है, न काँप रहा है, न चिल्ला रहा है । जलालुद्दीन भी मौन हैं, शांत हैं ।

तब उस टुकड़ी के मूर्खों ने अपना अभिप्राय देना शुरु कर दियाः “हाँ, अब ये लोग ध्यान में हैं । अब जलालुद्दीन और उनके शिष्यों को कुछ अक्ल आयी । पहले तो ये बिगड़े हुए थे, अब सुधर गये हैं ।

जो लोग खुद बिगड़े हुए हैं उनको ही साधक लोग, भक्त लोग बिगड़े हुए दिखते हैं । ऐसे लोग ‘रॉक एंड रोल’ में नाचेंगे, फिल्म की पट्टिया  देखकर तो हँसेगे-रोयेंगे लेकिन भगवान के लिए भाव में आकर न हँसेंगे, न रोयेंगे, न नाचेंगे । वहाँ अपने को सभ्य समझेंगे और भगवान के लिए हँसना, रोना, नाचना असभ्यता मानेंगे । वे बेचारे अंदर की मस्ती लेने की कला ही नहीं जानते हैं ।

ऐसे ही प्रोफेसर और उनके साथियों ने, बेचारों ने अपना मत दियाः “हाँ, अब ठीक है । अब चुप होकर बैठे हैं । महाराज भी चुप हैं, लोग भी चुप हैं, अच्छा है । अब ये लोग सुधर गये हैं । अब साधना करते रहेंगे, ध्यान करते रहेंगे तो कभी-न-कभी परमात्मा को पा लेंगे ।”

तब किसी ने कहाः “वह ठीक था या यह ठीक है, ऐसा कहना ही ठीक नहीं है । वैसे ही पहले से अपने पाप ज्यादां कि हम इन लोगों की तरह मस्ती में मस्त नहीं हो पाते हैं, ऊपर से संतों और साधकों के संबंध में अभिप्राय देकर पाप का बोझ बढ़ाना उचित नहीं है । हमें चुप रहना चाहिए ।”

किसी ने कहाः “चलो, बेकार की बातों में समय मत गँवाओ ।” उस वक्त भी वे चले गये पर मौका मिला तो आये बिना नहीं रह पाये । अब की बार देखा तो जलालुद्दीन अकेले हैं । आकाश की ओर उनकी निगाहें हैं । उनके रोम-रोम से चैतन्य की मस्ती बिखर रही है । उनके अस्तित्व से मौन (शांति) और आनंद की खबरें मिल रही हैं ।

…..उसे फिर कुछ सीखना नहीं पड़ता

प्रोफेसर उनके सामने आकर बैठे । उन्होंने मौलाना से पूछाः “बाबा जी ! सब कहाँ गये ? आपके भक्त और शिष्य, जो आपके साथ रहते थे, वे सब चले गये क्या ?”

जलालुद्दीन बोलेः “हाँ, मुझे जो देना था, वह मैंने दे दिया । उन्हें जो पाना था, वह उन्होंने पा लिया । मुझे जो पाठ पढ़ाना था, पढ़ा दिया । हमारे कॉलेज के दिन पूरे हो गये । अब छुट्टियाँ चल रही हैं ।”

“अभी हमारे कॉलेज की छुट्टियाँ तो पड़ी नहीं हैं ।”

“तुम्हारे अज्ञानियों के स्कूल-कॉलेज में तुम 15 साल तक विद्यार्थियों की खोपड़ी में कचरा भरते रहते हो, उन्हें हर साल छुट्टियाँ देते हो फिर भी उनकी छुट्टी नहीं होती है । वे कहीं-न-कहीं बँधे रहते हैं । परंतु यहाँ जो आता है और यहाँ के पाठ ठीक से पढ़ लेता है उसकी तो सदा के लिए छुट्टी हो जाती है, साथ ही उसे जन्म-मरण के चक्कर से भी छुट्टी मिल जाती है । हमारा ज्ञान ऐसा है ! विद्यार्थी तुम्हारे पाठ तो हजार जन्म पढ़ता रहे फिर भी उसकी बेड़ियाँ नहीं टूटतीं । हमारा पाठ जो एक बार सीख ले उसे फिर कुछ सीखना नहीं पड़ता । अँगूठाछाप व्यक्ति भी हमारा पाठ पढ़े तो अच्छे-अच्छे, तुम जैसे पढ़े हुए लोगों को भी पढ़ाने की योग्यता पा लेता है । वह चाहे निर्धन दिखे पर कइयों को धनवान बनाने का सामर्थ्य रखता है ।”

प्रोफेसर एकटक जलालुद्दीन की ओर निहार रहे थे । जलालुद्दीन जो बोल रहे थे वह केवल भाषा नहीं थी, भाषा के पीछे कुछ सत्य था, तत्त्व का अनुभव था ।

लोग समझते हैं कि पैसे हों, सत्ता हो या लोगों में प्रतिष्ठा हो तो ही सुखी जीवन गुजारा जा सकता है । पैसे के बिना सुख नहीं मिल सकता, सुधार नहीं हो सकता, सेवा भी नहीं हो सकती । लेकिन वे लोग भ्रांत मनोदशा में जी रहे हैं ।

जलालुद्दीन ने प्रोफेसर को कहाः “मेरा पाठ पढ़ने वाला व्यक्ति जहाँ कहीं जायेगा, जो कुछ करेगा उसके लिए शुभ हो जायेगा । जिन वस्तुओं को देखेगा वे प्रसाद हो जायेंगी । वह जितने दिन जियेगा उतने दिन उसके लिए मानो हर दिन दीवाली और हर रात पूनम हो जायेगी । ऐसा पाठ पढ़ाकर अब मैं विश्रांति ले रहा हूँ ।”

अगर सोचने में रह गये तो चूक गये…..

वे प्रोफेसर तो पढ़े-लिखे व्यक्ति थे । कुछ सोचकर वे नम्रता से बोलेः “महाराज ! हम भी आपसे पढ़ना चाहते हैं । हमें भी आप पाठ पढ़ाइये ।”

जलालुद्दीन बोलेः “अब मेरे पास समय नहीं है । तुम कई बार यहाँ आते रहे….. सब देखते रहे । परंतु तब मेरे पाठ पढ़ने की तुम लोगों में कोई उत्सुकता नहीं थी । अब मैंने अपना काम निपटा लिया है । अब मैं आखिरी क्षणों के इंतजार में कुछ दिन बिता दूँगा । फिर इस संसार के शरीररूपी चोले को छोड़कर अपने आत्मा में लीन हो जाऊँगा । वक्त यूँ ही चला गया, तुम समझ नहीं  पाये । जगत की विद्या पढ़ाने वाले प्रोफेसर तो लाखों-लाखों मिल जायेंगे किंतु जगदीश्वर की मुलाकात का पाठ पढ़ाने वाले मुर्शिद (सद्गुरु) तो कभी-कभी, कोई-कोई विरले ही समाज के बीच आते हैं । वे जब आते हैं तो श्रद्धा-भक्तिवाले कुछ लोग उनसे जितनी जिसकी श्रद्धा-निष्ठा होती है उतना-उतना पा लेते हैं और बाकी के वैसे ही रह जाते हैं ।”

आप स्टेशन पर पहुँचे हो और रेलगाड़ी भी उस समय खड़ी हो…. अगर आप कहीं जाना चाहते हो तो समय रहते ही, रेलगाड़ी जब खड़ी हो तब उसमें बैठ जाना चाहिए । अगर सोचने में रह गये तो चूक गये । रेलगाड़ी रवाना होने की तैयारी में हो तब तक भी बैठ सकते हो । तुम जहाँ कहीं जाना चाहते हो वहाँ पहुँच सकते हो परंतु रेलगाड़ी चली जाय उसके बाद तो फिर सिर कूटना ही रहेगा ।

ऐसे ही प्रोफेसर बेचारे सोचने में ही रह गये । आये तो सही संत के पास….. दो बार, तीन बार, चार बार…. पर ऐसे-के-ऐसे ही रह गये । सब आपस में एक-दूसरे को दोष देने लगेः ‘तूने ऐसा कहा…. तूने वैसा कहा….।’ जब संत के पास समय नहीं रहा तब आये तो फिर उनके हाथ सिर कूटना ही रहा । ऐसे लोगों के लिए कहावत सार्थक होती है कि अब पछताये होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत ।

उस समय तो दर्शक बनकर आये थे । अगर साधक बन के, जिज्ञासु बन के आते, भगवद्ध्यान, सत्संग और भगवन्नाम रूपी गाड़ी में बैठ जाते तो भवसागर से पार हो जाते । भवसागर से पार नहीं भी होते तो भवसागर से पार होने की कुछ कला ही सीख लेते । इतना भी नहीं होता तो सत्संगियों के बीच बैठकर सत्संग-कथा सुनते तो कुछ समझ का विकास होता, कुछ पाप मिटा सकते थे । पर जो लोग अपने को समझदार मानते हैं वे सत्संग में नहीं बैठ सकते । जो लोग जानते हैं कि अपनी समझ से भी अधिक समझ है, अपने सुख से भी विशेष सुख है और उसे पाने में अपने समय का सदुपयोग कर लेना चाहिए-ऐसी जिनकी सन्मति होती है, वे ही लोग ब्रह्मवेत्ता संतों के सान्निध्य में शांति और आनंद का अनुभव कर सकते हैं । वे ही संतों के सान्निध्य का लाभ लेकर परमात्मप्राप्ति की चल पड़ते हैं और अपने मनुष्य-जन्म को सार्थक कर लेते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2019, पृष्ठ संख्या 4-6 अंक 322

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

तो वह कर्मबंधन से छुड़ाने वाला हो जाता है – पूज्य बापू जी


भगवान कहते हैं-

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ।।

‘सर्वदा योगयुक्त (सर्वदा मुझ में एकाग्रबुद्धि रखने वाले) और (मुझे) प्रीतिपूर्वक भजने वाले लोगों को मैं बुद्धियोग (ज्ञाननिष्ठा) देता हूँ, जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं ।’ (गीताः 10.10)

बुद्धि तो सबके पास है लेकिन बुद्धि में योग आ जाय और योग आयेगा भगवान में प्रीति करने से । हम अपने दिल को भगवान से जोड़ें । जो कुछ काम करें, भगवान की प्रीति-प्राप्ति के लिए करें । कर्म तो हम करते हैं लेकिन कर्म में योग मिला दें । कर्म में योग तब मिलेगा जब निष्काम भाव से कर्म करेंगे ।

आप किसके लिए कर्म करते हैं ?… एक माई रास्ते पर झाड़ू  लगाती है और उसकी दृष्टि रुपयों पर है तो वह उसकी नौकरी हो गयी । एक माई बुहारी करती है घर में, उसकी दृष्टि रुपयों पर नहीं है, कुटुम्बियों की सेवा पर है तो सांसारिक कर्तव्यपूर्ति हो जाती है । शबरी भीलन गुरु के आश्रम में बुहारी करती है । उसकी दृष्टि रुपयों पर भी नहीं, कुटुम्बियों की सेवा पर भी नहीं, उसकी दृष्टि राम पर है तो उसकी बुहारी बंदगी हो जाती है, पूजा हो जाती है । बुहारी तो वही-की-वही लेकिन किसके लिए की जा रही है इसका महत्त्व है ! नौकरी करें लेकिन किसके लिए क्या करें ? रुपये-पैसे कमाकर मजा लेने के लिए नहीं बल्कि अपना कर्तव्य पालन करके उस प्यारे (परमात्मा) को प्यार करने के लिए करते हैं तो नौकरी बंदगी हो जाती है ।

भजतां प्रीतिपूर्वकम्…. जो मुझे प्रीतिपूर्वक भजता है…. भगवान में प्रीति कैसे हो ? बार-बार भगवन्नाम लें, बार-बार भगवन्नाम लें, बार-बार भगवान के निमित्त कार्य करें । कार्य किये बिना तो कोई नहीं रह सकता है इसलिए कार्य करें लेकिन राम के लिए, ईश्वरप्रीति-अर्थ । किसी को छोटा दिखाने के लिए अथवा अपने को बेड़ा दिखाने के लिए कार्य करेंगे तो वह कार्य बंधन हो जायेगा लेकिन भगवान को प्रसन्न करने के लिए कार्य करें तो वह बंधन से छुड़ाने वाला हो जाता है ।

ददामि बुद्धियोगं तं.… मैं उनको बुद्धियोग देता हूँ…. एक होती है बुद्धि, मति । कुमार्ग में जाय तो कुमति, सुमार्ग में जाय तो सुमति ।

सुमति कुमति सब कें उर रहहिं ।

नाथ पुरान निगम1 अस कहहीं ।। (श्री रामचरित. सुं. कां. 39.3)

1 वेद या उनका कोई भाग ।

अगर सत्कर्म करके ईश्वर को अर्पण करें और ईश्वर की प्रसन्नता चाहें तो वह सुमति मेधा बन जाती है । मेधावी पुरुषों की वाणी शास्त्र बनने लगती है । और उसी मेधा को अगर सत्यस्वरूप की तरफ लगायें – आत्मा के लिए अनंत ऐश्वर्य, अनंत सत्यत्व, चैतन्यत्व, ज्ञानत्व और आनंदत्व का श्रवण करके गम्भीर निदिध्यासन करें तो बुद्धियोग हो जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2019, पृष्ठ संख्या 17 अंक 322

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ