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Sant Charitra

संत चरनदास जी


 

अलवर शहर (राजस्थान) से 8 कि.मी. दूर डेहेरा नामक गाँव में सन् 1703 ई. के भादों शुक्ल तृतिया, मंगलवार के दिन पिता मुरलीधर व माता कुंजीदेवी के घर संत चरनदास जी का अवतरण हुआ। नामकरण संस्कार के समय उनका नाम रणजीत रखा गया। उनके पिताश्री साधु स्वभाव के, त्यागी वृत्तिवाले, प्रभुभक्त और एकांत प्रेमी थे। वे घंटों तक ध्यान में लीन रहते थे। उनकी माता कुंजीदेवी संतसेवी और विदुषी थीं।

संत चरनदास जी को 5 वर्ष की अल्पायु से ही रामनाम के जप का स्वाद लग गया था। वे स्वयं तो प्रेम से रामनाम जपते थे, साथ में अपने साथियों को भी प्रभु के नाम-सुमिरन की प्रेरणा देते थे। एक दिन वे जब, रामनाम कीर्तन में मस्त थे, तब वैरागी तपस्वी वेदव्यासनंदन, शुकदेव जी उन्हें अपनी गोद में लेकर प्यार किया, इससे उनके हृदय में प्रभुप्रेम की प्रबल धारा प्रवाहित हो गयी। तत्कालीन रीति के अनुसार छठे वर्ष में उन्हें पाठशाला पढ़ने के लिए भेजा गया, परंतु अध्यापकों के लाख प्रयत्नों के बावजूद भी उन्होंने लौकिक विद्या पढ़ना अस्वीकार कर दिया। उन्होंने एक दिन अध्यापकों का हठ देखकर कहाः

आल जाल तू क्या पढ़ावे।

कृष्ण नाम लिख क्यों न सिखावे।।

जो तुम हरि की भक्ति पढ़ाओ।

तो मोकू तुम फेर बुलाओ।।

इस पंक्ति से उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उनकी रुचि प्रभुनाम-जप में अधिक और लौकिक विद्या में कम है।

जब रणजीत 8 वर्ष की आयु अवस्था के हुए, तब एक दिन उनके पिता जी जंगल में एकांत साधना करते हुए अचानक लोप हो गये। इस घटना के कुछ महीने बाद उनके दादा प्रागदास जी व दादी यशोदा का भी अचानक निधन हो गया। पति के बाद सास-ससुर की छाया भी सिर से उठ जाने से कुंजीदेवी के दिल पर गहरा आघात लगा। रणजीत अपनी माता के दुःखी हृदय पर प्रेम के फाहे रखने में सफल हो गये। माता कुंजीदेवी का मन दुःख और चुप्पी से अब ऊब चुका था। उनके लिए अब डेहरा गाँव में रहना असहनीय हो गया था, इस कारण वे पुत्र के साथ दिल्ली में स्थित अपने मायके चली गयीं।

दिल्ली में कुंजीदेवी के चाचा भिखारीदास शाही दरबार में उच्च पदाधिकारी थे। उन्होंने कुंजीदेवी को हर प्रकार से मदद देने का आश्वासन दिया। उन्होंने रणजीत को अरबी व फारसी भाषा सिखाने के लिए कादिरबख्श नामक एक मौलवी को नियुक्त किया। उस मौलवी ने भी रणजीत को पढ़ाने का भरसक प्रयत्न किया, परंतु उन्हें भी निराशा ही हाथ लगी।

उन दिनों छोटी उम्र में ही विवाह हो जाते थे। रणजीत के लिए भी कई रिश्ते आये, परंतु वे विवाह के लिए राज़ी न हुए। माता ने उनके सामने वंश को आगे बढ़ाने की इच्छा प्रकट की तथा नाना ने धर्मग्रंथो के उदाहरणों से गृहस्थ आश्रम की विशेषता सिद्ध करके और शास्त्रों में से वंश को आगे बढ़ाने के धर्म का विवरण देकर उन्हें विवाह की प्रेरणा देनी चाही, परंतु रणजीत ने संसार की नश्वरता, मनुष्य-जन्म के मूल उद्देश्य आदि का उल्लेख करके बार-बार इस बात पर जोर दिया कि ‘मेरा मन प्रभुभक्ति में इतना लीन हो चुका है कि मेरे लिए गृहस्थ धर्म निभा पाना असम्भव है।

10 वर्ष की अल्पायु में ही रणजीत के हृदय सागर में प्रभुप्रेम की लहरें पूरे जोर से उठने थीं। वे सदा साधु-संतों की संगति और भजन मंडलियों में सम्मिलित होने के लिए उत्सुक रहते थे। भूखे-प्यासे, गरीब, लाचारों की सेवा-सहायता में उनकी विशेष रूचि थी। उनका ध्यान एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित था और वह था परमात्म-प्राप्ति ! प्रभु प्रेम में उनकी आँखों से प्रेमाश्रुओं की झड़ी लगी रहती थी और वे अपने खाने पीने, पहनने, सोने तक की सुध-बुध खो बैठते थे।

16 वर्ष की उम्र तक जब अपने प्रयत्नों से प्रभु के दर्शनों की तड़प शांत न हुई तो उनके हृदय में सदगुरु मिलन की प्यास जाग उठी। वे सदगुरु के विरह में पल-पल, क्षण-क्षण व्याकुल रहने लगे।

चातक मीन पतंग जब, पिया बिन नहीं रह पाये।

साध्य को पाये बिना, साधक क्यों रह जाय।।

वे कभी सदगुरु की खोज में दूर-दूर तक जाते, कभी नागाओं, सिद्धों, योगियों के पास जाते तो कभी संन्यासियों, उदासियों के पास, परंतु उन्हें कहीं भी शांति प्राप्त न हुई। वे 16 से 19 वर्ष त सदगुरु की खोज में दर-दर भटकते रहे। आखिर मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) के पास गंगा-यमुना के दोआबे पर स्थित मोरनातीस नामक स्थल पर उन्हें एक महात्मा के दर्शन हुए, जिन्हें देखते ही उनके मन में प्रेम, श्रद्धा और शांति की ऐसी प्रबल तरंग उठीं कि उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ जैसे उनकी वर्षों की खोज आज पूरी हो गयी है। वे महात्मा और कोई नहीं बल्कि वही शुकदेव जी महाराज थे, जिन्होंने बालक रणजीत को गोदी में बिठाकर प्यार किया था। जिन सदगुरु की खोज थी वे मिल गये। उस वक्त रणजीत की उम्र 19 वर्ष थी। उन्होंने प्रेममय हृदय और आँसुओं से भरे नेत्रों से सदगुरु के चरणकमलों में माथा टेकते हुए स्वयं को गुरुचरणों में समर्पित कर दिया। महात्मा शुकदेव जी ने उन्हें विधिवत दीक्षा दी और उनका परमार्थी नाम श्यामचरनदास रख दिया। शुकदेव जी ने उन्हें दिल्ली वापस जाकर दीक्षा के अनुसार अभ्यास करने की आज्ञा दी। आगे चलकर वे संत चरनदास जी के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे टूटे हृदय से दिल्ली प्रस्थान कर गये। सदगुरु से बिछुड़ने के कारण वे बड़े व्याकुल हो गये। दिन भूखे-प्यासे विरह में व्यतीत हो गया, रात्रि को सदगुरु ने ध्यान में आकर ढाढस बँधाया और कहाः

जब-जब ध्यान करे हो।

ऐसे ही तुम दर्शन पै हो।

अरु हम तुम कभू जुदे जू नाहीं।

तुम मो में मैं तुम्हारे माँही।।

सदगुरु शिष्य के अंतःकरण में ज्योतिर्मय स्वरूप में सदैव विद्यमान रहते हैं। यह स्वरूप कभी भी शिष्य का साथ नहीं छोड़ता। सदगुरु-प्रदत्त युक्तियों के अभ्यास से यही ज्योतिर्मय स्वरूप शिष्य को आत्मा-परमात्मा की अभिन्नता का ज्ञान करा देता है। दिल्ली लौटकर चरनदास जी ने बरिम नाले के पास आरामदायक स्थान पर पक्की गुफा बनवा कर उसमें गुरु आज्ञानुसार तन, मन से अभ्यास शुरु कर दिया। वहाँ उन्होंने 12 वर्ष तक अभ्यास किया। वे कई-कई दिनों तक समाधि में लीन रहते थे। एक बार आस-पास फैली हुई आग गुफा में भी पहुँच गयी, पर ध्यानमग्न चरनदास जी उसी प्रकार गुफा में बैठे रहे। लोगों ने यही समझा के वे जलकर राख हो गये होंगे, पर जब वे ध्यान से उठकर बाहर आये तो उन्हें सही-सलामत देखकर सभी दंग रह गये।

वे सदगुरु की आंतरिक प्रेरणा के अनुसार फतेहपुरी में एक आश्रम बनाकर रहने लगे। समाज के हर वर्ग और धर्म के लोग उनके सत्संग में आने लगे। एक बार संत चरनदास जी ने एक गरीब के लड़के की शादी के लिए सोने की 40 मोहरें और बहुत से सेवकों को उसकी सहायता के लिए भेजा। रात में आश्रम को सुनसान देखकर चोर आ गये, उन्होंने बहुत से सामान की कई गठरियाँ बाँध लीं, परंतु उन्हें आश्रम से बाहर जाने का मार्ग ही नहीं दिखाई दिया। चोरों को परेशान देखकर  चरनदास जी ने स्वयं उठकर उन्हें रास्ता दिखाया और सामान ले जाने को कहा। चोर लज्जित होकर क्षमा माँगते हुए कहने लगेः ‘अब हम सुई तक नहीं ले जायेंगे।’ पर संत चरनदास जी ने उनसे जबरदस्ती गठरियाँ उठवायीं और उनके साथ जाकर आश्रम के बाहर छोड़ आये। उन्होंने न कभी किसी का बुरा सोचा और न ही किसी को कुछ बुरा कहा। यदि कोई उनकी निंदा भी करता तो वे कहते कि निंदक शत्रु नहीं अपितु सच्चा मित्र है, जो निंदा के साबुन से हमारे दुर्गुणरूपी मैल को धोता है। उनके परम शिष्य रामरूप जी ने लिखा हैः ‘संत चरनदास कभी भी वाद-विवाद में नहीं उलझते थे। वे एकांत-प्रेमी थे और बार-बार कहते थे कि मैं बुरे-से-बुरा था पर मेरे सदगुरु शुकदेव जी ने मुझ पर कृपा करके मेरा बेड़ा पार कर दिया।’

किसू काम के थे नहीं कोई न कौड़ी देय।

गुरु शुकदेव कृपा करी, भई अमोलक देह।।

संत चरनदास जी ने दिल्ली में कई आश्रम बनवाये तथा फतेहपुरी आश्रम में 5 वर्ष बिताये। फतेहपुर निवास के समय वे एक बार वृंदावन गये थे। मार्ग में 7 ठगों ने उन्हें घेर लिया, परंतु उनकी अमीदृष्टि से वे स्वयं को ठगाकर उनके अनन्य भक्त बन गये। उनके 108 प्रमुख शिष्यों में इन सातों के नाम भी आते हैं। इसी यात्रा के दौरान उन्हें पुनः सदगुरु जी के दर्शन प्राप्त हुए। गुरुदेव ने उन्हें भक्तिमार्ग का प्रचार करने की आज्ञा दी। यहाँ से लौटकर उन्होंने घासमंडी में आश्रम बनवाया। यहाँ एक वर्ष व्यतीत कर वे परीक्षितपुर आ गये। वहाँ नंददास जी उनसे विधिवत दीक्षा लेने वाले प्रथम शिष्य बने। नंददास जी के बाबा हरि दास जी ने अपनी पत्नी, चारों पुत्रों और एकमात्र पुत्री सहजोबाई, दयाबाई और नूपीबाई संत चरनदास जी की तीन प्रमुख शिष्याएँ थीं।

बाद में वे परीक्षितपुर से गद्दनपुर चले गये। वहाँ पर एक मुसलमान फकीर मुहम्मद बाकर ने उनकी शरण ग्रहण की और वहाँ से वे पानीपत आ पहुँचे, यहाँ का नवाब शाकर खाँ और एक खतरनाक डाकू उनके शिष्य बन गये। उन्होंने उस डाकू का नाम रामधड़ल्लामल रखा। इसी यात्रा के दौरान सन् 1757-58 ई. में चरनदास जी की माता का देहांत हो गया। माता के परलोक गमन के पश्चात सुखदेवपुर आ गये। यह स्थान चाँदनी चौक के पास मुहल्ला बन्नीमारां और हौजकाजी के मध्य स्थित है। चरनदासजी अनेक स्थानों की यात्रा की, परंतु उनका कार्यक्षेत्र दिल्ली व उसके आस-पास का क्षेत्र ही रहा।

उन्होंने नादिरशाह के भारत पर आक्रमण के छः महीने पूर्व ही उसके आक्रमण की तिथि मुहम्मदशाह की हार, नादिरशाह द्वारा राज्य वापस देकर लौट जाने की तिथि आदि कई महत्त्वपूर्ण बातों की जानकारी अपने सेवकों को दी थी। उनकी इस भविष्यवाणी को सुनकर नादिरशाह ने उन्हें जेल में डाल दिया, परंतु उस समय उसके आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही, जब उसी रात को चरनदास जी नादिरशाह के सिर पर पदाघात कर उसे जगा दिया। आश्चर्यचकित व भयभीत नादिरशाह उनके चरणों में गिर क्षमायाचना करने लगा तथा कई गाँवों की जागीरें व धन-सम्पत्ति उनके नाम कर दी। वे न तो किसी सेवक के घर भोजन करते थे और न ही किसी से धन, वस्त्रादि की भेंट लेते थे, परंतु जरूरतमंदों की भरपूर सहायता करते थे। उनका यह क्रम 60 वर्ष की अवस्था तक चला, तत्पश्चात उन्होंने शिष्यों की अत्यधिक संख्या और उनकी व्यवस्था हेतु सेवा-भेंट लेना स्वीकार किया, परंतु उसमें से अपने लिए एक पाई का भी उपयोग नहीं किया। उन्होंने ब्रह्मलीन होने के एक वर्ष, तीन महीने व दो दिन पहले ही अपने परम धाम जाने के संकेत दे दिये थे। वे उन दिनों फतेहपुरी स्थित सुखदेवपुरा आश्रम में निवास करते थे। संवत् 1839 विक्रमी, मार्गशीर्ष सप्तमी को बुधवार के दिन वे 79 वर्ष की आयु पूरी कर स्वधाम पधार गये। उन्होंने स्वधाम जाने की इच्छा पहले ही प्रकट कर दी थी, फिर भी उन्होंने अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया। बाद में उनके 108 शिष्यों ने अलग-अलग गद्दियाँ चलाईं जिनमें रामरूप, सहजोबाई, जुगतानंद आदि की गद्दियाँ प्रमुख थीं। चरनदास जी के शिष्यों ने अपनी रचनाओं में उनकी अलौकिक प्रतिभा व जीवन के विषय में विस्तार से गाया है। सहजोबाई ने तो यहाँ तक कहा किः

साँईं चरनदास पर तन मन वारूँ।

गुरु न तजूँ, पर हरि को तजि डारूँ। (सहजोवाणीः पृष्ठ 3)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2002, पृष्ठ संख्या 14-17 अंक 118

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वास्तविक कर्तव्य और सामाजिक कर्तव्य


 

मुख्य कर्तव्य में लीन तुकाराम जी महाराज
संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ईश्वर को पाने के लिए आपको चाहे जो भी करना पड़े, वे सब प्रयास, वे सब सौदे सस्ते हैं। संसार को पाने के लिए यदि ईश्वर का त्याग करना पड़े तो सौदा महँगा है। ईश्वर को पाने के लिए यदि संसार की कचरापट्टी का त्याग करना पड़े तो कर देना चाहिए, क्योंकि यदि ईश्वर मिल गया तो संसार तो उसकी छायामात्र है। वह स्वयं ही पीछे-पीछे चला आयेगा। संसार की रजो-तमोगुणी वासनाओं को पोषने के लिए संसार के सुख से चिपके तो वह सुख टिकेगा नहीं और मुक्ति का सुख मिलेगा नहीं। फिर आप रोते रह जाओगे।

दो प्रकार के कर्तव्य होते हैं- एक होता है वास्तविक कर्तव्य और दूसरा होता है सामाजिक कर्तव्य। मनुष्य-जन्म मिला है तो मुक्ति पाना मनुष्य का मुख्य कर्तव्य है। जन्म-मरण से पार होना, पाप-ताप से पार होना, यह मनुष्य का मुख्य कर्तव्य है। दूसरा है गौण कर्तव्य अर्थात् सामाजिक या ऐहिक जिम्मेदारी। यदि आप सतत फेरे फिरकर शादी करके आये हैं तो आपका ऐहिक कर्तव्य है पत्नी का पालन-पोषण करना। बच्चे को जन्म दिया है तो उसको पढ़ाना-लिखाना, यह आपकी ऐहिक जिम्मेदारी है।

जो मुख्य जिम्मेदारी को निभाने में लग जाता है, उसकी ऐहिक जिम्मेदारी अपने-आप पूरी होने लगती है। फिर भले प्रारंभ में उसे थोड़ा विरोध ही क्यों ने सहना पड़े।

तुकाराम जी महाराज शादी करके आये तो उनकी ऐहिक जिम्मेदारी तो थी कि कुछ भी करके कमायें और पत्नी का भरण पोषण करें। वे ऐहिक जिम्मेदारी के फेरे फिरकर तो आये किंतु उनका मन आध्यात्मिक अथवा वास्तविक जिम्मेदारी की तरफ अधिक झुकता गया। अतः वे उसी को निभाने में पूर्ण रूप से संलग्न हो गये। नतीजा यह हुआ कि लोग उनकी निंदा करने लगे। फिर भी तुकाराम जी महाराज ने निंदकों की परवाह नहीं की। उन्होंने सोचा कि ‘चलो, मुख्य काम तो हो रहा है।’ जब तुकाराम जी महाराज पर निंदकों की बातों का कुछ असर न हुआ तो उन्होंने मुंडन करवा कर, उनके सिर पर हल्दी व चूने का लेप करके, गधे पर बिठाया। इतने से जब निंदकों को संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने बैंगन और गाजर का हार बनाकर तुकाराम जी महाराज के गले में डाल दिया और गधे पर उलटा (अर्थात् पूँछ की ओर मुँह करके) बिठाकर पूरे गाँव में घुमाया।

फिर भी धन्य हैं तुकाराम जी महाराज ! इतना होने पर भी वे अपने मुख्य कर्तव्य से नहीं डिगे। बाहर से तो बड़ा भारी अपमान दिख रहा है, किंतु अंदर से उनके चित्त पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उनकी यह ‘शोभायात्रा’ घूमते-घूमते जब उनके घर के सामने आयी तो उनकी पत्नी जीजाई, जो उन्हें उठते-बैठते गालियाँ सुना देती थी, उसका भी हृदय पिघल गया। उसने तो उठाया डंडा दौड़ी निंदकों के पीछे ! जीजाई का यह रूप देखकर सब भाग गये। उसने तुकाराम जी को गधे पर से उतारा। फिर रोते-रोते बोल उठीः
“आपकी ऐसी हालत किसने की ?”

तुकाराम जी बोलेः “रोती क्यों है ? दुःखी क्यों होती है ? आज तक मैं पूरा गाँव नहीं घूमा था, बेचारों ने गली-गली घुमा दिया। हजामत करवाने पैसा तो था नहीं, अपने खर्चे से उन्होंने मुण्डन भी करवा दिया। कितने अच्छे लोग थे ! सिर पर कहीं फोड़े-फुंसी न हों इसलिए उन बेचारों ने चूना और हल्दी भी लगा दी। हम रोज दाल खा-खाकर ऊब गये थे, गरीबी की वजह से दाल से ही गुजारा करना पड़ता था। उन बेचारों ने बैंगन और गाजर का हार पहना दिया तो हमें 5-7 दिन के लिए सब्जी भी मिल गयी। आज का दिन कैसा शुभ है। तू दुःखी क्यों होती है ?”

यह है सात्त्विक सुख ! यह है वास्तविक कर्तव्य को निभाने का आनंद ! बाहर दुःख की बौछारें हो रही हैं, फिर भी चित्त में दुःख पैदा नहीं हो रहा है।

तुकाराम जी महाराज भगवान के भजन के लिए एक पहाड़ी पर जाकर बैठ जाते और उनकी पत्नी किसी के घर अनाज पीसती, तो किसी की कुछ सेवा करती। फिर अपने घर आकर रोटी बनाती और पति परमात्मा को भोजन देने पहाड़ी पर जाती। इस तरह उनका गुजारा चलता था।

एक दिन दोपहर के समय वह तुकाराम जी को भोजन देने जा रही थी। एक तो भीषण गर्मी… दूसरे दोपहर का समय और तीसरे, परिश्रम से थकी जीजाई। आज उसके क्रोध का कोई पार न रहा। रास्ते में वह विट्ठल को कोसती जा रही थीः “ऐ विट्ठल ! तुझे और कोई नहीं मिला क्या ? मेरे पति के दिल में घुसकर बैठ गया है ? ऐ काला कलूट ! तू बाहर से तो काला है ही, भीतर से भी काला है….” कोसते-कोसते अपने पैरों को पटकते हुए जा रही है।

भगवान अपनी निंदा तो सह लेते हैं किंतु अपने प्यारे भक्त की निंदा उनसे सही नहीं जाती। प्रकृति कोपायमान हुई और जीजाई के पैर में एक बबूल का शूल चुभ गया। जीजाई वहीं गिर पड़ी। ‘भोजन का समय हो गया और जीजाई अभी तक नहीं आयी, क्या बात है ?’ – यह सोचकर तुकाराम जी पहाड़ी से देखने लगे।

इधर तुकाराम जी को भूख लगी और उधर भगवान विट्ठल की नींद खराब हुई कि ‘मेरा भक्त भूख से व्याकुल है।’ भगवान विट्ठल जीजाई के सामने प्रकट हो गये और बोलेः “उठ जीजाई !”
जीजाई ने जैसे ही विट्ठल को देखा कि वह क्रोध से भड़क उठी और बरस पड़ीः “तू विट्ठल !! इधर भी आ गया !!! तूने ही मेरा गृहस्थ जीवन बरबाद कर दिया है। जा, चला जा यहाँ से।”
विट्ठल तो जाने लगे ? जीजाई ने ही मुँह घुमा दिया। फिर भी यह क्या ? जिधर मुँह घुमाया उधर विट्ठल खड़े दिखाई दिये। अब तो जीजाई जिधर मुँह घुमाती जाती है, उधर-उधर विट्ठल प्रकट होते जाते हैं। आखिर थक कर जीजाई ने आँखें बंद कर लीं, किंतु यह क्या ! भीतर भी विट्ठल ही दिखने लगे ! जीजाई फिर बड़बड़ाने लगीः
“तू भीतर कैसे घुस गया ? चल, निकल बाहर।”

इन्कार भी तो आमंत्रण देता है। लग गया जीजाई का ध्यान। मन शांत हो गया। उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। वह रो-रोकर भगवान से माफी माँगने लगीः “विट्ठल ! मैंने तुम्हें बहुत से अपशब्द कह दिये। मुझे माफ कर दो।”

विट्ठल बोलेः “अरे, जीजाई ! रोती क्यों है ? तेरे सब अपराध माफ है। जो मुख्य कर्तव्य में लग जाते हैं, उनके गौण कर्तव्य मैं पूरे करता हूँ। तुम्हारे पतिदेव अपने मुख्य कर्तव्य के पालन में, ईश्वर को पाने में लगे हुए हैं, अतः उनके गौण कर्तव्य तो मुझे ही पूरे करने पड़ते हैं। जीजाई ! तू फिकर मत कर, उठ।”
विट्ठल ने जीजाई का हाथ पकड़कर उसके खड़ा किया और उसके पैर से शूल निकाला। भगवान के स्पर्श से उसकी सारी थकान भी दूर हो गयी।
जीजाई बोलती हैः “विट्ठल ! मुझे प्यास लगी है।”
यह सुनकर विट्ठल ने पास की चट्टान पर पत्थर दे मारा तो वहाँ से झरना फूट पड़ा। जीजाई ने पानी पीकर जब प्यास बुझा ली तब विट्ठल बोलेः
“जीजाई ! जल्दी करो। मेरा भक्त भूखा है।”
जीजाई और भगवान, दोनों पैदल ही पहाड़ी पर जाने लगे। तुकाराम जी तो भूख से व्याकुल होकर दूर-दूर तक ताक ही रहे थे। अचानक देखा कि ‘अरे, अमावस्या की काली रात और मध्याह्नकाल के भुवनभास्कर एक साथ ! कहाँ जीजाई और कहाँ विट्ठल ! दोनों एक साथ कैसे ? मुझे कोई भ्रम तो नहीं हो गया ?’ आँखें मसल-मसलकर तुकाराम जी ने देखा कि ‘मैं वास्तव में होश में तो हूँ न ?’
देखते-देखते दोनों तुकाराम जी के पास पहुँच गये। उनके आते ही तुकाराम जी ने भगवान से पहला प्रश्न यही कियाः
“भगवान विट्ठल ! आप जीजाई को लेकर आये !”
विट्ठल ने सारी घटना बता दी। उन्होंने कहाः
“आज जीजाई के पैर में शूल चुभ गया था। देर हो रही थी, इसलिए मुझे आना पड़ा।”
तुकाराम जी तो भगवान के साकार विग्रह को देखते ही भूख-प्यास भूल गये। तब भगवान के कहाः “खाओ, तुकाराम !”
खाते-खाते तुकाराम जी कहते हैं- “भगवन् ! जीजाई तो सदैव आपको कोसती रहती है, फिर भी आप उसके साथ कैसे ?”
“तुकाराम ! मेरी नज़र जीजाई पर नहीं, तुम पर थी। मेरी नज़र तो भक्त पर होती है और भक्त के नाते भक्त के सम्बन्धियों का कल्याण करना यह मेरा स्वभाव है।”
जो अपने मुख्य कर्तव्य को निभा लेता है, उसके गौण कर्तव्य का निर्वाह स्वयं भगवान की कृपा से ही हो जाता है। अतः ईश्वर की ओर जाने वालों को उनके कुटुंबी कोसें नहीं बल्कि सहयोग करें। इसी में भला है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2002, पृष्ठ संख्या 11-13, अंक 117
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राजकुमार श्यामराव से बने संत तुलसी साहिब


 

पुणे (महाराष्ट्र) के राजा ने अपने बड़े युवराज श्यामराव का विवाह केवल 12 वर्ष की उम्र में कर दिया। श्यामराव ने इस विवाह का बहुत विरोध किया था। वे बचपन से ही वैरागी थे किंतु पिता और ऊपर से राजा, भला उनका आदेश वे कैसे टालते ! जब वे 20-22 वर्ष के हो गये, तब भी पति-पत्नी के शारीरिक विकारों से दूर रहे। उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई एक पतिव्रता नारी थी। वह सदैव पति की सेवा में तल्लीन रहती। श्यामराव अपनी पत्नी की सेवा से बहुत प्रसन्न थे। एक दिन उन्होंने पत्नी से कहाः “तुमने मेरी बहुत सेवा की है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ। आज तुम मुझसे कुछ माँग लो।”

लक्ष्मीबाई शर्मा गयी। उसने सारी बात अपनी सासु को बता दी और कहाः “भला मैं क्या माँगूँ ? मेरे पास सब कुछ है।”

सासु बोलीः “नहीं, तुम्हारे पास पुत्र नहीं है। अब वही बात फिर से कहे तो तुम उससे एक पुत्र माँग लेना।”

दूसरे दिन श्यामराव ने फिर वही बात दोहरायी तो झुकी हुई आँखों से लक्ष्मीबाई बोलीः “मुझे एक पुत्र दे दीजिये।”

उनको दस महीने बाद एक पुत्र की प्राप्ति हुई। श्यामराव के पिता ने सोचा, ‘अब तो पुत्र का मन संसार में रम गया है इसलिए उसे राजगद्दी सौंपकर जंगल में जा के भगवान का भजन किया जाय।’ किंतु पुत्र तो पहले ही अंदर से संन्यासी था, वह बोलाः “पिता जी ! आप राजपाट क्यों छोड़ना चाहते हैं ?”

“बेटा ! यह सब एक दिन तो छूट ही जाना है। मैं क्यों न इस मोह-माया से दूर जाकर सत्य की खोज करूँ, जो मानव-जीवन का लक्ष्य है।”

“पिता जी ! जो आपका लक्ष्य है, वही मेरा भी लक्ष्य है। आप अब इस उम्र में राजपाट त्यागना चाहते हैं तो समझिये मैंने इसे त्याग ही दिया। मैं भला क्यों इस झूठी मोह माया में पड़ूँ, जिससे आप छूटना चाहते हो !”

फिर भी पिता ने आस नहीं छोड़ी, वे बार-बार समझाते रहे और एक दिन श्यामराव को राजगद्दी सौंपने की तिथि की घोषणा कर दी।

राजकुमार को राजा बनाने की तैयारियाँ जोरों से चल रही थीं। उनका राज्याभिषेक होने में केवल एक दिन शेष था। वे अपने कुछ साथी और जीवन-रक्षक घुड़सवारों के साथ शहर से बाहर निकल गये। धीरे-धीरे अपने तेज-तर्रार तुर्की घोड़े को साथियों से भी अलग ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी राहों से एवं इतने दूर निकल गये कि कोई खोज न पाये। उनकी खोज में अनेक सैनिक दौड़ाये गये किंतु उनका कहीं पता नहीं चला। आखिर निराश हो के राजा ने राजगद्दी अपने छोटे पुत्र बाजीराव को सौंपकर वन-गमन किया।

यद्यपि श्यामराव स्वयं एक उच्च कोटि के साधक थे किंतु फिर भी वे किन्हीं ऐसे महापुरुष की तलाश में थे जिनसे वे गुरुदीक्षा ले सकें। उनको ऐसे ही एक संत मिल गये। उन्होंने उन संत को अपना सब कुछ सौंप दिया और उनकी शरण में चले गये। गुरुआज्ञा से वे ॐकार के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत जप की साधना में डूब गये। शारीरिक और मानसिक साधनाएँ कीं और एक दिन शरीर, इन्द्रियों और मन के पार होकर निजात्मा में स्थित हो गये। आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार करने में सफल हो गये। वे श्यामराव से तुलसी साहेब बनकर समाज में विचरण करने लगे। उन्होंने गाँवों-शहरों में बरसों घूम-घूमकर लोगों को सत्य का ज्ञान दिया। हाथरस (उत्तर प्रदेश) में उनका छोटा सा आश्रम है और वे वहीं रह के सत्संग कर लोगों को सन्मार्ग दिखाते रहे।

एक बार एक साहूकार तुलसी साहेब को किसी तरह प्रसन्न कर अपने घर भोजन कराने ले गया। उसने बहुत सेवा की किंतु सेवा के पीछे उसका स्वार्थ था। उसने उनसे माँगा कि वे कृपा करके उसे पुत्रप्राप्ति का वरदान दे दें। इस पर तुलसी साहेब ने अपना सोंटा उठाया और चलते हुए बोलेः “मैं तो वरदान देना चाहता हूँ कि तुम्हारे यहाँ पुत्र हो तो भी भगवान उसे उठा लें और तुम्हें बिल्कुल कंगाल कर दें। तभी तुम इस संसार की इस मोह-माया छोड़कर परमात्मा की खोज में निकलोगे, तभी तुम्हें स्थायी आनंद का पता चलेगा।” महापुरुषों की अपनी अलमस्ती होती है। सामने वाले की योग्यता के अनुसार कुछ देना-न देना, जिसमें सामने वाले का मंगल होता है वही उनके द्वारा होता है।

तुलसी साहेब का मानना है कि ‘समस्त लोगों और समस्त धर्मों का स्वामी एक ही परमात्मा है। उस एक का ही चिंतन करना चाहिए। उस एक ईश्वर को ही जानना चाहिए। छोटे-मोटे देवताओं की पूजा अंततः संसार के आवागमन में ही घुमाती है। हमें इस चक्रव्यूह से बाहर निकलना है। एक ॐकार तत्त्व को जानकर उसी में मिल जाना है। यही मोक्ष है।’ इस तरह वे अद्वैत मत के समर्थक थे।

उन्होंने सन् 1843 में अपना पंचभूतों का चोला छोड़ा और अखंड चैतन्य में समा गये।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2016, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 284

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