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Sant Charitra

ऐसे गहने हों तो हीरे-मोतियों की क्या आवश्यकता ?


भक्तिमति मीराबाई की भगवद्भक्ति, साधुसंगति आदि देखकर एक ओर जहाँ उनके देवर विक्रमादित्य (महाराजा विक्रम) का क्रोध बढ़ता जा रहा था, वहीं दूसरी ओर मीरा की यश-कीर्ति का विस्तार हो रहा था । मंदिर में महल की डयोढ़ी (दहलीज) पर मीरा के भजन लिखने-सुनने वाले जिज्ञासु यात्रियों, साधु सज्जनों की भीड़ लगी ही रहती थी । यह सब देख-सुन महाराणा विक्रम तिलमिला उठता था ।

एक दिन मीरा की ननद उदा के पति पधारे । सारी हँसी-खुशी के बीच उन्होंने पत्नी को उलाहना दियाः “तुम्हारी भाभी पुरुषों की भीड़ में नाचती गाती हैं । कैसी कुलरीति है हिन्दूपति राणा के घर की ?”

उदा मन ही मन गुस्से को पी गयी और दूसरे दिन उसने सारी भड़ास मीराबाई पर निकालते हुए कहाः “मेरी भाभी ! क्या जानती है आप अपनी करतूतों का परिणाम ? आपके नंदोई, इस घर के जँवाई पधारे हैं । आपके कारण मुझे कितने उलाहने, कितनी वक्रोक्तियाँ सुननी पड़ीं सो तो मैं ही जानती हूँ ।”

मीरा ने कहाः “बाईसा ! जिनसे मेरा कोई परिचय या स्नेह-संबंध नहीं है, उनके द्वारा दिये गये उलाहनों का कोई प्रभाव मुझ पर नहीं होता ।”

मीरा का उत्तर सुनकर उदा मन ही मन जल उठी और व्यंग्यपूर्वक बोलीः “किंतु भाभी ! कैसे समझाऊँ आपको कि आपके इस साधु-संग से आपका मायका और ससुराल दोनों लज्जित हैं । आप इन बाबाओं का संग छोड़ती क्यों नहीं है ? सारे सगे-संबंधियों और प्रजा में थू-थू हो रही है । क्या इन श्वेत वस्त्रों को छोड़कर और कोई रंग नहीं बचा है पहनने को ? और कुछ न सही पर एक-एक सोने का कंगन हाथों में और एक स्वर्ण-कंठी गले में पहन ही सकती हैं न ? क्या आप इतना भी नहीं जानतीं कि लकड़ी के डंडे जैसे सूने हाथ अपशकुनी माने जाते हैं ? जब बावजी हुकम (मीराबाई के पति भोजराज) का परलोकगमन हुआ और गहने-कपड़े उतारने का समय आया, तब तो आप सोलहों श्रृंगार करके उनका शोक मनाती रहीं और अब ? ये तुलसी की मालाएँ हाथों और गले में बाँधे फिरती हैं, जैसे कोई निर्धन औरत हो । पूरा राजपरिवार लाज से मरा जा रहा है  आपके व्यवहार के कारण ।”

मीराबाई ने शांतभाव से कहाः “जिसने शील (किसी का भी अहित न चाहना और न करना, सच्चरित्रता, सदाचार, विनम्रता) और संतोष के गहने पहन लिये हैं, उसे सोने और हीरे-मोतियों की आवश्यकता नहीं रहती बाईसा !”

मीरा के वचनों में जीवन की एक गहरी सच्चाई झलक रही थी । मीराबाई को भक्तिमार्ग से हटाने के लिए बहुत प्रयास हुए फिर भी वे डटी रहीं । गीता में जो भी कहा गया हैः भजन्ते मां दृढव्रताः । जो दृढ़ हैं वह अवश्य पूर्णता प्राप्त कर लेता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2019, पृष्ठ संख्या 21 अंक 323

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गुरुमंत्र के प्रभाव से एक ने पाया ऋषि पद ! – पूज्य बापू जी


इतरा माता का पुत्र बालक ऐतरेय बाल्यकाल से ही जप करता था । वह न तो किसी की बात सुनता था, न स्वयं कुछ बोलता था । न अन्य बालकों की तरह खेलता ही था और न ही अध्ययन करता था ।

आखिर लोगों ने कहाः “यह तो मूर्ख है । कुछ बोलता ही नहीं है ।”

एक दिन माँ ने दुःखी होकर ऐतरेय से कहाः “माता-पिता तब प्रसन्न होते हैं जब उनकी संतान का यश होता है । तेरी तो निंदा हो रही है । संसार में उस नारी का जन्म निश्चय ही व्यर्थ है जो पति के द्वारा तिरस्कृत हो और जिसका पुत्र गुणवान न हो ।”

तब ऐतरेय हँस पड़ा और माता के चरणों में प्रणाम करके बोलाः “माँ ! तुम झूठे मोह में पड़ी हुई हो । अज्ञान को ही ज्ञान मान बैठी हो । निंदा और स्तुति संसार के लोग अपनी दृष्टि से करते हैं । निंदा करते हैं तो किसकी करते हैं ? जिसमें कुछ खड़ी हड्डियाँ हैं, कुछ आड़ी हड्डियाँ हैं और थोड़ा माँस है जो नाड़ियों से बँधा है, उस निंदनीय शरीर की निंदा करते हैं । इस निंदनीय शरीर की निंदा हो चाहे स्तुति, क्या अंतर पड़ता है ? मैं निंदनीय कर्म तो नहीं कर रहा, केवल जानबूझकर मैंने मूर्ख का स्वांग किया है ।

यह संसार स्वार्थ से भरा है । निःस्वार्थ तो केवल भगवान और भगवत्प्राप्त महापुरुष हैं । इसीलिए माँ ! मैं तो भगवान के नाम का जप कर रहा हूँ और मेरे हृदय में भगवत्शांति है, भगवत्सुख है । मेरी निंदा सुनकर तू दुःखी मत हो ।

माँ ! ऐसा कभी नहीं सोचना चाहिए जिससे मन में दुःख हो, बुद्धि में द्वेष हो और चित्त में संसार का आकर्षण हो । संसार का चिंतन करने से जीव बंधन में पड़ता है और चैतन्यस्वरूप परमात्मा का चिंतन करने से जीव मुक्त हो जाता है ।

वास्तव में मैं शरीर नहीं हूँ और माँ ! तुम भी यह शरीर नहीं हो । शरीर तो कई बार पैदा हुए और कई बार मर गये । शरीर को ‘मैं’ मानने से, शरीर के साथ संबंधित वस्तुओं को मेरा मानने से ही यह जीव बंधन में फँसता है । आत्मा को मैं मानने और परमात्मा को मेरा मानने से जीव मुक्त हो जाता है ।

माँ ! ऐसा चिंतन-मनन करके तू भी मुक्तात्मा हो जा । अपनी मान्यता बदल दे । संकीर्ण मान्यता के कारण ही जीव बंधन का शिकार होता है । अगर वह ऐसी मान्यता को छोड़ दे तो जीवात्मा परमात्मा का सनातन स्वरूप है है ।

माँ ! जीवन की शाम हो जाय उसके पहले जीवनदाता का ज्ञान पा ले । आँखों को देखने की शक्ति क्षीण हो जाय उसके पहले जिससे देखा जाता है उसे देखने का अभ्यास कर ले । कान बहरे हो जायें उसके पहले जिससे सुना जाता है उसमें शांत होती जा… यही जीवन का सार है माँ !”

इतरा ने देखा कि बेटा लगता तो मूर्ख जैसा है किंतु बड़े-बड़े तपस्वियों से भी ऊँचे अनुभव की बात करता है । माँ को बड़ा संतोष हुआ ।

ऐतरेय ने कहाः “माँ ! पूर्वजन्म में मुझे गुरुमंत्र मिला था । मैं निरंतर उसका जप करता था । उस जप के प्रभाव से ही मुझे पूर्वजन्म  की स्मृति हुई, भगवान के प्रति मेरे मन में भक्ति का उदय हुआ ।”

यही बालक आगे चलकर ऐतरेय ऋषि हुए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2019, पृष्ठ संख्या 18,19 अंक 318

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सेवाभाव से घर में प्रकटाये महान संत


संत टेऊँराम जी पुण्यतिथिः 8 जून 2019, जन्यतीः 8 जुलाई

सिंध प्रदेश के हैदराबाद जिले में सिंधु नदी के तट पर बसे खंडू गाँव में भक्त चेलाराम जी रहते थे । वे इतने संतसेवी थे कि कहीं भी किन्हीं सत्पुरुष, महात्मा को देखते तो उनको अपने घर में ले जाते और प्रेमपूर्वक भोजनादि से संतुष्ट करके ही उन्हें विदा करते । उनके घर में नियमित रूप से कथा-कीर्तन होता रहता था । चेलाराम जी की पत्नी कृष्णा देवी भी भक्ति र सेवा में पति से कम नहीं थीं ।

एक बार एक संत-मंडली खंडू में आयी । भक्त जी संतों को घर लेकर आये और श्रद्धापूर्वक उनका भलीभाँति आदर-सत्कार किया । चेलाराम जी की प्रार्थना पर सत्संग का आयोजन हुआ । सत्संग-कीर्तन करते हुए वे संतपुरुष भगवत्प्रेम में, अपने स्वरूप की मस्ती में इतने तो तन्मय हो गये कि उनका दर्शन करने आये लोग भी अपने शरीर की सुध-बुध भूलकर कीर्तन में तल्लीन हो गये ।

कृष्णा देवी भी आनंदमग्न हो गयीं । वे मन-ही-मन भगवान से प्रार्थना करने लगीं की ‘हे प्रभो ! इन सत्पुरुषों जैसे योगी महात्मा मेरे घर में पुत्ररूप में अवतरित हों ।’ सत्संग पूरा हुआ । चेलाराम जी व कृष्णादेवी की सेवा से संतुष्ट हुए उन महात्माओं ने उनसे कुछ माँगने को कहा । तब कृष्णा देवी ने अपने मन की बात संतों के श्रीचरणों में निवेदित की ।

महात्माओं ने आशीर्वाद देते हुए कहाः “जो संतों की सेवा व सत्संग का श्रवण-मनन करते हैं, दूसरों तक सत्संग पहुँचाने में निमित्त बनते हैं ऐसे पुण्यात्मा भक्तों पर भगवान विशेष प्रसन्न रहते हैं और उनकी शुभेच्छा की पूर्ति भी करते हैं । आपके शुभ कर्म ही आपके घर में एक दिव्यात्मा के रूप में अवतरित होंगे ।” संतों ने कृष्णा देवी को कुछ साधना-विधि भी बतायी ।

कृष्णा देवी ने चालीस दिन का व्रत अनुष्ठान प्रारम्भ किया । वे अपना अधिकांश समय सत्शास्त्र अध्ययन, महापुरुषों के वचनों का चिंतन-मनन, परमात्म-ध्यान आदि में लगाने लगीं । अनुष्ठान की अंतिम रात्रि को ईश्वर ने कृष्णा देवी को स्वप्न में कहाः ‘हे कल्याणी ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ । तुम्हारा संकल्प शीघ्र ही पूर्ण होगा ।’ यह खबर सुनकर कृष्णा देवी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा ।

समय पाकर उन्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई । बालक को एक तरफ जहाँ माता-पिता से उत्तम संस्कार मिले, वहीं दूसरी तरफ सद्गुरु आसूराम जी का कृपा-प्रसाद मिला और आगे चलकर ये संत टेऊँरामजी के नाम से प्रसिद्ध हो गये । सद्गुरुकृपा से उन्हें जो मिला उसका वर्णन करते हुए वे कहते हैं-

जो कुछ दीसै1 सोई है प्रभु, उस बिन और न कोई है ।

नाम-रूप यह जगत बना जो, वासुदेव भी वोही है ।।

अस्ति2 भाति3 प्रिय4 रूप जो, सत् चित् आनंद सोई है ।

कह टेऊँ गुरु भ्रम मिटाया, जहँ देखूँ तहँ ओई5 है ।।

1 दिख रहा 2 सदा विद्यमान, शाश्वत अस्तित्व 3 ज्ञानस्वरूप 4 आनंदस्वरूप 5 वही (परमात्मा)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2019, पृष्ठ संख्या 21 अंक 317

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