Monthly Archives: January 2015

प्रत्येक हिन्दू बालक को संस्कृत सीखनी ही चाहिए


महात्मा गाँधी
शिक्षकों का प्रेम मैं विद्यालयों में हमेशा ही पा सका था। अपने आचरण के विषय में बहुत सजग था। आचरण में दोष आने पर मुझे रोना ही आ जाता था। मेरे हाथों कोई भी ऐसा काम, जिससे शिक्षकों को मुझे डाँटना पड़े अथवा शिक्षकों का वैसा ख्याल बने तो वह मेरे लिए असह्य हो जाता था।
संस्कृत विषय चौथी कक्षा में शुरु हुआ था। विद्यार्थी आपस में बातें करते कि ‘फारती बहुत आसान है।’ मैं भी आसान होने की बात सुनकर ललचाया और एक दिन फारसी के वर्ग में जाकर बैठा। संस्कृत के शिक्षक को दुःख हुआ। उन्होंने मुझे बुलाया और कहाः “यह तो समझ कि तू किनका लड़का है ! क्या तू अपने धर्म की भाषा नहीं सीखेगा ? तुझे जो कठिनाई हो वह मुझे बता। मैं तो सब विद्यार्थियों को बढ़िया संस्कृत सिखाना चाहता हूँ। आगे चलकर उसमें रस के घूँट पीने को मिलेंगे। तुझे यों ही हारना नहीं चाहिए। तू फिर से मेरे वर्ग में बैठ।”
मैं शिक्षक के प्रेम की अवमानना न कर सका। आज मेरी आत्मा कृष्णशंकर का उपकार मानती है क्योंकि जितनी संस्कृत मैंने उस समय सीखी, उतनी भी न सीखी होती तो आज संस्कृत शास्त्रों में मैं जितना रस ले सकता हूँ, उतना ने ले पाता। मुझे तो इस बात का पश्चात्तपा होता है कि मैं अधिक संस्कृत न सीख सका। क्योंकि (काफी) बाद से मैं समझा कि किसी भी हिन्दू बालक को संस्कृत का अच्छा अभ्यास किये बिना रहना ही न चाहिए।
भाषा पद्धतिपूर्वक सिखायी जाय और सब विषयों को अंग्रेजी के माध्यम से सीखने-सोचने का बोझ हम पर न हो तो भाषाएँ सीखना बोझरूप न होगा बल्कि उसमें बहुत ही आनन्द आयेगा। असल में तो हिन्दी, गुजराती, संस्कृत एक भाषा मानी जा सकती हैं।
माँ के दूध के साथ जो संस्कार मिलते हैं और जो मीठे शब्द सुनाई देते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिए, वह विदेशी भाषा द्वारा शिक्षा लेने से छूट जाता है। राष्ट्रीयता टिकाये रखने के लिए किसी भी देश के बच्चों को नीची या ऊँची, सारी शिक्षा उनकी मातृभाषा के जरिये ही मिलनी चाहिए।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2015, पृष्ठ संख्या 20, अंक 265
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

पुत्रवान भव राजन् – पूज्य बापू जी


राजा दिलीप को कोई संतान नहीं थी। वे गुरु वसिष्ठ के चरणों में गये और प्रार्थना कीः “गुरुवर ! ऐसा कोई उपाय बतायें जिससे मैं संतानप्राप्ति कर सकूँ।”
गुरुवर वसिष्ठजी ने कहाः “राजन् ! आश्रम में रहकर नंदिनी गाय की सेवा करो। अगर उसकी सेवा से उसे संतुष्ट कर सको तो काम बन जायेगा।”
गुरुवर की आज्ञा शिरोधार्य करके राजा दिलीप नंदिनी की सेवा करने लगे। वे उसे चराने के लिए रोज जंगल में ले जाते। सेवा करते-करते राजा को बहुत समय बीत गया।
एक दिन जब राजा दिलीप नंदिनी को चराने ले गये, तब जंगल में एक सिंह ने नंदिनी के ऊपर पंजा रख दिया। यह देखकर दिलीप बोल उठेः “रूको-रूको ! हे वनकेसरी ! गाय को क्यों मारते हो ?”
सिंहः “यह तो मेरा आहार है।”
दिलीपः “यह तुम्हारा आहार नहीं, मेरे गुरुदेव की गाय है। मैं इसका सेवक हूँ। जब तक सेवक जीवित हो, तब तक सेव्य कष्ट नहीं पा सकता। मैं गाय चराने के लिए आया हूँ। इसकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है। अगर तुम्हें भूख लगी हो तो मेरा आहार कर लो लेकिन नंदिनी पर प्रहार मत करो।”
“मानव-देह बड़ी मूल्यवान है। पशु तो आता-जाता रहता है। उसका उपयोग करना होता। मानव के लिए पशु है, पशु के लिए मानव नहीं।”
दिलीपः “आपकी यह बात आपके ही पास रहे। मनुष्य अगर मानवता छोड़ दे तो वह पशु से भी बदतर है। मेरा कर्तव्य है इसकी सेवा करना। अतः मुझे अपने कर्तव्य में ही लगे रहने दो वनकेसरी !”
राजा दिलीप सिंह के सामने नीचे सिर करके पड़ गये। राजा की अटूट निष्ठा देखकर देवताओं द्वारा पुष्पवृष्टि होने लगी और सिंह गायब हो गया। नंदिनी बोलीः “राजन ! तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए मैंने ही माया का सिंह बनाया था। मैं तुम्हारी गुरुभक्ति से और मेरे प्रति प्रदर्शित दया भाव से अत्यंत प्रसन्न हूँ। पुत्रवान भव राजन् ! तेजस्वी भव। यशस्वी भव। पुत्र प्राप्ति के लिए अब तुम मेरा दूध दुहकर पी लो।”
राजा बोलेः “माता ! बछड़े के पीने के बाद तथा धार्मिक अनुष्ठान के बाद बचे दूध को ही मैं पी सकता हूँ।”
यह सुन नंदिनी अत्यंत प्रसन्न हुई। दोनों आश्रम लौट आये। बछड़े के पीने व होमादि अनुष्ठान के बाद बचे दूध का गुरु आज्ञा पाकर राजा ने पान किया। समय पाकर राजा दिलीप के यहाँ संतान का जन्म हुआ जो राजा रघु के नाम से प्रख्यात हुए और इन्हीं के नाम पर कुल का नाम पड़ा रघुकुल। इसी कुल में आगे चलकर मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ है। कैसी है महत्ता गुरु आज्ञा-पालन की और कैसी है महिमा गुरुसेवा की ! और कैसी है राजा दिलीप की निष्ठा !
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2015, पृष्ठ संख्या 17, अंक 265
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

चार स्थान जहाँ सांसारिक बातें हैं वर्जित


चार जगहों पर सांसारिक बातें नहीं करनी चाहिए, केवल भगवत्स्मरण ही करना चाहिए। ये चार स्थान हैं- मंदिर, श्मशान, रोगी के पास, गुरु निवास
श्मशान में कभी गये तो ‘तुम्हारा क्या हाल है ? आजकल धंधा कैसा चल रहा है ? सरकार का ऐसा है….’ ऐसी इधर-उधर की बातें न करें वरन् अपने मन को समझायें कि ‘आज इसका शरीर आया, देर-सवेर यह शरीर भी ऐसे ही आयेगा। इसको मैं-मैं मत मान, जहाँ से मैं-मैं की शक्ति आती है वही मेरा है। प्रभु ! तू ही तू…. तू ही तू…. मैं तेरा, तू मेरा। अरे मन ! इधर-उधर की बातें मत कर। देख वह शव जल रहा है, कभी यह शरीर भी जल जायेगा।’ इस प्रकार मन को सीख दें।
अगर श्मशान में जाने को न मिले तो आश्रम द्वारा प्रकाशित ‘ईश्वर की ओर’ पुस्तक सभी बार-बार पढ़ें। उससे भी मन विवेक वैराग्य से सम्पन्न होने लगेगा।
रोगी से मिलने जाओ तब भी संसार की बातें नहीं करनी चाहिए। रोगी से मिलते समय उसको ढाढ़स बँधाओ। उसको कहोः ‘रोग तुम्हारे शरीर को है। शरीर तो कभी रोगी, कभी स्वस्थ होता है लेकिन तुम तो भगवान के सपूत, अमर आत्मा हो। एक दिन यह शरीर नहीं रहेगा फिर भी तुम रहोगे, तुम तो ऐसे हो।’ इस प्रकार रोगी में भगवदभाव की बातें भरें तो आपका रोगी से मिलना भी भगवान की भक्ति हो जायेगा। रोगी के अंदर बैठा हुआ परमात्मा आप पर संतुष्ट होगा और आपके दिल में बैठा हुआ वह रब भी आप पर संतुष्ट होगा।
अगर आप मंदिर या गुरु आश्रम में जाते हो तो वहाँ पर भी सांसारिक चर्चा न करो, इधर-उधर की बातें छोड़ दो। वहाँ तो ऐसे रहो कि एक दूसरे को पहचानते ही नहीं और पहचानते भी हो तो रब के नाते। अन्यथा भगवान और गुरु का नाता तो ठंडा हो जाता है और पहचान बढ़ जाती है कि ‘आप मेरे घर आइये, आप यह करिये – आप वह करिये, जरा ध्यान रखना, उसका लड़का ठीक है, अपने ही हैं…..’ मंदिर-आश्रम में जाकर भगवदभाव जगाना होता है, संसार को भूलना होता है। अगर वहाँ जाकर भी संसार की बातें करोगे तो मुक्ति कहाँ पाओगे ? दुःखों से विनिर्मुक्त कहाँ होओगे ? इसलिए मुक्ति के रास्ते को गंदा मत करो वरन् गंदे रास्तों को भी भगवद् भक्ति से सँवार लो।
अगर गुरु के निवास पर जाते हो, गुरु के निकट जाते हो तब भी सांसारिक बातों को महत्व न दो। गुरु को निर्दोष निगाहों से, प्रेमभरी निगाहों से, भगवदभाव की निगाहों से देखो और उन्हें संसार की छोटी-छोटी समस्या सुनाकर उनका दिव्य खजाना पाने से वंचित न रहो। उनके पास से तो वह चीज मिलती है जो करोड़ों जन्मों में करोड़ों माता-पिताओं से भी नहीं मिली। ऐसे गुरु मिले हैं तो फिर संसार के छोटे-मोटे खिलौनों की बातें नहीं करनी चाहिए।
इस प्रकार चार जगहों पर सांसारिक चर्चा से बचकर भगवच्चर्चा, भगवत्सुमिरन करें। मंदिर एवं संतद्वार पर जप-ध्यान करें तो आपके लिए मुक्ति का पथ प्रशस्त हो जायेगा।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 2015, पृष्ठ संख्या 11, अंक 265
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ