Monthly Archives: June 2009

जपात् सिद्धिर्न संशयः


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

जप करने से वायुमंडल में एक प्रकार का भगवदीय रस, भगवदीय आनंद व सात्त्विकता का संचार होता है, जो आज के वातावरण में विद्यमान वैचारिक प्रदूषण को दूर करता है । भगवन्नाम-जप के प्रभाव से दिव्य रक्षा-कवच बनता है, जो जापक को विभिन्न हलके तत्त्वों से बचाकर आध्यात्मिक व भौतिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है ।

गुरु के द्वारा मंत्र मिल गया तो आपकी आधी साधना तो दीक्षा के प्रभाव से ही हो गयी और पूर्वकृत पाप तथा पूर्वकृत गंदी आदतें दुबारा नहीं दुहरायें तो पहले के पाप क्षम्य हो जाते हैं और आप निर्दोष हो जाते हैं । ज्यों-ज्यों जप बढ़ेगा त्यों-त्यों पाप नष्ट होंगे लेकिन कोई भयंकर महापाप है तो ज्यादा जप-अनुष्ठान करने की आवश्यकता होती है ।

भगवान आद्य शंकराचार्य के संप्रदाय में बहुत बड़े विद्वान हो गये विद्यारण्य स्वामी । उनको गुरुमंत्र मिला और गुरु ने कहा कि ‘अनुष्ठान करो ।’

एक अक्षर का मंत्र हो तो 1,11,110 जप और उससे अधिक अक्षरों के मंत्र के लिए मंत्र में जितने अक्षर है उतने गुना (जैसे तीन अक्षर के मंत्र हेतुः 1,11,110×3) जप करने से इष्टमंत्र सिद्ध होता है । ऐसे अनुष्ठान से अनिष्ट छू हो जाते हैं और जिस देव का मंत्र है वह देव प्रकट भी हो जाता है । विद्यारण्य स्वामी ने एक अनुष्ठान किया, दो, तीन, चार, पाँच, छः….. ऐसा करते-करते अनेक अनुष्ठान हो गये । देखा कि अभी तक इष्टदेवता माँ भगवती प्रकट नहीं हईं, कुछ चमत्कार नहीं हुआ । ‘यह सब ढकोसला (पाखण्ड) है, मैं नाहक इसमें फँसा ।’ – ऐसा विचार आया । तो एकांत जगह में जहाँ कुटिया बना के वे रह रहे थे, वहाँ लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और अग्नि प्रज्वलित करके धार्मिक पुस्तकें, पूजा-पाठ की सामग्री, माला, गौमुखी आदि सब अग्निदेवता में स्वाहा कर दिया ।

जब अग्नि भभक-भभककर सबको स्वाहा कर रही थी, उतने में एक दिव्य आभासम्पन्न महिला वहाँ प्रकट हो गयीं और विद्यारण्य स्वामी को कहने लगीं- “यह तुम क्या कर रहे हो ?”

बोलेः “माता जी ! यह सब जप-वप ढकोसला है । मैंने अनेक अनुष्ठान किये, मंत्रजप से कुछ नहीं होता । अब मैं लोगों में प्रचार करूँगा कि धार्मिक बनके समय बर्बाद मत करो । मैं नास्तिकवाद का प्रचार करूँगा । ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं, मंत्र-यंत्र ये सब फालतू बाते हैं ।”

देवी ने कहाः “अच्छा ! तुम्हें जो करना है करो लेकिन पीछे मुड़के भी तो जरा देखो ।”

विद्यारण्य स्वामी ने देखा कि जैसे आगे अग्नि जल रही है, वैसे ही पीछे भी भभक-भभक करके लपटें दिख रही हैं और उनमें धड़ाक-धड़ाक करके ऊपर से बड़े-बड़े पहाड़ जैसे पत्थर गिर कर फूट रहे हैं । पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा…. ऐसा करके अनेक पत्थर भयंकर ध्वनि करते हुए उस अग्नि में नष्ट हो गये । वे चकित होकर सोचने लगे कि ‘यह मैं क्या देख रहा हूँ ! जिन देवी ने मुझसे कहा था वे इस रहस्य को जरूर जानती होंगी ।’

पीछे मुड़कर देखा तो देवी हैं नहीं ! वे कहाँ गयीं ? युवक थे, वन में इधर-उधर जरा आपाधापी की, पुकार लगायीः “हे मातेश्वरी ! देवेश्वरि !! हे विश्वेश्वरि !!! कृपा करो । आप आयीं थीं, अब अदृश्य हो गयी हो । मैं नहीं जानता वास्तव में आप कौन हो ? मेरा मार्गदर्शन करो ।”

आकाशवाणी हुई कि “तुमने तो धर्म का आश्रय, जप का आश्रय, गुरु आज्ञा का आश्रय छोड़ दिया, अब तुम अनाथ हो । जाओ भटको, मनमानी करो । कई अनाथ भटक रहे हैं और मरने के बाद माँ का गर्भ नहीं मिलने पर तो नाली में बह रहे हैं । ऐसे ही तुम भी जाओ, जैसा भी करना है करो । सूर्य नहीं है ऐसा प्रचार करने से क्या सूर्य का अस्तित्व मिट जायेगा ? ईश्वर नहीं है ऐसा प्रचार करने से क्या ईश्वर मिट जायेगा ?”

“माता जी ! यह मैंने क्या देखा कि अनेक बड़े भयंकर पत्थर अग्नि में जलकर नष्ट हो गये !”

देवी बोलीः “तुम्हारे पूर्वजन्मों के जो भयंकर महापातक थे, वे एक-एक करके अनुष्ठानों से नष्ट हुए ।”

“माता जी ! कृपा करो, मार्गदर्शन दो ।”

देवी बोलीं- “मार्गदर्शक गुरु के मत्र का तुमने अनादर किया । उन गुरु की पूजा-प्रार्थना करके  उनसे क्षमायाचना करो । गुरु के स्पर्श अथवा गुरु के दिये हुए मंत्र को और माला को अपना कल्याण करने वाला परम साधन मानकर फिर से जप-अनुष्ठान करोगे तो तुम्हें सिद्धियाँ मिलेंगी ।”

विद्यारण्य स्वामी ने रोते हुए गुरु के चरणों में गिर कर यह सारी घटना सुनायी । कृपालु गुरु ने उन्हें पुनः माला, ग्रंथ आदि दे दिया और कहा कि “अब एक ही अनुष्ठान से तुम सफल हो जाओगे ।”

उन्होंने ऐसा ही किया और इतने बड़े सिद्ध हुए कि उन्होंने ग्रंथ रचा और उस ग्रंथ से मुझे (पूज्य बापू जी को) परमात्मा की प्राप्ति हुई ।

जैसे श्रीकृष्ण की गीता से अर्जुन को तत्त्व प्रसादजा मिल गयी, ऐसे ही गुरुमंत्र के प्रभाव से उन महापुरुष की जो पूर्वजन्मों के महापातकों की भयँकर कालिमाएँ थी, वे नष्ट हुईं और उन्हे तत्त्वज्ञान, तत्त्व प्रसादजा बुद्धि मिली । उन्होंने पंचदशी नामक प्रसिद्ध ग्रंथ लिखा । वेदांत के साधक और ज्ञानमार्ग की साधना करने वाले सभी संत-महात्मा और भक्त उस ग्रंथ से परिचित हैं ।

तो जप करते हैं और कुछ धड़ाक-से हो जाय, ऐसा नहीं होता । जप के प्रभाव से पहले तन की शुद्धि, मन की शुद्धि और पूर्वकर्मों की शुद्धि होती है और जब वह कर्जा निपट जाय तब जमा होगा न ! बैंक बैलेंस कब होगा ? ‘मैंने रोज दो सौ, पाँच सौ, हजार रूपये बैंक में दिये, अभी तक मेरे एक लाख रूपये हुए नहीं !…’ अरे बुद्धू जी ! साढ़े तीन लाख पहले के बैंक के तुम्हारे ऊपर बाकी थे, वही अभी जमा होने में पचीस हजार हुए । तेरा जमा कैसे होगा ? पहले कर्जा पूरा होगा तबह जमा होगा न बेटे ! पहले कर्जा पूरा होगा तब जमा होगा न बेटे ! ऐसे ही जप से पातकनाशिनी ऊर्जा पैदा होती है, जिससे संचित पापों का नाश होता है और पुण्य बढ़ता है । अतः निरंतर जप करते रहना चाहिए ।

शास्त्र कहते हैं-

जपात् सिद्धिः जपात् सिद्धिः जपात् सिद्धिर्न संशयः ।

नीच कर्मों से बचकर किये गये जप से अवश्य ही सिद्धि मिलती है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2009, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 198

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विराट गुरु-तत्त्व की स्मृति जगाओ-पूज्य बापू जी


गुरुपूर्णिमा यह खबर देने वाला पर्व है कि आप कितने भी लघु शरीर, लघु अवस्था में हो फिर भी आपके अंदर विराट छुपा है । जैसे लहर समुद्र से अलग होकर अपने को मानेगी तो मौत की तरफ जायेगी, समुद्र से जुड़कर अपने को देखेगी तो विशाल है, ऐसे ही जीवात्मा अपने परमात्म-चैतन्य की ओर देखेगा तो उसे गुरुत्व का एहसास होगा ।

आप लघु शरीर, लघु व्यापार, लघु कर्म में होते हुए भी विराट परमात्मा के सनातन अंश हैं, इस बात का संदेश देने वाली तथा शम, दम, तितिक्षा, समाधान, ईश्वरप्रणिधान – ये सदगुण सुविकसित करके आपको स्वस्थ, सुखी और सम्मानित जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव कराने वाली पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा है । इसे ‘ज्ञानपूर्णिमा’ भी कहते हैं । आषाढ़ महीने में आती है इसलिए ‘आषाढ़ी पूर्णिमा’ भी कहते हैं । वेदराशि के चार सुव्यवस्थित विभाग करने वाले एवं विश्व का सर्वप्रथम आर्ष ग्रंथ रचने वाले वेदव्यास जी के सम्मान में यह पूर्णिमा ‘व्यासपूर्णिमा’ के नाम से भी जानी जाती है । इस पर्व पर व्यासरूप सच्चे ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की पूजा करके जीव अपने लघुत्व को विराट में मिलाकर स्वयं में विराटता का अनुभव करता है । इस पवित्र पर्व पर जिसने गुरुदेव की पूजा कर ली, उसकी सारी पूजाएँ हो गयीं । गुरुदेव की पूजा के बाद दूसरी कोई पूजा शेष नहीं बचती । देवी-देवताओं की पूजा के बाद रह जाय लेकिन ब्रह्मवेत्ताओं का ब्रह्मज्ञान जिसके जीवन में प्रतिष्ठित हो गया, फिर उसके जीवन में किसकी पूजा बाकी रहेगी ! जिसने सद्गुरु के ज्ञान को पचा लिया, सद्गुरु की पूजा कर ली उसके लिए किसी की पूजा करना शेष नहीं रहता ।

व्यासपूर्णिमा हमें सिखाती है कि जो गुरु का आदर करता है वह आदरणीय हो जाता है । मैंने गुरु का आदर किया, मेरा कितने लोग आदर करते हैं मैं गिन नहीं सकता हूँ । मैंने अगर पैसों का आदर किया होता, ऐश-आराम का आदर किया होता तो मेरी जवानी दीवानगी की खाई में गिर जाती लेकिन मैंने गुरु का आदर किया, अपने जीवन का आदर किया तो मेरी जवानी प्रभु के रंग से रँग गयी और करोड़ों लोग उस प्रसाद से पावन हो रहे हैं – यह प्रत्यक्ष है ।

जैसे शालग्राम की पूजा कोई पत्थर की पूजा नहीं नारायण की पूजा है, शिवलिंग की पूजा कोई पत्थर की पूजा नहीं शिव की पूजा है, ऐसे ही गुरु का आदर, गुरु की पूजा यह ज्ञान की पूजा है, चैतन्य आत्मा का आदर करते हुए अपने चेतना जगाने की पूजा है । जब तक मनुष्य को ज्ञान की प्यास रहेगी, सच्चे जीवन की प्यास रहेगी तब तक यह व्यासपूर्णिमा, गुरुपूर्णिमा का पर्व मनाया जाता रहेगा ।

इस  पूर्णिमा का यह संदेश है कि आप अपनी लघु ग्रंथियों को खोल दो और अपने में छुपे हुए विराट गुरु-तत्त्व की स्मृति जगाओ । भगवान श्रीकृष्ण का संदेश है – स्मृति और संयम । व्यास जी का संदेश है – स्मृति, संयम और अपने गुरुत्व का साक्षात्कार ।

तुझमें राम मुझमें राम, सबमें राम समाया है ।

कर लो सभी से स्नेह जगत में, कोई नहीं पराया है ।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2009, पृष्ठ संख्या 9 अंक 198

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गुरुभक्तियोग


किसी भी प्रकार के ज्ञान के उद्भव के लिए बाह्य साधन, कर्म या क्रिया आवश्यक है । अतः साधक में ज्ञान का आविर्भाव करने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है । परस्पर प्रभावित करने की सार्वत्रिक प्रक्रिया के लिए एक-दूसरे के पूरक दो भाग के रूप में गुरु-शिष्य हैं । शिष्य में ज्ञान का उदय शिष्य की पात्रता और गुरु की चेतनाशक्ति पर अवलम्बित है । शिष्य की मानसिक स्थिति अगर गुरु की चेतना के आगमन के अनुरूप पर्याप्त मात्रा में तैयार नहीं होती तो ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं हो सकता । इस ब्रह्माण्ड में कोई भी घटना घटित होने के लिए यह पूर्वशर्त है । जब तक सार्वत्रिक प्रक्रिया के एक-दूसरे के पूरक ऐसे दो भाग या दो अवस्थाएँ इकट्ठी नहीं होतीं, तब तक कहीं भी, कोई भी घटना घटित नहीं हो सकती ।

‘आत्मनिरीक्षण के द्वारा ज्ञान का उदय स्वतः हो सकता है और इसलिए बाह्य गुरु की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है’ – यह मत सर्वस्वीकृत नहीं बन सकता । इतिहास बताता है कि ज्ञान की हरेक शाखा में शिक्षण की प्रक्रिया के लिए शिक्षक की सघन प्रवृत्ति अत्यंत आवश्यक है । यदि  किसी भी व्यक्ति में किसी भी बाह्य सहायता के सिवाय, सहज रीति से ज्ञान का उदय संभव होता तो स्कूल, कॉलेज एवं यूनिवर्सिटियों की कोई आवश्यकता नहीं रहती । जो लोग ‘शिक्षक की सहायता के बिना ही स्वतंत्र रीति से कोई व्यक्ति कुशल बन सकता है’ – ऐसे गलत मार्ग पर ले जाने वाले मत का प्रचार-प्रसार करते हैं, वे लोग भी तो स्वयं किसी शिक्षक के द्वारा ही शिक्षित होते हैं । हाँ, ज्ञान के उदय के लिए शिष्य या विद्यार्थी के प्रयास का महत्त्व कम नहीं है । शिक्षक के उपदेश जितना ही उसका भी महत्त्व है ।

इस ब्रह्माण्ड में कर्ता एवं कर्म सत्य के एक ही स्तर पर स्थित हैं क्योंकि इसके सिवाय उनके बीच पारस्परिक आदान-प्रदान संभव नहीं हो सकता । अलग स्तर वर स्थित चेतनाशक्ति के बीच प्रतिक्रिया नहीं हो सकती । हालाँकि शिष्य जिस स्तर पर होता है उस स्तर को माध्यम बनाकर गुरु अपनी उच्च चेतना को शिष्य पर केन्द्रित कर सकते हैं । इससे शिष्य के मन का योग्य रूपांतर हो सकता है । गुरु की चेतना के इस कार्य को ‘शक्ति-संचार’ कहा जाता है । इस प्रक्रिया में गुरु की शक्ति शिष्य में प्रविष्ट होती है । ऐसे उदाहरण भी मिल जाते हैं कि शिष्य के बदले में गुरु ने स्वयं ही साधना की हो और उच्च चेतना की प्रत्यक्ष सहायता के द्वारा शिष्य के मन की शुद्धि करके उसका ऊर्ध्वीकरण किया हो ।

दोषदृष्टिवाले लोग कहते हैं- “अंतरात्मा की सलाह लेकर सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा हम पहचान सकते हैं, अतः बाह्य गुरु की आवश्यकता नहीं है ।

किंतु यह बात ध्यान में रहे कि जब तक साधक शुचि और इच्छा-वासनारहितता के शिखर पर नहीं पहुँच जाता, तब तक योग्य निर्णय करने में अंतरात्मा उसे सहायरूप नहीं बन सकती ।

पाशवी अंतरात्मा किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान नहीं दे सकती । मनुष्य के विवेक और बौद्धिक मत पर उसके अव्यक्त और अज्ञात मन का गहरा प्रभाव पड़ता है । प्रायः सभी मनुष्यों की बुद्धि सुषुप्त इच्छाओं तथा वासनाओं का साधन बन जाती है । मनुष्य की अंतरात्मा  उसके अभिगम, झुकाव, रूचि, शिक्षा, आदत, वृत्तियाँ और अपने समाज के अनुरूप बात ही कहती है । अफ्रीका के जंगली आदिवासी, सुशिक्षित यूरोपियन और सदाचार की नींव पर सुविकसित बने योगी की अंतरात्मा की आवाजें भिन्न-भिन्न होती हैं । बचपन से अलग-अलग ढंग से बड़े हुए दस अलग-अलग व्यक्तियों की दस अलग-अलग अंतरात्मा होती हैं । विरोचन ने स्वयं ही मनन किया,  अपनी आत्मा का मार्गदर्शन लिया एवं ‘मैं कौन हूँ ?’ इस समस्या का आत्मनिरीक्षण किया और निश्चय किया कि यह देह ही मूलभूत तत्त्व है । (ऐसा अंतरात्मा की अनर्थकारी प्रेरणावाला अनर्थकारी जीवन हो गया ।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2009, पृष्ठ संख्या 7,8 अंक 198

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