Monthly Archives: September 2011

अहंकार और प्रेम


पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी

जो जगत से सुखी होना चाहता है वह अकड़ने का मजा लेगा – ‘मेरे पास इतनी गाड़ियाँ हैं, इतनी मोटरे हैं, इतना अधिकार है, और अधिकार हथियाऊँ….’ यह रावण का रास्ता है और गुरु के प्रसाद से जो तृप्त हुए हैं, उनका राम जी का रास्ता है। सब कुछ देकर नंगे पैर जंगलों में घूमते हैं फिर भी राम जी संतुष्ट हैं, प्रसन्न हैं और रावण के पास सब गुछ है फिर भी असंतुष्ट है, अप्रसन्न है। अपनी पत्नी और लंका की सुंदरियाँ मिलने पर भी अहंकार चाहता है कि इतनी सुंदर सीता को लंका की शोभा बढ़ाने को ले आऊँ। अहंकार ले-ले के, बड़ा बनकर सुखी होना चाहता है और प्रेम दे देकर अपने आप में पूर्णता का एहसास करता है।

अहंकार क्रोध में, लोभ में, विकारों में बरसकर, दूसरों को परिताप पहुँचाकर सुखी होना चाहता है लेकिन प्रेम अपनी मधुमय शीतलता से बरसते हुए दूसरों के दुःख, रोग, शोक हरकर उनकी शीतलता में अपनी शीतलता का एहसास करता है। अहंकार की छाया ऐसी है कि अहंकार छायामात्र शरीर को ‘मैं’ मानेगा और अपने आत्मा को ‘मैं’ रूप में न सुनेगा, न मानेगा, न जानेगा। जबकि प्रेम शरीर को क्षणभंगुर जानता है व मन परिवर्तनशील, तन परिवर्तनशील, चित्त परिवर्तनशील… उन सबका साक्षी हो जो  है अपरिवर्तनशील, उस अपने आत्मदेव को ‘मैं’ मानता है, जानता है।

जो सबका साक्षी है, उसमें तृप्त होने का यत्न करता है तो जिज्ञासु है। तृप्त हो गया तो व्यास जी है, कृष्ण जी है, राम जी है, नारायणस्वरूप है। अहंकार तोड़ता है और महापुरुष जोड़ते हैं। अहंकार अपनी छाया से हमें विक्षिप्त  और वासनावान करता है लेकिन प्रेम अपनी प्रभा से हमे विकसित, संतुष्ट, तृप्त, दानी और निरभिमानी करता है। अहंकार संग्रह से संतुष्ट होता है और प्रेम बाँटकर तृप्त होता है।

अहंकार बाह्य शक्ति, सामग्री से बड़ा होना चाहता है और प्रेम परमात्म-प्रीति से पूरे बड़प्पन में अपने को ‘मैं’ मिलाने में राज़ी रहता है। तरंग कितनी भी बड़ी बने फिर भी सागर नहीं हो सकती है लेकिन छोटी-सी तरंग अपने को पानी माने तो सागर तो वह खुद ही है। ऐसे ही यह जीव शरीर को ‘मैं’ मानकर, कुछ पा के जो बड़ा बनता है, ये उसके बड़प्पन के ख्वाब रावण की दिशा के हैं। एम.बी.ए. पढ़े हुए बच्चों को सिखाया जाता है कि गंजे आदमी को कंघी बेचनी है और नंगे लोगों को कपड़े धोने का साबुन बेचना है। चाहे उनको काम आये या न आये, उनसे पैसे बनाओ। साधन इकट्ठे करो और सुखी रहो। जो भी ऐसा रास्ता लेते हैं वे खुद परेशान रहते है और दूसरों का शोषण करते हैं लेकिन जो शबरी का, मीरा का, रैदास जी का, राजा जनक का रास्ता लेते हैं वे खुद भी तृप्त होते हैं, दूसरों को भी तृप्त करते हैं।

स तृप्तो भवति। सः अमृतो भवति।

स तरति लोकांस्तारयति।

अहंकार लेने के अवसर खोजता है और प्रेम देने के अवसर खोजता है। चाहे निगाहों से पोसे, वाणी से पोसे, हरड़ रसायन से पोसे, पंचगव्य से पोसे अथवा हरि ॐ करके, प्रणाम करके पोसे, नम्रता के गुण देकर उनकी उन्नति करे… प्रेम अवसर खोजता रहता है कि मेरे सम्पर्क में आने वाले पोषित हों और जो सम्पर्क में नहीं हों वे भी पोषितों से पोषित हों। मेरे शिष्य जायेंगे, भण्डारा करेंगे, सेवाएँ करेंगे। सरकार का एक करोड़ निकलता है तो लोगों तक कितने पहुँचते होंगे भगवान जाने…. लेकिन हमारे यहाँ से एक करोड़ निकलता है तो लोगों तक तीन करोड़ होकर पहुँचता है। हमारे यहाँ से एक रूपया निकलता है तो शिष्यों द्वारा उसमें और सहयोग मिलता है। कोई सर्विस चार्ज नहीं, कोई हड़प चार्ज नहीं क्योंकि जो प्रेमी गुरु के प्यार हैं, वे पुहँचाने में अपना भी सहयोग कर देते हैं। अहंकारी सबसे आगे और विशेष होने में मानता है और प्रेमी सबके पीछे रहकर, सेवा खोज के, मिटकर अमिट को पाने में सफल हो जाता है। राजा चतुरसिंह के उदयपुर राज्य में सत्संग होता था। वे संत महात्मा के चरणों में जाते, पीछे बैठ जाते।

प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं।

अहंकार और प्रेम…. एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं। अहंकार सब कुछ पा के, कुछ बनकर सुखी होने की भ्रांति में टकराते-टकराते हार जाता है, थक जाता है और प्रेम सब कुछ देते-देते अपने पूर्ण स्वभाव को जागृत कर लेता है।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।

जो संसार में सुखी होना चाहता है, वह बड़े दुःख को बुलाता है। संसार दुःखालय है। संसार की सुविधा पाकर जो सुखी रहना चाहता है, वह किसी न किसी से धोखा, शोषण और कई वस्तुओं की पराधीनता करेगा और जो संसार की सेवा खोजकर निर्वासनिक होता है, उसका प्रेम स्वभाव स्वतः जागृत होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 224

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

अपना पुरुषार्थ लघु उनकी कृपा गुरु


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

सरल-में-सरल एक चीज  है और वही चीज कठिन-में-कठिन है। सरल भी इतनी कि साधारण-से-साधारण व्यक्ति भी उसको कर सकता है और कठिन भी इतनी कि बड़े-बड़े महाराथी भी हार जाते हैं। वह क्या है ?

‘भक्ति।’

रघुपति भगति करत कठिनाई।

भगवान की भक्ति बड़ी कठिन है। युद्ध कर लेंगे, राज कर लेंगे, लड़ाई में मर जायेंगे लेकिन भक्ति नहीं कर पायेंगे… मनमुख व्यक्तियों के लिए यह इतनी कठिन है और  जो सत्संगी हैं उनके लिए तो – कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।

भक्तिमार्ग में क्या प्रयास है ! योग में तो समाधि लगानी पड़े, उपवास करना पड़े, यह करना पड़े, वह करना पड़े…. लेकिन भक्ति में तो बस भगवान का सुमिरन !

जोग न मख जप तप उपवासा।

सरल सुभाव न मन कुटिलाई।

जथा लाभ संतोष सदाई।

हो गयी भक्ति ! इतनी सरल है।

मोर दास कहाईइ नर आसा।

करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा। (श्रीरामचरित. उ.कां. 45.1-2)

भगवान की भक्ति तो भाई पुरुषार्थहीन, बुद्धिहीन, साधनहीन पशु भी कर सकते हैं। बंदर ने भी भक्ति की, ऊँट और कुत्ते भी भक्ति करने में सफल हो जाते हैं। भील और वक्ष भी भगवान के भक्त हो गये और कुब्जा भी भगवान की भक्त बन गयी। कुब्जा ने कोई साधन नहीं किया।

भक्ति सरल भी है और कठिन भी है। तीसमारखाँ के लिए बड़ी कठिन है। भगवान की भक्ति पुरुषार्थ से नहीं मिलती। जो आपके पुरुषार्थ से मिलता है वह  नष्ट हो जायेगा। चाहे धन मिले चाहे स्वास्थ्य, चाहे सुंदरी मिले चाहे सुंदरा, उसे आप छोड़ जायेंगे या छूट जायेगा। कर्म से जो कुछ भी मिलेगा वह छूट जायेगा। भक्ति कर्म का फल नहीं है।

एक छोटी सी घटना सुनाता हूँ। हनुमान जी सीता जी को खोजने के लिए लंका पहुँचे। रात भर घूमे, प्रभात को भी घूमे, सारी लंका छान मारी लेकिन सीता जी नहीं मिलीं। सीता जी कौन हैं ? भक्ति, ब्रह्मविद्या ही सीता जी है और राम जी हैं भगवान, ब्रह्म। हनुमान जी ने पुरुषार्थ किया लेकिन भक्ति नहीं मिली, ब्रह्मविद्या नहीं मिली। जब विभीषण मिले तो उन्होंने बतायाः “सीता जी लंका की अशोक वाटिका में हैं।”

हनुमान जी बोलेः “मैंने तो पूरी लंका देखी और अशोक वाटिका भी तो लंका में ही है, मुझे तो सीता जी नहीं दिखीं !”

सीता जी कैसे मिलेंगी ? पुरुषार्थ से नहीं मिलेंगी, युक्ति से मिलेंगी। सीता जी को जानने वाले हनुमान जी जैसा पुरुषार्थ तुम्हारे हमारे में नहीं है। तो हम पुरुषार्थ से भगवान को या भगवान की भक्ति को नहीं पा सकते हैं, युक्तिदाता सद्गुरु का इशारा मिले तो भक्ति और भगवान को पाना सुगम हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 20 अंक 225

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

कर्म का फल हाथों-हाथ


पुराने पंजाब के मुजफ्फगढ़ जिले के छोटे-से गाँव की यह सत्य घटना है। वहाँ राम दास नाम के एक भगवद्भक्त दर्जी रहते थे, जो आसपास के जमींदार परिवारों के कपड़े सिलकर अपनी आजीविका चलाते थे। वे हमेशा भगवन्नाम-स्मरण और भगवान की लीलाओं के गान में ही तल्लीन रहते थे। कपड़े सिलते समय भी उनका सुमिरन सतत चलता रहता। कभी कपड़ा सिलने की मशीन की टिक-टिक के साथ नामोच्चारण का तार बँध जाता  तो कभी हाथ की सिलाई के साथ लीला-पदों का गान होता रहता।

कलियुग में अनेकों दोष हैं किंतु इसमें एक बहुत बड़ा गुण भी है कि केवल भगवन्नाम का कीर्तन, जप, स्मरण आदि लोगों के पाप, ताप, अशांति व दुःखों को दूर कर ब्रह्म-परमात्म का रस जगा देता है। संत तुलसीदास जी ने कहा हैः

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।

गावत नर पावहिं भव थाहा।। (श्रीरामचरित. उ.कां. 102,2)

भगवन्नाम कीर्तन से भक्त  रामदास का हृदय निर्मल हो गया था। अब वे शांतिमय तथा संतोषपरायण जीवन व्यतीत करते थे। उन्हें दुःखद घटनाएँ भी दुःखी नहीं कर पाती थीं। सब घटनाओं में वे परमात्म-कृपा का अनुभव करते थे। उनसे सभी लोग बड़े प्रसन्न थे और उन्हें भगत जी कह के पुकारते। रामदास जी का एक मुसलमान पड़ोसी था, जो उनसे द्वेष करता था। इनका शांति और आनंद से रहना उससे सहन नहीं होता था।

वह हमेशा इनको परेशान व दुःखी करने के लिए कुछ-न-कुछ करता रहता पर सफल नहीं हो पाता। वह हमेशा सोचता रहता कि ‘यदि इस काफिर की मशीन न रहे तो यह अपनी आजीविका का अर्जन न कर सकेगा औक दूसरी जगह चला जायेगा।’ एक दिन अवसर पाकर उसने भगत जी की मशीन चुरा ली।

रामदास जी ने सोचा कि ‘मेरे प्रभु को मशीन की टिक-टिक अच्छी नहीं लगती होगी इसलिए उन्होंने उसे उठवा लिया।’ वे प्रसन्न चित्त से हाथ से ही कपड़े सीने लगे। उन्होंने मशीन की चोरी होने की सूचना भी पुलिस में नहीं दी।

भगवान और संत अपने ऊपर आये हुए कष्ट और दुःख तो सहन कर लेते हैं पर अपने भक्तों के ऊपर आयी हुई मुसीबतों को वे नहीं सहन कर पाते। अतः भक्तवत्सल भगवान से यह सहन नहीं हुआ और चोर के दायें हाथ की हथेली में एक भयंकर फोड़ा हो गया। इतनी भयंकर पीड़ा होने लगी कि दिन का चैन व रात की नींद हराम हो गयी। अगले ही दिन डॉक्टर के पास जाकर उसे चीरा लगवाना पड़ा पर कोई आराम नहीं हुआ बल्कि समस्या और बढ़ गयी। औषधि प्रयोग से एक फोड़ा कुछ ठीक होता तो दूसरा निकल आता। बहुत जगह इलाज कराया। झाड़-फूँक, टोना-टोटका… जिसने जो कहा, सब किया पर कुछ फायदा नहीं हुआ। वह बहुत परेशान हो गया। डॉक्टर भी हैरान थे कि सारे प्रयत्न करने पर इसका फोड़ा क्यों ठीक नहीं होता ! आखिर एक डॉक्टर ने थककर रोगी से स्पष्ट कह दिया कि ‘तुमने जरूर इस हाथ से कोई घोर पाप किया है, जिससे मेरी अनुभवसिद्ध औषधियाँ भी काम नहीं कर रही हैं। तुमको अल्लाह से अपना गुनाह बख्शवाना होगा।” उसको तुरंत याद आया कि उसने भक्त रामदास की मशीन चुरायी है, इसी पाप का फल वह भोग रहा है। कर्म का फल कभी समय पाकर मिलता है, जैसे भीष्म पितामह को 72 जन्मों के बाद मिला था।

वह व्यक्ति उसी समय घर गया और मशीन लाकर रामदास जी को वापस देते हुए उनके चरणों में गिरकर माफी माँगने लगाः “भगत जी ! मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं आपकी मशीन चुरायी थी। मुझे द्वेषवश आपका शांतिमय तथा संतोषपरायण जीवन अच्छा नहीं लगता था। अल्लाह ने मुझे सबक सिखा दिया है, अब कभी भी किसी भगवद्भक्त को सताने का मन में सोचूँगा तक नहीं।” इस प्रकार बोलते हुए वह फूट-फूटकर रोया। उसकी आँखों से पश्चात्ताप के आँसुओं की धाराएँ बहने लगीं।

भक्त रामदास ने उसे उठाया और आँसू पोंछते हुए कहाः “भाई ! पश्चात्ताप से सब धुल जाते हैं, मन पवित्र हो जाता है। अपनी भूल जिसको समझ में आ जाय और जो की हुई गलती दुबारा न करने का प्रण कर ले, उसके पापों को भगवान क्षमा कर देते हैं। अब तुम शांतिपूर्वक घर जाओ और भगवान का भजन करना। परमात्मा परम दयालु हैं, वे सब ठीक कर देंगे।”

उसी समय से उसे दर्द में आराम पड़ने लगा और कुछ ही दिनों में उसके हाथ का फोड़ा भी ठीक हो गया। फिर तो वह भक्त रामदास के पास आता और बड़े प्रेम से भगवान के लीला-पदों को  सुनता और भगवत्प्रेम व भगवद्-आनंद में डूब जाता। इस प्रकार उसका पूरा जीवन ही बदल गया। उसके जीवन में रामायण का यह वचन प्रत्यक्ष हुआः

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। (श्री रामचरित. बा.कां. 2.5)

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ