भाई भिखारी की यह कथा सभी भक्तों व साधकों को जरूर पढ़नी चाहिए….

भाई भिखारी की यह कथा सभी भक्तों व साधकों को जरूर पढ़नी चाहिए….


गुरुदेव की कल्याणकारी कृपा प्राप्त करने के लिए अपने अंतः कर्ण की गहराई से उनको प्रार्थना करो, ऐसी प्रार्थना चमत्कार कर सकती है । जिस शिष्य को गुरुभक्तियोग का अभ्यास करना है, उसके लिए कुसंग एक महान शत्रु है । गुरुभक्तियोग शुद्ध विज्ञान है, वह निम्न प्रकृति को वश में लाने की एवम् परम आनंद प्राप्त करने की रीति सिखाता है ।

गुरू में दृढ़ श्रद्धा साधक को अनंत ईश्वर के साथ एकरूप बनाती है । श्री अर्जुनदेव जी आज अपने आसन पर कुछ ऐसे दैदीप्यमान हो रहे थे, जैसे आसमान के सिंहासन पर पूर्णमासी का चंद्रमा और जैसे तारे दूर-2 से सिमट कर आसमान की गोद में झुरमुट बना लेते हैं, वैसे ही दूर-दराज से पधारे भक्त गुरुदेव के श्रीचरणों में सिमटे बैठे थे । एकाएक एक साधक ने प्रश्न किया कि गुरुदेव आज आपके दरबार में हजारों की तादाद में संगत बैठी है, परन्तु मैं जानना चाहता हूं कि इनमें से ऐसे कितने शिष्य हैं जो आपकी रजा में अपनी रजा मानते हैं ।

यह सुन गुरुदेव के मुख पर आयी प्रसन्नता एकदम गंभीरता में बदल गई और उनकी नज़रें संगत पर दौड़ने लगीं, लेकिन कहीं ठहरी नहीं और अंततः वापिस पुतलियों में आकर सिमट गई । यह देख सभी भक्तों के दिल थम गए क्योंकि इसका मतलब था इन सबमें से कोई भी नहीं । गुरुदेव ने कहा, हालांकि सम्पूर्ण आसमान में लाखों सूर्य हैं, लेकिन जैसे तुम्हें एक ही सूर्य दिखाई पड़ता है, वैसे ही मुझे भी इस घड़ी दूर गुजरात की धरती पर #भाई भिखारी के रूप में एक ही ऐसा शिष्य दिखाई पड़ रहा है ।

गुरुदेव का यह कथन सुनकर तो उस साधक की जिज्ञासा और भी प्रबल हो गई । अगले ही दिन भाई भिखारी से मिलने की चाह लिये वह गुजरात की तरफ कूच कर गया । उसके घर पहुंचा तो पता चला कि दो दिन बाद ही उसके सुपुत्र की शादी है, इसलिए सारा घर दुल्हन की तरह सजा था, सब लोग अपनी ही मस्ती में झूम रहे थे । उन्हें लगा कि वह जिज्ञासु साधक भी बाराती है, खैर किसी तरह पूछता-पाछता वह जिज्ञासु भाई भिखारी के पास पहुंचा और बोला मैं गुरुदरबार से आया हूं, गुरू अर्जुनदेव जी का शिष्य हूं ।

भाई भिखारी ने ज्यों-ही यह सुना तो उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव भर आये, अरे आप खड़े क्यूं हैं आइये बैठिये । उस सज्जन पुरुष ने अपनी पत्नी से कहा कि जल्दी से भोजन और पानी का प्रबंध करो, हमारे गुरुभाई आये हैं इतनी दूर से चलकर । जिज्ञासु को ऐसा स्नेह प्राप्त कर अच्छा-सा लगा, लेकिन वह थोड़ा उलझन में भी था, कारण कि भाई भिखारी ने उसका सत्कार तो किया लेकिन अपना काम छोड़ कर खड़ा नहीं हुआ, और काम भी क्या कोई खास नहीं, मामूली-सा टाट बुनने का ।

वह टाट बुन रहा था और उसे बुनता ही रहा, वह भी इतना जल्दी -2 जैसे कि वह टाट शीघ्र ही चाहिए हो । फिर जिज्ञासु ने यह सोचा कि हो सकता है इनके रीति-रिवाज के अनुसार ऐसी टाट की आवश्यकता होती होगी, लेकिन यह छोटा काम तो मजदूर से करवाना चाहिए । बेटे की शादी हो और पिता इतने मामूली से कार्य में लगा रहे, यह तो कोई बात ना हुई । जिज्ञासु के मस्तिष्क में कहीं-ना-कहीं यह बात चुभ सी गई, लेकिन भूख और लंबे सफर की थकान ने कहा कि अभी खा-पीकर कुछ आराम कर लिया जाए ।

कई घंटों की नींद के बाद जब जिज्ञासु तरो-ताजा होकर उठा तो कुछ बातचीत करने के इरादे से फिर भाई भिखारी के पास पहुंचा, परंतु वहां पहुंचकर हैरान रह गया, क्योंकि भाई भिखारी तो अब भी टाट ही बुन रहा था । उसके पास ही खाने की थाली पड़ी थी, उसमें ठंडी सब्जी और सुखी रोटियां साफ कह रही थी कि थाली कब से उसके पास रखी थी । भोजन करना तो दूर उसने उसको सूंघ कर भी नहीं देखा था । जिज्ञासु का दिमाग अब प्रश्नों की उलझन में उलझे बिना ना रह सका, वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर शादी के अवसर पर इस टाट का क्या काम, क्योंकि टाट को तो जमीन पर बिछाकर उस पर बैठा जाता है और शादी में नीचे बैठना तो वैसे भी महा-अशुभ है ।

कारण कि नीचे तो तब बैठा जाता है जब घर में कोई मृत्यु हो जाए और ऐसे अशुभ की तो कोई सोच भी नहीं सकता, परंतु जिज्ञासु की भाई भिखारी से कुछ पूछने की हिम्मत ना हुई । यूं ही पूरा दिन बीत गया, फिर रात भी बीत गई लेकिन नहीं बीती तो वह कल वाली कहानी, टाट की कहानी । सुबह भी भाई भिखारी उस टाट को ही बुनने में लगा था, कितनी अजीब सी बात थी । ऐसी तन्मयता थी भाई भिखारी की टाट बुनने में, जैसे कोई लड़की अपने दहेज का सामान तैयार कर रही हो, वह दिन और रात भी उसी टाट की भेंट चढ़ गये ।

अगली सुबह हुई, आज भाई भिखारी के बेटे ने तैयारी कर ली घोड़ी चढ़ने की, जिज्ञासु को पूरा यकीन था कि आज तो भाई भिखारी को वह टाट के बिना देख पायेगा, लेकिन जिज्ञासु आवाक रह गया, उसका यकीन गलत निकला । वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर उस टाट का इस शगुन के अवसर पर क्या अर्थ है, अब जिज्ञासु खुद को रोक नहीं पाया और उसने पूछा ही लिया कि भाई भिखारी आखिर इस टाट में ऐसा क्या है ? तुम इस अवसर पर इसे क्यूं बुन रहे हो ? आने वाले कल की तैयारी हो रही है गुरूभाई ! बस इतना ही भाई भिखारी ने कहा और दोबारा टाट बुनने में लग गया ।

अब तो जिज्ञासु को लगने लगा कि अवश्य ही में किसी गलत व्यक्ति के घर चला आया हूं । यह तो निरा पागल दिखता है, परंतु फिर गुरुदेव ने लाखों को छोड़ इस अकेले का नाम क्यूं लिया । जिज्ञासु गुरुदेव के वचनों और अपनी बुद्धि के निर्णयों के बीच पिसता जा रहा था, इसी कशमकश में शादी का दिन भी गुजर गया । भाई भिखारी ने पूरा दिन शादी के रीति-रिवाजों में कोई रुचि नहीं दिखाई, उसका तो पूरा ध्यान अपनी टाट में ही था । जिज्ञासु ने अब यह सोचा कि मेरा यहां आना व्यर्थ हो गया, मुझे कल सुबह ही निकल जाना चाहिये, चलो भाई भिखारी को अपने जाने के बारे में बता दूं ।

रात्रि का पहला प्रहर बीतने को ही था, जिज्ञासु भाई भिखारी के पास पहुंचा तो पाया की वह लंबी चैन की सांस ले रहा है, उसकी टाट बनकर तैयार हो चुकी थी । जिज्ञासु ने जब सुबह उससे अपने लौटने की बात कही तो वह तुरंत बोला , नहीं भैया ! कल आप नहीं जा पायेंगे, इतना कहकर भाई भिखारी टाट समेटने लगा । अब जिज्ञासु ने कहा कि भाई माना कि तुम अपनी मर्ज़ी के मालिक हो लेकिन फिर भी क्या बताने का कष्ट करोगे की आखिर इस टाट का क्या रहस्य है ? भाई भिखारी बोला कुछ नहीं बस कर्ज चुकता करने का समय बिल्कुल मेरे सिर पर आ चुका था।

शुक्र है प्रभु का, कि मैंने तैयारियां मुक्कमल कर लीं । यह उत्तर सुनना था कि जिज्ञासु की खीज की हद ना रही और वह पैर पटकता हुआ अपने कक्ष में चला गया । सुबह होने को ही थी कि जिज्ञासु की नींद अचानक विलाप के शोर से खुल गई, वह दौड़ कर बरामदे में गया, वहां नवविवाहिता जोर -2 से रो रही थी । घर की अन्य स्त्रियां भी चीख चिल्ला रही थी, जिज्ञासु को कुछ समझ ना आया, वह दौड़ कर कमरे तक पहुंचा तो पता चला कि भाई भिखारी के बेटे के अचानक पेट में पीड़ा हुई और वह मृत्यु को प्राप्त हो गया । खबर फैलते ही पूरा मौहल्ला इकट्ठा हो गया, सब जल्द से जल्द पहुंच गए ।

सब थे वहां बस एक को छोड़ कर भाई भिखारी को, आखिर कहां था भाई भिखारी ! यह कैसे हो सकता है, अरे वह पिता था उस जवान लड़के का जो अभी -2 मृत्यु को प्राप्त हुआ, कहीं ऐसा तो नहीं कि वह किसी कमरे में छिप कर रो रहा हो । इस विचार के आते ही जिज्ञासु को भाई भिखारी से सुहानुभूति हुई, वह बोल पड़ा अरे कोई जाकर भाई भिखारी को भी तो संभालो । कहीं वह कुछ…. हां हां बहुत से पिता ऐसे सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाते, फिर उनकी कहीं से रोने धोने की आवाज़ भी तो नहीं आ रही है ।

मैं देखता हूं उन्हें, हे गुरुदेव उन्हें शक्ति दो । हड़बड़ाहट में जिज्ञासु ने एक-2 करके सारे कमरों में देखा, परन्तु उसे भाई भिखारी कहीं नहीं मिला, फिर दोबारा आंगन में आया तो भाई भिखारी को वहां पाया । इसे देख कर जिज्ञासु हैरान रह गया, वह ना रो रहा था ना दुखी परेशान लग रहा था बिल्कुल शांत था जैसे कुछ हुआ ही ना हो । और तो और उसके हाथों में अब भी वही टाट थी परन्तु अब उस टाट का औचित्य सबको समझ आ रहा था । भाई भिखारी ने आंगन से अन्य वस्तुएं हटाकर उसी टाट को बिछा दिया, फिर बेटे का मृतक शरीर उस टाट पर रख दिया गया।

परंतु जिज्ञासु के मन में अब भी एक दुविधा थी कि यह कैसा पिता है जवान बेटा मर गया और इसकी आंखों में अश्रु तक नहीं । क्या कोई दुख नहीं है इसको ? वरना चेहरे पर इतनी सहजता और बेफिक्री कैसी और यही भाव प्रश्न बन कर जिज्ञासु के होंठो पर आ गया । उत्तर में भाई भिखारी बस इतना ही बोला चलो अच्छा हुआ कर्ज चुक गया । जिज्ञासु ने हैरानी से कहा मतलब ! यही शब्द तो तुमने कल कहे थे, तुमने यह भी कहा था कि टाट आने वाले कल की तैयारी है, तो क्या इसी क्षण के लिए तुमने टाट बुनी थी ? क्या तुमको पहले ही सब पता था ? पता था गुरू भाई पता था तो तुमने अपने बेटे को बचाना क्यूं नहीं चाहा, बचाया क्यूं नहीं उसे ?

भाई भिखारी ने कहा कि वह मेरा बेटा नहीं था बल्कि प्रभु का था, मेरी तो प्रभु ने पिता का दायित्व निभाने की सेवा लगाई थी, जो आज पूर्ण हुई । जिज्ञासु यह सुनकर लगभग रो-सा दिया और कहा परन्तु तुम उसे बचा भी तो सकते थे अपने गुरुदेव से प्रार्थना करते । गुरुदेव सर्वसमर्थ हैं वे अपने प्यारों की पुकार अवश्य सुनते हैं, वे अवश्य ही तुम्हारे बेटे की मृत्यु टाल देते, अभी-2 तो शादी हुई कल और आज बेटे की मृत्यु हो गई । जब तुम्हें पता था तब गुरूदरबार में आ जाते या प्रार्थना करते गुरुदेव से, तुमने उनसे बेटे का जीवन क्यूं नहीं मांगा ?

भाई भिखारी ने कहा नहीं गुरूभाई नहीं ! भला मैं गुरुदेव के इंसाफ में बाधा कैसे डाल सकता हूं । सोचो क्या वे कभी गलत कर सकते हैं क्या ! क्या अब मैं उन्हें बताऊं की वे ऐसा नहीं ऐसा करें, यह तो मूर्खता होगी गुरुभाई । क्या गुरुदेव नहीं जानते कि मेरा हित-अहित किसमे है । मुझे पता है कि जो मुझे मिल रहा है वह गुरुदेव का ही तो प्रसाद है और नश्वर वस्तुओं के लिए प्रार्थना थोड़े ना हुआ करती है, प्रार्थना तो होती है आत्मिक स्तर को ऊंचा उठाने के लिए, इसलिए तुम शोक मत करो, सुमिरन करो गुरू की रजा में राजी रहो । इतना कह भाई भिखारी तो अंतिम संस्कार के कार्यों में लग गया लेकिन जिज्ञासु का शरीर पत्थर-सा हो गया, क्योंकि उसने प्रत्यक्ष देख लिया, कि गुरू की रजा में यूं राजी रहना आसान नहीं है ऐसा कार्य तो सच में विरले गुरुभक्त सतशिष्य ही सकते हैं ।

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