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ध्यान और जप हैं एक दूसरे के परिपोषक


(जप के बाद क्या करें ?)

संतों एवं शास्त्रों ने ध्यानसहित भगवन्नाम-जप की महिमा गाकर संसार का बड़ा उपकार किया है क्योंकि सब लोग जप के साथ ध्यान नहीं करते । अतः ध्यान के बिना उन्हें विशेष लाभ भी नहीं होता । लोभी की भाँति भगवन्नाम अधिकाधिक जपना चाहिए और कामी की भाँति निरंतर स्वरूप का ध्यान करना चाहिए । संत तुलसीदास जी कहते हैं-

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम ।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ।। (श्रीरामचरित. उ.कां. 130)

बापू जी ने ध्यान करना सिखाया

ध्यान क्या है ?

ध्यान तो लोग करते हैं परंतु अपनी मान्यता, अपनी समझ के अनुसार करते हैं, जिससे उन्हें ध्यान का पूरा लाभ नहीं मिल पाता । लेकिन पूज्य बापू जी जैसे योग के अनुभवी ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष का अनुभवसम्पन्न मार्गदर्शन जिनको मिल जाता है उनकी तो सहज में ही ध्यान की गहराइयों की यात्रा होने लगती । ध्यान क्या है और वह कैसे करना चाहिए – इस संदर्भ में पूज्य बापू जी के श्रीवचनों में आता हैः “सब काम करने से नहीं होते हैं । कुछ काम ऐसे भी हैं जो न करने से होते हैं । ध्यान ऐसा ही एक कार्य है । ध्यान का मतलब क्या ? ध्यान है डूबना । ध्यान है आत्मनिरीक्षण करना…. हम कैसे हैं यह देखना । कहाँ तक पहुँचे हैं यह देखना । कितना ध्यान और जप कैसे एक-दूसरे के परिपोषक हैं इसके बारे में पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः “जप अधिक करें कि ध्यान करें ? जप के बिना ध्यान नहीं होगा । ध्यान ठीक करे बिना जप नहीं होगा । इसलिए जप में ध्यान लगाओगे तभी जप ठीक होगा और जप ठीक होगा तो फिर धीरे-धीरे जप के अर्थ में मन लगेगा तो फिर वह शांत हो जायेगा, मन का ध्यान लगेगा । जप के अर्थ में मन लगेगा तो मन भगवदाकार बनेगा, भगवदाकार बनेगा तो सुख मिलेगा और जहाँ सुख है वहाँ मन लगता है ।”

अपने आपको भूल पाये हैं, कितना विस्मृतियोग में डूब पाये हैं यह देखना ।

सत्संग भी उसी को फलता है जो ध्यान करता है । ध्यान में विवेक जागृत रहता है । ध्यान में बड़ी सजगता, सावधानी रहती है । ‘करने’ से प्रेम कम करें, ‘न करने’ की ओर प्रीति बढ़ायें । जितना भी आप करोगे उसके अंत में ‘न करना’ ही शेष रहेगा । ध्यान अर्थात् न करना… कुछ भी न करना । जहाँ कोशिश होती है, जहाँ करना होता है वहाँ थकावट भी होती है । जहाँ कोशिश होती है, थकावट होती है वहाँ आनंद नहीं होता । जहाँ कोशिश नहीं होती, आलस्य-प्रमाद भी नहीं होता अपितु निःसंकल्पता होती है, जो स्वयमेव होता है, वहाँ सिवाय आनंद के कुछ नहीं होता और वह आनंद निर्विषय होता है । वह आनंद संयोगजन्य नहीं होता, परतंत्र और पराधीन नहीं होता वरन् स्वतंत्र और स्वाधीन होता है । मिटने वाला और अस्थायी नहीं होता, अमिट और स्थायी होता है सब उसमें नहीं डूब पाते कोई-कोई बड़भागी ही डूब पाते हैं और जो डूब पाते हैं वे आनंदस्वरूप को खोज भी लेते हैं ।

‘न करने की ओर प्रीति बढ़ायें…’ इसका मतलब यह नहीं कि आलसी हो जायें । जो निष्काम सेवा नहीं करता वह ध्यान भी नहीं कर सकता । पहले निष्काम सेवा के द्वारा अंतःकरण को शुद्ध करे । ज्यों-ज्यों अंतःकरण शुद्ध होता जायेगा, त्यों-त्यों ध्यान, जप में मन लगता जायेगा ।

लोग ध्यान करते हैं तो ध्यान में सुन्न (क्रियारहित) हो जाने से थोड़ी बहुत थकान उतरती है, थोड़ा-बहुत फायदा हो जाता है लेकिन ध्यान में अंतःकरण को आत्मस्वरूप से तदाकार करना पड़ता है ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 40,41 अंक 328-329

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भगवान बड़े कि भगवान का नाम बड़ा ? –पूज्य बापू जी


जब हनुमान जी को मृत्युदंड देने उद्यत हुए श्रीराम जी !

(पिछले अंक में आपने पढ़ा कि देवर्षि नारद जी के बताये अनुसार हनुमान जी ने भरी सभा में विश्वामित्र जी को पीठ दिखायी और उनके सामने पूँछ झटक दी । इसे अपना अपमान जानकर विश्वामित्र जी ने श्रीरामजी को आज्ञा दी कि वे हनुमानजी को मृत्युदंड दें । इससे हनुमान जी राम जी के प्रति चिंतित हो गये । अब आगे….)

देवर्षि नारदजी कहते हैं- “हनुमान तुम चिंता क्यों करते हो ? मैंने तुमको काम सौंपा है तो यह मेरा काम है ।”

हनुमानजीः “तो मैं क्या करूँ ?”

“अभी निश्चिंत हो के सो जाओ । अभी तो रात है । जो होगा, सुबह होने के बाद होगा न !”

तुलसी भरोसे राम के, निश्चिंत होई सोय ।

अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय ।।

सुबह हुई । नारदजी बोलेः “देखो हनुमान ! जो अनंत ब्रह्माण्डों में रम रहा है उसी मूल तत्त्व से जुड़कर प्राण चलते हैं, हाथ उठता है, वही तो राम है ।

जीव राम घट-घट में बोले, ईश्वर राम दशरथ घर डोले ।

बिंदु (हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा, मन) राम का सकल पसारा, ब्रह्म राम है सबसे न्यारा ।।

‘जैसे घटाकाश, मठाकाश, मेघाकाश और महाकाश – ये चार दिखते हैं लेकिन आकाश चारों में एक है । ऐसे ही वही सर्वव्यापक राम सत्यस्वरूप है, वही मेरा मूल है और श्रीराम जी का हाथ भी उसी मूल की सत्ता से उठता है ।’ – ऐसा चिंतन करके जब रामजी का तीर चले तो तुम बोल देनाः ‘जय श्री राम ! भाव उसी ब्रह्म राम पर रखना । फिर देखो क्या होता है !”

रामचन्द्र जी ने बराबर बाण का संधान किया । हनुमान जी बोलें- ‘जय श्री राम !….’ तो गदा को छूने के पहले ही बाण ‘सट्’ करके नीचे गिर जाय । इस प्रकार रामजी का सारे बाण खत्म हो गये, अब एक बाण बचा । राम जी ने यह संकल्प करके संधान किया कि ‘यह मेरा बाण सफल हो ।’

नारदजी समझ गये कि राम जी भी उसी राम-तत्त्व में विश्रांति पाकर बाण के साथ संकल्प जोड़ रहे हैं तो विश्वामित्र जी को कहाः “देखो, हनुमानजी के प्राण अभी शेष हैं । राम रजी इतनी तीव्रता से बाण मारते हैं और वह हनुमान जी की गदा को छूता तक नहीं । अगर राम जी और भी कुछ करके मार भी देंगे तो महाराज ! लोग बोलेंगे कि ‘विश्वामित्र ऋषि अपमान न सह सके, रामजी के सेवक को मरवा दिया ।’ आपके नाम पर कलंक आ जायेगा । अतः अब आप खड़े होकर कह सकते हैं कि ‘रामचन्द्र जी ! हम इस हनुमान को क्षमा करते हैं ।’ तो लोगों के मन में आपके प्रति सद्भाव होगा, हनुमानजी का भी सद्भाव बढ़ेगा और रामजी का सिर आपके चरणों म  अहोभाव से झुकेगा । धर्मसंकट से रामजी भी बच जायेंगे, हनुमान जी भी बच जायेंगे और आपका नाम कलंक से बच जायेगा । अब बाजी आपके हाथ में है ।”

विश्वामित्रजीः “नारद ! तुम बड़े बुद्धिमान हो । बहुत-बहुत ठीक कहा है तुमने ।”

विश्वामित्र जी खड़े हो गये, बोलेः “हे श्रीराम ! रुक जाओ । हम हनुमान को क्षमा करके प्राणदान देते हैं ।”

‘साधो….. साधो….. ! जय श्री राम ! जय विश्वामित्र ! जय हो, जय हो !!’ जयघोषों से सारा वातावरण गूँजने लगा ।

नारद जी खड़े हो गये, बोलेः “सुनो, सुनो ! साधु स्वभाववाले सज्जनो ! सत्य के चाहक लोगो ! ‘भगवान बड़े कि भगवान का नाम बड़ा ? इसका निर्णय आज सरयू-तट पर प्रत्यक्ष हो गया । भगवान ने संधान करके इतने-इतने बाण मारे लेकिन भगवान के नाम ने उन बाणों को निरस्त कर दिया । अब इस पर कौन क्या शास्त्रार्थ करेगा ?”

रामु न सकहिं नाम गुन गाई ।

भगवान राम भी भगवन्नाम के गुणों को नहीं गा सकते ।

तो भगवान का नाम और फिर जब वह ब्रह्मवेत्ता सदगुरु के द्वारा मिल जाया है और उसका अर्थ समझ से अगर कोई जपता है तो महाराज ! उसके जन्म-जन्मांतर के कुसंस्कार, पाप-ताप मिट जाते हैं । भगवन्नाम, गुरुमंत्र जपने से 84 नाड़ियों, 25 उपत्यकाओं, 5 शरीरों और 7 मुख्य केन्द्रों में सात्त्विक भगवद्-आन्दोलन पैदा होते हैं । भगवन्नाम अकाल मृत्यु को टालता है, बुद्धि में सत्य का संचार करता है और जब सद्गुरु ने भगवन्नाम दिया है तो वह नाम ‘गुरुमंत्र’ अर्थात् बड़ा मंत्र हो जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 328-329

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सुखमय जीवन की अनमोल कुंजियाँ


महामारी, रोग व दुःख शमन हेतु मंत्र

अग्नि पुराण में महर्षि पुष्कर जी परशुराम जी से कहते हैं कि ”यजुर्वेद के इस (निम्न) मंत्र से दूर्वा के पोरों की 10 हजार आहुतियाँ देकर होता (यज्ञ में आहुति देने वाला व्यक्ति या यज्ञ कराने वाला पुरोहित) ग्राम या राष्ट्र में फैली हुई महामारी को शांत करे । इससे रोग-पीड़ित मनुष्य रोग से और दुःखग्रस्त मानव दुःख से छुटकारा पाता है ।

काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषपरि ।

एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च ।। (यजुर्वेदः अध्याय 13, मंत्र 20)

विद्यालाभ व अद्भुत विद्वता की  प्राप्ति का उपाय

‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वाग्वादिनी सरस्वति मम जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा ।’ इस मंत्र को इस वर्ष गुजरात और महाराष्ट्र को छोड़कर भारतभर के लोग 8 जून को दोपहर 1-45 से रात्रि 11-45 बजे तक तथा केवल गुजरात और महाराष्ट्र के लोग 5 जुलाई को रात्रि 11-02 से 11-45 बजे तक या 6 जुलाई को प्रातः 3 बजे से रात्रि 11-12 बजे तक 108 बार जप लें फिर मंत्रजप के बाद उसी दिन रात्रि 11 से 12 बजे के बीच जीभ पर लाल चन्दन से ‘ह्रीं’ मंत्र लिख दें । जिसकी जीभ पर यह मंत्र इस विधि से लिखा जायेगा उसे विद्यालाभ व अद्भुत विद्वत्ता की प्राप्ति होगी ।

कर्ज निवारक कुंजी

प्रदोष व्रत यदि मंगलवार के दिन पड़े तो उसे ‘भौम प्रदोष व्रत’ कहते हैं । मंगलदेव ऋणहर्ता होने से कर्ज निवारण के लिए यह व्रत विशेष फलदायी है । भौम प्रदोष व्रत के दिन संध्या के समय यदि भगवान शिव एवं सद्गुरुदेव का पूजन करें तो उनकी कृपा से जल्दी कर्ज से मुक्त हो जाते हैं । पूजा करते समय यह मंत्र बोलें-

मृत्युञ्जय महादेव त्राहि मां शरणागतम् ।।

जन्ममृत्युजराव्याधिपीडितं कर्मबन्धनैः ।।

इस दैवी सहायता के साथ स्वयं भी थोड़ा पुरुषार्थ करें ।

(इस वर्ष ‘भौम प्रदोष व्रत’ 5 व 11 मई तथा 15 व 21 सितम्बर को है ।)

सुख-शांति व धनवृद्धि हेतु

सफेद पलाश के एक या अधिक पुष्पों को किसी शुभ मुहूर्त में लाकर तिजोरी में सुरक्षित रखने से उस घर में सुख-शांति रहती है, धन आगमन में बहुत वृद्धि होती है ।

संकटनाशक मंत्रराज

नृसिंह भगवान का स्मरण करने से महान संकट की निवृत्ति होती है । जब कोई भयानक आपत्ति से घिरा हो या बड़े अनिष्ट की आशंका हो तो भगवान नृसिंह के इस मंत्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए ।

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।

नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ।।

पूज्य बापू जी के सत्संग में आता है कि “इस विशिष्ट मंत्र के जप और उच्चारण से संकट की निवृत्ति होती है ।

तो कल्पनातीत मेधाशक्ति बढ़ेगी-पूज्य बापू जी

नारद पुराण के अनुसार सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण के समय उपवास करे और ब्राह्मी घृत को उँगली से स्पर्श करे एवं उसे देखते हुए ‘ॐ नमो नारायणाय’ । मंत्र का 8000 (80 माला) जप करे । थोड़ा शांत बैठे । ग्रहण समाप्ति पर स्नान के बाद घी का पान करे तो बुद्धि विलक्षण ढंग से चमकेगी, बुद्धिशक्ति बढ़ जायेगी, कल्पनातीत मेधाशक्ति, कवित्वशक्ति और वचनसिद्धि (वाक् सिद्धि) प्राप्ति हो जायेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद अप्रैल मई 2020, पृष्ठ संख्या 48,49 अंक 328-329

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