कल्याणकारी छः बातें

कल्याणकारी छः बातें


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

परमात्मदेव का ज्ञान, परमात्मदेव की प्रीति, परमात्मदेव में विश्रांति मिले ऐसे कर्म, ऐसा चिंतन, ऐसा संग, ऐसे शास्त्रों का अध्ययन करना, ऐसा भाव बनाना पुरुषार्थ है और इसके विपरीत करना प्रमाद है । प्रमाद मौत की खाई में गिराता है । बार-बार जन्मो, बार-बार मरो, बार-बार माँ की कोख में फँसो… इस प्रकार न जाने कितने जन्म बीत गये, कितने माँ-बाप, कितने मित्र, कुटुम्बी छोड़के आये हो । तो अब यह जीवन विफल न हो इसलिए इन छः बातों का याद रखें-

1 अपना लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए ।

2 अपने जीवन में उत्साह बना रहे ।

3 भगवान में, अपने-आप में श्रद्धा बनी रहे ।

4 किस पर भरोसा करें, किस पर नहीं ? सावधान रहें ।

5 जीवन में धर्म होना चाहिए ।

6 अपनी अंतिम यात्रा कैसी हो ?

एक तो अपने लक्ष्य का निश्चय कर लें, अपना लक्ष्य ऊँचा बना लें । दो प्रकार के लक्ष्य होते हैं- एक होता है वास्तविक लक्ष्य, दूसरा होता है अवांतर लक्ष्य । परम सुख, परम ज्ञान, परम मुक्त अवस्था को पाना, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान पाना यह वास्तविक लक्ष्य है । खाना-पीना, कमाना और इनके सहायक कर्म यह अवांतर लक्ष्य है । किसी से पूछा जाय कि ‘आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ?’ तो बोलेंगे- ‘मैं वकील बनूँ, मैं सेठ बनूँ….’ नहीं, यह जीवन का वास्तविक उद्देश्य नहीं है, जीवन का वास्तविक उद्देश्य है शाश्वत सुख पाना और उसके सहायक सब कर्म साधन हैं ।

कुछ लोग लक्ष्य बना लेते हैं, ‘मैं डॉक्टर बनूँगा ।’ डॉक्टर बन गया बस । यह क्या लक्ष्य है ! यह तो मजूरी है । यदि तुमने वकील बनने का लक्ष्य बना लिया तो यह तो अवांतर लक्ष्य है बेटे ! मुख्य लक्ष्य है अपने आत्मा-परमात्मा को पाकर सदा के लिए दुःखों, कष्टों, चिंताओं से मुक्त हो जाना । फिर भी शरीर रहेगा तब तक ये दुःख, कष्ट आयेंगे लेकिन आप तक नहीं पहुँचेंगे, आप  अपने पृथक परमेश्वर स्वभाव में, अमर पद में प्रतिष्ठित रहोगे । तो ऐसे लक्ष्य का निश्चय कर लो ।

दूसरी बात है मन में उत्साह बना रहे । उत्साह का मतलब है सफलता, उन्नति, लाभ और आदर के समय चित्त में काम करने का जैसा जोश, तत्परता, बल बना रहता है, ठीक ऐसा ही प्रतिकूल परिस्थिति में बना रहे । जिसका उत्साह टूटा, मानो उसका जीवन सफल हो गया । उत्साहहीन जीवन व्यर्थ है ।

उत्साहसमन्वितः…. कर्ता सात्त्विक उच्यते ।

‘उत्साह से युक्त कर्ता सात्त्विक कहा जाता है ।’ (भगवद्गीताः 18.26)

जो काम करें उत्साह से करें, तत्परता से करें, लापरवाही न बरतें । उत्साह से काम करने से योग्यता बढ़ती है, आनंद आता है । उत्साहहीन होकर काम करने से कार्य बोझ बन जाता है ।

उत्साह बिनु जो कार्य हो, पूरा कभी होता नहीं ।

उत्साह होता है जहाँ, होती सफलता है वहीं ।

उत्साह न छोड़ें और लापरवाही न करें, जीवन में धैर्य रखें ।

तीसरी बात है ईश्वर पर और अपने पर भरोसा रखें । ऊँचे लोगों पर भरोसा रखें । ऊँचे-में-ऊँचे हैं परमात्मा, जो परमात्मा के नाते जीवनयापन करते है ऐसे लोगों की बातो पर दृढ़ विश्वास रखें ।

चौथी बात है किस पर कितना विश्वास रखें, किस पर न रखें ? कर्म करने में, विचार करने में, संग करने में, विश्वास करने में सावधान रहें । किसकी बात पर विश्वास करें ? जो स्वार्थी हैं, द्वेषी हैं, निंदक हैं, कृतघ्न है, बेईमान हैं उनकी बातों पर विश्वास करें कि जो भगवान के रास्ते चल रहे हैं, भगवत्सुख में हैं, भगवद्ज्ञान में है, ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय’ जिनका जीवन है उनकी बातों प ? किसका संग करना चाहिए और किसके संग से बचना चाहिए ? जो बहिर्मुख हैं, झगड़ालू हैं, विषय विकारों में पड़ रहे हैं, निंदक हैं उनसे बचें । जो अपने सजातीय हैं अर्थात् भगवान के रास्ते हैं, प्रीति में हैं, ज्ञान में हैं उनका संग करें, उनकी बातों में श्रद्धा करें । श्रद्धावान के संग से श्रद्धा निखरती है, साधक के संग से साधना निखरती है और शराबी के संग से जुआरीपना आता है तो हमको क्या चाहिए उसी प्रकार का ऊँचा संग करें ।

‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ में वसिष्ठजी महाराज कहते हैं कि अच्छा संग करना चाहिए, अपने अंतःकरण का शोधन हो ऐसा संग करना चाहिए, सत्शास्त्रों का आश्रय लेना चाहिए । संतजनों का संग करके संसार-सागर से तरने का उपाय करना चाहिए अर्थात् आसुरी वृत्तियों से बचना चाहिए । जो हमारा समय, शक्ति, बुद्धि, जीवन खराब कर दें ऐसे संग से, ऐसे भोगों से ऐसे चिंतन से, ऐसे साहित्य से बचकर श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ संग, श्रेष्ठ चिंतन और श्रेष्ठ में श्रेष्ठ परमात्मा की बार-बार स्मृति करके उसमें गोता मारने का अभ्यास कर दो तो अंत में जीवन भगवान से मिलाने वाला हो जायेगा ।

पाँचवी बात है जीवन में धर्म का नियंत्रण हो । जीवन में धर्म का नियंत्रण होगा तो अनुचित कार्यों पर रोक लग जायेगी और उचित होने लगेगा, अऩुचित में समय-शक्ति बर्बाद नहीं होगी । आप अनुचित नहीं करते तो लोग आपको बदनाम करने की साजिशें रचकर आपकी निंदा करवाते हों फिर भी आपके अंतःकरण में खलबली नहीं मचेगी । आपके जीवन में धर्म है, आपके जीवन में परोपकार, है, आपकी बुद्धि भगवत्प्रसादजा है तो आपका कुप्रचार करने वाले थक जायें, फिर भी आपका बाल बाँका नहीं होगा । जीवन में धर्म का फल है कि हर परिस्थिति में हम सम रहें । जैसे धर्मराज युधिष्ठिर को दुर्योधन ने कितना कष्ट दिया लेकिन धर्मराज का बाल बाँका नहीं हुआ ।

छठी बात है अपनी अंतिम यात्रा कैसी हो ? आखिर में कैसे मरना है यह याद रहे, मरना तो पड़ेगा ही । चिंता लेकर मरना है, तड़पते हुए मरना है, अधूरा काम छोड़कर मरना है, कुछ पाते-पाते या छोड़ते-छोड़ते मरना है, भय लेकर मरना है अथवा वासना के जाल में छटपटाते हुए मरकर बाद में कई जन्मों में भटकना पड़े ऐसे मरना है ? नहीं ! निश्चिंत होकर, पूर्णकाम होकर, आप्तकाम होकर मरना है । कोई इच्छा, कोई वासना न रहे, हमारे जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाय बस ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान ।…..

तो वैसा अभ्यास और वैसी यात्रा रोज करते रहना चाहिए । इससे जीवन निर्भार रहेगा, निर्दुःख रहेगा । इस जीवन को अपने पूर्ण तत्त्व का अनुभव करने वाला जीवन बनाना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2009, पृष्ठ संख्या 2,3 अंक 196

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