Tag Archives: Rakshabandhan

Rakshabandhan

पक्के हित व प्रेम का बंधनः रक्षाबन्धन – पूज्य बापू जी


(रक्षाबन्धनः 10 अगस्त 2014)

रक्षा सूत्र का मनोवैज्ञानिक लाभ

हिन्दू संस्कृति ने कितनी सूक्ष्म खोज की ! रक्षा बन्धन पर बहन भाई को रक्षासूत्र (मौली) बाँधती है। आप कोई शुभ कर्म करते हैं तो ब्राह्मण रक्षासूत्र आपके दायें हाथ में बाँधता है, जिससे आप कोई शुभ काम करने जा रहे हैं तो कहीं अवसाद में न पड़ जायें, कहीं आप अनियंत्रित न हो जायें। रक्षासूत्र से आपका असंतुलन व अवसाद का स्वभाव नियंत्रित होता है, पेट में कृमि भी नहीं बनते। और रक्षासूत्र के साथ शुभ मंत्र और शुभ संकल्प आपको असंतुलित होने से बचाता है। रक्षाबंधन में कच्चा धागा बाँधते हैं लेकिन यह पक्के प्रेम का और पक्के हित का बंधन है।

वर्षभर के यज्ञ-याग करते-करते श्रावणी पूर्णिमा के दिन ऋषि यज्ञ की पूर्णाहुति करते हैं, एक दूसरे के लिए शुभ संकल्प करते हैं। यह रक्षाबंधन महोत्सव बड़ा प्राचीन है।

ऋषियों के हम ऋणी हैं

ऋषियों ने बहुत सूक्ष्मता से विचारा होगा कि मानवीय विकास की सम्भावनाएँ कितनी ऊँची हो सकती हैं और असावधानी रहे तो मानवीय पतन कितना निचले स्तर तक और गहरा हो सकता है। रक्षाबन्धन महोत्सव खोजने वाले उऩ ऋषियों को, वेद भगवान का अमृत पीने वाले, वैदिक रस का प्रचार-प्रसार करने वाले और समाज में वैदिक अमृत की सहज-सुलभ गंगा बहाने वाले ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को मैं प्रणाम करता हूँ। आप भी उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करो जिन्होंने केवल किसी जाति विशेष को नहीं, समस्त भारतवासियों को तो क्या, समस्त विश्वमानव को आत्म-अमृत के कलश सहज प्राप्त हों, ऐसा वैदिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया है। हम उन सभी आत्मारामी महापुरुषों को फिर से प्रणाम करते हैं।

शिष्य भी करते हैं शुभ संकल्प

इस पर्व पर बहन भाई के लिए शुभकामना करती है। ऋषि अपने शिष्यों के लिए शुभकामना करते हैं। इसी प्रकार शिष्य भी अपने गुरुवर के लिए शुभकामना करते हैं कि ‘गुरुवर ! आपकी आयु दीर्घ हो, आपका स्वास्थ्य सुदृढ़ हो। गुरुदेव ! हमारे जैसे करोड़ों-करोड़ों को तारने का कार्य आपके द्वारा सम्पन्न हो।’

हम गुरुदेव से प्रार्थना करें- ‘बहन की रक्षा भले भाई थोड़ी कर ले लेकिन गुरुदेव! हमारे मन और बुद्धि की रक्षा तो आप हजारों भाइयों से भी अधिक कर पायेंगे। आप हमारी भावनाओं की, श्रद्धा की भी रक्षा कीजिये।’

रक्षाबन्धन पर संतों का आशीर्वाद

राखी पूर्णिमा पर ब्राह्मण अपने यजमान को रक्षा का धागा बाँधते हैं लेकिन ब्रह्मज्ञानी गुरु धागे के बिना ही धागा बाँध देते हैं। वे अपनी अमृतवर्षी दृष्टि से, शुभ संकल्पों से ही सुरक्षित कर देते हैं अपने भक्तों को।

रक्षाबन्धन में केवल बहनों का ही प्यार नहीं है, ऋषि मुनियों और गुरुओं का भी प्यार तुम्हारे साथ है। आपके जीवन में सच्चे संतों की कृपा पचती जाय। बहन तो भाई को ललाट पर तिलक करती है कि ‘भाई तू सुखी रह ! तू धनवान रहे ! तू यशस्वी रहे….’ लेकिन मैं ऐसा नहीं सह सकता हूँ। आप सुखी रहें लेकिन कब तक ? यशस्वी रहें तो किसका यश ? मैं तो यह कह सकता हूँ कि आपको संतों की कृपा अधिक से अधिक मिलती रहे। संतों का अनुभव आपका अनुभव बनता रहे।

सर्व मंगलकारी वैदिक रक्षासूत्र

भारतीय संस्कृति में ‘रक्षाबन्धन पर्व’ की बड़ी भारी महिमा है। इतिहास साक्षी है कि इसके द्वारा अनगिनत पुण्यात्मा लाभान्वित हुए हैं फिर चाहे वह वीर योद्धा अभिमन्यु हो या स्वयं देवराज इन्द्र हो। इस पर्व ने अपना एक क्रांतिकारी इतिहास रचा है।

वैदिक रक्षासूत्र

रक्षासूत्र मात्र एक धागा नहीं बल्कि शुभ भावनाओं व शुभ संकल्पों का पुलिंदा है। यही सूत्र जब वैदिक रीति से बनाया जाता है और भगवन्नाम व भगवद् भाव सहित शुभ संकल्प करके बाँधा जाता है तो इसका सामर्थ्य असीम हो जाता है।

कैसे बनायें वैदिक राखी ?

वैदिक राखी बनाने के लिए एक छोटा सा ऊनी, सूती या रेशमी पीले कपड़े का टुकड़ा लें। उसमें दूर्वा, अक्षत (साबुत चावल) केसर या हल्दी, शुद्ध चन्दन. सरसों के साबुत दाने-इन पाँच चीजों को मिलाकर कपड़े में बाँधकर सिलाई कर दें। फिर कलावे से जोड़कर राखी का आकार दें। सामर्थ्य हो तो उपरोक्त पाँच वस्तुओं के साथ स्वर्ण भी डाल सकते हैं।

वैदिक राखी का महत्त्व

वैदिक राखी में डाली जाने वाली वस्तुएँ हमारे जीवन को उन्नति की ओर ले जाने वाले संकल्पों को पोषित करती हैं।

दूर्वाः जैसे दूर्वा का एक अंकुर जमीन में लगाने पर वह हजारों की संख्या में फैल जाती है, वैसे ही ‘हमारे भाई या हितैषी के जीवन में भी सदगुण फैलते जायें, बढ़ते जायें…..’ इस भावना का द्योतक है दूर्वा। दूर्वा गणेश जी की प्रिय है अर्थात् हम जिनको राखी बाँध रहे हैं उनके जीवन में आने वाले विघ्नों का नाश हो जाय।

अक्षत (साबुत चावल)- हमारी भक्ति और श्रद्धा भगवान के, गुरु के चरणों में अक्षत हो, अखण्ड और अटूटट हो, कभी क्षत-विक्षत न हों – यह अक्षत का संकेत है। अक्षत पूर्णता की भावना के प्रतीक हैं। जो कुछ अर्पित किया जाय, पूरी भावना के साथ किया जाय।

केसर या हल्दीः केसर की प्रकृति तेज होती है अर्थात् हम जिनको यह रक्षासूत्र बाँध रहे हैं उनका जीवन तेजस्वी हो। उनका आध्यात्मिक तेज, भक्ति और ज्ञान का तेज बढ़ता जाय। केसर की जगह पर पिसी हल्दी का भी प्रयोग कर सकते हैं। हल्दी पवित्रता व शुभ का प्रतीक है। यह नजरदोष न नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती है तथा उत्तम स्वास्थ्य व सम्पन्नता लाती है।

चंदनः चन्दन दूसरों को शीतलता और सुगंध देता है। यह इस भावना का द्योतक है कि जिनको हम राखी बाँध रहे हैं, उनके जीवन में सदैव शीतलता बनी रहे, कभी तनाव न हो। उनके द्वारा दूसरों को पवित्रता, सज्जनता व संयम आदि की सुगंध मिलती रहे। उनकी सेवा-सुवास दूर तक फैले।

सरसों- सरसों तीक्ष्ण होती है। इसी प्रकार हम अपने दुर्गुणों का विनाश करने में, समाज द्रोहियों को सबक सिखाने में तीक्ष्ण बनें।

अतः यह वैदिक रक्षासूत्र वैदिक संकल्पों से परिपूर्ण होकर सर्व मंगलकारी है। यह रक्षासूत्र बाँधते समय यह श्लोक बोला जाता हैः

येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।

तेन त्वां अभिबध्नामि1 रक्षे मा चल मा चल।।

इस मंत्रोच्चारण व शुभ संकल्प सहित वैदिक राखी बहन अपने भाई को, माँ अपने बेटे को, दादी अपने पोते को बाँध सकती है। यही नहीं, शिष्य भी यदि इस वैदिक राखी को अपने सदगुरु को प्रेमसहित अर्पण करता है तो उसकी सब अमंगलों से रक्षा होती है तथा गुरुभक्ति बढ़ती है।

1 शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय ‘अभिबध्नामि’ के स्थान पर ‘रक्षबध्नामि’ कहे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2014, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 259

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

संकल्पशक्ति के सदुपयोग का पर्वः रक्षाबन्धन


(पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी)

हमारी भारतीय संस्कृति त्याग और सेवा की नींव पर खड़ी होकर पर्वरूपी पुष्पों की माला से सुसज्ज है। इस माला का एक पुष्प रक्षाबन्धन का पर्व भी है जो गुरूपूनम के बाद आता है।

यूँ तो रक्षाबन्धन भाई-बहन का त्योहार है। भाई बहन के बीच प्रेमतंतु को निभाने का वचन देने का दिन है, अपने विकारों पर विजय पाने का, विकारों पर प्रतिबंध लगाने का दिन है एवं बहन के लिए अपने भाई के द्वारा संरक्षण पाने का दिन है लेकिन व्यापक अर्थ में आज का दिन शुभ संकल्प करने का दिन है, परमात्मा के सान्निध्य का अनुभव करने का दिन है, ऋषियों को प्रणाम करने का दिन है। भाई हमारी लौकिक सम्पत्ति का रक्षण करते हैं किंतु संतजन व गुरुजन तो हमारे आध्यात्मिक खजाने का संरक्षण करते हैं। उत्तम साधक बाह्य चमत्कारों से प्रभावित होकर नहीं अपितु अपने अंतरात्मा की शांति और आनंद के अनुभव से ही गुरुओं को मानते हैं। साधक को जो आध्यात्मिक संस्कारों का खजाना मिला है वह कहीं बिखर न जाय, काम, क्रोध, लोभ आदि लुटेरे कहीं उसे लूट न लें इसलिए साधक गुरुओं से रक्षा चाहता है। उस रक्षा की याद ताजा करने का दिन है रक्षाबंधन पर्व।

लोकमान्य तिलक जी कहते थे कि मनुष्यमात्र को निराशा की खाई से बचाकर प्रेम, उल्लास और आनंद के महासागर में स्नान कराने वाले जो विविध प्रसंग हैं, वे ही हमारी भारतीय संस्कृति में हमारे हिन्दू पर्व हैं। हे भारतवासियो ! हमारे ऋषियों ने हमारी संस्कृति के अनुरूप जीवन में उल्लास, आनंद, प्रेम, पवित्रता, साहस जैसे सदगुण बढ़ें ऐसे पर्वों का आयोजन किया है। अतएव उन्हें उल्लास से मनाओ और भारतीय संस्कृति के ऋषि-मनीषियों के मार्गदर्शन से जीवनदाता का साक्षात्कार करके अपने जीवन को धन्य बना लो।

तिलक जी ने यह ठीक ही कहा कि अपने राष्ट्र की नींव धर्म और संस्कृति पर यदि न टिकेगी तो देश में सुख, शांति और अमन-चैन होना संभव नहीं है।

तिलकजी एक बार विदेश यात्रा कर रहे थे। वहाँ अकस्मात् उन्हें याद आया कि आज तो रक्षाबंधन है। बहन की अनुपस्थिति को सोचकर वे कुछ चिंतित और दुःखी से हुए लेकिन उपाय के रूप में उन्होंने वहाँ एक भारतीय परिवार को खोज लिया। उनके घर जाकर महिला से निवेदन कियाः “बहन ! आज रक्षाबंधन है। तू मेरी धर्म की बहन बन जा। मुझे शुभ कामनाओं का एक छोटा सा धागा ही बाँध दे, ताकि मुझमें सच्चरित्रता, उत्साह और प्रेम बना रहे।”

वह महिला खुश हो गयी और बोलीः “वाह भैया ! धर्म भाई के रूप में तुम्हें पाकर तुम्हारी यह बहन तो सचमुच धन्य हो गयी !”

वह धागा ले आयी और प्रेम से तिलकजी की कलाई पर बाँध दिया। तिलक जी को उस दिन उस बहन के प्रेमपूर्ण आग्रह ने इतना विवश कर दिया कि वे भोजन किये बिना अपनी बहन के घर से विदा न हो सके।

राखी मँहगी है या सस्ती, यह महत्त्वपूर्ण नहीं है लेकिन इस धागे के पीछे जितना निर्दोष प्रेम होता है, जितनी अधिक शुद्ध भावना होती है, जितना पवित्र संकल्प होता है, उतनी रक्षा होती है तथा उतना ही लाभ होता है। जो रक्षा की भावनाएँ धागे के साथ जुड़ी होती हैं, वे अवश्य फलदायी होती हैं, रक्षा करती हैं  इसलिए भी इसे रक्षाबंधन कहते होंगे।

राखी का धागा तो 25-50 पैसे का भी हो सकता है किंतु धागे के साथ जो संकल्प किये जाते हैं वे अंतःकरण को तेजस्वी व पावन बनाते हैं। जैसे इन्द्र जब तेजहीन हो गये थे तो शचि ने उनमें प्राणबल मनोबल भरने के भाव का आरोपण कर दिया कि ʹʹजब तक मेरे द्वारा बँधा हुआ धागा आपके हाथ पर रहेगा, आपकी ही विजय होगी, आपकी रक्षा होगी तथा भगवान करेंगे कि आपका बाल तक बाँका न होगा।”

शचि ने इन्द्र को राखी बाँधी तो इन्द्र में प्राणबल का विकास हुआ और इन्द्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की। धागा तो छोटा सा होता है लेकिन बाँधने वाले का शुभ संकल्प और बँधवाने वाले का विश्वास काम कर जाता है।

कुंता ने अभिमन्यु को राखी बाँधी और जब तक राखी का धागा अभिमन्यु की कलाई पर बँधा रहा तब तक वह युद्ध में जूझता रहा। पहले धागा, टूटा, बाद में अभिमन्यु मरा। उस धागे के पीछे भी तो कोई बड़ा संकल्प ही काम कर रहा था कि जब तक वह बँधा रहा, अभिमन्यु विजेता बना रहा। लेकिन यहाँ न तो किसी ने कुंता से धागा बँधवाया है, न ही शचि से क्योंकि सूक्ष्म जगत में स्थूलता का मूल्य कम होता है। यहाँ सूक्ष्म संकल्प ही एक-दूसरे की रक्षा करने में पर्याप्त होते हैं।

जो देह में अहंबुद्धि करते हैं, उनको बाह्य धागे की जरूरत पड़ती है लेकिन जो ब्रह्म में, गुरु तत्त्व अथवा आत्मा में अहंबुद्धि करते हैं, उनके लिए धागा तो दिखने भर के लिए है, उनके संकल्प ही एक दूसरे के लिए काफी होते हैं। राखी का यह धागा तो छोटा सा होता है परंतु इस धागे के पीछे-कर्तव्य का संकेत होता है।

ʹभाई छोटी छोटी बातों के कारण आवेश और आवेग का शिकार न हो जाय, सदैव सम रहे, राखी का यह कच्चा धागा भाई में पक्की समझ जगाने का स्मृतिचिह्न बनेʹ – ऐसा मंगल चिंतन करते-करते बहन भाई को राखी बाँधे तथा भाई भी बहन के जीवन में आने वाली व्यावहारिक, सामाजिक एवं मानसिक मुसीबतों को मिटाने के अपने संकल्प की स्मृति ताजी करे, ऐसा पावन दिन रक्षाबंधन है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2012, अंक 235, पृष्ठ संख्या आवरण पृष्ठ एवं 27

ૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐૐ