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जीवन्मुक्त के लक्षण


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जीते जी जिन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का निश्चय हो गया है, जिन्होंने अपने साक्षीस्वरूप का अनुभव कर लिया है एवं ʹइस ब्रह्माण्ड तथा अनंत ब्रह्माण्डों में मेरे सिवा दूसरा कोई तत्त्व नहीं है….ʹ ऐसा जिन्हें बोध हो गया है, वे जीवन्मुक्त हैं। ऐसे महापुरुष समस्त व्यवहार करते हुए भी व्यवहार या कर्म से नहीं बँधते क्योंकि वे देहभाव या मनभाव से कुछ नहीं करते।

वे अहंकार को, जो कि सब दुःखों का मूल कारण है, देह से लेकर अंतःकरण में कहीं भी नहीं रखते। वे सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों से परे होते हैं। वे सुख-दुःख को सच्चा नहीं मानते। जब वे अनुभव करते हैं कि ʹमेरा जन्म ही नहींʹ तो मृत्यु को वे सत्य कैसे मानते हैं ?ट

जब तक अंतःकरण है तब तक साक्षीभाव का कथन किया जा सकता है किन्तु जहाँ अंतःकरण के भी अभाव का अनुभव होता हो तब साक्षी भी कैसे कह सकते हैं ? साक्षीभाव की संज्ञा भी मुमुक्षु को समझाने के लिए है।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में अलग-अलग प्रसंगों पर देह, मन, आत्मा को स्वयं के रूप में कहते हैं किन्तु श्रीकृष्ण परमात्मा का वास्तविक स्वरूप तो आत्मा है, साक्षी है। भक्त प्रथम देहभाव से श्रीकृष्ण परमात्मा की उपासना करता है, फिर धीरे-धीरे आत्मभाव से उपासना करता है और अंत में ʹवह आत्मा अन्य कोई नहीं वरन् स्वयं ही हूँ….ʹ ऐसे अभेद भाव से उपासना रता है। अंत में वह भेद-अभेद को भी मिटा देता है। ʹमुझमें कोई भाव ही नहीं, मुझमें द्वैतपना भी नहीं है और एकपना भी नहीं है…ʹ यह परम अवस्था है। इस स्थिति को ʹजीवन्मुक्ति की स्थितिʹ अथवा ʹब्राह्मी स्थितिʹ कहते हैं।

जब सभी मनुष्य तुमको अच्छा करने लगें तब समझना कि मुसीबत आ खड़ी हुई है। बनावटी संतों की इसी प्रकार प्रशंसा उनके ही अनुयायियों ने की थी। सभी हमें अच्छा बोलें ऐसी इच्छा न करें क्योंकि अपना वास्तविक स्वरूप जो कि मन-वाणी से परे है उसकी प्रशंसा कोई नहीं करता अपितु शरीर, मन आदि की ही लोग प्रशंसा करते हैं और ऐसी प्रशंसा हमें नीचे ले जाती है।

अध्यात्म-पथ पर चलने वालों के लिए ऐसी प्रशंसा, लोगों की बातचीत एवं अनेक प्रकार की सिद्धियों के पीछे पड़ना यह सब विघ्नरूप है, उनकी उन्नति को रोकने वाला है क्योंकि जहाँ आत्मा के सिवाय कुछ नहीं है, जहाँ शरीर को भी भूलने की बात है वहाँ यह सब अवनति की ओर ले जाने वाला है। अतः जीवन्मुक्त महापुरुष उस ओर दृष्टिपात ही नहीं करते। जीवन्मुक्त अवस्था में इस जगत को देखने पर भी, शरीर को देखने पर भी पूरा साक्षीभाव बना रहता है।

जीवन्मुक्त की पहचान इस प्रकार होती हैः उनका मन मानों ब्रह्म का ध्यान करता है, वचन मानों स्तुति करते हैं, चरण मानों ब्रह्म की प्रदक्षिणा करते हैं ऐसा लगता है। षडरिपु उनके षडमित्र बनकर रहते हैं। क्रोध क्षमा का रूप लेता है। अभिमान सम्मान का रूप लेता है। कपट सरलता का रूप लेता है। लोभ संतोष का रूप लेता है। मोह प्रेम का रूप लेता है। काम पूर्णकाम अर्थात् वासनारहित हो जाता है।

कई तत्त्वज्ञ महापुरुष कहते हैं कि मन एवं वाणी आत्मा तक नहीं  पहुँच सकते। यह सच है लेकिन मनरूपी महासागर में उठते विचाररूपी तरंगों को आत्मा जानती एवं देखती है। इसी प्रकार वाणी एवं वाणी से उत्पन्न वचनरूपी तरंगों की भी आत्मा साक्षी है।

जैसे मनुष्यादि शरीर का जीवन अन्न है, वैसे ही मनुष्य का मनुष्यत्व उसके सदाचार में निहित है। इसी प्रकार जीव का जीवन तत्त्वज्ञान है, वही उसका आहार है। परन्तु आत्मा का जीवन तो ब्रह्म का साक्षात्कार है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2000, पृष्ठ संख्या 20, अंक 89

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छोड़ो आशा-तृष्णा को….


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्रीमद् आद्यशंकराचार्य ने कहा हैः

अंगं गलितं मुण्डं दशनविहीनं जातं तुण्डम्।

वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशा पिण्डम्।।

ʹअंग गलित हो गये, सिर के बाल पक गये, मुँह में दाँत नहीं रहे, बूढ़ा हो गया, लाठी लेकर चलने लगा फिर भी आशा पिण्ड नहीं छोड़ती।ʹ

(चर्पटपंजरिका स्तोत्रः 6)

आशा ही जीव को जन्म-जन्मान्तर तक भटकाती रहती है। मरुभूमि में पानी के बिना मृग का छटपटाकर मर जाना भी इतना दुःखद नहीं है, जितना तृष्णावान का दुःखी होना है। शरीर की मौत की छटपटाहट पाँच-दस घंटे या पाँच-दस दिन रहती है, लेकिन जीव तृष्णा के पाश में युगों से छटपटाता आया है, गर्भ से शमशान तक ऐसी जन्म मृत्यु की यात्राएँ करता आया है। गंगाजी के बालू के कण तो शायद गिन सकते हैं लेकिन इस आशा-तृष्णा के कारण कितने जन्म हुए नहीं गिन सकते।

बुद्धिमान बुजुर्गों का कहना है कि यदि सिर के बाल सफेद होने लगें तो समझ लेना चाहिए कि शमशान में जाने की तैयारी हो रही है। यदि दाँत गिरने शुरु हो जायें तो समझ लें संसार के भोग अब आपके लिए नहीं हैं। अतः संसार के भोग भोगने की रुचि को मिटाते जाना चाहिए। बुढ़ापा आने पर लकड़ी का सहारा लेने की जरूरत पड़ने लगे तो समझ जाना चाहिए कि एक दिन ये ही लकड़ियाँ इस शरीर को जला देंगी।

अतः हे मानव ! अब तू सावधान हो जा। तुच्छ वासनाओं को छोड़, संसार की आसक्ति को छोड़, संसार से सुख लेने की इच्छा को छोड़ क्योंकि संसार से कोई भी व्यक्ति पूर्ण सुखी होकर नहीं गया है। जिनकी गोद में भगवान श्रीराम स्वयं खेले थे, उन राजा दशरथ को भी संसार ने रुलाया था। अतः संसार से सुख पाने की तृष्णा छोड़। अपने सुख स्वरूप परमात्मा की ओर कदम आगे बढ़ा, अपने मन को समझाः

ʹऐ मेरे मन ! आशा करनी ही है तो इस बात की आशा कर कि मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे, जब मैं अपने परम पद में विश्रान्ति पाऊँगा ? यह संसार मुझे स्वप्नवत् कब भासेगा ? कब मेरे चित्त की तृष्णाओं का नाश हो जायेगा ? कब मेरा चित्त निर्दोष नारायण के ध्यान में मग्न रहने लगेगा ? न जाने कितनी बार माताओं के गर्भों में लटकता आया हूँ। हे शिव ! हे कल्याणस्वरूप ! हे अन्तर्यामी प्रभु ! तू मेरा हाथ पकड़कर मुझे अपने निर्बन्ध, मुक्त स्वभाव में ले चल। हे ईश्वर ! ये बाल सफेद हो गये, लेकिन बुद्धि श्वेत नहीं हुई, शुद्ध नहीं हुई, उसका मायारूपी कालापन नहीं हटा। दाँत गिर गये, लेकिन अभी तक तुच्छ आशाएँ-तृष्णाएँ नहीं गिरीं। हाथ में डंडा आ गया लेकिन हृदय में आपका प्रेम नहीं आया। शरीर जीर्ण हो गया फिर भी मेरी तृष्णाएँ जीर्ण नहीं हुईं। हे मेरे प्रभु ! मुझमें मेरे स्वरूप को पाने की लालसा जगा दे….ʹ

इस प्रकार अपने मन को समझाते हुए प्रार्थना करते जाओ, अपने आपके मित्र बनते जाओ। जो आदमी संसार की तुच्छ वासनाओं को मिटाने का यत्न नहीं करता, वह अपने आपका शत्रु है। जो मनुष्य अपने शरीर की नश्वरता का ख्याल नहीं करता, उसकी बालबुद्धि है। वह अवश्य माया से ठगा जाता है। मृत्यु के समय पराये तो उसके पराये हैं ही, अपने भी पराये हो जाते हैं और शरीर भी अपना नहीं रहता।

जो मनुष्य ऐसे वर्त्तमान समय-परिस्थिति का दुरुपयोग करके, भविष्य की विषय-वासनाओं एवं ऐहिक सुखों की पूर्ति करने तथा इस नाशवान शरीर को सुखी करने में जीवन भर लगे रहते हैं, वे ʹपापी मनुष्यʹ के रूप में पहचाने जाते हैं। पापी मनुष्यों की यह पहचान है कि वे अपनी तृष्णा के मुताबिक जगत की परिस्थितियों को अपने अनुकूल करके सुख पाने की इच्छा में ही जुटे रहते हैं। वे क्षणभंगुर शरीर को ही सब कुछ मानने लगते हैं और आत्मा का अनादर करते हैं। वे अपनी आत्मिक शक्तियों का उपयोग भी शरीर के ऐश-आराम में करते हुए उसे बरबाद कर देते हैं।

शंकराचार्य हमें सचेत करते हुए कहते हैं- “तू तुच्छ तृष्णा को, देहाध्यास को, वासनाओं को पोस मत। विषयो के संग से अपना सत्यानाश मत कर। तू तो निर्विषयी, निर्लोभी, निरहंकारी एवं निर्द्वन्द्व पद में स्थित महापुरुषों के वचनों को विचार।”

हे मानव ! कभी-कभी शमशान में जा और अपने मन को दिखा किः ʹदेख ! आखिर तेरा भी यही हाल होने वाला है। हे मेरे मन ! तेरा यह हाल हो जाये, उसके पहले तू विषय  वासना के पाश को विवेक-बुद्धि से काट दे। संसार के विषयों से वैराग्य कर और परमात्मरस पाने का अभ्यास कर।ʹ

बुद्ध अपने प्रिय शिष्यों से कहते थेः “यदि मेरा शिष्य बनना  चाहते हो, भिक्षु बनना चाहते हो, तो पहले छः महीने तक शमशान में निवास करो। वहाँ जितने मुर्दे जलाये जाते हों, उनके साथ अपना सादृश्य स्थापित करो कि ʹमैं ही जल रहा हूँ। ये सब भी पंचभूतों के बने हैं और मेरा शरीर भी पंचभूतों का ही बना है।ʹ इससे विवेक-वैराग्य जागृत होगा।”

विवेकवान विरक्त मनुष्य को यदि कोई कहे किः ʹतुम बड़े ही सुन्दर दिख रहे हो….ʹ तो यह सुनकर उसे सुन्दरता का अभिमान नहीं होता क्योंकि सुन्दरता का परिणाम क्या है, यह उसे पता होता है।  उसे सदा ऐसा स्मरण रहता है कि यह सुन्दर चेहरा भी एक मुट्ठी राख बनने की ओर ही जा रहा है। अतः सुन्दरता का गर्व करने से क्या लाभ ?

मानव कितना महान है ! …लेकिन इस अभागी तृष्णा ने ही उसे भटका दिया है। अभागी आशा-तृष्णा ही उसे जन्म-मरण के चक्र में फँसाती है।

आज की इच्छा कल का प्रारब्ध बन जाती है इसलिए भोगने की, खाने की, देखने की आशा करके अपने भविष्य को नहीं बिगाड़ना चाहिए। हे मानव ! जीते-जी आशा-तृष्णारहित होकर परमात्म-साक्षात्कार करने का प्रयत्न करना चाहिए।

संसार की वस्तुओं को पाने की तृष्णा में हम दुःखद परिस्थितियों को मिटाने की मेहनत और सुखद परिस्थितियों को थामने का व्यर्थ यत्न करने में ही उलझ गये हैं। अज्ञान से यह भ्रांति मन में घुस गई है किः ʹकुछ पाकर, कुछ छोड़कर, कुछ थामकर सुखी होंगे।ʹ हालांकि सुख के संबंध क्षणिक हैं, फिर भी उसी को पाने में अपना पूरा जीवन लगा देते हैं और जो शाश्वत संबंध है आत्मा-परमात्मा का, उसको जानने का समय ही नहीं है। कैसा दुर्भाग्य है ! ऐसी उलटी धारणा हो गई है, उलटी बुद्धि हो गयी है।

ईश्वर हमसे तसू भर भी दूर नहीं है। जरूरत है तो केवल उसे प्रगट करने की। जैसे लकड़ी में अग्नि छुपी है, किन्तु उस छुपी हुई अग्नि से भोजन तब तक नहीं पकता, जब तक दियासिलाई से अग्नि को प्रकट नहीं करते। जैसे विद्युत्तार में विद्युत्शक्ति छुपी है, किन्तु उस छुपी हुई शक्ति से विद्युत्तार संचारित होकर बल्ब से तब तक प्रकाश नहीं फैलाता जब तक स्विच चालू नहीं करते। ऐसे ही परमात्मा अव्यक्त स्वरूप में सबमें छुपा हुआ है किन्तु जब तक जीव की सारी तुच्छ वासनाएँ ज्ञानरूपी दियासिलाई से जल नहीं जातीं, चित्त वासनारहित नहीं हो जाता तब तक अन्तःकरण में ईश्वरत्व का प्रागट्य नहीं होता।

अतः देर न करो। उठो… अपने-आप में जागे हुए निर्वासनिक महापुरुषों के, सदगुरुओं के चरणों में पहुँच जाओ…. अपनी तुच्छ इच्छाओं को जला डालो…. अपने ज्ञानस्वरूप में जाग जाओ…. ऐसे अजर-अमर पद को पा लो कि फिर तुम्हें दुबारा गर्भवास का दुःख न सहना पड़े।

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स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2000, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 89

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सब दोषों का मूलः प्रज्ञापराध


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

प्रज्ञापराधो मूलं सर्वदोषाणाम्…

सभी दोषों का मूल है प्रज्ञा का अपराध। इस संसार में जितने भी दुःख हैं वे सब बेवकूफी के कारण ही उत्पन्न होते हैं। जहाँ बेवकूफी है वहाँ दुःख है। जहाँ समझ है वहाँ सुख है।

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।

जहाँ कुमति तहँ दु-ख निधाना।।

जितने भी दुःख हैं वे सब बुद्धि की मंदता से आते हैं। बुद्धि की मंदता के कारण ही राग-द्वेष होता है। बुद्धि की मंदता के कारण ही लोग सम्पूर्ण जीवन ʹमेरे-तेरेʹ में गँवाकर अंत में निराश होकर मर जाते हैं।

एक बहुत बड़े विद्वान पण्डित थे। उनके नाम से सब पण्डित घबराते थे। कोई भी उनके साथ शास्त्रार्थ करने को तैयार नहीं होता था।

एक दिन जब सूर्य ढल गया और संध्या का समय हुआ तो वे पण्डित महाशय दही खाने लगे। उसी समय उनकी पहचान वाले एक दूसरे पण्डित मित्र वहाँ पहुँच गये। संध्या के समय उन्हें दही खाते देखकर पण्डित मित्र ने कहाः

“यह क्या कर रहे हो ?”

विद्वान पण्डितः ʹʹदही खा रहा हूँ।”

“संध्या के समय दही खा रहे हो ! क्या तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी है ?”

“मेरी बुद्धि इतनी तीक्ष्ण है कि लोग मुझसे बात करने में भी घबराते हैं। मेरे साथ शास्त्रार्थ करने के लिए कोई नहीं आता। अतः मैं अपनी बुद्धि की तीव्रता को कम करने के लिए दही खा रहा हूँ।”

उनकी बात सुनकर मित्र हँसने लगा और बोलाः “बुद्धि को कम करने के लिए दही खा रहे हो ? तुम्हें दही खाने की आवश्यकता नहीं है, तुम तो ऐसे ही मूर्ख हो। संध्या के समय संध्या करनी चाहिए, प्राणायाम-जप-ध्यानादि करना चाहिए यह तुम्हें मालूम है, फिर भी अपनी बुद्धि का दिवाला निकाल रहे हो। तुमसे बड़ा मूर्ख और कौन होगा ?”

यह है प्रज्ञा का अपराध। बुद्धि की कमी के कारण ही व्यक्ति सब करा कराया चौपट कर देता है। मानव के पास बुद्धि तो है किन्तु वह उसका सही उपयोग नहीं करता इसी कारण आये दिन झगड़े-फसाद होते रहते हैं। जरा-जरा सी बात में हम इतने भड़क जाते हैं कि मार पीट क नौबत आ जाती है।

जहाँ राग होता है वहाँ दूसरे की कोई गलती नहीं दिखती और जहाँ द्वेष होता है वहाँ दूसरे का सदगुण नहीं दिखाई देता। दूसरों को समझकर कार्य नहीं करते तो उनकी अच्छाई भी हमें बुराई ही दिखती है। ये राग-द्वेष भी होते हैं प्रज्ञा की कमी से….. प्रज्ञा के दोष के कारण ही हमें दूसरों की कंकड़ समान कमियाँ भी पहाड़ जैसी लगती हैं और अपनी पहाड़ जैसी कमियाँ भी कंकड़ जैसी लगती है। अपनी कमी का पता चलने पर भी उन्हें निकालने के लिए उतने सजाग या उतने दृढ़ प्रयत्नशील नहीं रहते और अपने इस मिथ्या शरीर की प्रशंसा एवं वाहवाही सुनकर खुश होते हैं और खोये रहते हैं।

अरे ! वाहवाही से तो कुत्ता भी खुश हो जाता है, पुचकारने पर पूँछ हिलाता है और डण्डा दिखाने पर पूँछ दबा लेता है। फिर आप खुश या नाराज हो गये तो क्या बड़ी बात है ?

प्रज्ञा के अपराध के कारण ही हम कुछ न जानते हुए भी अपने-आपको सर्वश्रेष्ठ समझने लगते हैं।

यह मूर्खता नहीं तो और क्या है ?

मनुष्य की प्रज्ञा का यह दोष दूर होता है बुद्धि का आदर करने से। बुद्धि का जितना आदर करोगे उतनी वह विकसित होगी। ….और बुद्धि की पराकाष्ठा है  ब्रह्मज्ञान। बुद्धि के विकास के लिए आत्मज्ञान से बढ़कर कोई उपाय नहीं है।

यदि सब दुःखों से सदा के लिए छूटना है तो आत्मज्ञान पा लो।

कभी न छूटे पिण्ड दुःखों से, जिसे ब्रह्म का ज्ञान नहीं।

जब तक ब्रह्म का ज्ञान नहीं होगा, तब तक दुःखों से पिण्ड नहीं छूट सकता। फिर चाहे आप स्वयं प्रधानमंत्री ही क्यों न बन जायें। सुविधाएँ मिल जायेंगी लेकिन सब दुःखों का अंत न हो सकेगा। समस्त दुःखों का अंत तो तभी होगा जब ब्रह्म का ज्ञान पाओगे, अपने आत्मस्वरूप को पहचानोगे।

रामकृष्ण परमहंस का एक शिष्य था जो कुछ बनना चाहता था। श्रीरामकृष्ण उसको बोलते थेः

“तू चाहे डॉक्टर बन, चाहे इन्जीनियर बन, चाहे वकील बन लेकिन पहले अपने आपको जान ले। मूल को जान ले फिर चाहे किसी भी शाखा को पकड़ना। एक बार अपने आत्मदेव को पा ले फिर जो पाना चाहो पा लेना।”

ईश्वर को पाने के लिए संसार को छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन संसार को पाने के लिए ईश्वर का त्याग कदापि न करना।

आज कल के माता-पिता भी बच्चों से डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि बनने की आशा तो रखते हैं लेकिन कोई भी माता-पिता यह नहीं कहते कि ʹबेटा ! तू एक बार ब्रह्मवेत्ता होकर दिखा दे।ʹ जो माता पिता ऐसा बोलें वे माता-पिता नहीं वरन् उनके रूप में साक्षात् सदगुरु ही हैं।

ऐसी महिमा है आत्मज्ञान की ! जिसने अपने आत्मस्वरूप को पाया है समझो, उसने सब कुछ पा लिया और जिसने अपने आत्मस्वरूप को नहीं पाया उसने कुछ नहीं पाया। आत्मज्ञान-प्राप्त महापुरुष की प्रज्ञा परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाती है…. तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। …..और जिसकी प्रज्ञा परमात्मा में प्रतिष्ठित हो चुकी है उसके सब दोष अपने-आप निवृत्त हो जाते हैं।

दुनिया में जो कुछ दुःख हैं वे प्रज्ञा के दोष से हैं। बुद्धि की जितनी मन्दता, दुःख उतने ज्यादा। बुद्धि जितनी हीन, दुःख उतने ज्यादा। बुद्धि जितनी शुद्ध, दुःख उतने कम। बुद्धि अगर पूर्ण शुद्ध हो गई तो बड़ा अनुपम लाभ होगा।

बुद्धिगत ज्ञान का आदर करने से व्यर्थ का आकर्षण, व्यर्थ की चेष्टा, व्यर्थ के भोग और व्यर्थ का संग्रह, व्यर्थ का शोषण और व्यर्थ का पुचकार सारा का सारा खत्म होता चला जायेगा। विकल्प कम होने से आपका मन निःसंकल्प होगा। मन निःसंकल्प होने लगेगा तो सामर्थ्य बढ़ने लगेगा। मन को ज्यादा काम नहीं तो बुद्धि को ज्यादा परेशानी नहीं। बुद्धि जहाँ से स्फुरित होती है उस वास्तविक ज्ञान में बुद्धि ठहरने की अधिकारिणी हो जायेगी।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में ʹसांख्ययोगʹ नामक दूसरे अध्याय में कहते हैं-

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।57।।

ʹजो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि स्थिर है।ʹ (57)

यदा संहरते चायं कूर्मोङ्गानीव सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।58।।

ʹ…..और कछुआ सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है।ʹ (ऐसा समझऩा चाहिए।)(58)

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।61।।

ʹइसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहितचित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।ʹ (61)

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।68।।

ʹइसलिए हे महाबाहो ! जिस परुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है।ʹ(68)

इन्द्रियगत ज्ञान अति तुच्छ है। जो लोग इन्द्रियगत ज्ञान को सर्वस्व मानते हैं उन लोगों के जीवन में बस, भोग…. भोग…. भोग…। पाश्चात्य जगत के लोग परलोक को नहीं मानते, श्राद्ध आदि को नहीं मानते। वे लोग इन्द्रियगत ज्ञान को ही सर्वस्व मानते हैं। इस शरीर को खूब खिलाओ-पिलाओ और भोग भोगो। इन्द्रियगत ज्ञान का आदर है इसलिए इन्द्रियों को खूब भोग चाहिए। इन्द्रियाँ चंचल हैं इसलिए भोग भी बदलते रहते हैं।

पाश्चात्य जगत की क्या परिस्थिति है ? बड़ी दयनीय स्थिति है उन लोगों की। वे लोग समय-समय पर फैशन बदलते हैं, कपड़े बदलते हैं, फर्नीचर बदलते हैं, घर बदलते हैं, कार बदलते हैं और यहाँ तक कि पत्नी भी बदलते हैं।

कहीं-कहीं तो ऐसी जगहें हैं जहाँ लोग अपनी-अपनी पत्नी ले जाते हैं। सब लोग नाचते हैं, झूमते हैं, दारू पीते हैं और पत्नियाँ बदल कर उपभोग करते हैं। फिर भी बेचारों को सुख नहीं है… दिनों दिन अशान्ति के, बरबादी के रास्ते चले जा रहे हैं।

पत्नी बदलो, परिवार बदलो, घर बदलो, गाड़ी बदलो, कपड़े बदलो, यह बदलो, वह बदलो फिर भी शांति नहीं। जब अमेरिका में 25 करोड़ की जनसंख्या थी तब वहाँ 20-25 हजार लोग हर साल आत्महत्या करते थे और अब 27 करोड़ 3 लाख से अधिक की आबादी हो गई है तो फिर क्या हाल होगा ? हालाँकि वहाँ की आर्थिक स्थिति बड़ी अच्छी है, खाने-पीने की प्रचुर चीजें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, उनमें कोई मिलावट नहीं है, लोग खूब काम करते हैं… अपनी डयूटी बजाते हैं लेकिन मशीन की तरह काम किये जा रहे हैं। भोग में अपने को गिराये जा रहे हैं।

भारत का अभी भी सौभाग्य है कि हजारों की संख्या में आप लोग आत्मशांति की जगह पर बैठ सकते हो।

भारत के युवक जब विदेशों में जाते हैं तब वहाँ उनका ब्रेनवाश अर्थात् बलात मतपरिवर्तन या मतारोपण किया जाता है कि जिस भूमि में वे पैदा हुए, जो ऋषियों की भूमि है, भगवान ने भी कई अवतार जिस भूमि पर लिये हैं, कई संत-महात्मा, ब्रह्मवेत्ता सत्पुरुष जिस भूमि पर अवतरित होते रहते हैं ऐसी अपनी मातृभूमि भारत के लिए उनमें घृणा और नफरत पैदा हो जाती है।

स्वामी रामतीर्थ के कथनानुसार और रशिया के कई विद्वानों के लेखों के अनुसार ईसा मसीह सत्रह साल भारत में रहे थे। उन्होंने कश्मीर के योगियों से योग सीखा। बाद में वहाँ जाकर चमके थे। ऐसी दिव्य भारत भूमि के लिए ही वे युवक बोलने लगते हैं- ʹIndia is nothing. India is very poor. भारत कुछ नहीं है। भारत बहुत गरीब है।ʹ

मैं अमेरिका गया था तो वहाँ के लोगों ने पूछाः “आप आध्यात्मिकता की बात करते हैं… तो भारत में आध्यात्मिकता है फिर भी भारत इतना गरीब क्यों है ?”

मैंने कहाः “हमारा भारत गरीब क्यों है यह आपको बता दूँगा लेकिन पहले आप यह बताओ कि आपके पास सब कुछ भौतिक सुविधाएँ होने के बावजूद दिल की दरिद्रता क्यों नहीं मिटती ? पति कमाता है, पत्नी कमाती है, बच्चे कमाते हैं फिर भी जैसे बूढ़े पशुओं को गोशाला में भेज देते हैं, ऐसे ही आप अपने माँ-बाप को नर्सिंग होम (सरकारी अनाथाश्रम) में क्यों भेज देते हो ? दिल के इतने दरिद्र क्यों हो ?

अब मैं यह बताता हूँ कि भारत दरिद्र क्यों हुआ। वह जमाना था कि भारत के लोग सोने के बर्तनों में भोजन करते थे। युधिष्ठिर महाराज ने यज्ञ किया था तब प्रतिदिन एक लाख लोगों को भोजन कराते थे। दस हजार साधू-ब्राह्मणों को सुवर्णपात्रों में भोजन परोसा जाता था। उन्हें हाथ जोड़कर विनती करते थे किः ʹभोजनोपरान्त कृप्या सुवर्णपात्र को स्वीकार करके अपने घर ले जाइये।ʹ कुछ लोग ये बर्तन ले जाते और कुछ लोग ऐसे भी थे जो कहतेः ʹहम ये सोने के ठीकरे सँभालेंगे कि अपने आत्मधन का ख्याल करेंगे ?ʹ सोने के बर्तन वहीं छोड़कर वे चले जाते थे। ऐसा हमारा भारत था !

हमारे भारत के एक साधू स्वामी रामतीर्थ अमेरिका पहुँचे तो वहाँ का राष्ट्रपति मि. रूजवेल्ट उनका दर्शन करके बोलता हैः “आज मेरा जीवन धन्य हुआ। अब तक तो ईसा मसीह के बारे में केवल सुना था। आज जिन्दा ईसा मुझे इन साधू में दिखाई दे रहा है।ʹ

भारत में ऐसे मोती पकते हैं। भारत आध्यात्मिक औऱ भौतिक दोनों संपत्तियों से समृद्ध था। फेरी-वाले पुकार लगाते थे) ʹदेना चाहो तो सोने-चाँदी के टूटे-फूटे बर्तन….ʹ

जमाना बदला। विदेशी लुटेरों ने देश पर आक्रमण किया। भारतीयों में संकीर्णता और दुर्बलता घुस गई। ʹसबमें भगवान हैं…ʹ की भावना से सब विदेशियों को आत्मसात कर लिया लेकिन लुटेरों ने भारत का सब माल हड़प कर लिया। फिर अफगानिस्तान आये, हूण आये, शक आये, ग्रीक (यूनानी) आये, फिरंगी (अंग्रेज) आये। सदियो तक भारत पराधीन बना रहा। शोषकों ने भारत की आर्थिक स्थिति सब गड़बड़ कर दी। शोषक लोग बढ़ गये, कंस और रावणों का प्रभाव बढ़ गया। समाज का खून चूसने वाले दुष्टों का बोलबाला होने लगा। लोगों में सावधानी नहीं रही। उन्होंने अपनी बलवान संकल्प-शक्ति खो दी। वे अपनी हिम्मत और प्राणशक्ति को भूलते गये। आध्यात्मिकता का, वेदान्त का, उपनिषदों का अमृतोपदेश गिरि-गुफाओं तक ही सीमित होने लगा। लोग हिम्मत, साहस, प्रसन्नता और सतर्कता भूलते गये। भय, लाचारी, खुशामदखोरी, पलायनवाद….ʹ अपना क्या ? करेगा सो भरेगा….ʹ इस प्रकार की धारणा से समाज पिछड़ गया। इसका फायदा शोषकों ने लिया।

…..ओर इस समय भारत में अमेरिका की अपेक्षा भूमि कम है, अमेरिका की अपेक्षा तीसरा हिस्सा भी नही है और जनसंख्या तीन गुनी से भी अधिक है। इस प्रकार देखा जाये तो अमेरिका में भारत की अपेक्षा करीब साढ़े नौ गुनी अधिक भौतिक सुविधाएँ हैं। फिर भी हमें रंज नहीं है।

आपके यहाँ भले ही इतनी सुविधाएँ हों लेकिन भारत आध्यात्मिक सपूतों के प्रसाद से प्रेम और सहनशक्ति, सहानुभूति और स्नेह, सदभाव और सामाजिक जीवन में आपसे अभी भी कहीं ऊँचा है। भले ही सिनेमा और टी.वी के माध्यम से पाश्चात्य जगत की गन्दगी भारत में आ रही है फिर भी आध्यात्मिक सुवास, हृदय की शांति कोई लेना चाहे तो, मिलेगी तो भारत से ही मिलेगी, आपके यहाँ मिलनी मुश्किल है।”

हे भारतवासियों ! आत्मशांति, आत्मनिर्भरता, आत्मसंयम और सदाचार बढ़ाकर अपना आत्म-साक्षात्कार…. अपना जन्मसिद्ध अधिकार पा लो। कब तक विलासियों का अनुकरण करते-करते अपने को अशांति और उद्वेग में खपाते रहोगे ?

उठो… जागो… कमर कसो। सनातन धर्म के सर्वोपरि सिद्धान्तों को अमल में लाओ और यहीं, इसी जन्म में आत्मा-परमात्मा का अनुभव, अपनी अमरता का अनुभव कर लो।

हे परमेश्वर के अति निकटवर्ती मानव ! बहकावे में आकर विलासिता में फिसलने से अपने को बचा।

मानव ! तुझे नहीं याद क्या ? तू ब्रह्म का ही अंश है।

कुल गोत्र तेरा ब्रह्म है, तू ब्रह्म का ही वंश है।।

हे स्थितप्रज्ञ ! हे ऋषियों की संतान ! अपनी प्रज्ञा को ऊँची उठाओ… ब्रह्म में स्थिर करो। यही तुम्हारा वास्तव में मुख्य कर्तव्य है। फिर पूरा संसार तुम्हें खिलौन लगेगा।

ૐ….ૐ….ૐ…जागो….जागो…

ऐसे पुरुषों को खोज लो जो तुम्हारी प्रज्ञा को परमात्मा में प्रतिष्ठित कराने की क्षमता रखते हों।

उत्तिष्ठित….जाग्रत…. प्राप्य वरान्निबोधत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2000, पृष्ठ संख्या 9-13, अंक 89

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