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चित्त को वश कैसे करें ?


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्री योगवाशिष्ठ महारामायण में आता है किः “चित्तरूपी पिशाच भोगों की तृष्णारूपी विष से पूर्ण है और उसने फुत्कार के साथ बड़े-बड़े लोक जला दिये हैं। शम-दम आदि धैर्यरूपी कमल जल गये हैं। इस दुष्ट को और कोई नहीं मार सकता…. हे राम जी ! यह चित्त शस्त्रों से नहीं काटा जाता, न अग्नि से जलता है और न किसी दूसरे उपाय से नाश होता है। साधु के संग और सत्शास्त्रों के विचार से नाश होता है।”

चित्तरूपी पिशाच को, मन रूपी भूत को समझाने के लिए वशिष्ठजी महाराज कहते हैं। ‘शम’ माने मन को रोकना, ‘दम’ माने इन्द्रियों को रोकना और भगवान में लगाना। इन शम दमादि सारे सदगुणों को चित्तरूपी पिशाच ने नष्ट कर दिया है। इस चित्तरूपी पिशाच को शनैः शनैः वश करने का यत्न करना चाहिए। नियम में निष्ठा रखें एवं अपने को व्यस्त रखें। सत्प्रवृत्ति, सत्कर्म में ऐसे लगे रहो कि दुष्प्रवृत्ति और दुष्कर्म के विषय में सोचने का समय ही न मिले, करने की बात तो ही दूर रही।

‘खाली दिमाग शैतान का घर’ होता है अतः अपने को व्यस्त रखें। अपने समय का सदुपयोग करें। सत्पुरुषों के रास्ते चलें, ईश्वर के नाम का आश्रय लें। इसी से अपना मंगल होता है, कल्याण होता है।

यह चित्तरूपी पिशाच जो जन्म-मरण के चक्कर में ले जाता है, विकारों में तपाता है वह शस्त्रों से काटा नहीं जाता, आग से जलाया नहीं जाता और न ही अन्य हथियारों से नष्ट किया जा सकता है। यह तो केवल संतों के संग, सत्शास्त्रों के विचार और भगवन्नाम के जप से ही शांत होता है और बड़े लाभ को प्राप्त कराता है।

बड़े में बड़ा लाभ है-आत्मसुख, हृदय का आनंद, हृदयेश्वर का बोध प्राप्त हो जाय। फिर सुख और दुःख की चोट नहीं लगती। दिव्य ज्ञान की, दिव्य आनंद की दिव्य प्रेरणा मिलती है। अपने आत्मखजाने की प्राप्ति होने से सारे दुःख सदा के लिए मिट जाते हैं। ऐसा पुरुष स्वयं तो परमसुख पाता ही है दूसरों को भी सुख देने में सक्षम हो जाता है।

जरूरत है तो केवल चित्तरूपी वैताल को वश करने की। ईश्वर में मन लगता नहीं है इसलिए इधर-उधर भटकता है। जप-ध्यान, सेवा में नियम से लगता नहीं है, इधर-उधर की बातों में ज्यादा लगता है। अतः यत्नपूर्वक मन को जप ध्यान-सेवा में लगायें। इधर-उधर के फालतू विचार आयें तो मन को कह दें-खबरदार ! मेरा मनुष्य जीवन है और परमात्मा में लगाना है। मन ! तू इधर-उधर की बातें कब तक सुनेगा और सुनायेगा ? एक-दूसरे के झगड़े में, टाँग खींचने में अथवा विकारों में कब तक खपता रहेगा ?”

जो अपना समय एक-दूसरे को लड़ाने में, टाँग खींचने में अथवा विकारों में नष्ट करते हैं, उऩका विनाश हो जाता है। फिर वे ‘कोचमैन’ का घोड़ा बनकर भी कर्म नहीं काट सकते और कुम्हार का गधा बनने पर भी उनके पूरे कर्म नहीं कटते। सुअर, कुत्ता, पेड़-पौधा आदि कई योनियों में भटकते हैं फिर भी कर्मों का अंत नहीं होता।

केवल मनुष्य जन्म में ही जीव सारे कर्मों का अन्त करके अनंत को पा सकता है। मनुष्य जीवन बड़ी कीमती है। इस कीमती समय को जो गप-शप में खर्चता है उसके जैसा अभागा दूसरा कोई नहीं है। इस कीमती समय को जो दूसरों की टाँग खींचने में या निंदा-चुगली में लगाता है, उसके जैसा बेवकूफ दूसरा कौन हो सकता है ? इस कीमती समय को छल-कपट करके अपने हृदय को जो मंद बना देता है उस जैसा आत्महत्यारा कौन ?

रक्षताम् रक्षताम् कोषानामपि हृदयकोषम्।

‘रक्षा करो, रक्षा करो अपने हृदय की रक्षा करो।’ इसमें मलिन विचार न आयें, इसमें छल-कपट न आये। अगर किसी कारणवश आ भी जाये तो तुरंत सचेत होकर उससे अलग हो जायें। तभी हृदय शुद्ध होगा। यदि कोई हृदय में छल कपट, बेईमानी रखता है तो जप-ध्यान पूरा फलता नहीं है।

कोई बोलते हैं किः ‘राम-राम करेंगे तो तर जायेंगे। गीध, गणिका, अजामिल आदि तर गये, बिल्वमंगल तर गये।’ लेकिन कब तरे ? जब वैश्या का रास्ता छोड़ सच्चाई से ईश्वर का रास्ता पकड़ा, ध्यान-भजन में बरकत आयी तब तरे। अजामिल ‘नारायण-नारायण’ करके तर गये। कैसे तरे कि बुराइयाँ छोड़कर अच्छे मार्ग पर कदम रखा, तब तरे। ऐसा हीं कि भलाई का काम भी करते रहे और अंदर से बुराई, छल-कपट भी करते रहे ! बुराई को बुराई जानें और जो सच्चाई है उसको सच्चाई जानें।

अपनी बुद्धि को बलवान बनायें। आत्मविषयिणी बुद्धि करें, फिर मन उसके अनुरूप चले और इन्द्रियाँ भी उसके कहने पर चलें। एक बार परब्रह्मपरमात्मा का साक्षात्कार कर लें फिर विकारों में होते हुए भी निर्विकारी नारायण में रहेंगे। भोग में रहते हुए भी आत्मयोग में रहेंगे। तमाम व्यवहार करने पर भी, जनक की तरह लेना-देना, राज्य करना पड़े फिर भी अंतःकरण में भगवत्-रस, भगवत्-ज्ञान, भगवत्-शांति बनी रहेगी।

एक बार भगवत्तत्व को पाने तक अपने चित्त की रक्षा करो, फिर तो स्वाभाविक ही सुरक्षित रहता है। जैसे एक बार दही से मक्खन निकाल दो फिर छाछ में डालो तब ऊपर ही रहेगा, ऐसे ही एक बार बुद्धि को इन विकारों से, प्रपंचों से ऊपर ऩिकालकर परमात्मसुख का स्वाद दिला दो फिर बुद्धिपूर्वक संसार में रहो तो भी कोई लेप नहीं लगता। तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। (गीता) उसकी प्रज्ञा परब्रह्म में प्रतिष्ठित हो जाती है।

अतः आप भी प्रयत्न करो, पुरुषार्थ करो, शाश्वत फल पाओ। प्रज्ञा को परब्रह्म में प्रतिष्ठित करके मोक्ष सुख को पा लो। स्वर्ग भी जहाँ फीका हो जाय उस आत्म-परमात्म सुख को दाँव पर लगा कर वृद्ध होने वाले, बीमार होने वाले और छूट जाने वाले कल्पित शरीर के पीछे आत्मा का घात कर रहे हैं। चैतन्य-चंदन को भूले जा रहे हैं, खोय जा रहे हैं। काश ! अभी भी रुक जायें। आखिर कब तक इस नश्वर की ममता करेंगे ! शाश्वत का संगीत, शाश्वत आनंद और शाश्वत सुख को पाने के  प्रयास में लगें। ॐ शांति…. ॐ आंतरिक सुख… ॐ अंतरात्मा का माधुर्य-ज्ञान…

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 105

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भोजन पात्र


भोजन शुद्ध, पौष्टिक, हितकर व सात्त्विक बनाने के लिए हम आहार व्यंजनों पर जितना ध्यान देते हैं उतना ही ध्यान हमें भोजन के बर्तनों पर भी देना आवश्यक है। भोजन बनाते समय हम हितकर आहार द्रव्य उचित मात्रा में लेकर, यथायोग्य पदार्थों को एक साथ मिलाकर उन पर जब अग्निसंस्कार करते हैं तब वे जिस बर्तन में पकाये जा रहे हैं उस बर्तन के गुण अथवा दोष भी उस आहार द्रव्य में समाविष्ट हो जाते हैं। अतः भोजन किस प्रकार के बर्तनों में बनाना चाहिए अथवा किस प्रकार के बर्तनों में भोजन करना चाहिए इस पर भी शास्त्रों ने आदेश दिये हैं।

भोजन के समय खाने व पीने के पात्र अलग अलग होने चाहिए। वे स्वच्छ, पवित्र व अखण्ड होने चाहिए। सोना, चाँदी, काँसा, पीतल, लोहा, काँच, पत्थर अथवा मिट्टी के बर्तनों में भोजन बनाने की पद्धति प्रचलित है। इसमें सुवर्णपात्र सर्वोत्तम तथा  मिट्टी के पात्र हीनतम माने गये हैं। सोने के बाद चाँदी, काँसा, पीतल, लोहा और काँच के बर्तन क्रमशः हीन गुणवाले होते हैं।

काँसे के पात्र बुद्धिवर्धक स्वाद अर्थात् रूचि उत्पन्न करने वाले तथा रक्तपित्त का प्रसादन करने वाले होते हैं। अतः काँसे के पात्र में भोजन करना चाहिए। इससे बुद्धि का विकास होता है। जो व्यक्ति रक्तपित्तजन्य विकारों से ग्रस्त हैं अथवा उष्ण प्रकृतिवाले हैं उनके लिए भी काँसे के पात्र हितकर हैं। अम्लपित्त, रक्तपित्त, त्वचाविकार, यकृत तथा हृदयविकार से पीड़ित व्यक्तियों के लिए भी काँसे के पात्र स्वास्थ्यप्रद हैं। इससे पित्त का शमन व रक्त की शुद्धि होती है।

लोहे की कढ़ाई में सब्जी बनाना तथा लोहे के तवे पर रोटी सेंकना हितकारी है परन्तु लोहे के बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए इससे बुद्धि का नाश होता है। स्टील के बर्तन में बुद्धिनाश का दोष नहीं माना जाता। सुवर्ण, काँसा, कलई किया हुआ पीतल का बर्तन हितकारी है। पेय पदार्थ चाँदी के बर्तन में लेना हितकारी है लेकिन लस्सी आदि खट्टे पदार्थ न लें। एल्यूमिनियम के बर्तनों का उपयोग कदापि न करें।

केला, पलाश अथवा बड़ के पत्र रूचि उत्पन्न करने वाले तथा विषदोष का नाश करने वाले तथा अग्नि को प्रदीप्त करने वाले होते हैं। अतः इनका उपयोग भी हितावह है।

पानी पीने के पात्र के विषय में भावप्रकाश ग्रंथ में लिखा है-

जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।

पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।

काचेन रचितं तद्वत् तथा वैडूर्यसम्भवम्।

(भावप्रकाश, पूर्वखण्ड, 4)

अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैडूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करेंष ताँबा तथा मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजली से पानी नहीं पीना चाहिए।

(साँईं श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द्र, सूरत)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 27, अंक 105

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अहंता और ममता


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

भोग और विकारों को मिथ्या जानकर जिसने अपना मन भगवान में लगा दिया, जिसने अपना मन जगत से मोड़कर जगदीश्वर में लगा दिया, उसे जगत की कोई परिस्थिति दुःख नहीं दे सकती।

‘यह मेरा बेटा है, यह मेरा पिता है, यह मेरी माता है, यह मेरी पत्नी है…..’ इसकी अपेक्षा उनके हित की भावना रखना अच्छा है। लेकिन ममतावाली भावना दुःख देती है।

तुलसी ममता राम से समता सब संसार।

राग न द्वेष न दोष दुःख, दास गये भवतार।।

ममता रखें तो ईश्वर से रखें। किसी से राग न करें, द्वेष न करें और दोष-दर्शन की बुद्धि न रखें। इससे चित्त निर्मल होता है और निर्मल चित्त में ही ईश्वरप्राप्ति की जिज्ञासा उठती है।

ऐसा नहीं है कि परमात्मा का साक्षात्कार हो जायेगा तो सब लोग, सब वस्तुएँ एवं सब परिस्थितियाँ सदा, सर्वत्र अनुकूल हो जायेंगी। परिस्थितियाँ तो जैसे संसार में निर्मित हैं प्रारब्धवेग से बदलती रहेंगी, लोगों के मनोभावों में भी अदल-बदल होती रहेगी लेकिन उऩमें आसक्ति और ममता न होने के कारण चोट नहीं लगेगी।

अज्ञान है तो आसक्ति है और आसक्ति है तो चोट लगती है। अज्ञान नहीं है तो आसक्ति भी नहीं रहती और चोट भी नहीं लगती। एक चोट होती है किः ‘अररर…. मेरा क्या होगा ? मेरा फलाना चला गया, मेरा क्या होगा ?…..’ यह है वासना वाली चोट। ‘बेटा चला गया, बेचारे का क्या होगा ? यह है ममता की चोट। वह चला गया कहीं खड़िया न हो जाये, कहीं उसका पतन न हो जाये ?…. यह है करूणा की चोट।

माता पिता एवं गुरुजनों को ममता नहीं रखनी चाहिए, आसक्ति नहीं रखनी चाहिए। संसारी लोग आसक्ति रखते हैं। माता-पिता को अगर आसक्ति नहीं है तो ममता में आ जाते हैं। ममता नहीं है, करुणा करें। करुणा का भाव ठीक है लेकिन आसक्ति दुःखदायी है, ममता दुःखदायी है।

आसक्ति होती है शरीर को ‘मैं’ मानकर और ममता होती है शरीर से संबंधित वस्तुओं को ‘मेरा’ मानकर। ‘अहं’ और ‘मम’ मिट जाये, आसक्ति और ममता से रहित हो जाये तो फिर कोई चोट नहीं लगती।

जगत की आसक्ति या देह की आसक्ति शरीर को भोगों में एवं आलस्य में गिरा देती है। आसक्ति शरीर को आलसी बना देती है, इन्द्रियों को विलासी बना देती है और मन को असंयमी बना देती है।

आलस्य नहीं, विलासिता नहीं, असंयम नहीं पुरुषार्थ हो। पुरुषार्थ अर्थात् पुरुष के अर्थ, परमात्मा के अर्थ प्रयत्न करना चाहिए। प्रयत्न भी कैसा ? बाह्य प्रयत्न से शातं होकर भीतर कोई प्रयत्न न हो। जैसे यहाँ तक (आश्रम तक) नहीं पहुँचे थे तो औरों को जरूरत थी। यहाँ तक पहुँच गये तो फिर यहाँ बैठना ही है, बस। ऐसे ही प्रयत्न करके बाहर के आकर्षणों से अपने को हटायें और फिर शांत होकर बैठ जायें, इसका नाम है ध्यान।

इससे इन्द्रियों का संयम, मन की प्रसन्नता एवं बुद्धि की योग्यता अपने आप निखरती है। महामूर्ख में से महाकवि कालिदास इसी रीति से बने थे। विलासी विश्वामित्र मे से ऋषि विश्वामित्र इसी रीति से बने थे। कहाँ तो भूतपूर्व विलासी राजा और कहाँ श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाई उनकी चरण सेवा करते हैं।

पानी नीचे की ओर बहता है लेकिन पुरुषार्थ करके उसे ऊपर चढ़ाया जा सकता है। पंप लगाओ तो पानी ऊपर चढ़ जायेगा। पानी का स्वभाव ही है नीचे बहना। ऐसे ही इन्द्रियों का स्वभाव है भोगों में बहना, मन का स्वभाव है उनके पीछे जाना लेकिन पुरुषार्थ करें तो इन्द्रियाँ संयत रहेंगी और मन  उन्नत हो जायेगा। शरीर की आसक्ति शरीर को आलसी बना देगी, विलासी बना देगी और मन को असंयमी बना देगी। अगर प्रभु में, आत्मसुख को पाने में आसक्ति हुई तो मन संयमी बनेगा, इन्द्रियाँ संयत रहेंगी और शरीर प्रयत्नशील रहेगा, पुरुषार्थी रहेगा। तुलसीदासजी ने कहा हैः

जो न तरै भवसागर, नर समाज अस पाइ।

सो कृत निंदक मंदमति, आत्माहन अधो गति जाइ।

जिसने मनुष्य जीवन पाकर भी भवसागर से, विकारों के आकर्षण से खुद को नहीं बचाया, जो आत्मा-परमात्मा के ज्ञान में नहीं आया, वह मंदमति है, आत्म-हत्यारा है, अधोगति को जायेगा।

वशिष्ठजी महाराज कहते हैं- ‘हे रामजी ! मनुष्य जीवन पाकर अगर उसने पुरुषार्थ नहीं किया, अपने आत्मसुख में, परमात्म भाव में आने का यत्न नहीं किया तो वह ऐसी जगह जाकर गिरेगा जहाँ से उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा।’

कबीर जी ने कल्पना करके सुनाया हैः

साँझ पड़ी दिन आथमा, दीन्हा चकवी रोय।

चलो चकवा वहँ जाइये, जहँ दिवस रैन न होय।।

चकवा कहता हैः

रैन की बिछुड़ी चाकवी, आन मिले परभात।

सत्य का बिछुड़ा मानखा, दिवस मिले नहीं रात।

‘रात्रि की बिछुड़ी चकवी तो फिर से प्रभात को आ मिलेगी लेकिन सत्य से बिछुड़ा मनुष्य न दिन को मिल पायेगा न रात्रि को।’

मनुष्य जन्म मिला है परमात्म-ज्ञान पाने के लिए, परमात्म-सुख पाने के लिए। जो सत्य-स्वरूप परमात्मा है उसका ज्ञान पाकर तुम ऐसे शिखर पर बैठ जाओगे जहाँ संसार के सुख-दुःख तुमको विचलित न सकेंगे। यह अवस्था आती है ‘अहं’ और ‘मम’ के नष्ट होने से।

अहंता और ममता का नाश होते ही चित्त में विश्रांति आने लगती है, परमात्म-प्रसाद की, परमात्म-ज्ञान की प्राप्ति स्वयं होने लगती है।

स्थूल ‘शरीर’ की आसक्ति मनुष्य को आलसी बना देती है, उसकी इन्द्रियों को विलासी बना देती है, मन को असंयमी बना देती है और बुद्धि को अविवेकी बना देती है। ईश्वर की आसक्ति शरीर, इन्द्रियों को शुद्ध पुरुषार्थी, मन को संयमी-सदाचारी बनाकर बुद्धि को शुद्ध ज्ञान के प्रकाश से परिपूर्ण कर देती है।

यदि शरीर के बजाय आत्मा में प्रीति कर दें किः ‘मैं हाड़-मांस का शरीर नहीं हूँ…. मैं तो ज्ञान स्वरूप परमात्मा का सनातन सपूत हूँ। सब बदलता है फिर भी मैं नहीं बदलता हूँ….’ इस प्रकार का आत्मचिंतन एवं आत्मा में आसक्ति करने से शरीर का आलस्य दूर हो जाता है, इऩ्द्रियाँ विलासिता से परे हो जाती हैं, मन का असंयम दूर होने लगता है और बुद्धि का अविवेक हटकर बुद्धि में समत्व का साम्राज्य प्रकट होता है।

स्वामी  निश्चलदासजी के पास एक व्यक्ति ने आकर कहाः “मुझे सत्य का मार्ग बताइये।”

स्वामी निश्चलदासजी उस वक्त प्याज के छोटे छोटे पौधे उखाड़ कर दूसरी जगह पर लगा रहे थे। बोलेः “सत्य का मार्ग देखो। इधर से उखाड़कर उधर लगा दो।”

व्यक्ति कुछ समझ न पाया। तब स्पष्ट करते हुए निश्चलदास जी महाराज बोलेः ”इत्थऊ उखाड़ के उत्थे लगा दे। जो देह और उसके संबंधियों में प्रीति है उस प्रीति को उखाड़कर आत्मा में लगा दे, बस। सुख का मार्ग, सत्य का मार्ग कोई कठिन थोड़े ही है।”

सत्य का मार्ग, परमात्मा का मार्ग बुद्ध पुरुष के लिए, ब्रह्मज्ञानियों के लिए कठिन नहीं है। और बुद्धुओं के लिए सरल नहीं है। आप अगर बुद्ध पुरुष का संग करते हो तो ईश्वरीय सुख सरल हो जाता है और बुद्धुओं का संग करते हो तो बड़ा कठिन है, भाई !

‘मेरा तो यह निश्चय है….’ तुम कौन हो ? यह तुम्हें पता है क्या ? तुम अपने को तो जानते नहीं और तुम्हारा निश्चय लेकर भाग रहे हो ?

हजारों-हजारों जन्मों तक भागे और भी भागो तो तुम्हारी मर्जी है। रुकना चाहो तो हम मदद करते हैं भागना चाहते हो तुम्हारी मर्जी…. ज्ञान के शिखर पर चढ़ना चाहते हो तो हम मदद करते हैं, गिरना चाहते हो तो तुम्हारी मर्जी…। हम गिरने में मदद नहीं करेंगे इसीलिए ऐसा कह रहे हैं। बाकी तुम्हारी मर्जी…..

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 10,11 अंक 105

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