Yearly Archives: 2001

निरन्तर यत्न करें…..


संत श्री आशाराम जी के सत्संग प्रवचन से

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।

एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।

‘मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरन्तर परमात्मा में लगावे।’ (गीताः 6.10)

जिसको परमसत्य का अनुभव करना हो, वह भोगबुद्धि से संग्रह न करे। हाँ, औरों के उपयोग में आ जाय, सत्कर्म में लग जाय, इस भावना से आता है और जाता है तो ठीक है। लेकिन ‘मैं इन चीजों से मजा लूँगा, बुढ़ापे में मेरे काम आयेंगी’ ऐसी भोगबुद्धि से संग्रह न करे। संसार की भोगवासनाओं से अपने ओर ऊपर उठाता जाय। भोगबुद्धि से संग्रह न करने वाला, आशारहित तथा मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला अकेला एकान्त में स्थित होकर मन को निरन्तर परमात्मा में लगाये तो वह परमात्मा को पा लेगा।

हम मन को परमात्मा में निरन्तर नहीं लगाते थोड़ी देर के लिए लगाते हैं इसीलिए मार्ग बहुत लम्बा लगता है।

कोई कहता है किः ‘मैं 19 साल से साधना करता हूँ।’ लेकिन तुम 19 साल से ईर्ष्या कितनी कर रहे हो ? द्वेष कितना कर रहे हो ? कपट कितना कर रहे हो ? धोखा धड़ी कितनी कर रहे हो ? उसको एक पलड़े में रखो और ईमानदारी से भक्ति कितनी कर रहे हो उसको दूसरे पलड़े में रखो। फिर भी अभी तुम्हारी जो ऊँची स्थिति है, वह तुम्हारे अहंकार के कारण नहीं है, देने वाले दाता की रहमत के कारण है।

जब अध्यात्म-प्रसाद अधिकारी को मिलता है तो बड़ी शोभा पाता है। अनाधिकारी को मिलता है तो बिखर जाता है फिर भी मिटता नहीं है। जैसे तुम तपेली में देशी घी लेने जाओ और तपेली में घी लेकर फिर दुकानदार को बोलो किः

‘नहीं चाहिए और दुकानदार तपेली में से घी खाली कर ले फिर भी तपेली में चिकनाहट तो रह ही जाती है। ऐसे ही गुरु ने कृपा कर दी और मूर्ख शिष्य ने जहाँ-तहाँ अहंकार करके, इधर-उधर भटककर फेंक दी। फिर भी जो थोड़ी-बहुत योग्यता है वह उस तपेली की चिकनाहट की नाईं ब्रह्मवेत्ता का ही प्रसाद है।

ब्रह्मवेत्ता के प्रसाद को पूर्ण रूप से पचाने के लिए, परमात्म-ज्ञान को पाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। थोड़ा-थोड़ा यत्न नहीं, निरन्तर यत्न हो, निरन्तर प्रयास हो। उस परमात्मा को  पाने के लिए एकांत में रहिये, परमात्मा का ध्यान धरिये, सत्संग करिये, मन एवं इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखिये, आशारहित होइये एवं भोगबुद्धि से संग्रह न करिये तो परमात्म-प्राप्ति सहज जाती है। आत्मसुख सहज हो जाता है।

आत्मिक सुख के बिना, उस परमेश्वरीय प्रसाद के बिना कोई कितना भी खड़ेश्वरी, तपेश्वरी बन जाये, कितना भी फलाहारी, व्रतधारी हो जाये, लेकिन सच्ची साधना के बिना सच्चा सुख, सच्ची शांति, सच्चा माधुर्य और सच्चा ज्ञान प्रगट नहीं होता है। सच्ची साधना क्या है ? वही, जो श्री कृष्ण बतला रहे हैं-

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।

एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।

सच्ची साधना के स्वरूप का ज्ञान होता है। ‘ईश्वर था, ईश्वर है, ईश्वर रहेगा’ यहाँ तक तो बहुत लोग जा सकते हैं। ‘ईश्वर मुझसे अलग नहीं है और मैं ईश्वर से अलग नहीं हूँ’ ऐसा सुनकर भी कोई कह सकता है। किन्तु जिसने सच्ची साधना की है उसको अनुभव होता है किः ‘परमात्मा और मैं दो नहीं है। जहाँ से ”मैं’ उठता है, वही आत्मा परमात्मा है।

दिव्यता की कमी के कारण ईश्वर दूर दिखता है, पराया दिखता है, परलोक में दिखता है। दिव्य साधना करने से दिव्य ज्ञान होता है और वह ईश्वर अपना-आपा, अपना आत्मा, अपना सोsहंस्वरूप दिखता है, अनुभव होता है। इसी अनुभव को पाने का यत्न निरन्तर करना चाहिए-

योगी युञ्जीत सततम्………

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 105

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महापुरुषों की युक्ति


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

संसारियों को कई गुत्थियों का हल नहीं मिल पाता। यदि मिल भी जाता है तो एक को राजी करने में दूसरे को नाराज करना पड़ता है एवं नाराज हुए व्यक्ति के कोप का भाजन बनना पड़ता है। जबकि ज्ञानियों के लिए उन गुत्थियों को हल करना आसान होता है। ज्ञानी महापुरुष ऐसी दक्षता से गुत्थी सुलझा देते हैं कि किसी भी पक्ष को खराब न लगे। इसीलिए देवर्षि नारद की बातें देव-दानव दोनों मानते थे।

ऐसी ही एक घटना मेरे गुरुदेव के साथ परदेश में घटी थीः एयरपोर्ट पर गुरुदेव को लेने के लिए  बड़ी-बड़ी हस्तियाँ आयी थीं। कई लोग अपनी बड़ी लग्जरी गाड़ी में गुरुदेव को बैठाने के लिए उत्सुक थे। एक-दो आगेवानों के कहने से और सब तो मान गये लेकिन दो भक्त हठ पर उतर गये – “गुरुदेव बैठेंगे तो मेरी ही गाड़ी में।” मामला जटिल हो गया। दोनों में से एक भी टस से मस होने को तैयार न था। इन दोनों भक्तों की जिद्द अऩ्य भक्तों के लिए सिरदर्द का कारण बन गयी।

एक ने कहाः  “यदि पूज्य गुरुदेव मेरी गाड़ी  में नहीं बैठेंगे तो मैं गाड़ी के नीचे सो जाऊँगा।”

दूसरे ने कहाः “पूज्य गुरुदेव मेरी गाड़ी में नहीं बैठेंगे तो  मैं जीवित नहीं रहूँगा।”

ऐसी परिस्थिति में ‘क्या करें, क्या न करें ?’ यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। दोनों बड़ी हस्तियाँ थी, अहं की साइज भी बड़ी थी। दोनों में से किसी को भी बुरा न लगे – ऐसा सभी भक्त चाहते थे। इस बहाने भी ब्रह्मज्ञानी महापुरुष का सान्निध्य मिले तो अच्छा है – ऐसी उदात्त भावना से उऩ्होंने हल ढूँढने का प्रयास किया किन्तु असफलता  मिली।

इतने में तो मेरे गुरुदेव का प्लेन एयरपोर्ट पर आ गया। पूज्य गुरुदेव बाहर आये, तब समिति वालों ने पूज्य गुरुदेव का भव्य स्वागत करके खूब  नम्रता से परिस्थिति से अवगत कराया एवं पूछाः “बापू जी ! अब क्या करें।”

ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कभी-कभी ही परदेश पधारते हैं। अतः स्वाभाविक है कि प्रत्येक व्यक्ति निकट का सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयत्न करे। प्रेम से प्रयत्न करना अलग बात है एवं नासमझ की तरह जिद्द करना अलग बात है। संत तो प्रेम से वश हो जाते हैं जबकि जिद्द के साथ नासमझी उपरामता ले आती है। लोगों ने कहाः

“दोनों के पास एक-दूसरे से टक्कर ले – ऐसी गाड़ियाँ हैं एवं निवास हैं। बहुत समझाया पर मानते नहीं हैं। हमारी गाड़ी में बैठकर हमारे घर आयें – ऐसी जिद्द लेकर बैठे हैं। अब आप ही इसका हल बताने की कृपा करें। हम तो परेशान हो गये हैं।”

पूज्य गुरुदेव बड़ी सरलता एवं सहजता से बोलेः “भाई ! इसमें परेशान होने जैसी बात ही कहाँ है ? सीधी बात है और सरल हल है। जिसकी गाड़ी में बैठूँगा उसके घर नहीं जाऊँगा और जिसके घर जाऊँगा उसकी गाड़ी में नहीं बैठूँगा। अब निश्चय कर लो।”

इस जटिल गुत्थी का हल गुरुदेव ने चुटकी बजाते ही कर दिया कि ‘एक की गाड़ी दूसरे का घर।’

दोनों पूज्य गुरुदेव के आगे हाथ जोड़कर खड़े रह गयेः “गुरुदेव ! आप जिस गाड़ी में बैठना चाहते हैं उसी में बैठें। आपकी मर्जी के अनुसार ही होने दें।”

थोड़ी देर पहले को हठ पर उतरे थे परन्तु संत के व्यवहार कुशलतापूर्ण हल से दोनों ने जिद्द छोड़कर निर्णय भी संत की मर्जी पर ही छोड़ दिया !

प्राणीमात्र के परम हितैषी संतजनों द्वारा सदैव सर्व का हित ही होता है। ब्रह्मज्ञानी ते कछु बुरा न भया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 19, 20 अंक 105

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जिज्ञासा तीव्र होनी चाहिए


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग प्रवचन से

जिसको कुछ जानना है, वह भी दुःखी है, जिसको कुछ पाना है वह भी दुःखी है, जिसको कुछ छोड़ना है वह भी दुःखी है। कुछ पाना है और वह दूर है तो वहाँ जाना पड़ता है अथवा उसे बुलाना पड़ता है। कुछ छोड़ना है तब भी प्रयत्न करना पड़ता है और जानने के लिए भी प्रयत्न करना पड़ता है। लेकिन अपने आपको पहचानना है तो न पकड़ना पड़ता है, न छोड़ना पड़ता है, न दूर जाना पड़ता है। केवल अपने-आपको खोजने का ज्ञान सुनना है।

जो अपना-आपा है उसको पाना क्या औऱ अपने-आपको छोड़ना क्या ? अपने-आपसे दूरी भी क्या ? इतना आसान है परमतत्त्व परमात्मा का ज्ञान। लेकिन उसके लिए आवश्यक है तीव्र जिज्ञासा और अंतःकरण की शुद्धि, शिष्य का समर्पण और गुरु का सामर्थ्य…. ये चीजें होती हैं तब काम बनता है। गुरु समर्थ हों और शिष्य समर्थ हो। “बापू जी ! शिष्य समर्थ कैसे ?”

शिष्य छल-कपट, बेईमानी छोड़ने में समर्थ हो, अपनी मनमानी छोड़ने में समर्थ हो। शिष्य का सामर्थ्य है कि अपनी मनमानी छोड़ने में समर्थ हो और गुरु का सामर्थ्य है कि अनुभूति के वचन हों। शिष्य का सामर्थ्य चाहिए गुरु ज्ञान को पचाने का और गुरु का सामर्थ्य चाहिए शिष्य को देने का। शिष्य का सामर्थ्य चाहिए कि मनमुखता छोड़ सके। गुरु का सामर्थ्य चाहिए कि अनुभव को स्पर्श करके मार्गदर्शन दे सके। गुरु की कृपा और शिष्य का पुरुषार्थ…

पुरुषार्थ भी कैसा ? ईश्वरप्राप्ति के लिए ही पुरुषार्थ, उसी दिशा का पुरुषार्थ। उससे विपरीत दिशा का पुरुषार्थ घाटा कर देता है। चाहिए तो परमात्मा लेकिन खोज रहे हैं इधर-उधर छोटे संग में !

वशिष्ठजी कहते हैं- ‘हे राम जी ! मरूभूमि का मृग होना अच्छा है लेकिन मूढ़ों का संग अच्छा नहीं।’ एकांत में आश्रम भी बनायेंगे तो संग ज्ञानी का मिलेगा कि मूढ़ों का मिलेगा ? अतः संग ऊँचा हो जिससे जिज्ञासा उभरे। जिज्ञासा बढ़े।

तीन प्रकार के लोग होते हैं- पहले तालाब में पत्थर जैसे, जब तक पत्थर तालाब में पड़ा रहता है भीगा रहता है, बाहर निकालो तो वो कुछ ही देर में सूख जाता है। ऐसे ही कई लोग होते हैं जो सत्संग में जाते हैं तब तक भीगे रहते हैं बाहर निकले तो भी कुछ देर सत्संग का प्रभाव रहता है। बाद में देखो तो वैसे-के-वैसे। ब्रह्मवेत्ता के ऐसे तो करोड़ों भक्त होते हैं।

दूसरे प्रकार के लोग होते हैं कपड़े जैसे, कपड़े को सरोवर में डाला, भीगा, ठंडा भी हुआ। बाहर निकाला तो पत्थर जितनी जल्दी सूखता है उतनी जल्दी नहीं सूखता, समय पाकर सूखता है। ऐसे ही कुछ होते हैं अंतेवासी, जो सब छोड़कर समर्पित होते हैं। गुरु के कार्य में भी लगते हैं लेकिन समय पाकर वे भी मनमुख हो जाते हैं।

तीसरे होते हैं शक्कर के ढेले की तरह, सरोवर में डालो तो घुलमिल जाते हैं। उनका अपना  अस्तित्त्व ही नहीं रहता, स्वयं सरोवर हो जाते हैं।

ऐसा शिष्य तो लाखों-करोड़ों में कोई विरला ही होता है। कभी कोई मिल गया ब्रह्मवेत्ता के जीवन में तो बहुत हो गया…. बाकी सब तैयार हो रहे हैं, किसी-न-किसी जन्म में जागेंगे। ब्रह्मवेत्ता का अनुभव बहुत ऊँची स्थिति है। भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश की बराबरी का अनुभव कोई मजाक की बात है क्या ? ईश्वर प्राप्ति की तीव्र जिज्ञासा हो और मनमुखता छोड़ें, तब पूर्णता का सर्वोपरि ऊँचा आत्म-साक्षात्कार का अनुभव होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2001, पृष्ठ संख्या 9, अंक 105

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