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सत्संग यही सिखाता है – पूज्य बापू जी


‘लोग बोलते हैं कि इच्छा छूटती नहीं, इच्छा छोड़ना कठिन है’ लेकिन संत बोलते हैं कि ‘इच्छा पूरी करना असंभव है।’ इच्छा पूरी नहीं होती, इच्छा गहरी होती जाती है। जो कठिन काम है वो तो हो सकता है लेकिन जो काम असम्भव है तब नहीं हो सकता है। हमें इच्छाएँ खींचती हैं इसलिए हम सत् वस्तु (परमात्मा) से दूर हो जाते हैं। किस विषय की इच्छाएँ खींचती हैं ? या तो देखने की या तो सुनने की या सूँघने की या चखने की या स्पर्श करने की। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध…. इन पाँच प्रकार के विषयों की इच्छाएँ हमें घसीटती हैं। अब आज हमारी जो स्थिति है, जो अवस्था है, इसके जवादार हम हैं। हमारी इच्छाएँ घूम-फिरकर देर-सवेर अवस्था का रूप धारण कर लेती हैं। इच्छाएँ आकर अवस्था दे जाती हैं, मिटती नहीं और दूसरी बन जाती है।

विषम इच्छाएँ होती हैं इसीलिए हम दुःखी होते हैं। सजातीय इच्छा हुई और वह पूरी हुई तो गहरी चली जायेगी। इच्छा थोड़ी देर के लिए पूरी हुई, थोड़ी देर का हर्ष हुआ परंतु जिस वस्तु से सुख मिला उस वस्तु ने हमारे अंदर राग की एक गहरी लकीर खींच दी और जिस वस्तु से दुःख मिला उस वस्तु ने हमारे अंदर भय की लकीर खींच दी। इच्छाएँ पूरी नहीं हुई बल्कि उन्होंने हमारे चित्त को टुकड़े-टुकड़े कर दिया। अब क्या करना चाहिए ?

एक तो होती है सत् वस्तु और दूसरी होती है असत् वस्तु। तो मन के फुरने, कल्पनाएँ जो हैं कि ‘यह करूँ तो सुखी होऊँगा, यह करूँ तो सुखी होऊँगा…’ इन कल्पनाओं के द्वारा असत् वस्तु को पाने की इच्छा हमारे जीवन को टुकड़े-टुकड़े कर देती है और सत्संग के द्वारा सत्त्वगुण बढ़ायें तो हम सत् वस्तु अपने सत्स्वरूप को पा लेते हैं।

दो चीजें होती हैं। एक होती है – नित्य और दूसरी होती है – अनित्य। बुद्धिमान आदमी अपने लिए अनित्य वस्तु पसंद करने के बजाय नित्य वस्तु पसंद करेगा, असत् वस्तु पसंद करने के बजाय सत् वस्तु पसंद करेगा। जो नित्य है, आप उसको पसंद करना और जो अनित्य है, उसका उपयोग करना।

देह अनित्य है – पहले नहीं थी, बाद में नहीं रहेगी और अब भी बदल रही है। जो वस्तु अभी मिली है, वह पहले हमारे पास नहीं  थी और मिली है तो उसको छोड़ना पड़ेगा। ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मिली हुई और आप सदा रख सकें। या तो मिली हुई वह वस्तु आपको छोड़नी पड़ेगी या वस्तु आपको छोड़कर चली जायेगी। फिर चाहे वह नौकरी हो, चाहे मकान हो, चाहे परिवार हो, चाहे पति हो, चाहे पत्नी हो, चाहे गाड़ी हो, चाहे देह हो। देह आपको मिली है तो उसे छोड़ना पड़ेगा। बचपन आपको मिला था तो छूट गया। जवानी मिली थी, छूट गयी। बुढ़ापा मिला है, छूट जायेगा। मौत मिलेगी, वह भी छूट जायेगी किंतु आप नहीं छूटोगे क्योंकि आप अछूट आत्मा हो, स्वतः सिद्ध हो, सच्चिदानंदघन हो। जो मिली हुई चीज है उसको आप रख नहीं सकते और अपने-आपको छोड़ नहीं सकते। कितना सरल सत्य है, कितना सनातन सत्य है, कितना स्वाभाविक है !

लोग बोलते हैं, संसार को छोड़ना कठिन है लेकिन संतों का यह अनुभव है, सत्संग से हमने यह जाना है कि संसार को छोड़न कठिन नहीं, संसार को रखना असम्भव है। कठिन नहीं, असम्भव ! परमात्मा को छोड़ना असम्भव है। ईश्वर को आप छोड़ नहीं सकते और जगत को आप रख नहीं सकते। देखो, कितना सरल सौदा है !

बचपन छोड़ने की आपने मेहनत की क्या ? अपने आप छूट गया। बचपन छोडूँ, बचपन छोडूँ…. कोई रट लगायी थी ? जवानी छोड़ूँ, जवानी छोड़ूँ… कोई चिन्ता की थी ? छूट गयी। आप रखना चाहें तो भी छूट जायेगी। ऐसे ही अपमान छोड़ूँ, निंदा छोड़ूँ या स्तुति छोड़ूँ… नहीं ये अपने आप छूटते जा रहे हैं। एक साल पहले जो आपकी निंदा या स्तुति का प्रसंग था, वह अभी पुराना हो गया, तुच्छ हो गया। जो निंदा हुई वह पहले दिन बड़ी भयानक लगी, जो स्तुति हुई वह पहले दिन बड़ी मीठी लगी लेकिन अब देखो, सब पुराना हो गया। संसार की ऐसी कोई परिस्थिति नहीं है, कोई स्थिति नहीं है कि जिसको आप रख सकें। आपको छोड़ना नहीं पड़ता है महाराज ! छूटता चला जा रहा है।

संसार को थामना असम्भव है और अपने को हटाना असम्भव है। जिसको आप हटा नहीं सकते वह है सत् वस्तु और जिसको आप रख नहीं सकते वह है असत् वस्तु। सत्संग सत् वस्तु का बोध कराने के लिए होता है और जब तक सत् वस्तु का बोध नहीं हुआ तब तक आदमी कहीं टिक नहीं सकता क्योंकि असत् शाश्वत नहीं है। तो असत् का उपयोग करो और सत् का साक्षात्कार करो। बस, सत्संग यही सिखाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 210

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सबसे बड़ा सहयोगी


(पूज्य बापू जी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)

जैसे जुआरी होना है तो दूसरा जुआरी आपको सहयोग करेगा, भँगेड़ी होना है तो दूसरा भँगेड़ी आपको सहयोग करेगा, ऐसे ही मुक्तात्मा बनना है तो भगवान ही आपका साथ देते हैं। कितना बड़ा सहयोग है भगवान का ! भगवान मुक्तात्मा हैं. आपका मुक्तात्मा बनने का इरादा हो गया तो वे खुश हो जाते हैं कि हमारी जमात में आ रहा है। जैसे कोई अच्छा आदमी किसी पार्टी में आता है तो पार्टी वाले खुश होते हैं। पार्टीवाले तो चमचे को अच्छा बोलेंगे और सच बोलने वाले को बुरा बोलेंगे परंतु भगवान की नजर में कोई बुरा नहीं है। भगवान तो सच बोलने वाले को ही अच्छा मानते हैं, चमचागिरी से भगवान राजी नहीं होते हैं।

मूर्ख लोग बोलते हैं- ‘अरे भाई ! प्रशंसा से, फूल चढ़ाने से, भोग लगाने से तो भगवान भी राजी हो जाते हैं और हमको दुःखों से बचाते हैं।’

अरे मूर्ख ! भगवान की प्रशंसा से भगवान राजी हो जाते हैं – यह तू कहाँ से सुनकर आया, कहाँ से देखकर आया ? यह वहम घुस गया है। तुम भगवान के कितने गुण गाओगे ? अरब-खरबपति को बोलो कि ‘सेठजी ! आप तो हजारपति हो, आप तो लखपति हो….. आपके पास तो बहुत पैसा है, 12,14,15 लाख हैं….।’

खरबपति को बोलो कि आपके पास 15 लाख हैं तो उसको तो गाली दी तुमने ! ऐसे ही अनंत-अनंत ब्रह्माण्ड जिसके एक-एक रोम में हैं, ऐसे भगवान की व्याख्या हम क्या करेंगे और उनकी प्रशंसा क्या करेंगे ! हम भगवान की प्रशंसा करके उनका अपमान ही तो कर रहे हैं ! फिर भी भगवान समझते हैं कि ‘बच्चे हैं, इस बहाने बेचारे अपनी वाणी पवित्र कर रहे हैं।’

भगवान प्रशंसा से प्रसन्न होते हैं – यह वहम निकाल देना चाहिए। भगवान की प्रशंसा नहीं, गुणगान करने से हमारी दोषमयी मति थोड़ी निर्दोष हो जाती है। बाकी तो भगवान का कुछ भी गुणगान करोगे तो एक प्रकार का बचकानापन ही है क्योंकि भगवान असीम हैं। आपकी बुद्धि सीमित है और आपकी कल्पना भी सीमित है तो आप भगवान की क्या महिमा गाओगे ! फिर भी भगवान कहते हैं- ‘मेरे में चित्त वाला होकर तू मेरी कृपा से सम्पूर्ण विघ्नों से तर जायेगा। यदि तू अहंकार के कारण मेरी बा नहीं मानेगा तो तेरा पतन हो जायगा।’

फिर न जाने कीट, पतंग आदि किन-किन योनियों में भटकना पड़ेगा।

जैसे किसी मनुष्य को मस्का मारकर उससे काम लिया जाता है, ऐसे ही भगवान को मस्का मारकर आप अपना कुछ भला नहीं कर सकते। भगवान को प्रीतिपूर्वक भजते हैं, कुछ देते हैं तो उन चीजों की आसक्ति छूटती है और भगवान के लिए आदर होने से आपका हृदय पवित्र होता है। बाकी भगवान खुशामद से राजी हो जायें, ऐसे वे भोले नहीं हैं। जैसे किसी नेता को, किसी और व्यक्ति को कोई चीज देकर, खुशामद करके आप राजी पा लेते हैं, वैसे भगवान खुशामद से राजी नहीं होते हैं। भजतां प्रीतिपूर्वकम्….. भगवान प्रेम से राजी होते हैं। भगवान को स्नेह करो। कुछ भी न करो, एक नये पैसे की चीज भगवान को अर्पण नहीं करो तो भी चल जायेगा लेकिन प्रीतिपूर्वक भगवान को अपना मानो और अपने को भगवान का मानो।

भगवान ऐसा सहयोग करते है, ऐसी मदद करते हैं जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। हम दस हजार जन्म लेकर भी यहाँ तक नहीं पहुँच सकते थे जहाँ गुरु, भगवान ने पहुँचा दिया। अपनी तपस्या से, अपने बल से हम नहीं पहुँच सकते थे। भगवान में प्रीति थी तो गुरु में प्रीति हो गयी। गुरु भगवत्स्वरूप हैं। संत कबीरजी ने कहा हैः ‘भगवान निराकार है। अगर साकार रूप में चाहते हो तो साधु प्रत्यक्ष देव।’ गुरु को भगवत्स्वरूप मानने से गुरु के हृदय से वही परब्रह्म परमात्मा छलके।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।

मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।……

ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 210

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राक्षस भी जिसे पसन्द नहीं करते


किसी के द्वारा की गयी भलाई या उपकार को न मानने वाला व्यक्ति कृतघ्न कहलाता है। ‘महाभारत’ में पितामह भीष्म धर्मराज से कहते हैं- “कृतघ्न, मित्रद्रोही, स्त्रीहत्यारे और गुरुघाती इन चारों के पाप का प्रायश्चित हमारे सुनने में नहीं आया है।”

गौतम नाम का ब्राह्मण था। ब्राह्मण तो वह केवल जाति से था, वैसे एकदम निरक्षर और म्लेच्छप्राय था। पहले तो वह भिक्षा माँगता था किंतु भिक्षाटन करते हुए जब म्लेच्छों के नगर में पहुँचा तो वहीं एक विधवा स्त्री को पत्नी बना कर बस गया। म्लेच्छों के संग से उसका स्वभाव भी उन्हीं के समान हो गया। वन में  पशु-पक्षियों का शिकार करना ही उसकी जीविका हो गयी।

एक दिन एक विद्वान ब्राह्मण जंगल से गुजरे यज्ञोपवीतधारी गौतम को व्याध के समान पक्षियों को मारते देख उन्हें दया आ गयी। उन्होंने उसको समझाया कि यह पापकर्म छोड़ दे। गौतम के चित्त पर उनके उपदेश का प्रभाव पड़ा और वह धन कमाने का दूसरा साधन ढूँढने निकल पड़ा। वह व्यापारियों के एक दल में शामिल हो गया किंतु वन में मतवाले हाथियों ने उस दल पर आक्रमण कर दिया, जिससे कुछ व्यापारी मारे गये। गौतम अपने प्राण बचाने के लिए भागा और रास्ता भटक गया। वह भटकते-भटकते दूसरे जंगल में जा पहुँचा, जिसमें पके हुए मधुर फलोंवाले वृक्ष थे। उस वन में महर्षि कश्यप का पुत्र राजधर्मा नामक बगुला रहता था। गौतम संयोगवश उसी वटवृक्ष के नीचे जा बैठा, जिस पर राजधर्मा का विश्राम-स्थान था।

संध्या के समय जब राजधर्मा ब्रह्मलोक से लौटे तो देखा कि उनके यहाँ एक अतिथि आया है। उन्होंने मनुष्य की भाषा में गौतम को प्रणाम किया और अपना परिचय दिया। गौतम को भोजन करा के कोमल पत्तों की शय्या बना दी। जब वह लेट गया तब राजधर्मा अपने पंखों से उसे हवा करने लगे।

परोपकारी राजधर्मा ने पूछाः “ब्राह्मणदेव ! आप कहाँ जा रहे हैं तथा किस प्रयोजन से यहाँ आना हुआ ?”

गौतमः मैं बहुत गरीब हूँ और धन पाने के लिए यात्रा कर रहे था। मेरे कुछ साथियों को हाथियों ने मार डाला। मैं अपने प्राण बचाने के लिए इधर आ गया हूँ।”

राजधर्माः “आप मेरे मित्र राक्षसराज विरूपाक्ष के यहाँ चले जाइये, वे आपकी मदद करेंगे।”

प्रातःकाल ब्राह्मण वहाँ से चल पड़ा। जब विरूपाक्ष ने सुना कि उनके मित्र ने गौतम को भेजा है, तब उन्होंने उसका बड़ा सत्कार किया और उसे खूब धन देकर विदा किया।

गौतम जब लौटकर आया तो राजधर्मा ने फिर सत्कार किया। रात्रि में राजधर्मा भी भूमि पर ही सो गये। उन्होंने पास में अग्नि जला दी थी, जिससे वन्य पशु रात्रि में ब्राह्मण पर आक्रमण न करें। परंतु रात्रि में जब उस लालची, कृतघ्न गौतम की नींद खुली तो वह सोचने लगा, ‘मेरा घर यहाँ से बहुत दूर है। मेरे पास धन तो पर्याप्त है पर मार्ग में भोजन के लिए तुच्छ नहीं है। क्यों न इस मोटे बगुले को मारकर साथ ले लूँ तो रास्ते का मेरा काम चल जायेगा।’ ऐसा सोचकर उस क्रूर ने सोते हुए राजधर्मा को मार डाला। उनके पंख नोच दिये, अग्नि में उनका शरीर भून लिया और धन की गठरी लेकर वहाँ से चल पड़ा।

इधर विरूपाक्ष ने अपने पुत्र से कहाः “बेटा ! मेरे मित्र राजधर्मा प्रतिदिन ब्रह्माजी को प्रणाम करने ब्रह्मलोक जाते हैं और लौटते समय मुझसे मिले बिना घर नहीं जाते। आज दो दिन बीत गये, वे मिलने नहीं आये। मुझे उस गौतम ब्राह्मण के लक्षण अच्छे नहीं लगते। मेरा चित्त व्याकुल हो रहा है। तुम जाओ, पता लगाओ कि मेरे मित्र किस अवस्था में है।”

राक्षसकुमार दूसरे राक्षसों के साथ जब राजधर्मा के निवासस्थान पर पहुँचा तो देखा कि राजधर्मा के निवासस्थान पर पहुँचा तो देखा कि राजधर्मा के पंख खून से लथपथ बिखरे पड़े हैं। इससे उसे बड़ा दुःख हुआ। क्रोध के मारे उसने गौतम को ढूँढना प्रारम्भ किया। थोड़ी ही देर मे राक्षसों ने उसे पकड़ लिया और ले जाकर राक्षसराज को सौंप दिया।

अपने मित्र का आग में झुलसा शरीर देखकर राक्षसराज शोक से मूर्च्छित हो गये। मूर्च्छा दूर होने पर उन्होंने कहाः “राक्षसो ! इस दुष्ट के टुकड़े-टुकड़े कर दो और अपनी भूख मिटाओ।”

राक्षसगण हाथ जोड़कर बोलेः “राजन् ! इस पापी को हम लोग नहीं खाना चाहते। आप इसे चाण्डालों को दे दें।”

राक्षसराज ने गौतम के टुकड़े-टुकड़े कराके वह मांस चाण्डालों को देना चाहा तो वे भी उसे लेने को तैयार नहीं हुए। वे बोलेः “यह तो कृतघ्न का मांस है। इसे तो पशु, पक्षी और कीड़े तक नहीं खाना चाहेंगे तो हम इसे कैसे खा सकते हैं !” फलतः वह मांस एक खाई में फेंक दिया गया।

राक्षसराज ने सुगंधित चंदन की चिता बनवायी और उस पर बड़े सम्मान से अपने मित्र राजधर्मा का शरीर रखा। उसी समय देवराज इन्द्र के साथ कामधेनु उस परोपकारी महात्मा के दर्शन करने आकाशमार्ग से आयीं। कामधेनु के मुख से अमृतमय झाग राजधर्मा के मृत शरीर पर गिर गया और राजधर्मा जीवित हो गये।

इस प्रकार परोपकारी, धर्मनिष्ठ राजधर्मा की तो जयजयकार हुई और कृतघ्न गौतम को प्राप्त हुई – मौत अपकीर्ति और नरकों की यातनापूर्ण यात्रा !

ऐसे अनेक कृतघ्नों की दुर्दशा का वर्णन इतिहास में मिलता है। जैसे – महावीरजी से गोशालक ने तेजोलेश्या विद्या की शिक्षा ली और उस विद्या का प्रयोग उन्हीं के ऊपर कर दिया तो महावीर जी का तो कुछ नहीं बिगड़ा, उलटा वह दुष्ट ही उस विद्या के तेज से झुलसकर मर गया।

महापुरुष तो अपनी समता में रहते हैं, उनके मन में किसी के प्रति नफरत नहीं होती पर प्रकृति उन कृतघ्नों को धोबी के कपड़ों की तरह पीट-पीटकर मारती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 10,11 अंक 210

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