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विद्या क्या है ? – पूज्य बापू जी


 

विद्या ददाति विनयम्। विद्या से विनय प्राप्त होता है। यदि विद्या पाकर भी अहंकार बना रहा तो ऐसी विद्या किस काम की ! ऐसी विद्या न तो स्वयं का कल्याण करती है न औरों के ही काम आती है।

एक समय जयपुर में राजा माधवसिंह का राज्य था। राज्य-सिंहासन पर बैठने से पूर्व माधवसिंह एक सामान्य जागीरदार का पुत्र था। बाल्यकाल से ही वह बड़ा ऊद्यमी और शैतान था। पढ़ने लिखने में उसकी रूचि न थी।

उसके बाल्यकाल के गुरू थे संसारचन्द्र। यदि माधवसिंह को कोई पाठ नहीं आता तो वे उसे कठोर सजा देते। सच्चे गुरू शिष्य का अज्ञान कैसे सहन कर लेते ! बड़ा होने पर बचपन का वही ऊधमी माधवसिंह जयपुर का राजा बना।

एक दिन माधवसिंह बड़ा दरबार लगाकर बैठा था, तब किसी ने राजदरबार में आकर संसारचन्द्र की शिकायत की, जबकि वे बिल्कुल निर्दोष थे।

माधवसिंह ने संसारचन्द्र को राजदरबार को उपस्थित करने का आदेश दिया। संसारचन्द्र निर्भयतापूर्वक राजदरबार में आये।

माधवसिंह बोलाः “गुरूजी ! आपको याद होगा कि किसी जमाने में आप मेरे गुरु थे और मैं आपका शिष्य।”

संसारचन्द्र याद करने लगे तो माधवसिंह ने पुनः कहाः “जब मुझे कोई पाठ नहीं आता था तब आप मुझे डंडे से मारते थे।”

संसारचन्द्र के प्राण कंठ तक आ गये। उन्होंने सोचा कि ‘अब माधवसिंह जरूर मुझे फाँसी पर लटकायेगा। इसकी क्रूरता तो प्रख्यात है।’ किन्तु तभी स्वस्थ होकर संसारचन्द्र ने कहाः “महाराज ! सत्ता का नशा मनुष्य को खत्म कर देता है। यदि मुझे पहले से ही इस बात का पता होता कि आप जयपुर नरेश बनने वाले हैं तो मैंने आपको उससे भी ज्यादा कठोर सजाएँ दी होतीं। आपको राजा की योग्यता दिलाने के लिए मैंने ज्यादा दंड दिया होता। यदि मैं ऐसा कर पाता तो जो आज आप विद्या को लज्जित कर रहे है, उसकी जगह उसे प्रकाशित करते।”

सारी सभा मन-ही-मन संसारचन्द्र की निर्भयता की प्रशंसा करने लगी। माधवसिंह को भी अपनी क्रूरता के लिए पश्चाताप होने लगा। उसने गुरु संसारचन्द्र से क्षमा माँगी और उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया।

जो विद्या अहं को जगाकर विकृति पैदा करे, वह विद्या ही नहीं है। विद्या तो मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारने का काम करती है और ऐसी विद्या प्राप्त होती है ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के चरणों में।

धन्य हैं स्पष्टवक्ता संसारचन्द्र और धन्य हैं गुरु को हितैषी मानकार राजमद छोड़ने व अपनी चतुराई चूल्हे में डालने वाला माधवसिंह ! राजसत्ता का मद छोड़कर सदगुरू का आदर करने वाले छत्रपति शिवाजी की नाईं इस विवेकी ने भी अपनी उत्तम सूझबूझ का परिचय दिया।

क्या आप लोग भी अपने हितैषियों की कठोरता का सदुपयोग करेंगे ? या बचाव की बकवास करके अवहेलना करेंगे ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 9, अंक 209

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ठग सुक्खा सलाखों के पीछे


कहते हें- विनाशकाले विपरीतबुद्धिः।

जब गीदड़ की मौत आती है तब वह शहर की ओर भागता है। ऐसा ही हुआ ठग सुखाराम के साथ जिसने पूज्य बापू जी जैसे महान, पवित्र, ब्रह्मज्ञानी संत को बदनाम करने की साजिश की। शायद उसे यह पता नहीं था कि

संत सताये तीनों जायें, तेज, बल और वंश।

ऐसे ऐसे कई गये, रावण कौरव और कंस।।

इसी से उसकी बुद्धि विपरीत हो गई और उसने सीधा अतिरिक्त जिला कलेक्टर को ही ठगने की योजना बना ली। यह भी नहीं सोचा कि यदि मैं पकड़ा गया तो क्या होगा ?

ठगी व धोखाधड़ी के कई मामलों में लिप्त इस कुख्यात ठग सुक्खा उर्फ तांत्रिक सुखाराम उर्फ आस्ट्रेलियन बाबा उर्फ प्रीस्ट सुखविंदर सिंह उर्फ हरविंदर सिंह को आखिरकार पुलिस ने चार सौ बीसी के मामने में गिरफ्तार कर ही लिया व न्यायालय ने उसे रिमांड में भेज दिया है। ऐसे शातिर दिमागवाले अपराधी के बेबुनियाद आरोपों को उछालने वाले कुछ स्वार्थी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वाले असलियत सामने आने पर अब चुप्पी साध के बैठे हैं।

क्या था मामला ?

उदयपुर के अतिरिक्त जिला कलेक्टर (ए.डी.एम.) एवं राजस्थान प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी श्री माँगी लाल चौहान की माँ वैष्णों देवी तीर्थ स्थल में लापता हुई। उन्हें तलाश लाने का दावा करते हुए तांत्रिक सुक्खा डेढ़ लाख रूपये की ठगी कर गायब हो गया। पिछले दिनों तांत्रिक सुखाराम ने पूज्य बापू जी के बारे में कुछ टी.वी. चैनलों पर फिर से टिप्पणी की थी। वह प्रसारण अब चौहान ने देखा तो वे बोल उठेः अरे ! यह तो तान्त्रिक सुक्खा है, जिसने हमें ठगा है। उनके भाई राजेश चौहान द्वारा तुरंत सुक्खा के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवायी गयी।

शिकायत में लिखा गया है….

इन्दौर आ जाना, मैं तुम्हें तुम्हारी माँ के साक्षात् दर्शन करवा दूँगा। ऐसा झूठा आश्वासन देकर सुखाराम ने मुझे इन्दौर बुलाया। रात्रि करीब डेढ़ बजे एक पुलिस सब इंसपेक्टर एवं अन्य साथी मुझे एक मारूति कार में बिठाकर देवास श्मशान तक ले गये। वहाँ सुखाराम ने श्मशान ने जलते अँगारों पर शराब एवं अन्य सामग्री से तांत्रिक क्रिया की। वापसी में एक बहती नदी पर गाड़ी रोककर मुझे एक कपड़े में लपेटी हुई वस्तु दी और कहाः “ऐसा बोलकर फेंक देना कि जाओ कालू ! मेरी माँ का पता लगाकर आओ। मैंने ऐसा ही किया। वस्तु पानी में गिरते ही दो विस्फोट हुए। फिर सुक्खा ने कहा कि “मैं तुम्हारी माँ को ढूँढने वैष्णो देवी जाऊँगा, मुझे पैसा दो।” इस प्रकार कुल डेढ़ लाख रूपये कि ठगी करके वह गायब हो गया और मोबाईल भी बंद कर दिया। काफी प्रयास के बाद भी हमारा सुक्खा से सम्पर्क नहीं हो पाया।

कैसे दबोचा इस शातिर ठग को ?

उदयपुर पुलिस दल ने सादे वस्त्रों में जाकर सुक्खा के देवास (म.प्र.) स्थित अड्डे की छानबीन की। वहाँ पता चला कि पिछले छः महीनों से उसने अपना अड्डा बदल दिया है और वह इंदौर से 27 कि.मी. दूर अरनिया कुंड, खुड़ैल में रह रहा है। पुलिस दल वहाँ पहुँचा तो उसने उसके अड्डे में तांत्रिक गतिविधियाँ देखीं। 27 अप्रैल को वहाँ छापा मारकर ठग कुकर्मी सुक्खा को दबोचा गया। प्रतापनगर (उदयपुर) थाना प्रभारी ने बताया कि रिमांड अवधि में  सुखाराम से अन्य ठगी के मामलों के बारे में भी पता लगाया जायगा।

खुल रहे हैं सुक्खा के धोखाधड़ी के कई और मामले…..

हाल ही में गुरुद्वारा श्री गुरुनानक दरबार, जवाहरनगर, जयपुर (राज.) के तत्कालीन सचिव प्रीतपाल सिंह ने उनके बेटे व भतीजे को आस्ट्रेलिया में नौकरी दिलाने का झाँसा देकर 60 हजार रूपये ठगने के मामले में सुक्खा के खिलाफ पुलिस में एफ आई आर दर्ज करवायी है। एक अन्य मामले में सुक्खा ने रायकुण्डा, जि. इन्दौर की आदिवासी महिला सीताबाई के पुत्र की शराब की लत छुड़ाने के बहाने 20 हजार रूपये की ठगी और सुक्खा की साथी महिलाओं ने सीताबाई को गाली-गलौज, मारपीट की व हाथ-पैर तुड़वा देने की धमकियाँ दी। इसकी शिकायत इन्दौर पुलिस मं दर्ज करायी गयी है।

इतने वर्षों से लोगों से ठगी करने वाला यह शातिर आज तक पुलिस की गिरफ्त में नहीं आया था पर संत को सताने, उनकी बदनामी करने का फल प्रकृति ने इस ठग को दे ही दिया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 209

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सुख का विज्ञान


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

प्राणिमात्र का एक ही उद्देश्य है कि हम सदा सुखी रहें, कभी दुःखी न हों। सुबह से शाम तक और जीवन से मौत तक प्राणी यही करता है – दुःख को हटाना और सुख को थामना। धन कमाते हैं तो भी सुख के लिए, धन खर्च करते हैं तो भी सुख के लिए। शादी करते हैं तो भी सुख के लिए और पत्नी को मायके भेजते हैं तो भी सुख के लिए। पत्नी के लिए हीरे जवाहरात ले आते हैं तो भी सुख के लिए और तलाक दे देते हैं तो भी सुख के लिए। प्राणिमात्र जो भी चेष्टा करता है वह सुख के लिए ही करता है, फिर भी देखा जाय तो आदमी दुःखी का दुःखी है क्योंकि जहाँ सुख है वहाँ उसने खोज नहीं की।

यदि किसी को कहें- भगवान करे दो दिन के लिए आप सुखी हो जाओ, फिर मुसीबत आये। तो वह व्यक्ति कहेगाः “अरे भैया ! ऐसा न कहिये।”

‘अच्छा, दस साल के लिए आप सुखी हो जाओ, बाद में कष्ट आये।’

‘नहीं, नहीं….।’

‘जियो तब तक सुखी रहो, बाद में नरक मिले।’

‘न-न…. नहीं चाहते। दुःख नहीं सदा सुख चाहते हैं।’

तो उद्देश्य है सदा सुख का परंतु इच्छा है नश्वर से सुख लेने की, क्षणिक सुखों के पीछे भागने की इसलिए ठोकर खाते हैं।

क्षणिक सुखों की इच्छा क्यों होती है ? क्योंकि क्षण-क्षण में बदलने वाले जगत की सत्यता खोपड़ी में घुस गयी है। नश्वर जगत की सत्यता चित्त में ऐसी मजबूती से घुस गयी है, नश्वर जगत को, नश्वर संबंधों को, नश्वर परिस्थितियों को इतना सत्य मानते हैं कि सत्य को समझने की योग्यता ही गायब कर देते हैं।

वास्तव मे हमारा उद्देश्य तो है शाश्वत सुख किंतु इच्छा होती है नश्वर सुख की, नश्वर वस्तुओं की। तो उद्देश्य और इच्छा जब तक विपरीत रहेंगे तब तक जीवन में ‘सोऽहं’ का संगीत न गूँज पायेगा। उद्देश्य और इच्छा में जब तक फासला होगा, तब तक दो नाव में पैर रखने वालों की हालत से हम गुजरते रहेंगे, दुःखी होते रहेंगे।

आप सुखप्राप्ति चाहते हैं, सदा सुखी रहना चाहते हैं, जो स्वाभाविक है। तुम्हारा उद्देश्य जो है न, वह स्वाभाविक है और इच्छा जो वह अज्ञान से उठती है।

जैसे ठीक जानकारी न होने से, ठीक वस्तु का बोध न होने से आदमी गलत रास्ते चला जाता है। दूरबीन से नक्षत्रों या चाँद को देखना हो और काँच साफ न हो तो ठीक से नहीं दिखता, ऐसे ही ठीक बोध न होने से, ठीक समझ न होने से ज्ञान की नजर खुलती नही। और जब तक ज्ञान की नजर खुलती नहीं तब तक सुख-दुःख सब हमारी उन्नति के लिए आते हैं, ऐसा दिखता नहीं।

ठीक देखने क लिए ठीक अंतःकरण चाहिए और ठीक अंतःकरण के लिए उच्च विवेक चाहिए।

संत तुलसी दास ने कहाः

बिन सतसंग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।

भगवान की कृपा से ही ऐसे विवेक के रास्ते मनुष्य चलता है और उसकी अनात्मा की आसक्ति धीरे-धीरे मिटती जाती है तथा आत्मा का ज्ञान, प्रीति, विश्रांति, आत्मतृप्ति, परमात्मतृप्ति की तरफ चलती रहती है।

आत्मतृप्तमानवस्य कार्यं न विद्यते।

विकारों की तरफ फिसले नहीं तो जल्दी से पूर्ण स्वभाव की प्राप्ति हो जाती है। शिवजी कहते हैं-

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

श्रीरामचरित. सुं.कां.33.2

उस आत्मानंद का रस पाकर फिर वह विकारी रस में आसक्त नहीं होता यही जीवन्मुक्ति है, जीते जी मुक्ति ! दुःखों से, आकर्षणों से, प्रशंसा से, निंदा से मुक्त महापुरुष बन जाओ। अष्टावक्र जी कहते हैं- तस्य तुलना केन जायते ? ऐसे आत्मा-परमात्मा में जागे उस महापुरुष की तुलना किससे करोगे ? इंद्रदेव का सुख भी आत्मसुख के आगे तुच्छ हो जाता है।

‘अष्टावक्र गीता’ में आता हैः

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति।।

जिस पद को पाये बिना इंद्रादि देवता भी दीन हो जाते है, उस आत्मपद को पाकर आत्मारामी महापुरुष न यश से फूलते हैं न अपयश में दुःखी, चिंतित, परेशान होते हैं, ऐसा ब्रह्मस्वभाव का सुख है।

तैसा अंम्रितु1 तैसी बिखु2 खाटी।

तैसा मानु तैसा अभिमानु।

हरख सोग3 जा कै नही बैरी मीत समान।

कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जान
1 अमृत, 2 विष, 3 हर्ष-शोक

ऐसा सत्संग का विवेक मुक्तात्मा, महात्मा बना देता है। क्षुद्र विषय-विकारी सुख से अपने को थोड़ा बचाते जाओ और निर्विकारी, शाश्वत सुख में बढ़ते जाओ, यही मनुष्य जीवन की उपलब्धि है। सदा रहने वाला सुख सदा रहने वाले अपने क्षेत्रज्ञ स्वरूप में ही है। पंचभौतिक शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार यह अष्टधा प्रकृति का क्षेत्र है। भगवान कहते हैं-

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।

(भगवदगीताः 7.4)

भगवान कृपा करके अपना स्वभाव बता रहे हैं कि मैं इनसे भिन्न हूँ, अतः आप भी इनसे भिन्न हैं। पंचभौतिक शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार बदलते हैं, आप अबदल हैं। आप आत्मा हो, शाश्वत हो, शरीर के मरने  के बाद भी आपकी मृत्यु नहीं होती, आप अजर-अमर हो नारायण ! आप अपनी अमरता में जागो, टिको। शाश्वत सुख आपका अपना-आपा है।

सुख शांति का भण्डार है, आत्मा परम आनन्द है।

क्यों भूलता है आपको ? तुझमें न कोई द्वन्द्व है।।

भगवान हमारे परम सुहृद हैं। उन परम सुहृद के उपदेश को सुनकर अगर जीव भीतर, अपने स्वरूप में जाग जाय तो सुख और दुःख की चोटों से परे परमानन्द का अनुभव करके जीते-जी मुक्त हो जायेगा। जीव जब तक परम सुख नहीं पा लेता तब तक नश्वर सुख की चाह बनी रहती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 10,11, अंक 209

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