Monthly Archives: May 2014

आवश्यकता है वीर सपूतों की


बात उस समय की है जब हिन्दुओं पर मुगलों का अत्याचार अपनी चरम सीमा पर था और हिन्दू अपने को दीन व लाचार मानकर सब सह रहे थे। औरंगजेब का खौफ महाराष्ट्र के गाँवों में छाया हुआ था। उसके क्रूर सैनिक आकर आतंक मचाते थे, युवतियों को उठाकल ले जाते थे, किसानों की भेड़-बकरियों व गायों को अपना भोजन बना लेते थे, फसलों को तहस-नहस कर देते थे।

एक बार दशहरे के पर्व पर छत्रपति शिवाजी के पौत्र साहूजी महाराज के मंत्री बाजीराव पेशवा, जो वीर, पराक्रमी व बड़े बुद्धिमान भी थे, अपने सैनिकों के साथ खानदेश की मुहिम पर निकले। ‘होल’ गाँव से गुजर रहे थे कि किसी पेड़ के पीछे से एक मिट्टी का ढेला बड़े जोर से आकर उनके मुँह पर लगा। उनके मुँह से खून आने लगा। इतने में एक बालक गाँव की तरफ भागता दिखायी दिया। बाजीराव ने सैनिकों को आदेश दियाः ”जाओ, उस बालक को शीघ्र पकड़कर ले आओ।” जब पेशवा के सामने उस बालक को लाया गया तो पीछे-पीछे उसकी विधवा माँ और मामा भी आ गये।

बालक ने आते ही निडरता से व्यंग्यात्मक प्रश्न कियाः “क्यों, मिट्टी के ढेले से पेट नहीं भरा क्या ?”

बाजीराव उस बालक की निर्भयता देखकर दंग रह गये ! बालक से  पूछाः “तुमने मुझे ढेला क्यों मारा ?”

बालकः “शुक्र मनाओ कि ढेला ही मारा है। तुम लोग हमें लाचार मानकर हमारी भेड़-बकरियों को मार के खा जाते हो, किसानों की फसलें जला देते हो। लेकिन अब हम नहीं सहेंगे, हम लड़ेंगे और तुम्हें मुँह की खानी पड़ेगी, जैसे अभी खायी है।”

पेशवाजी तनिक भी क्रोधित नहीं हुए बल्कि बालक की निर्भयता व वीरता देखकर बहुत प्रसन्न हुए और बोलेः “बेटा !  मैं तुम्हारी निडरता देख बहुत खुश हुआ लेकिन हम वे नहीं हैं जो तुम समझ रहे हो। मैं तो साहूजी महाराज का मंत्री बाजीराव हूँ। हमारे महाराज तो आप सबके रक्षक हैं।”

बालक शर्मिन्दा होते हुए बोलाः “क्षमा कीजिये। आप ही की तरह वे मुगल सैनिक घोड़े पर सवार होकर आते हैं जिस कारण मैं धोखा खा गया।”

पेशवा ने बालक की माँ और मामा से कहाः “यह बालक बड़ा निर्भय और होनहार है। इस कोमल उम्र में इतना साहस ! धन्य है इसका अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम ! बचपन में ही वतन के लिए मर-मिटने का अदभुत भाव है। यह जरूर एक दिन बहादुर सिपहसालार बनकर मराठा साम्राज्य में चार चाँद लगायेगा। अगर आप लोग अनुमति दें तो इसे महाराज की सेवा के लिए ले जाऊँ ?”

माँ और मामा ने गौरवान्वित हो स्वीकृति दे दी। यही बालक आगे चलकर मराठा साम्राज्य का वीर सेनापति “मल्हारराव होल्कर’ के नाम से शौर्य एवं पराक्रम का प्रतीक बनकर चमक उठा। सारे मुगल सरदार इसके नाम से थरथर काँपते थे।

हमारे देश में मल्हारराव होल्कर, हकीकत राय, गुरुगोविन्दसिंह के दो वीर पुत्र, स्कंदगुप्त, छत्रपति वीर शिवाजी – ऐसे अनेक वीर बालक हुए हैं, जिन्होंने अपनी संस्कृति, धर्म व राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की। हर बच्चे में इनके समान साहस, शौर्य व योग्यताएँ छुपी हुई हैं। माँ-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों में बाल्यकाल में ही ऐसे संस्कारों का सिंचन करें कि उनमें भी अपनी संस्कृति व देश के लिए कुछ कर दिखाने की उमंग जगे। आज की मैकाले शिक्षा पद्धति, फिल्मों, मीडिया आदि के माध्यम से हमारे देश के नौनिहालों को भ्रमित किया जा रहा है। देश में ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि वे पाश्चात्य जगत के अँधानुकरण के लिए विवश हो जायें और अपनी भारतीय संस्कृति व धर्म के प्रति हीनभावना से ग्रस्त हो जायें। अतः हमें अपने देश की बाल पीढ़ी की ऐसे वातावरण से रक्षा करनी होगी और उन्हें संतों-महापुरुषों के मार्गदर्शन का लाभ दिलाना होगा, जिससे उनका जीवन चमक उठे और वे अपने देश, संस्कृति व माता-पिता को गौरवान्वित कर सकें।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2014, पृष्ठ संख्या 19,20 अंक 257

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अशुभ से लोहा लेना चाहिए – पूज्य बापू जी


 

(शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती की रिहाई के बाद 19 जनवरी 2005 को हुए सत्संग से)

जब-जब अन्याय हुआ तो संतों ने ही लोहा लिया है। अंग्रेज इतना अन्याय करते थे तो संतों की प्रेरणा से ही लोगों में जागृति आयी और फिर गांधी जी भी तैयार हो गये। स्वामी रामतीर्थ का संकल्प, विवेकानंद जी का संकल्प, ऋषि दयानंद जी आदि का संकल्प…..

एक संत को वाइसरॉय ने बुलाया कि “आपके सत्संग ठीक होते हैं न ? हमारे ब्रिटिश शासन में आपको कोई समस्या तो नहीं ?

संत बोलेः “नहीं, सब ठीक होता है।”

“तो आप सत्संग के बाद प्रार्थना किया करो न, कि ‘ब्रिटिश शासन भारत में रहे।’ ये सब लोग भारत की आजादी-आजादी…. सब बकवास कर रहे हैं।”

“यह तो नहीं हो सकता है। मैं यह कह सकता हूँ कि ब्रिटिश शासन का खात्मा जल्दी हो। भारत आजाद हो।”

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती जी को फँसाया जा रहा था तो हम लोगों ने इसके विरोध में दिल्ली में एक दिन का सत्याग्रह किया था। उस समय 80-90 प्रतिशत लोग बोलते थे कि “बापू जी ने बहुत बढ़िया किया”, 5-10 प्रतिशत लोग होते हैं न, कि “संतों को यह सब करने की क्या जरूरत है ?” अरे ! तुम क्या सिखाते हो कि ‘संतों को यह नहीं करना चाहिए, वह नहीं करना चाहिए…..’ तुम्हारी बेचारी पहुँच क्या ! तुम अपना ही घर, अपना ही दिल सँवार लो तो बहुत है।

हम तो बैठ गये सत्याग्रह में। शंकराचार्य जी के खिलाफ 1-2 दिन पहले कुछ लोगों ने बयान दिये थे कि ‘उनको पद से इस्तीफा दे देना चाहिए जब तक निर्दोष साबित नहीं होते ” जब हम लोग सत्याग्रह पर बैठे तो जो मनचाहे बयान देते थे, उन सबके तेवर बदल गये। आप भगवत्प्रेरणा से कोई कार्य करते हो तो दुनिया फिर उसके अनुसार पटरी बदलने को तैयार हो जाती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हमने सत्याग्रह किया उसी से हो गया, नहीं। फिर भी कोई अच्छा कार्य शुरु करता है तो भगवान की दया से सब लोगों का सहयोग मिल जाता है। इसीलिए बुरे से लोहा लेना चाहिए। कोई आदमी पीड़ित हो रहा हो और अन्याय होता हो तो आपका जितना भी बस चलता है, बुद्धिपूर्वक, धैर्यपूर्वक अशुभ से लोहा लेकर शुभ की मदद करना चाहिए।

आजकल बहुत झूठे केस हो जाते हैं। शत्रुता से या किसी कारण के अथवा दहेज के बहुत झूठे केस होते हैं। कई बार तो निर्दोष लोग खून के केस में झूठे फँसाये जाते हैं। कोई झूठा फँस गया हो तो उसको बचाने के लिए शुभ संकल्प करें, मंत्रजप करना चाहिए तो वह बच जायेगा, निर्दोष छूट जायेगा।

जैसे शंकराचार्य जी के लिए जब तूफान चला तो वहाँ अशुभ भावनावाली टोली कम नहीं थी लेकिन जब शुभ भावना के संकल्प ने जोर पकड़ा तो अशुभ दबा। अशुभ से लोहा लेने के लिए शुभ लोगों को संगठित होना चाहिए, आवाज उठानी चाहिए। संसार है, शुभ-अशुभ चलता रहता है। अशुभ से दबो मत और शुभ का अभिमान करो मत। पक्षपात नहीं करो, सत्य का आश्रय लो। प्रीतिपूर्वक भगवान का जप करो और जब संसार की कोई समस्या सुलझानी हो तो विश्वासपूर्वक चिंतन करो कि ‘यह काम होगा, भगवान जानते हैं। मैं निर्दोष हूँ अथवा फलाना निर्दोष है, छूटेगा ही।’ ऐसा संदेह न करो कि ‘छूटेगा कि नहीं ? अपना क्या ? मैं दिल्ली में उपवास करूँ और वे मद्रास में हैं, उनको लाभ होगा कि नहीं ?’ अरे ! हम बैठे हैं तो संकल्प जायेगा, देर-सवेर रंग आयेगा तो पूरे हिन्दुस्तान में रंग आ गया। आपका इरादा पक्का होना चाहिए और स्वार्थ नहीं होना चाहिए बस। हमें तो संतोष है कि हमने जयेन्द्र सरस्वती जी के लिए अन्याय के खिलाफ जो धरना दिया था वह सार्थक हो गया।

निंदा स्तुति से जुड़ो नहीं

प्रभु के साथ रहो

करोड़ों लोग यशगान करते हैं तो हजारों लोग थोड़ी निंदा कर लेंगे तो क्या है ! लाखों या करोड़ों भी निंदा कर लेंगे तो क्या है ! जिसकी स्तुति हुई उसकी निंदा हुई, हम तो अपने-आप, प्रभु के साथ। यह इसीलिए बता रहा हूँ कि आप भी मजबूत बन जाओ, गंदी झूठी अफवाह से डरो नहीं। बोलेः ‘झूठ –मूठ में मेरी बेइज्जती कर दी…..’ कर दी तो कर दी। जिसकी कर दी वह शरीर है, अगर सचमुच में की तो तू बुराई से बच जा और झूठा आरोप किया है तो करने दे, उनका तो धंधा है। वे तो ब्लैकमेलिंग करने के लिए, पैसे नोंचने के लिए अखबारों में, चैनलों में किसी को भी निंदा का शिकार बना देते हैं, ऐसे क्या डरना ! जरा-जरा बात में डरने की क्या जरूरत है !

अपनी तरफ से बुरा नहीं करते फिर कोई बुराई थोप दे तो क्यों डरना ? मजबूत बनो। आपकी इज्जत, आपका मनोबल ऐसा क्या कि 5-25 आदमी बेईमानी या द्वेष से आपकी निंदा करें और आप तुच्छ हो जाओ। आप ऐसे तुच्छ नहीं हो। और 50-100 चमचे आपकी वाहवाही करें और आप बड़े हो गये, इसमें भी भोले नहीं पड़ो। यह संसार है, हम हैं अपने आप, प्रभु के साथ निंदा में, स्तुति में। बस, यह मंत्र पक्का रखो। ‘जन्म के पहले प्रभु के साथ थे, अभी भी प्रभु के साथ हैं, निंदा और स्तुति सब आयी गयी, हम तो प्रभु के साथ। प्रभु हम तुम्हारे साथ हैं न ? हैं न ? हैं न ? दे ताली, ले मजा !’ इतना तो यार सीख लो तुम, कम-से-कम जितना ट्रक ड्राइवर ट्रक के पीछे लिख के चलते हैं, ‘बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला।’ आजकल ऐसा ही है, सूझबूझ से जीना पड़ेगा। और जितना आप इन चीजों से डरोगे उतना वे ब्लैकमेलिंग वाले आपकी नस जान जायेंगे, आपको शोषित कर देंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2014, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 257

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आखिर कौन हैं ये ?


डॉक्टर प्रतिभा शर्मा

एम.ए., एम. फिल., एम.बी.ए, पी. एच. डी.

(एक अदभुत सत्य घटना पर आधारित पुस्तक ‘आखिर कौन हैं ये ?’ भाग – 1 से संक्षिप्त)

एक मुद्दे की सच्चाई जानने की इच्छा हुई जो पिछले 8 महीने से देश-विदेश के मीडिया में छाया हुआ है – ‘नाबालिक के यौन-शौषण के आरोप में विश्व के प्रसिद्ध नामी संत आशाराम बापू जेल में।’ सिर्फ बापू ही नहीं, कई तरह के आरोप विगत कई वर्षों से देश के जाने माने संतों पर लगते रहे हैं और उन्हें जेल भी जाना पड़ा है। लेकिन आज तक किसी भी संत पर कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ है बल्कि वे निर्दोष छूटकर बाहर आये हैं। आज फिर एक संत पर  आरोप लगे हैं और वे जेल में हैं। विचारणीय पक्ष यह है कि इन संत पर लगे आरोप का आधार क्या है ? क्योंकि नये कानून बनने के बाद कइयों पर झूठे आरोप लगने लगे हैं और उसमें कई तो झूठे साबित भी हुए हैं। क्या ये संत भी अन्य संतों की तरह निर्दोष छूटकर बाहर आयेंगे ? अगर ऐसा होता है तो फिर मीडिया जो दिखा रहा है वह झूठ है ? अगर संत आशाराम बापू पर लगे आरोप सही हैं तो फिर उन करोड़ों भक्तों (जिसमें महिलाएँ तथा लड़कियाँ भी शामिल हैं) की श्रद्धा का रहस्य क्या है ? उनके 425 आश्रमों व उनमें रह रहे हजारों साधकों तथा 17 हजार से ज्यादा चल रहे ‘बाल संस्कार केन्द्रों’ आदि की वजह क्या है ? ये सारे प्रश्न मेरे जेहन में लगातार घूम रहे हैं और इन्हीं प्रश्नों का उत्तर ढूँढने के लिए मैंने जोधपुर जाने का निर्णय किया।

सत्य की खोज में जोधपुर की ओर…..

जब मैं जोधपुर के उस केन्द्रीय कारागृह के मुख्य द्वार पर पहुँची, जहाँ बापू कई महीनों से हैं, तो वहाँ खड़े लोगों ने बतायाः “आज रविवार है, कैदियों से मुलाकात का दिन है।”

अभी वहाँ करीब 30-40 लोग ही खड़े थे परंतु कुछ ही समय में लोगों के आने का सिलसिला चालू हुआ तो अच्छी खासी भीड़ जेल के सामने हो गयी, जिसमें सभी आयुवर्ग की महिलाएँ, पुरुष एवं बच्चे थे। उसमें भी महिलाओं की संख्या ज्यादा थी।

मैंने जेल के मुख्य द्वार पर खड़े पुलिसवालों को अपना परिचय देते हुए कुछ जानकारी माँगीः “यहाँ पर आशाराम बापू के अलावा और कितने कैदी हैं ? आज इतनी भीड़ क्यों हो रही है ?”

सिपाहीः “लगभग 700 कैदियों की जेल है, आज कैदियों से मुलाकात का दिन है। ये बाबा के दर्शन की भीड़ है।”

“क्या ये सब लोग आशाराम बापू के ही भक्त हैं या और अन्य लोग भी हैं ?”

इस  पर सिपाही ने थोड़ा चिढ़ते हुए कहाः “अरे ! क्या बतायें, हम तो परेशान हो गये हैं। पहले यहाँ इतनी सख्त डयूटी नहीं करनी पड़ती थी। अभी तो 24 घंटे चौकन्ना रहना पड़ता है। पर मानना पड़ेगा इन लोगों को, इतने महीने हो गये बाबा को यहाँ आये, पर एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब उनके दर्शन करने वालों की भीड़ नहीं आयी हो। समझ में नहीं आता, इतने आरोप लगने के बाद भी इन लोगों की श्रद्धा क्यों टिकी हुई है ! कभी-कभी ऐसा लगता है कि बाबा में कुछ तो है।”

सिपाही की बात सुनकर मेरा माथा ठनका, मैंने कई बार   सुना था कि ‘सबसे ज्यादा भीड़ अगर किसी के सत्संग में होती है तो वे संत आशाराम बापू ही हैं।’ इतने बड़े संत को इस तरह के आरोप में जेल की सजा काटनी पड़ रही है !

यही सब सोचते हुए मैं जेल के मुख्य द्वार के बाहर एक पत्थर पर बैठ गयी। इतने में मेरे नजदीक बैठी एक लड़की के पास एक पुलिस ऑफिसर आकर बोलाः “आप कहाँ से आये हो ?”

उसने बताया कि “मैं महाराष्ट्र से आयी हूँ।”

“आप इतनी दूर से क्यों आये हो ?”

“आशाराम बापू के दर्शन करने।” (यह बोलकर वह लड़की फिर से शांत होकर बैठ गयी।)

“क्या आपको सच में लगता है कि आपके बापू निर्दोष हैं ?”

“मेरे बापू निर्दोष थे, हैं और रहेंगे।” उस लड़की का इतना तेज उत्तर पाकर वह ऑफिसर उस लड़की के थोड़ा पास आया और बोलाः “बहन ! हम भी जानते हैं कि बापू एकदम निर्दोष हैं। और सच में वे कोई साधारण पुरुष नहीं दिव्य पुरुष हैं।”

लड़की ने पलटकर पूछाः “आप यह कैसे कह सकते हैं ?”

तब उस पुलिसवाले ने बतायाः “बापू जी की सुरक्षा में कई ऑफिसर रहते हैं। एक बार मेरा भी नम्बर लगा। मेरी डयूटी बाबा जी को चेक करने की थी। मैं बाबा जी के शरीर को छूकर चेक कर रहा था तो बाबा जी ने कहा कि “बाहर से क्या चेक कर रहे हो ? भीतर चेक करो कि तुम कौन हो ?” यह सुनते ही मुझे कुछ अजीब सा अनुभव हुआ। बस, बहन जी ! तब से हमें तो पक्का हो गया कि बाबा जी बिल्कुल निर्दोष हैं और ये कोई महापुरुष हैं।”

उसने इतना कह दिया कि “बापू जी के आने के बाद हम अहमदाबाद आश्रम में जरूर जायेंगे और मंत्रदीक्षा भी लेंगे।”

ऑफिसर के मुँह से ऐसी बातें सुनकर मैं तो अवाक् रह गयी। फिर तो मेरी जिज्ञासा और बढ़ गयी और मैं सबके साथ आकर भीड़ में शामिल हो गयी।

अगाध श्रद्धा

कुछ महिलाओं से मैंने पूछाः “आप बापू के दर्शन के लिए आयी हो ?”

उन्होंने मुझे सिर से पैर तक देखा, कोई जवाब नहीं दिया, दूसरी ओर चली गयीं। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। इसी बीच एक 30-32 साल का युवक मेरे पास आया और बोलाः “वे आपको पत्रकार समझ रही हैं, इसलिए आपकी बात का उन्होंने जवाब नहीं दिया।”

मैंने कहाः “भाई, अगर मैं पत्रकार हूँ तो भी क्या मेरी बात का जवाब नहीं देना चाहिए ?”

युवकः “दरअसल, पिछले कई महीनों से मीडिया ने बापू जी और आश्रमों पर कई घिनौने आरोप लगाये हैं, जो एकदम झूठे और बेबुनियाद हैं। मीडिया में पक्षपातपूर्ण तरीके से खबरों को तोड़-मरोड़कर दिखाया है, जिससे साधकों में मीडिया के खिलाफ बहुत आक्रोश हैं। आपको मालूम है कि भोलानंद, जिसने अनर्गल आरोप लगाया था कि “जम्मू आश्रम में बच्चे गाड़े गये हैं…..”, उसका भांडा फोड़ हो गया है और उसने पुलिस हिरासत में तथा जाहिर में आकर सभी षड्यंत्रकारी एवं बिकाऊ मीडियावालों की पोल खोल दी है। क्या आपको जानकारी है ?”

मैंने कहाः “नहीं।”

फिर वह युवक आत्मविश्वास से बोलाः “होगी भी कैसे ? मीडिया ने तो यह खबर लोगों तक आने ही नहीं दी। बापू जी के केस में मीडिया के इसी रूख के कारण लोगों का मीडिया पर से विश्वास उठ गया है।”

“आपका नाम क्या है ? और कहाँ से हो ? क्या करते हो ?”

“मेरा नाम अंकित दवे है, मुंबई से हूँ। अभी तो नौकरी छोड़ दी है।”

“नौकरी क्यों छोड़ दी ?”

“जब तक बापू जी बाहर नहीं आ जाते मुंबई नहीं जाऊँगा।”

मैं सुनकर हैरान रह गयी। आज के इस भौतिकवादी समाज में पढ़ा-लिखा, फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वाला नवयुवक अंधविश्वासी तो नहीं हो सकता !

हमारे बातें पास में खड़ी एक 20-22 साल की लड़की सुन रही थी।

मैंने उससे पूछाः “आप कहाँ से हो ? यहाँ कब से आयी हो ?”

लडकीः “जम्मू से हूँ। मैं तो 20-25 दिन से ही हूँ यहाँ।”

बातों ही बातों में उसने बताया कि जिस दिन से बापू जेल गये हैं, उसने भोजन छोड़ दिया है, केवल दूध और फल लेती है।

मैंने पूछाः “भोजन कब करोगी ?”

“जब बापू जी बाहर आयेंगे।” (इतना कहते ही उसकी आँखों में आँसू आ गये।)

मैने उसे सांत्वना दी और दूसरी ओर रुख किया। यहाँ पर उपस्थित लोगों की अगाध श्रद्धा देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा था और हृदय में कुछ अजीब सी अनुभूति भी। सभी के चेहरे और बातों में एक सच्चाई थी।

आखिर कौन हैं ये ?

बापू की एक झलक पाने के लिए बेताब इस भीड़ में कुछ महिलाएँ एक छोटी सी किताब पढ़ रही थीं।

मैंने पास खड़े एक व्यक्ति से पूछाः “ये महिलाएँ क्या पढ़ रही हैं ?”

व्यक्ति बोलाः “श्री आशारामायण जी का पाठ कर रही हैं।”

“इसमें क्या है ?”

“जैसे भगवान श्रीराम की जीवनलीला रामायण है, वैसे ही पूज्य बापू जी की जीवनलीला श्री आशारामायण है।”

कौतूहलवश मैंने भी यह पुस्तिका ले ली। काव्य के रूप में लिखी इस पुस्तिका में आशाराम बापू का जीवन परिचय और उनके द्वारा की गयी लीलाओं की झलक थी।

बापू के जन्म के बारे में लिखा थाः “इनके जन्मते ही अजनबी सौदागर बड़ा झूला ले आया था। आशाराम बापू के बचपन का नाम आसुमल था। इन्हें बचपन से ही ईश्वरप्राप्ति की लगन थी। विद्यालय में शिक्षक भी उनका आदर करते थे। जब ये बड़े हुए और घरवालों ने उनकी शादी करनी चाही तो घर छोड़कर भाग गये। माँ व भाई ने ढूँढकर समाज में अपनी इज्जत का वास्ता देकर शादी करवायी। लेकिन वे धर्मपत्नी को समझा बुझाकर अपना लक्ष्य ईश्वरप्राप्ति बता के घर छोड़कर चले गये। फिर वे कई गुफाओं, कंदराओं, जंगलों तथा अन्य जगहों में सदगुरु की खोज में घूमते घामते एक ब्रह्मज्ञानी संत साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज के चरणों में पहुँचे।”

इतना पढ़कर मन में फिर ठनक हुई कि जिनका जीवन युवावस्था से इतना संयमी व वैराग्यपूर्ण है कि ईश्वरप्राप्ति के लिए शादी क तुरंत बाद ही अपनी पत्नी को छोड़कर चले जाते हैं, क्या वे 74-75 वर्ष की आयु में अपनी पोती की उम्र की लड़की के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं ! एक बार तो ऐसा सोचना भी मुझे पाप लग रहा था। खैर, जैसे तैसे मन को इस उधेड़ बुन से सँभालते हुए मैंने आगे की पक्तियाँ पढ़ीं।

‘ईश्वरप्राप्ति की तीव्र तड़प देखकर साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज ने उनको शिष्यरूप में स्वीकार लिया। आसुमल गुरुसेवा में तितिक्षा सहते हुए बड़ी तत्परता से लगे रहे। और आसोज सुद दो दिवस संवत बीस-इक्कीस को साँईं श्री लीलाशाह जी की कृपा से उन्हें आत्मसाक्षात्कार हुआ।

इसके बाद उनके जीवन में कई चमत्कार हुए। सत्संग पर भगवन्नाम के प्रताप से उन्होंने कितने ही लोगों के रोग-शोक मिटाये, शराब-मांस आदि छुड़वाये और लोगों को भक्ति ज्ञान का रंग लगाया…. आदि।’

यह पुस्तिका पढ़कर मेरा मन आश्चर्य और असमंजता के सागर में गोते खाने लगा कि आखिर कौन हैं ये ?

फिर सोचा, ‘चलो, कुछ और लोगों से मिला जाय।’

मेरी उत्सुकता बढ़ती गयी…..

एक लम्बी सी सुंदर युवती पर मेरी निगाहें ठहर गयीं। मैंने उससे पूछाः “आप कहाँ से आयी हो ?”

उसने सहज भाव से उत्तर दियाः “अमेरिका से।” अब चौंकने की बारी मेरी थी, अमेरिका से….!

“क्यों आयी हो ?”

युवतीः “बापू जी के दर्शन करने।”

“आप तो बहुत दूर से आयी हो, दर्शन गये क्या ?”

“हाँ, कल कोर्ट में तो हुए थे पर बहुत दूर से हुए थे। आज रविवार को जेल के अंदर जाने की अनुमति मिल सकती है, जिससे पास से दर्शन हो सकते है।”

“अगर आप अन्यथा न लें तो एक प्रश्न पूँछूँ ?”

“हाँ-हाँ, पूछिये।”

“देखो, इतने महीनों से दुनिया के सामने बापू जी के खिलाफ माहौल बना है, कई आरोप लगे फिर भी आपकी इतनी श्रद्धा कि अमेरिका से यहाँ दर्शन के लिए आयी हो, मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। ऐसा क्यों ?”

“मैंने तो समझा था कि आपने मंत्रदीक्षा ली हुई है लेकिन आपक इस प्रश्न से मुझे समझ में आ गया कि आपने दीक्षा नहीं ली है। कोई बात नहीं, मैं आपके प्रश्न का जवाब जरूर देना चाहूँगी।” (यह सारा वार्तालाप अंग्रेजी में चल रहा था।)

लेकिन यह हकीकत है

उस युवती ने बताया कि “मेरा नाम सुची है, मैंने व मेरे पति ने 1998 में पूज्य बापू जी से दीक्षा ली थी। हमारा एक बेटा है। जब वह छोटा था तो एक बार ऐसा बीमारी पड़ा कि किसी दवाई के रिएक्शन से उसे दोनों आँखों से दिखना बंद हो गया। कई डॉक्टरों से इलाज कराया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। एक दिन मैंने बेटे को बापू जी की फोटो के सामने लिटा दिया और एक चिट्ठी लिखकर बापू जी द्वारा स्पर्श की हुई चरणपादुका पर रख दी, फिर रातभर हम वहीं बैठे रहे। अचानक सुबह-सुबह लगभग 4 बजे मेरा बेटा उठा और हमें देखते हुए बोलाः “पीले कपड़े में बापू जी आये थे, बापू जी की आँखों से रोशनी निकली और मेरी आँखों में समा गयी, मुझे अब सब दिख रहा है।”

हम तो खुशी से झून उठे। जहाँ सभी डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था वहाँ बापू ने हमारे बच्चे को नेत्रदान दिया। मुझे लगता है, शायद आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं होगा लेकिन यह हकीकत है। तब से लेकर आज तक  मैं और मेरे पति साल में 2 बार बापू जी के दर्शन करने भारत आते हैं। यहाँ जो भी लोग खड़े हैं या फिर बापू के जितने भी साधक हैं उनके अपने कई अनुभव हैं इसीलिए सबकी बापू जी में अगाध श्रद्धा है।

जैसा आपने कहा कि मीडिया में इतने दिनों से कई तरह की बातें प्रसारित की जा रही हैं, फिर भी हमारी श्रद्धा में कोई कमी नहीं आयी है तो इसका कारण यही है कि जो बापू जी ने हमें दिया है, उस पर मीडिया का कोई असर नहीं हो सकता। हमारे अमूल्य आध्यात्मिक और लौकिक अनुभवों के आगे मीडिया की वाहियात बातों की कोई कीमत ही नहीं है। जिनकी प्रेरणा से युवा पीढ़ी संयमी हो रही है, घर-घर ‘वेलेंटाइन डे’ की जगह ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ मनाया जा रहा है, आप जरा सोचिये ! क्या ऐसे महान संत ऐसा घृणित कार्य कर सकते हैं ? ऐसा सोचना भी पाप है।”

उस युवती की बातें सुनकर मैं अवाक् रह गयी।

अनोखी गुरुदक्षिणा

अब मेरी नजर उस व्यक्ति पर गयी जो लगातार मुझे ही घूर रहा था। वह व्यक्ति जब मेरे नजदीक आकर बोलाः “पहचाना ?”

“अरे संजय !”

मेरी बहन और संजय ने विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन से साथ-साथ पी.एच.डी. की थी।

मैंने पूछाः “क्या कर रहे हो आजकल और यहाँ कैसे ?”

संजयः “मैं इंदौर साइंस कॉलेज में प्रोफेसर हूँ और यहाँ बापू जी के दर्शन के लिए आया हूँ।”

“संजय ! मुझे यह जानकर बड़ा आश्चर्य हो रहा है कि तुम भी बापू के दर्शन करने आये हो ! मैं लेखिका हूँ। बहुत दिनों से मीडिया में बापू के बारे में खबरें सुन-सुनकर अनायास ही इच्छा हुई कि मैं भी इनके बारे में कुछ लिखूँ लेकिन मैं सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास नहीं करती हूँ। मीडिया द्वारा इतने कुप्रचार के बाद भी एक बात बार-बार सामने आ रही थी कि आशाराम बापू के भक्तों ने कभी अनशन किया तो कभी रैलियाँ  निकालीं, कहीं जेल भरो आंदोलन किया और कइयों ने तो भोजन का ही त्याग कर दिया।

बस, यही जानने के लिए कि आखिर सत्य क्या है ? आखिर कौन हैं ये ? ऐसी कौन सी सच्चाई है जो लोगों तक नहीं पहुँची है…. यही सब जानने के लिए मैं यहाँ आयी हूँ।

अच्छा, तुम तो वैज्ञानिक हो और विज्ञान पढ़े लोग आसानी से किसी बाबा के चक्कर में नहीं आते, तुम कैसे फंस गये ?”

“प्रतिभा ! तुम इस तरह की बातें करोगी तो मैं तुम्हारे किसी भी प्रश्न का जवाब नहीं दूँगा।”

“माफ करना संजय ! मेरा मतलब तुम्हें चोट पहुँचाना नहीं था, मैंने मजाक में ऐसा कह दिया। अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो मैं अपने शब्द वापस लेती हूँ।”

“बापू जी मेरे गुरु हैं और मेरे पूरे परिवार ने उनसे मंत्रदीक्षा ली है। तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगी कि मैं ड्रग्स लेता था और ड्रग्स का इतन आदी हो गया था कि मैंने कॉलेज जाना छोड़ दिया था। मेरी माँ बहुत परेशान हो गयी थी, पिता जी थे नहीं। माँ ने बापू जी से दीक्षा ली हुई थी और एक दिन मुझे बापू के दर्शन के लिए बहुत आग्रह करके ले गयी। बापू जी सत्संग में कह रहे थे कि “मुझे दक्षिणा में अपनी बुराइयाँ दे दो।”

मेरी माँ ने मेरा हाथ पकड़कर ऊपर कर दिया और कहा कि “बोल, मेरी नशे की आदत ले लो।” मैंने मजाक में कह दियाः “मेरी नशे की आदत ले लो।” तुम्हें विश्वास नहीं होगा उस दिन के बाद से आज तक मैंने कभी ड्रग्स नहीं ली और बाद में  मैंने बापू जी से दीक्षा भी ले ली। मैं आज जो कुछ भी हूँ, बापू जी की वजह से हूँ।”

एक पढ़ा-लिखा कॉलेज का प्रोफेसर, वैज्ञानिक किसी के बहकावे में नहीं आ सकता फिर भी मुझे अपने कई प्रश्नों के जवाब चाहिए थे इसलिए मैंने पूछाः “संजय ” मैं तुम्हारी बात समझ रही हूँ लेकिन मेरे कुछ प्रश्न हैं, क्या तुम उनका जवाब देना पसंद करोगे ?”

“हाँ-हाँ, पूछो।”

“मीडिया में इतने दिनों से सब कुछ आ रहा है। उसका कुछ तो कारण होगा…..?”

इतना दुष्प्रचार ! कुछ तो कारण होगा….

“हाँ है, इसके लिए एक नहीं बहुत सारे कारण हैं। आशाराम जी बापू एक विख्यात आध्यात्मिक संत हैं, जिन्होंने करोड़ों लोगों के मन पर भारतीय संस्कृति के संस्कार डाले हैं, भटके हुए लोगों को सत्य और ईश्वर के मार्ग पर लगाया है। पूज्य बापू जी ने धर्मांतरण का शिकार हो रहे हिन्दुओं को जागृत किया है। यह सब संस्कृति-विरोधी टीवी चैनलों और हिन्दु-विरोधी शासकों को मान्य नहीं था। बापू जी का प्रवचन सुनकर बहुत सारे हिन्दू, जिन्हें प्रलोभन देकर या डरा धमकाकर धर्मांतरण के लिए विवश किया जा रहा था, वे धर्म के प्रति जागरूक होने लगे थे, परिणाम यह आया कि धर्मांतरण कराने वाली संस्थाओं के मंसूबों पर पानी फिर गया, जिससे ये संस्थाएँ बापू जी के विरूद्ध हो गयीं।

बापू जी के सत्संगी मांसाहार, शराब फास्टफूड व कोल्डड्रिंक्स जैसी शरीर को हानि पहुँचाने वाली चीजों का त्याग कर देते हैं। इससे कई विदेशी कम्पनियों को नुकसान होने लगा और ये बापू जी की लोकप्रियता खत्म करना चाहती थीं। सौंदर्य-प्रसाधन बनाने वाली बहुत सारी विदेशी कम्पनियों के लिए भारत देश एक बहुत बड़ा बाजार है। लेकिन बापू जी अपने सत्संगों में अनेक बार इन केमिकल प्रसाधनों के नुकसानों के बारे में सचेत कर अनेक देशी और आयुर्वैदिक नुस्खे बताते हैं। इससे इन कम्पनियों को तथा इन कम्पनियों के विज्ञापन से करोड़ों रूपये कमाने वाले मीडिया को भी नुकसान होता है। इसलिए ये भी बापू जी का विरोध करते हैं।

बापू जी ने युवाओं को व्यसनमुक्त कर उन्हें संयम व सादगी का मार्ग दिखाया है। बापू जी से दीक्षा ले के ‘विद्यार्थी तेजस्वी तालीस शिविरों’ में भाग लेने से भारत की बाल एवं युवा पीढ़ी बहुत संयमी, तेजस्वी, निडर और बुद्धिमान हो रही है। बापू जी के द्वारा पूरे विश्व में बच्चों में नैतिक शिक्षा के लिए 17000 से अधिक ‘बाल-संस्कार केन्द्र’ चलवाये जा रहे हैं, ताकि उनमें हमारी संस्कृति के मूल्यों का संवर्धन हो। भारतीय युवावर्ग को बापू जी बार-बार ‘भारत को विश्वगुरु बनाने’ का नारा देकर उत्साहित कर रहे हैं। इसलिए भारत देश की विरोधी शक्तियाँ बापू जी को अपना  दुश्मन मानती हैं……”

है जवाब आपके पास ?

संजय लगातार बोलता जा रहा था। उसका चेहरा लाल हो गया था, उसके चेहरे पर दुःख और क्रोध का मिला जुला भाव स्पष्ट दिख रहा था।

“प्रतिभा ! मैं यही कहना चाहता हूँ कि मीडिया दोनों पक्ष को क्यों नहीं दिखाता है ? आज आठ महीने से लगातार बापू के खिलाफ मीडिया ने मोर्चा सँभाला हुआ है इसलिए मैं तुमसे कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ।

एक लड़की जो उत्तर प्रदेश की रहने वाली है, छिंदवाड़ा (म.प्र.) में पढ़ रही थी, तथाकथित घटना बताती है जोधपुर की और एफआईआर पाँच दिन बाद दिल्ली जा के रात को 2.30 बजे लिखवाती है, ऐसा क्यों ? इसे मीडिया ने क्यों नहीं दिखाया ?

लड़की की मेडिकल रिपोर्ट में रेप या यौन-शोषण की पुष्टि नहीं हुई फिर चैनलों ने झूठी अफवाहें क्यों फैलायीं कि बलात्कार हुआ है ?

साधक शिवाभाई के पास से अश्लील सीडी बरामद होने का झूठा प्रचार क्यों किया गया ?

अमृत प्रजापति, महेन्द्र चावला, राहुल सचान, अजय, हरेन्द्र, राजू लम्बू आदि कौन हैं ? इनके चरित्र और अतीत के बारे में जनता को क्यों नहीं बताया जा रहा है। अमृत प्रजापति, महेन्द्र चावला, राहुल सचान के ऊपर तो पहले से ही केस चल रहे हैं तो ऐसे चरित्रभ्रष्ट लोगों द्वारा लगाये गये आरोपों को सच बताकर मीडिया उनका समर्थन क्यों कर रहा है ?

जिस भोलानंद के झूठे आरोपों को मीडिया सारे दिन दिखाता था, वही भोलानंद जब स्वीकार करता है कि उसे बापू जी पर झूठे आरोप लगाने के लिए षड्यंत्रकारियों व कुछ मीडिया चैनलों द्वारा मालामाल करने का लालच दिया गया था तो इस खुलासे को मीडिया ने क्यों नहीं दिखाया ?”

मैं असमंजस में खड़ी सुन रही थी, मेरे पास कोई जवाब नहीं था लेकिन संजय मेरे जवाब का इंतजार नहीं कर रहा था, उसके सवाल खत्म नहीं हो रहे थे।

वह फिर बोलने लगाः “वेलेन्टाइन डे को ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ के रूप में बदलकर क्या बापू जी ने कोई अपराध किया है ?

होली, दिवाली आदि हिन्दू त्यौहारों को वैदिक रीति से मनाने का कार्य क्या गलत है ?

संत श्री आशाराम जी के आश्रम में हजारों गायों को कटने से बचाकर उनको पाला जाता है, गरीबों के लिए भंडारा किया जाता है, ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ कार्यक्रम चलवाकर लाखों गरीबों का कल्याण किया जाता है। क्या किसी को जीवनदान देना गुनाह है ?

गर्मियों में शरबत, छाछ व टोपी वितरण तथा सर्दियों में जरूरतमंदों में खजूर, कम्बल और ऊनी वस्त्रों, गर्म भोजन के डिब्बों का वितरण करना क्या पाप है ?

देश में जब-जब बाढ़, भूकम्प, सुनामी आदि प्राकृतिक आपदाएँ आयीं तो हजारों बेघर लोगों के लिए बापू जी ने मकान बनवाये, कपड़े, बर्तन आदि की व्यवस्था की। जहाँ प्रशासन नहीं पहुँचा वहाँ बापूजी द्वरा हजारों गरीब लोगों की सेवा करवायी गयी। क्या यह गुनाह है ?

पूज्य बापू जी के सत्संग से मेरे जैसे असंख्य लोग जो व्यसनों में डूबकर तबाह हो चुके थे, उनके जीवन से ड्रग्स, शराब, तम्बाकू, सिगरेट, बीड़ी आदि सदा के लिए अलविदा हो गये और वे कुत्ते की मौत मरने से बच गये। क्या यह उनकी गलती है ?

अगर मीडिया इतना ही देश का भला चाहता है और सच दिखाता है तो उनके सेवाकार्यों को मीडिया ने आज तक कभी क्यों नहीं दिखाया ?

इस बारे में कभी कोई रिपोर्ट क्यों नहीं बनायी जाती है कि संत आशारामजी बापू की महिला शिष्यों की संख्या करोड़ों में है ? उनका अनुभव क्यों नहीं दिखाया जाता है ?

पूरे भारत में बापू जी ने ‘युवाधन सुरक्षा अभियान’ चलाकर स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य और संयम का महत्त्व सिखाया, संयम पर आधारित ‘दिव्य प्रेरणा प्रकाश’ पुस्तक करोड़ों की संख्या में देश-विदेश में बाँटी गयी, क्या इस बात का प्रचार नहीं किया जाना चाहिए था ?

इसलिए हम सभी बहुत व्यथित हैं कि बापू जी को बिल्कुल झूठे, मनगढ़ंत आरोपों में फँसाकर जेल में रखा गया है। भारत की संस्कृति को बदनाम करने के लिए देश के प्रमुख संतों को साजिश का शिकार बनाया जा रहा है। बापू जी ने लोगों को सत्संग ही नहीं, कर्मयोग के सुसंस्कारों के साथ एक नयी दिशा, एक नयी पहचान देकर भारत के कदम विश्वगुरु पद की ओर बढ़ाये हैं।

प्रतिभा ! तुम और हम 4-5 व्यक्ति भी जोड़कर रख सकें तो बड़ी बात है, यहाँ तो करोड़ों लोग बापू जी के भक्त हैं और उऩ करोड़ों लोगों में से एक-एक के अनेकों अनुभव हैं। और इतने वर्षों से बापू जी के सान्निध्य में लोग अपने को उन्नत महसूस करते हैं, आनंदित महसूस करते हैं। लोगों को अब मीडिया या किसी के भी कुछ कहने का कोई असर नहीं हो सकता।

शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वतीजी, साध्वी प्रज्ञा सिंह, स्वामी केशवानंदजी, नित्यानंदजी जैसे हिन्दु संतों को बदनाम कर धर्म को नष्ट करने का षडयंत्र वर्षों से चला आ रहा है, मगर अब परिणाम सबके सामने आ ही गया न ! सारे संत एकदम पाक-साफ साबित हो गये। और आज परम पूज्य बापू जी के साथ फिर से वही इतिहास दोहराया जा रहा है। मगर अफसोस है कि इतने पर भी भारत की जनता की आँखें नहीं खुल रही हैं, वह देशद्रोहियों के प्रति सावधान नहीं हो रही है। धर्मद्रोहियों को इतना जरूर याद रखना चाहिए कि संतों व संस्कृति के विरुद्ध दुष्प्रयत्न करना… स्वयं को बरबाद करना है ! हमारे बापू जी हमारे गुरु हैं, हमारे भगवान हैं और मुझे गर्व है कि मैं संत श्री आशाराम जी बापू का शिष्य हूँ।”

मैं संजय का विश्वास देखकर दंग रह गयी। संजय कुछ देर चुप रहा और फिर सोचकर पुनः बोलाः “प्रतिभा ! मैं तुमसे निवेदन करता हूँ कि तुम अपनी किताब में मेरी ये बातें जरूर लिखना।”

“जरूर, मैने जो तुमसे प्रश्न किये और उसके मुझे जो उत्तर मिले वे तुम मेरी किताब में जरूर पाओगे।”

नये प्रश्नों का जन्म

मैंने वहाँ उपस्थित लोगों की श्रद्धा भक्ति को मन ही मन नमन किया और वापस अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। ट्रेन में मेरे मन में विचार आया कि जब मैंने यह जेल यात्रा शुरु की तो मैं एक गहरे असमंजस में थी कि आखिर कौन हैं संत आशाराम जी बापू ? जैसा मीडिया दिखाता है वैसे या जैसे इनके करोड़ों भक्त इन्हें मानते हैं वैसे अवतारी संत-महापुरुष !

इस यात्रा के बाद मेरे प्रश्नों का जवाब मिल गया परंतु उन जवाबों से कुछ नये प्रश्नों का जन्म हो गया। उन प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए पढ़ें पुस्तक – ‘आखिर कौन हैं ये ?’, भाग -2.

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2014, पृष्ठ संख्या 12-18, अंक 257

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