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दशहरे के दस विजयसूत्र


‘श्रीमद् भागवत’ के ग्यारहवे स्कंध के तेरहवें अध्याय के चौथे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी को बोलते हैं-

आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।

ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः॥

‘शास्त्र, जल, प्रजाजन, देश, समय, कर्म, जन्म, ध्यान, मंत्र और संस्कार- ये दस वस्तुएँ यदि सात्विक हों तो सत्वगुण की, राजसिक हों तो रजोगुण की और तामसिक हों तो तमोगुण की वृद्धि करती हैं।’

अपना जीवन महान बनाना है तो इन 10 बातों का ध्यान रखोः

शास्त्रः आप क्या पढ़ते हैं ? शारीरिक सुखसंबंधी ज्ञान देने वाला साहित्य, उपन्यास या विकारोत्तेजक कहानियाँ पढ़कर अपनी कमनसीबी बढ़ाते हैं कि जीवन में उदारता, सहिष्णुता, प्राणिमात्र के प्रति सदभाव, ब्रह्मचर्य, निर्लोभता आदि दैवी सदगुणों को अपनाने की प्रेरणा देने वाले गीता, रामायण, वेदांत शास्त्र पढ़ते हैं ? ऐसा ही पठन करना चाहिए जिससे आपमें संयम-सदाचार, स्नेह, पवित्रता, निरभिमानिता आदि दैवी गुणों का विकास हो, संत और भगवंत के प्रति आदर-मान की भावना जगे।

जलः आप क्या खाते-पीते हो ? कहीं आप ऐसी चीज तो नहीं खाते-पीते हो जिससे बुद्धि विनष्ट हो जाय और आपको उन्माद-प्रमाद में घसीट ले जाय? इस बात पर भी ध्यान रखें कि जिस जल से स्नान करते हो वह पवित्र तो है न ! खान-पान का ध्यान रखने से आपमें स्वाभाविक ही सत्वगुण का उदय हो जायेगा। आप दुर्गुणों से मुक्त होकर सरलता और शीघ्रता से दैवी सम्पदा की वृद्धि कर पाओगे।

प्रजाजनः आपका संग कैसा है ? मनुष्य जैसे लोगों के बीच में उठता-बैठता है, मन में जैसा बनने की इच्छा रखता है, उसी के अनुरूप उसके जीवन का निर्माण होता है। जिसे भगवद्-तत्व का साक्षात्कार करना हो उसे तत्वज्ञानी महापुरुषों का संग करना चाहिए।

देशः आप कैसे स्थान में रहते हो ? पवित्र, उन्नत स्थान में रहोगे तो आसुरी विचार और विकार आपको पकड़े रहेंगे। देहाध्यास (देह को ‘मैं’ मानना) के कूड़े-कचरे पर बैठोगे तो मान-अपमान, निंदा-स्तुति, सुख-दुःख आदि द्वन्द्व आप पर प्रभाव डालते रहेंगे और भगवत्स्मरण, ब्रह्मभाव के विचारों में रहोगे तो शांति-लाभ और दिव्य आनंद पाओगे।

समयः आप अपना समय कैसे व्यतीत करते हो ? कहीं जुआ-शराबघर में, सिनेमा-टीवी देखने में या विषय-विलास के चिंतन में तो नहीं ? अखबारों में ज्यादा समय तो नष्ट नहीं करते ? बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता। अतः जीवन का एक-एक क्षण भगवत्प्राप्ति में लगाओ, प्रमाद मत करो।

कर्मः आप किस प्रकार के कर्म करते हैं ? गंदे संस्कार भरकर कर्मबंधन बनाने वाले और नरकों में ले जाने वाले कर्म करते हैं कि अच्छे संस्कार भर के कर्मबंधन काटकर भगवान में विश्रांति दें ऐसे कर्म करते हैं ?

जन्मः जन्मों-जन्मों के आपके संस्कार और शिक्षा-दीक्षा कैसी है ? उससे भी स्वभाव बनता है।

ध्यानः आप अपने चित्त में चिंतन-ध्यान किसका करते हैं ? यदि काम का चिंतन करोगे तो दूसरे जन्म में वैश्या के घर पहुँच जाओगे, मांसाहार का चिंतन करोगे तो गिद्ध या शेर आदि मांसाहारी प्राणियों की योनि में पहुँच जाओगे, किसी से बदला लेने का चिंतन करोगे या ज्यादा द्वेष रखोगे तो साँप, बिच्छु, ततैया आदि योनियों में पहुँच जाओगे। अतः सावधान होकर अपने चिंतन ध्यान को भगवन्मय बनाओ।

अपने दोषों और दुर्गुणों पर, अपने मन में चलने वाली पाप-चिंतन की धारा पर कभी दया नहीं करनी चाहिए। अपने दोषों को क्षमा न करके प्रायश्चित के रूप में अपने-आपको कुछ दंड अवश्य देना चाहिए। दुबारा उस दोष को न दुहराना सबसे बड़ा दंड और प्रायश्चित है। प्रतिदिन रात्रो को सोने से पहले हिसाब लगाना चाहिए कि अशुभ चिंतन कितना कम हुआ और शुभ चिंतन कितना बढ़ा। सुबह उठते ही, जहाँ से उठे उस शुद्ध, बुद्ध, द्रष्टा, साक्षी, आनंदघन में कुछ समय डूबे रहो। ॐ आनंद….. ॐ शांति…. ॐ… यह सुबह की कुछ मिनटों की परमात्म-विश्रांति, घंटोंभर की दिन की साधना जितना आनंद-लाभ दे देगी। फिर परमात्मा या सदगुरुदेव का चिंतन ध्यान करके दिनभर के लिए शुभ संकल्प करना चाहिए कि ‘आज नम्रता, प्रेम, परगुण-दर्शन आदि दैवी गुणों के विकास के साथ प्रभु के नाम गुण का ही चिंतन करूँगा।’

मंत्रः मंत्र देने  वाले आपके गुरु कैसे हैं और मंत्र कैसा है ? टोने-टोटके का मंत्र है कि वैदिक मंत्र है और मंत्र देने वाले गुरु परमात्मप्रीति वाले हैं कि ऐसे-वैसे हैं ? समर्थ सदगुरु से मंत्र लेना चाहिए।

संस्कारः आपके संस्कार कैसे हैं ? अच्छे संस्कार धारण करने का व्रत ले  लो। किसी में हजार  बुराईयाँ हों, फिर भी उसमें से गुण भी लें लो एवं गुणों के आधार, गुणानिधान प्रभु मेरे हैं, मैं भगवान का हूँ – ऐसा चिंतन करने से आप उस समय नित्य ज्ञान में टिकने में तत्पर हो जायेंगे, आपका मंगल हो जायेगा।

यदि आपके जीवन में ये दस बातें आ गयीं तो आप अपने जीवन संग्राम में आऩे वाले हर रावण को नष्ट कर देंगे, प्रत्येक दिन दशहरा होगा और परमात्म-ज्ञान की प्राप्ति सहज, सुलभ हो जायेगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2014, पृष्ठ संख्या 27,28 अंक 261

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योगःकर्मसु कौशलम्


एक सम्पन्न घराने के इकलौते बालक को पढ़ने का शौक तो था ही, साथ ही लालटेन की रोशनी में चलने का भी बड़ा शौक था। पढ़ने के लिए वह दूसरे गाँव में जाता था। छुट्टी होने के बाद जानबूझकर खेल-कूद में समय बिताता। जब अँधेरा हो जाता तो लालटेन जलाकर घर वापस लौटता था।

एक दिन घर पहुँचने पर उसे पता चला कि लालटेन की ढिबरी (केरोसीन की टंकी का ढक्कन) रास्ते में कहीं गिर गयी है। दूसरे दिन रविवार था। बालक को बेचैनी होने लगी कि ‘आखिर मुझसे ऐसी भूल हुई कैसे ? मैं छोटी सी ढिबरी नहीं सम्भाल पाया !’

बाह्य दृष्टि से देखें तो उसके जैसे सम्पन्न परिवार के बालक के लिए लालटेन की ढिबरी खो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। एक लालटेन बिना ढिबरी की हो गयी तो उसके पिता उसे ढिबरी तो क्या दूसरी नयी लालटेन ही खरीदकर दे सकते थे किंतु बालक के मन में अपनी कार्यकुशलता में कमी का बड़ा भारी दुःख था।

अगला सारा दिन, सारी रात बेचैनी में बीती। सोमवार आया। बालक घर के दरवाजे से ही जमीन पर आँखें गड़ा-गड़ाकर ढिबरी खोजते हुए पाठशाला के रास्ते निकल पड़ा। छोटी सी चीज थी, दो दिन बीत गये थे। रास्ते में पड़ी चीज किसी को दिख गयी हो तो उसने उठा भी ली हो, यह भी हो सकता था। इस प्रकार ढिबरी के मिलने की सम्भावना तो  बहुत कम थी परंतु बालक के मन में अपने से प्रमाद हो जाने की पीड़ा तथा अपनी उस छोटी से छोटी अकार्यकुशलता को मिटाने का चाव बड़ा प्रबल था। चलते-चलते विद्यालय पहुँचने से पहले ढिबरी मिल गयी। बालक को बड़ी प्रसन्नता हुई। आगे चलकर यही बालक ‘स्वामी शरणानंदजी’ के नाम से विख्यात हुआ।

सत्य ही है यदि किसी को एक गिलास पानी पिलाना नहीं आता है तो ध्यान करना भी नहीं आयेगा। छोटे से छोटा काम करने में जो असावधानी करता है वह करने की आसक्ति से मुक्त नहीं हो सकता। और आसक्तिरहित हुए बिना योगवित् होना सम्भव नहीं है। ‘गीता’ में भगवान कहते हैं-

योगः कर्मसु कौशलम्।

पूज्य बापू जी भी यही समझाते हैं कि “जो भी कार्य करें, उसे पूरे मनोयोग से, दिल लगाकर करें। किसी भी काम को आलस्य या लापरवाही से बिगड़ने न दें। जो कर्म को पूरे मनोयोग से करता है उसका आत्मविकास होता है, उसकी योग्यताओं का विकास होता है। उठो…जागो…..दूर करो लापरवाही को और तत्परता एवं कुशलतापूर्वक छलाँग मारो। फिर तो पाओगे कि सफलता तुम्हारा ही इंतजार कर रही है।”

आश्रम के सत्साहित्य ‘पुरुषार्थ परम देव, जीवन रसायन, निर्भय नाद’ आदि का प्रतिदिन अमृतपान करने व उनमें लिखे वचनों पर अमल करने से सजगता, कार्यकुशलता, हिम्मत, साहस और ईश्वर व महापुरुषों की असीम कृपा के भण्डार स्वतः ही खुल जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2014, पृष्ठ संख्या 11, अंक 260

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यदि बचाओगे दूसरे के अधिकार तो सब करेंगे आपको प्यार


विजयनगर के प्रजावत्सल सम्राट थे कृष्णदेव राय। वे अपनी प्रजा के सुख-दुःख देखने के लिए अक्सर राज्य में भ्रमण करने के लिए जाते थे। एक बार इसी हेतु से वे अपने बुद्धिमान मंत्री तेनालीराम तथा कुछ सिपाहियों के साथ निकले। एक-एक गाँव देखते-देखते दूर निकल गये। शाम हो गयी। सभी थक गये। नदी किनारे उचित जगह देखकर महाराज ने कहाः ‘तेनालीराम ! यहीं पड़ाव डाल दो।”

विश्राम के लिए तम्बू लग गये। सभी भूख-प्यास से बेहाल थे। आसपास नजर दौड़ाने पर महाराज को थोड़ी दूर मटर की फलियों से लदा खेत दिखा। महाराज ने कुछ सिपाहियों को बुलाकर कहाः “जाओ सामने के खेत में से फलियाँ तोड़कर हम दोनों के लिए लाओ और तुम भी खाओ।”

सिपाही जैसे जाने के लिए पीछे मुड़े तो तेनालीराम ने कहाः “महाराज ! इस खेत का मालिक तो यह वह किसान है जिसने इस खेत में फसल लगायी और इसे अपने पसीने से सींचा है। आप इस राज्य के राजा अवश्य हैं पर खेत के मालिक नहीं। बिना उसकी आज्ञा के इस खेत की एक भी फली तोड़ना अपराध है, राजधर्म के विरूद्ध आचरण है, जो एक राजा को कदापि शोभा नहीं देता।”

महाराज को तेनालीराम की बात उचित लगी, सिपाहियों को आदेश दियाः “जाओ, इस खेत के मालिक से फलियाँ तोड़ने की अनुमति लेकर आओ।”

सिपाहियों को खेत में देख खेत का मालिक घबरा गया। सिपाहियों ने कहाः “महाराज स्वयं तुम्हारे खेत के नजदीक विश्राम कर रहे हैं और अपनी भूख मिटाने के लिए खेत से थोड़ी सी फलियाँ तोड़ने की अनुमति चाहते हैं।” यह सुन उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा ! प्रसन्नता और राजा के प्रति अहोभाव से उसका हृदय भर गया। वह दौड़ा-दौड़ा महाराज के पास पहुँचा।

राजा को प्रणाम किया और कहाः “महाराज ! यह राज्य आपका है, यह खेत आपका। आप प्रजापालक हैं, मैं आपकी प्रजा हूँ। मुझसे अनुमति लेने की आपको कोई आवश्यकता थी फिर भी आपने एक गरीब किसान के अधिकार को इतना महत्व दिया ! आप धन्य हैं !”

किसान खुद सिपाहियों के साथ खेत में गया और फलियाँ तोड़कर महाराज के सामने प्रस्तुत कीं, फिर आज्ञा लेकर गाँव गया।

थोड़ी देर बाद वह वापस आया। उसके साथ गाँव के कुछ लोग और भी थे जो अपने साथ सभी के लिए तरह-तरह की भोजन-सामग्री लाये। इतना अपनापन, प्रेम व सम्मान पाकर महाराज बड़े प्रसन्न हुए।

बुद्धिमान तेनालीराम मुस्कराकर बोलेः “जब हम अपने अहं को न पोसकर दूसरें के अधिकारों का ख्याल रखते हैं तो लोग भी हमारा ख्याल रखते हैं, उनके दिल में हमारे लिए आदर और प्यार बढ़ जाता है और वास्तविक आदरणीय, सर्वोपरि, सर्वेश्वर परमात्मा भी भीतर से प्रसन्न होते हैं।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2014, पृष्ठ संख्या 18, अंक 260

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