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बुलंदियों तक पहुँचाने वाले दो पंख पूज्य बापू जी


बच्चों को प्राणशक्ति और ज्ञानशक्ति (बुद्धिशक्ति) – इन दो शक्तियों की जरूरत है। ये दोनों बढ़ गयीं तो व्यक्ति सारी दुनिया को आश्चर्य में डाल सकता है। जिसके जीवन में ज्ञानदाता एवं प्राणशक्ति बढ़ाने वाले सदगुरु हैं, वह बच्चा भी कभी नहीं रहता कच्चा ! वह छोटे से छोटा बच्चा भी बड़ी बुलंदियों तक पहुँचाने वाले काम कर सकता है।

मगधनरेश कुमारगुप्त के 14 साल के बेटे स्कंदगुप्त ने हूण प्रदेश के दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिये थे। मेरे गुरु जी की प्राणशक्ति, ज्ञानशक्ति विकसित हुई थी तो उनकी आज्ञा से नीम का पेड़ भी खिसक गया उचित स्थान पर, जहाँ झूलेलालवालों की हद लगती थी। वहाँ दोनों समाजों में सुलह का संगीत लहराने लगा। ‘लीलारामजी’ में से ‘लीलाशाहजी’ कहकर मुसलमान भी नवाजने लगे। प्राणशक्ति और ज्ञानशक्ति बढ़ जाये तो संकल्प से सब कुछ हो सकता है।

प्राणशक्ति बढ़ाने के उपाय

पोषक आहारः ब्रेड, बिस्कुट, मिठाइयाँ, फास्टफूड, कोल्ड ड्रिंक्स आदि बाजारू खाद्य पदार्थों से जीवनशक्ति क्षीण होती है। प्राकृतिक आहार जैसे फल, सब्जी, गाय का दूध तथा पाचनशक्ति के अनुसार ऋतु-अनुकूल आहार लेने से जीवनशक्ति का विकास होता है। सुबह 9 से 11 और शाम को 5 से 7 बजे के बीच भोजन करने वाले की प्राणशक्ति बढ़िया रहती है।

व्यायाम प्राणायाम

ब्राह्ममुहूर्त (सूर्योदय से सवा दो घंटे पूर्व से सूर्योदय तक) में सभी दिशाओं की हवा सब प्रकार के दोषों से रहित होती है। अतः इस वेला में वायुसेवन तथा दौड़, दीर्घ श्वसन आदि बहुत ही हितकर होता है। प्रातः 4 से 5 बजे के बीच प्राणायाम करें तो प्राणशक्ति खूब बढ़ेगी।

संयमः बॉयफ्रेंड, गर्लफ्रेंड बनाने से जीवनीशक्ति व संयम का नाश होता है। जो लड़के लड़कियों से, लड़कियाँ लड़कों से दोस्ती करती हैं, उनकी प्राणशक्ति दब्बू बन जाती है। लड़की लड़कियों को सहेली बनाये, लड़के लड़कों को दोस्त बनाये तो संयम से प्राणशक्ति और जीवनीशक्ति मजबूत होती है। सदाचरण और ब्रह्मचर्य का पालन करें। साथ ही कब खाना – क्या खाना, कब बोलना, इसका संयम भी होना चाहिए।

ज्ञानशक्ति बढ़ाने के उपाय

तटस्थताः बुद्धि में तटस्थता हो, पक्षपात न हो तो ज्ञानशक्ति बढ़ती है। अपनों के प्रति न्याय और दूसरों के प्रति उदारता का व्यवहार करो। ॐकार का जप करते-करते सो जाओगे तो ज्ञानशक्ति तो बढ़ेगी ही, अनुमान शक्ति और अऩुशासनीय शक्ति भी बढ़ेगी।

समताः किसी भी खुशामद से तुम फूलो नहीं और किसी भी झूठी  निंदा से सिकुड़ो नहीं। सबसे सम व्यवहार करने तथा सुख-दुःख में सम रहने का अभ्यास बढ़ाने से ज्ञानशक्ति बढ़ती है। इससे आप मेधावी बन जाओगे। किस  समय क्या करना है इसकी सूझबूझ और त्वरित निर्णय की क्षमता भी आपमें आयेगी। समत्वयोग समस्त योगों में शिरोमणि है। पचास वर्ष  नंगे पैर घूमने की तपस्या, बीसों वर्ष के व्रत-उपवास चित्त की दो क्षण की समता की बराबरी नहीं कर सकते।

आप ऐसे लोगों से संबंध रखो कि जिनसे आपकी समझ की शक्ति बढ़े, जीवन में आने वाले सुख-दुःख की तरंगों का अपने भीतर शमन करने की ताकत आये, समता बढ़े, जीवन तेजस्वी बने।

विवेकः सत्संग का विवेक, शास्त्रसंबंधी विवेक हो तो ज्ञानशक्ति बढ़ती है। ‘नित्य क्या है, अनित्य क्या है ? करणीय क्या है, अकरणीय क्या है ?’ आदि का विवेक होना चाहिए। आवेश में आकर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। मन में जो आये वह करने लग गये, ऐसा नहीं। विचार करना चाहिए कि मेरी इस चेष्टा का परिणाम क्या होगा ? श्रेष्ठ लोग, गुरु या भगवान देखें, सुनें तो क्या होगा ? विवेकरूपी चौकीदार रहेगा तो बहुत सारी विपदाओं से, पतन के प्रसंगों से ऐसे ही बच जाओगे।

वसिष्ठ जी कहते हैं- “हे राम जी ! जिस पुरुष ने शास्त्रीय विचार का आश्रय लिया है, वह सदविचार की दृढ़ता से जिसकी वांछा ( इच्छा) करता है उसको पाता है। इससे सदविचार उसका परम मित्र है। सदविचारवान पुरुष आपदा में नहीं फँसता और जो कुछ अविचार से क्रिया करते हैं वह दुःख का कारण होती है। जहाँ अविचार है वहाँ दुःख है का कारण होती है। जहाँ अविचार है वहाँ दुःख है, जहाँ सदविचार है वहाँ सुख है। हे राम जी ! शास्त्रीय  विचार से रहित पुरुष बड़ा कष्ट पाता है। इससे एक क्षण भी विचाररहित नहीं रहना।”

भगवान को एकटक देखकर ‘ॐ’ का जप करने से प्राणशक्ति औरर ज्ञानशक्ति दोनों निखरती हैं। ये दोनों शक्तियाँ जितने अंश में विकसित होती हैं, उतने अंश में जीवन सुख, सम्पदा, आयु, आरोग्य और पुष्टि से भर जाता है। ईश्वर, गुरु, ॐ का भ्रूमध्य में थोड़ी देर ध्यान एवं शास्त्र-अध्ययन करने से विचारशक्ति, बुद्धिशक्ति, प्राणशक्ति का खजाना खिलने लगता है। सही सूझबूझ का धनी बना देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2014, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 255

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शिवत्व की विशेष प्रसन्नता पाने का पर्वः महाशिवरात्रि


पूज्य बापू जी

(महाशिवरात्रिः 27 फरवरी 2014)

भगवान शिव कहते हैं-

न स्नानेन न वस्त्रेण न धूपेन न चार्चया।

तुष्यामि न तथा पुष्पैर्यथा तत्रोपवासतः।।

‘हे पार्वती ! महाशिवरात्रि के दिन जो उपवास करता है वह निश्चय ही मुझे संतुष्ट करता है। उस दिन उपवास करने पर मैं जैसा प्रसन्न होता हूँ, वैसा स्नान, वस्त्र, धूप और पुष्प अर्पण करने भी नहीं होता।’

उत्तम उपवास कौन सा ?

‘उप’ माने समीप ‘वास’ करना, अपनी आत्मा के समीप जाने की व्यवस्था बोलते हैं ‘उपवास’। भगवान जितना उपवास से प्रसन्न होते हैं उतना स्नान, वस्त्र, धूप-पुष्प आदि से प्रसन्न नहीं होते।

उप समीपे यो वासो जीवात्मपरमात्मनोः।

‘जीवात्मा का परमात्मा के निकट वास ही उपवास है।’ जप-ध्यान, स्नान, कथा-श्रवण आदि पवित्र सदगुणों के साथ हमारी वृत्ति का वास ही ‘उपवास’ है। ऐसा नहीं कि अनाज नहीं खाया और शकरकंद का सीरा खा लिया और बोले, ‘उपवास है।’ यह उपवास का बिल्कुल निम्न स्वरूप है। उपवास का उत्तम स्वरूप है कि आत्मा के समीप जीवात्मा का वास हो। मध्यम उपवास है कि हफ्ते में एक बार और ऐसे पवित्र दिनों-पर्वों के समय अन्न और भूनी हुई वस्तुओं का त्याग करके केवल जरा सा फल आदि लेकर नाड़ियों की शुद्धि करके ध्यान-भजन करें, यह दूसरे  नम्बर का उपवास है। तीसरे नम्बर का उपवास है कि ‘चलो, रोटी-सब्जी छोड़ो तो राजगिरे के आटे की कढ़ी, साबुदाने की खिचड़ी और सिंघाड़े के आटे का हलुआ खाओ।’ रोज जितना खाते थे और जठरा को जितनी मेहनत करनी पड़ती थी, उससे भी ज्यादा व्रत के दिन मेहनत करनी पड़ती है। यह उपवास नहीं हुआ, मुसीबत मोल ले ली। अथवा तो कुछ लोग उपवास के दिन कुछ नहीं खाते, ‘चलो जल ही पियेंगे।’ और दूसरे दिन फिर पारणा करते हैं तो लड्डू खाते हैं, पेट एकदम साफ होगा और फिर एकदम भारी खुराक ! जैसे गाड़ी एकदम बंद और फिर चालू करके चौथे गियर में डाल दी तो क्या हाल हो जायेगा ? उपवास करने की कला, रीत जान लें और शिवरात्र मनाने की कला सीख लें।

महान बनने का अवसरः महाशिवरत्रि का व्रत-तप

महाशिवरात्र माने कल्याण करने वाली रात्रि, मंगलकारी रात। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी शिवरात्रि है, कल्याणकारी रात्रि है। यह तपस्या का पर्व है।

शिवस्य प्रिया रात्रिर्यस्मिन् व्रते अंगत्वेन विहिता तद् व्रतं शिवरात्र्याख्यम्।

शिवजी को जो प्रिय है ऐसी रात्रि, सुख-शांति-माधुर्य देने वाली, शिव की वह आनंदमयी, प्रिय रात्रि जिसके साथ व्रत का विशेष संबंध है, वह है शिवरात्रि और वह व्रत शिवरात्रि का व्रत कहलाता है। जीवन में अगर कोई-न-कोई व्रत नहीं रखा तो जीवन में दृढ़ता नहीं आयेगी, दक्षता नहीं आयेगी, अपने-आप पर श्रद्धा नहीं बैठेगी और सत्यस्वरूप आत्मा-परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती है। ‘यजुर्वेद’ में आता हैः

व्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्।

दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते।।

तो यह शिवरात्र जैसा पवित्र व्रत आपके मन को पुष्ट व पवित्र करने के लिए, मजबूत करने के लिए आता है। आपको महान बनने का अवसर देता है।

महाशिवरात्रि में रात्रि-पूजन का विधान क्यों ?

महाशिवरात्रि की रात्र को चार प्रहर की पूजा का विधान है। प्रथम प्रहर की पूजा दूध से, दूसरी दही से, तीसरी घी से और चौथी शहद से सम्पन्न होती है। इसका भी अपना प्राकृतिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य है। हमारी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक – चारों स्थितियाँ उन्नत हों इसलिए पूजा  का ऐसा विधान किया गया।

इस महाशिवरात्रि के व्रत में रात ही पूजन क्यों ? यह पूजन रात्र में इसलिए है क्योंकि एक ऋतु पूरी होती है और दूसरी ऋतु शुरु होती है। जैसे सृष्टिचक्र में सृष्टि की उत्पत्ति के बाद नाश और नाश के बाद उत्पत्ति है, ऐसे ही ऋतुचक्र में भी एक के बाद एक ऋतु आती रहती है। एक ऋतु का जाना और नयी ऋतु  आरम्भ होना – इसके बीच का काल यह मध्य दशा है। (महाशिवरात्रि शिशिर और वसंत ऋतुओं की मध्य दशा में आती है।) इस मध्य दशा में अगर जाग्रत रह जायें तो उत्पत्ति और प्रलय के अधिष्ठान में बैठने की, उस अधिष्ठान में  विश्रांति पाने की, आत्मा में विश्रांति पाने की व्यवस्था अच्छी जमती है। इसलिए इस तिथि की रात्र ‘महाशिवरात्र’ कही गयी है।

वैसे कई उपासक हर मास शिवरात्रि मनाते हैं, पूजा-उपासना करते हैं लेकिन बारह मास में एक शिवरात्रि है जिसको महाशिवरात्रि, अहोरात्रि भी कहते हैं। जन्माष्टमी, नरक चतुर्दशी, शिवरात्र और होली, ये चारों महारात्रियाँ हैं। इनमें किया गया जप-तप-ध्यान अनंत गुना फल देता है।

शिवपूजा का तात्त्विक रहस्य

ऋषियों ने, संतों ने बताया है कि बिल्वपत्र का गुण है कि वह वायु की बीमारियों को हटाता है और बिल्वपत्र चढ़ाने के साथ रजोगुण, तमोगुण व सत्त्वगुण का अहं अर्पण करते हैं। पंचामृत मतलब पाँच भूतों से जो कुछ मिला है वह आत्मा परमात्मा के प्रसाद से है, उसको प्रसादरूप में ग्रहण करना। और महादेव की आरती करते हैं अर्थात् प्रकाश में जीना। धूप-दीप करते हैं अर्थात् अपने सुंदर स्वभाव  सुवास फैलाना।

शिवजी त्रिशूल धारण करते हैं। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ये तीनों शूल देते हैं। जाग्रत में चिंता, स्वप्न में अटपटी सी स्वप्नसृष्टि और गहरी नींद (सुषुप्ति) में अज्ञानता – इन तीनों शूलों से पार करने वाली महाशिवरात्रि है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति बदल जाती है फिर भी जो नहीं बदलता, उस आत्मा में आने की रीत बितानेवाला शिवरात्रि का जो सत्संग मिल रहा है, उससे जीव तीन गुणों से पार हो जाता है।

महाशिवरात्रि पूजन का उद्देश्य

वेद परमात्मा के विषय में ‘नेति-नेति’ कहते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश – ये नहीं, ये प्रकृति हैं, इनसे परे जो है वह परमात्मा है। उस परमात्मा में यह जीवात्मा विश्रांति पाये, उस पूजा-विधि  की व्यवस्था और विशेष रूप से फले ऐसा दिन ऋषियों ने चुना और वह दिन है महाशिवरात्रि का।

इस शिवरात्रि की एक कथा प्रचलित है कि एक व्याध दिनभर भटकता रहा, शिकार नहीं  मिला। रात्रि में उसके पास जो  पानी का लोटा था उसे भर के वह किसी जलाशय के किनारे बेलवृक्ष पर बैठ गया। एक प्रहर में एक हिरण आया, दूसरे प्रहर में दूसरा, तीसरे प्रहर में तीसरा और चौथे प्रहर में चौथा हिरण आया लेकिन जब भी वह शिकार करने की तैयारी करता और हिरण के द्वारा दया-याचना होती तो वह उनको क्षमा करता गया और ‘अच्छा, फिर आना….’ ऐसा कहता गया। उसके हिलने डुलने से जाने अनजाने पानी के लोटे को हाथ लगता, पानी  की दो बूँदें वृक्ष के नीचे स्थित शिवलिंग पर गिरतीं और ऐसे ही बैठे-बैठे बिल्वपत्र तोड़ता था, वे बिल्वपत्र नीचे (शिवलिंग पर) गिरते जाते थे। संयोगवश वह महाशिवरात्रि का दिन था। अनजाने में उसकी शिवपूजा हुई और भगवान शिव प्रसन्न हुए तो दूसरे जन्म में वह बड़ा सम्राट हुआ, ऐसी कथा भी आती है।

कहने का तात्पर्य यह है कि अनजाने में भी अगर पुण्यमय तिथि का जागरण हो जाता है, त्याग हो जाता है और दूसरे के दुःख में आप थोड़ा अपने स्वार्थ को छोड़ देते हैं तो आप सम्राट बनने के योग्य हो जाते हैं। लेकिन सम्राट बनना ही जीवन का लक्ष्य नहीं है। सम्राट पद भोगकर भी गिरना पड़ता है। अगर उस व्याध को की संत मिल जाते तो उस महाशिवरात्रि की पूजा का फल दूसरे जन्म में सम्राट बनने तक सीमित नहीं होता। शिवजी जिस परमात्मा में विश्रान्ति पाकर शिवतत्त्व में निमग्न रहते हैं, मनुष्यमात्र अपने ऐसे स्वाभाविक शिवतत्त्व में मग्न रहने का अधिकारी है। इसी जन्म में उस तत्त्व का साक्षात्कार कर लें।

जिस पुत्र-परिवार और मेरे तेरे में हम लोग जगते हैं (सतर्क एवं रचे-पचे रहते हैं) उससे शिवजी बेपरवाह हैं और जिस शिवतत्त्व से हम बेपरवाह हैं उसमें शिवजी सदा निमग्न रहते हैं। पार्वती जी जा रही हैं  मायके लेकिन  शिवजी तेरे मेरे में नहीं अटके।

संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।

जो सहज स्वरूप में निमग्न रहते हैं ऐसे परमात्म-शिव की जो उपासना, आराधना करता है उसकी  मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं लेकिन जीवन मनोकामना पूर्ण करने के लिए नहीं है। असली जीवन तो मन की तुच्छ कामनाएँ निवृत्त करके मन की कामनाएँ जहाँ से पूर्ण और अपूर्ण दिखती हैं, उस जीवनददाता को पहचानने के लिए है, ‘मैं’ रूप में जानने के लिए है, साक्षात्कार करने के लिए है। ऐसा ज्ञान अगर गुरुओं के द्वारा मिल जाय और हम पचा लें तो हमें एकाध शिवरात्रि पर्याप्त हो जायेगी शिवतत्त्व  में जगने के लिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2014, पृष्ठ संख्या 11-13, अंक 254

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पुत्रि पबित्र किये कुल दोऊ


यह एक सत्य घटना है। एक परिवार में एक सेवानिवृत्त ईमानदार न्यायाधीश और उनकी पत्नी दोनों धार्मिक विचारों के सदगृहस्थ थे। उनकी एक पुत्री थी लक्ष्मी, जिसे बी.ए. तक आधुनिक शिक्षा के साथ हिन्दू धर्म व संस्कृति की ऊँची शिक्षा तथा बचपन से ही सत्संग का माहौल मिला था।

जज साहब अपनी बेटी के लिए संस्कारी, ईमानदार और सत्संगी वर की तलाश में थे। एक दिन रास्ते में उनकी गाड़ी के इंजन में खराबी आ गयी। चालक द्वारा बहुत प्रयास करने पर भी वह ठीक नहीं हो रहा था और कार को धक्का लगाने के लिए भी कोई तैयार न था। तभी सादे पोशाक में एक नवयुवक वहाँ आया। चालक को स्टीयरिंग पकड़ने के लिए कहकर उसने अकेले ही भारी गाड़ी को धक्का देना चालू किया और गाड़ी चालू किया और गाड़ी चालू हो गयी। जज साहब उस पुरुषार्थी, नेक युवक को धन्यवाद देकर उसे उसके  गंतव्य स्थान तक पहुँचाने हेतु अपनी गाड़ी में बिठा लिया।

गाड़ी में जज साहब द्वारा परिचय पूछने पर उसने बतायाः “मैं विश्वविद्यालय का एक छात्र तथा गरीब परिवार का लड़का हूँ। प्रतिवर्ष प्रथम आने के कारण मुझे छात्रवृत्ति मिलती है, जिससे मैट्रिक से एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की है। अब सरकारी छात्रवृत्ति द्वारा आगे की शिक्षा प्राप्त करने हेतु दो महीने के भीतर परदेश जाऊँगा।”

युवक की बुद्धिशीलता और अदबभरे व्यवहार से जज साहब बहुत प्रभावित हुए। ‘भले ही इसके पास पैसे की पूँजी नहीं है, मगर संस्कारों की पूँजी तो है।’ – यह सोचकर उन्होंने अपनी पुत्री लक्ष्मी का विवाह उस युवक के साथ कर दिया।

जज साहब की इच्छा थी कि दामाद के परदेश जाने से पहले लक्ष्मी अपनी ससुराल हो आये। प्रस्ताव को सुनकर युवक बोलाः “मैं पहले गाँव जाकर घर ठीक-ठाक करा आऊँ फिर ले जाऊँगा।” क्योंकि लड़के का घर खंडहर था।

युवक ने गाँव आकर अपने धनाढय चाचा से प्रार्थना की कि वे अपने घर को उसका बताकर लक्ष्मी को वहीं रख लें। चाचा मान गये। लक्ष्मी को ससुराल  लाकर युवक 5-7 दिनों बाद परदेश चला गया। लक्ष्मी अपने मिलनसार स्वभाव के कारण 2-4 दिन में ही सबकी चहेती बन गयी।

एक दिन एक महिला ने लक्ष्मी को ताना कसाः “क्या तुम्हारा बाप अँधा था जो बिना देखे तुझे दूसरे के घर में रहने को भेज दिया ?”

लक्ष्मी ने आश्चर्य से पूछाः “क्या यह मेरा घर नहीं है ?”

महिला ने एक खंडहर की ओर इशारा करते हुए कहाः “देखो, वह है तुम्हारा घर ! यह घर तो तुम्हारे पति के चाचे का है।”

दुःखद परिस्थितियों में समता बनाये रखने की सुंदर सीख पायी हुई सत्संगी लक्ष्मी ने बिना रोये-धोये, खुशी-खुशी अपना सामान बाँधा और नौकर के हाथों उस खंडहर घर में सामान भिजवाने लगी। चाचा के समझाने पर उसने विनम्रता से कहाः ” चाचा जी ! दोनों घर अपने ही हैं। मैं इसमें भी रहूँगी, उसमें भी रहूँगी।” उसकी सुंदर सूझबूझ से चाचा जी बहुत प्रसन्न हुए।

अपने घर में आकर उसने सबसे पहले अपने ससुर के चरण छुए। फिर एक आदर्श गृहलक्ष्मी की तरह सारे घर को साफ-सुथरा करके सब कुछ एकदम व्यवस्थित कर दिया।

रात को उस पढ़ी लिखी संस्कारी बहू ने अपनी स्थिति का वर्णन करते हुए माता-पिता को पत्र लिखाः ‘आज मुझे आपके द्वारा  मिले भारतीय संस्कृति के संस्कारों की पूँजी बहुत काम आयी। उन्हीं संस्कारों ने आज मुझे सभी परिस्थितियों का सामना कर हर हाल में खुश रहने की कला सिखायी है।…’

माता पिता को बेटी की समझ पर बड़ा गर्व हुआ। उन्होंने वहाँ से घर के निर्माण कार्य के सामान व कारीगरों के साथ एक पत्र भेजा, जिसमें एक पंक्ति लिखी थी, ‘पुत्रि पबित्र किये कुल दोऊ।’ लक्ष्मी उसे पढ़कर भावविभोर हो गयी। आये हुए कारीगरों ने कुछ ही समय में एक सुंदर मकान खड़ा कर दिया। परदेश गये अपने पति को लक्ष्मी ने अभी तक कुछ बताया नहीं था।

गृह-प्रवेश के दिन लक्ष्मी के माता-पिता व पति गाँव आये। बड़ी धूमधाम से सबसे पहले युवक के पिताजी को गृहप्रवेश कराया गया। इसके बाद सबने प्रवेश किया। इस कार्यक्रम को देखने हेतु आसपास की गरीब महिलाओं का एक झुंड अलग खड़ा था। बहू स्वयं एक-एक का हाथ पकड़कर उन्हें घरर के भीतर लायी और सबको भोजन कराया। सभी आदर्श बहू पर आशीर्वादों की वृष्टि करने लगे। पति तो यह परिवर्तन देखकर अवाक् सा रह गया। माता-पिता को भी अपनी पुत्री को देखकर आत्मसंतुष्टि हो रही थी कि सचमुच, आज सत्संग के कारण ही यह सम्भव हो पाया है।

तत्पश्चात लक्ष्मी  पति पुनः विदेश गया और कुछ दिनों बाद अपनी शिक्षा पूरी कर स्वदेश लौट आया और पूरा परिवार एक साथ रहने लगा।

कैसी है भारत की दिव्य संस्कृति और संस्कार कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त छात्रा ने भी विपरीत परिस्थितियों में अपना धैर्य नहीं खोया बल्कि गृहस्थ-जीवन को सुखमय जीवन में बदल दिया, संयम-सदाचार, समत्व में सराबोर कर दिया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2014, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 254

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