‘हे मन ! व्यर्थ क्यों चक्कर लगा रहा है ? कहीं विश्राम कर। जो काम या बात जैसे होने वाली होती है वह अपने-आप वैसे ही हो जाती है, और किसी प्रकार से नहीं होती। अतः मैं बीती बात का विचार न करते हुए और आगे आने वाली बात का भी विचार (चिंता) न करते हुए बिना सोचे (मन में भोगों की कामना न करते हुए अनासक्त भाव से) सहसा प्राप्त होने वाले भोगों को भोगता हूँ।
वैराग्य शतकः 62
हमारा मन कुछ पाकर, कुछ मिटा के, कुछ बना के संसार से सुख पाने की इच्छा से इधर-उधर भटकता रहता है लेकिन जो प्रारब्ध है वह बिना प्रयास के मिलकर ही रहता है और जो नहीं है वह खूब मेहनत करके पा भी लिया तो छूट ही जाता है। इसलिए विवेकीजन संसार के अनित्य भोगों के पीछे नहीं दौड़ते बल्कि प्रारब्धवश जो मिल जाता है, उसी को पाकर संतुष्ट रहते हैं और जो स्वतः प्राप्त है ऐसे परमात्मा का आश्रय ले के उसी में विश्रांति पाते हैं। संत कबीर जी कहते हैं-
मन अपना समुझाय ले, आया गाफिल होय।
बिन समुझे उठि जायगा, फोकट फेरा तोय।।
‘ऐ मानव ! अपने मन को यह अच्छी तरह समझा ले कि अज्ञानी होकर तू जन्म ले के आया है और जानने योग्य अपने आत्मस्वरूप का, ईश्वर-स्वरूप का ज्ञान पाये बिना ही दुनिया से उठ चलेगा तो तेरा यह चौरासी लाख योनियों का फेरा व्यर्थ ही चला जायेगा।’
पूज्य बापू जी के सत्संगामृत में आता हैः “हमारा अधिकांश समय भूतकाल के चिंतन और भविष्य की कल्पनाओं में व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है जबकि बीती बातों के चिंतन से कोई लाभ नहीं होता और भविष्य की कल्पनाओं में उलझने से कुछ हाथ नहीं लगता।
अरे, जो प्रारब्ध में होगा, आयेगा। बच्चा माँ के गर्भ से जन्म लेता है तो क्या कामना करता है कि ‘मेरे लिए दूध बन जाय, दूध बन जाय…’ ? प्रकृति और परमात्मा की व्यवस्था है, अपने आप दूध बन गया न ! तो प्रारब्ध वेग से सब मिलता रहता है। क्या आप कामना करते हो कि ‘श्वास मिल जाय, मिल जाय….’ ? अरे, आपकी आवश्यकता है तो श्वास मिलता रहता है। इसलिए कामना करके अपनी इज्जत मत बिगाड़ो, लालसा (परमात्मप्राप्ति की इच्छा) और जिज्ञासा करके उनको बढ़ाकर अपना आत्मखजाना पा लो बस !”
स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 25, अंक 309
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