Monthly Archives: May 2019

ऐसे लोग अपनी 7-7 पीढ़ीयाँ तारते हैं-पूज्य बापू जी


मशीन को काम दिया जाता है और इंसान को ज्ञान दिया जाता है । एक होता है ऐहिक ज्ञान, दूसरा अलौकिक ज्ञान और तीसरा ब्रह्मज्ञान । ऐहिक ज्ञान और अलौकिक ज्ञान – ये जहाँ से आते हैं वह है वास्तविक ज्ञान (ब्रह्मज्ञान) । ब्रह्मज्ञान के आराधकों को अथवा ब्रह्मज्ञान के पिपासुओं को उस वास्तविक ज्ञान का आदर करना चाहिए । उसका जितना आदर होगा उतना ही उनकी बुद्धि उधर के लिए समय लगायेगी और उतना ही उनकी इन्द्रियों और मन पर बुद्धि का अधिकार जमता जायेगा । ज्यों-ज्यों इन्द्रियों और मन पर बुद्धि का अधिकार जमता जायेगा त्यों-त्यों बुद्धि ‘ऋत’ आत्मा में विश्रांति पाती जायेगी । ‘ऋत’ माने सत्य और सत्य में विश्रांति पाते ही बुद्धि को सत्यस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार होगा । तब वह बुद्धि ऋतम्भरा प्रज्ञा कही जाती है । गीता में भगवान ने कहाः ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।’ उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित हो गयी ।

इसलिए अन्नदान, भूमिदान, कन्यादान, गोदान, गौरस-दान से भी ज्यादा मंगलकारी ऋषियों के सत्संग का दान करने वालों को तो धन्यवाद, उनके माता-पिताओं को भी धन्यवाद और उनको जो उत्साहित करें उनको भी धन्यवाद ।

भगवान कहते हैं-

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते ।

प्रसाद से सारे दुःख मिटते हैं ।

धनभागी हैं वे लोग, जो ‘ऋषि प्रसाद’, ‘ऋषि दर्शन’ बाँटते हैं-बँटवाते हैं ! उनके माता-पिता को भी धन्यवाद है ! ऐसे लोग अपनी 7-7 पीढ़ीयाँ तारते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2019, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 317

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साँईं श्री लीलाशाह जी की अमृतवाणी


हम क्या हैं और अपने को क्या समझते हैं ?

हम अनित्य पदार्थों को नित्य समझ बैठे हैं । यह हम भारी भूल कर रहे हैं । क्या यह शरीर हमारा है ? इस पर हमारा भरोसा कैसा ? इस पर इतना गर्व क्यों ? हम अनित्य पदार्थों की कितनी चिंता करते हैं । स्वयं क्या हैं यह हम सोचते ही नहीं । हम सेठ हैं लेकिन अपने को मोटर समझ बैठे हैं । हम मकान के स्वामी हैं परन्तु स्वयं को मकान मान बैठे हैं अर्थात् हम अजर-अमर आत्मा हैं किंतु अपने को यह शरीर समझ बैठे हैं ! कितनी विडम्बना है न ! जरा विचारो और विवेक जगाओ ।

दुःखस्वरूप संसार सुखरूप कैसे हो ?

सागर का पानी खारा होता है । वही पानी सूर्य के ताप के कारण भाप हो के ऊपर जाता है और बादलों का रूप ग्रहण करता है । फिर वही वर्षा होकर बरसता है । वह पानी खारा नहीं होता, मीठा होता है । सागर के पानी का खारापन सूर्य के ताप से निकल जाता है ।

इसी प्रकार यह संसार खारा अर्थात् दुःखरूप भासता है किंतु श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों के संग में रहकर सत्शास्त्रों का श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन करने से वह सुखरूप भासता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2019, पृष्ठ संख्या 13 अंक 317

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सेवाभाव से घर में प्रकटाये महान संत


संत टेऊँराम जी पुण्यतिथिः 8 जून 2019, जन्यतीः 8 जुलाई

सिंध प्रदेश के हैदराबाद जिले में सिंधु नदी के तट पर बसे खंडू गाँव में भक्त चेलाराम जी रहते थे । वे इतने संतसेवी थे कि कहीं भी किन्हीं सत्पुरुष, महात्मा को देखते तो उनको अपने घर में ले जाते और प्रेमपूर्वक भोजनादि से संतुष्ट करके ही उन्हें विदा करते । उनके घर में नियमित रूप से कथा-कीर्तन होता रहता था । चेलाराम जी की पत्नी कृष्णा देवी भी भक्ति र सेवा में पति से कम नहीं थीं ।

एक बार एक संत-मंडली खंडू में आयी । भक्त जी संतों को घर लेकर आये और श्रद्धापूर्वक उनका भलीभाँति आदर-सत्कार किया । चेलाराम जी की प्रार्थना पर सत्संग का आयोजन हुआ । सत्संग-कीर्तन करते हुए वे संतपुरुष भगवत्प्रेम में, अपने स्वरूप की मस्ती में इतने तो तन्मय हो गये कि उनका दर्शन करने आये लोग भी अपने शरीर की सुध-बुध भूलकर कीर्तन में तल्लीन हो गये ।

कृष्णा देवी भी आनंदमग्न हो गयीं । वे मन-ही-मन भगवान से प्रार्थना करने लगीं की ‘हे प्रभो ! इन सत्पुरुषों जैसे योगी महात्मा मेरे घर में पुत्ररूप में अवतरित हों ।’ सत्संग पूरा हुआ । चेलाराम जी व कृष्णादेवी की सेवा से संतुष्ट हुए उन महात्माओं ने उनसे कुछ माँगने को कहा । तब कृष्णा देवी ने अपने मन की बात संतों के श्रीचरणों में निवेदित की ।

महात्माओं ने आशीर्वाद देते हुए कहाः “जो संतों की सेवा व सत्संग का श्रवण-मनन करते हैं, दूसरों तक सत्संग पहुँचाने में निमित्त बनते हैं ऐसे पुण्यात्मा भक्तों पर भगवान विशेष प्रसन्न रहते हैं और उनकी शुभेच्छा की पूर्ति भी करते हैं । आपके शुभ कर्म ही आपके घर में एक दिव्यात्मा के रूप में अवतरित होंगे ।” संतों ने कृष्णा देवी को कुछ साधना-विधि भी बतायी ।

कृष्णा देवी ने चालीस दिन का व्रत अनुष्ठान प्रारम्भ किया । वे अपना अधिकांश समय सत्शास्त्र अध्ययन, महापुरुषों के वचनों का चिंतन-मनन, परमात्म-ध्यान आदि में लगाने लगीं । अनुष्ठान की अंतिम रात्रि को ईश्वर ने कृष्णा देवी को स्वप्न में कहाः ‘हे कल्याणी ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ । तुम्हारा संकल्प शीघ्र ही पूर्ण होगा ।’ यह खबर सुनकर कृष्णा देवी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा ।

समय पाकर उन्हें एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई । बालक को एक तरफ जहाँ माता-पिता से उत्तम संस्कार मिले, वहीं दूसरी तरफ सद्गुरु आसूराम जी का कृपा-प्रसाद मिला और आगे चलकर ये संत टेऊँरामजी के नाम से प्रसिद्ध हो गये । सद्गुरुकृपा से उन्हें जो मिला उसका वर्णन करते हुए वे कहते हैं-

जो कुछ दीसै1 सोई है प्रभु, उस बिन और न कोई है ।

नाम-रूप यह जगत बना जो, वासुदेव भी वोही है ।।

अस्ति2 भाति3 प्रिय4 रूप जो, सत् चित् आनंद सोई है ।

कह टेऊँ गुरु भ्रम मिटाया, जहँ देखूँ तहँ ओई5 है ।।

1 दिख रहा 2 सदा विद्यमान, शाश्वत अस्तित्व 3 ज्ञानस्वरूप 4 आनंदस्वरूप 5 वही (परमात्मा)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2019, पृष्ठ संख्या 21 अंक 317

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