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क्या जाने वो कैसो रे………


(भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज )

◆ ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के क्रियाकलाप सहज होते हैं। उनके श्रीमुख से निकली सहज वाणी ओभी ईश्वरीय वाणी होती है। उससे कितनों का भला हो जाता है, इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है यह घटना

एक बार जेतपुर (गुजरात) में ‘अखिल भारत लोअर सिंध पंचायत’ का सम्मेलन था, जहाँ साँईं श्री लीलाशाहजी भी उपस्थित थे। सिंधी समाज एवं भक्तों के दृढ़ आग्रह की वजह से लगभग हर सम्मेलन में स्वामी जी जरूर जाते थे तथा समस्त कार्यवाही उनकी देखरेख में चलती थी।

◆ उस सम्मेलन में किसी ने प्रधान को एक चाँदी की डिब्बी भेंट में दी थी। डिब्बी का सदुपयोग समाज के लिए हो इस उद्देश्य से साँईं श्री लीलाशाहजी ने उसे नीलाम करके उससे मिलने वाले पैसों को सामाजिक कार्य में लगाने की युक्ति अपनायी। महापुरुषों से प्राप्त प्रसाद की महत्ता कौन कितनी समझता है यह देखने तथा सेवा में अधिक से अधिक योगदान हो इसलिए नीलामी की जिम्मेदारी साँईं जी ने स्वयं ले ली। वे बड़े ही सहज ढंग से डिब्बी हाथ में लेकर सम्मेलन में आये हुए सदस्यों को कहने लगे कि “इसकी बड़ी बोली लगाओ।” कभी कभी तो स्वयं ही किसी-किसी भक्त से कहते कि “तुम्हारी बोली इतनी या इतनी ?” इस प्रकार आखिर में वह डिब्बी, जिसकी कीमत 50 रूपये से अधिक न थी, वह 500 रूपये में अहमदाबाद के एक कपड़ा व्यवसायी भक्त ने ली।

◆ सचमुच, जिनके लिए सारा ब्रह्माण्ड तिनके के समान है, जिनके लिए तीनों कालों में जगत बना ही नहीं, केवल स्वप्नवत मिथ्या है, ऐसे ब्रह्मनिष्ठ संत छोटे से छोटे कार्य को भी एक कुलीन राजकुमार की नाईं करते हैं, एक कलाकार के रूप में अपना किरदार बखूबी निभाते हैं। लेकिन उनकी ऐसी लौकिक क्रियाओं के पीछे छुपे रहस्यों को बाह्य दृष्टि से नापने-तौलने वाले लोग समझ नहीं पाते।

◆ शाम के समय जब स्वामी जी ने अपने निवास पर आये तो एक सेवक ने कहाः “स्वामी जी ! आज तो आपने ऑक्शनर्स जैसी भूमिका निभायी।”

स्वामी जी ने पूछाः “ऑक्शनर्स क्या ?”

◆ “स्वामी जी ! ऑक्शनर्स माने जो नीलामी करने वाले होते हैं, वे ऐसे ही अपने सामान की तारीफ करके उसका मूल्य बढ़ाने में अपनी कला दिखाते हैं।”

“भला ऐसा मैंने क्या किया ?”

“स्वामी जी ! आप ऐसे कह रहे थे कि जैसे यह डिब्बी नहीं साक्षात लक्ष्मी है लक्ष्मी !….”

यह सुन स्वामी जी थोड़ा मुस्कराये, फिर शांत हो गये। ऐसे प्रश्नों का कभी महापुरुष जवाब न भी दें लेकिन प्रकृति अवश्य उत्तर देती है। उस समय स्वामी जी की वह रहस्यमयी मुसकराहट कोई समझ नहीं पाया लेकिन कुछ समय बाद पता चला कि जिसने वह डिब्बी ली थी वह व्यापारी तो मालामाल हो गया है ! तब उस सेवक को हुआ कि ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों की लीलाओं को मानुषी बुद्धि से तौलना असम्भव है। इसीलिए गुरुवाणी में आता हैः

ब्रह्मगिआनी की मिति कउनु बखानै।

◆ ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों में कर्तापन नहीं होता। निःस्वार्थ, निखालिस ब्रह्मवेत्ताओं की ऐसी लीलाएँ जहाँ एक और लोकमांगल्यकारी होती हैं, वहीं दूसरी ओर भक्तों को आनंदित-आह्लादित, उन्नत कर देती हैं।

सदगुरु तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं


● ब्रह्मवेत्ता गुरु ने अपने सत्शिष्य पर कृपा बरसाते हुए कहाः “वत्स ! “तेरा मेरा मिलन हुआ है (तूने मंत्रदीक्षा ली है) तब से तू अकेला नहीं और तेरे मेरे बीच दूरी भी नहीं है। दूरी तेरे-मेरे शरीरों में हो सकती है, आत्मराज्य में दूरी की कोई गुंजाइश नहीं। आत्मराज्य में देश-काल की कोई विघ्न बाधाएँ नहीं आ सकतीं, देश काल की दूरी नहीं हो सकती। तू अब आत्मराज्य में आ रहा है, इसलिए जहाँ तूने आँखें मूँदीं, गोता मारा वहीं तू कुछ-न-कुछ पा लेगा।”

● करतारपुर में सत्संगियों की भारी दौड़ में गुरु नानक जी सत्संग कर रहे थे। किसी भक्त ने ताँबे के पैसे रख दिये। आज तक कभी भी नानक जी ने पैसे उठाये नहीं थे परंतु आज चालू सत्संग में उन पैसों को उठाकर दायीं हथेली से बायीं ओर और बायीं हथेली से दायीं हथेली पर रखे जा रहे हैं। नानक जी के शिष्य बाला और मरदाना चकित से रह गये। ताँबे के वे 4 पैसे, जो कोई 10-10 ग्राम का एक पैसा होता होगा, करीब 40 ग्राम होंगे।

● नानकजी बड़ी गम्भीर मुद्रा में बैठे हुए, सत्संग करते हुए पैसों को हथेलियों पर अदल-बदल रहे हैं। वे उसी समय उछाल रहे हैं, जिस समय हजारों मील दूर उनका भक्त जो किराने का धंधा करता था, वह वजीर के लड़के को शक्कर तौलकर देता है। शक्कर किसी असावधानी से रास्ते में थैले से ढुल गयी। वजीर ने शक्कर तौली तो 4 रानी छाप पैसे के वजन की शक्कर कम थी। वजीर ने राजा से शिकायत की। उस गुरुमुख को सिपाही पकड़कर राजदरबार में लाये।

● वह गुरुमुख अपने गुरु को ध्याता है ʹनानकजी ! मैं तुम्हारे द्वार तो नहीं पहुँच सकता हूँ परंतु तुम मेरे दिल के द्वार पर हो, मेरी रक्षा करो। मैंने तो व्यवहार ईमानदारी से किया है लेकिन अब शक्कर रास्ते में ही ढुल गई या कैसे क्या हुआ यह मुझे पता नहीं। जैसे, जो भी हुआ हो, कर्म का फल तो भोगना ही है परंतु हे दीनदयालु ! मैंने यह कर्म नहीं किया है। मुझ पर राजा की, सिपाहियों की, वजीर की कड़ी नजर है किंतु गुरुदेव ! तुम्हारी तो सदा मीठी नजर रहती है।ʹ

● व्यापारी ने सच्चे हृदय से अपने सदगुरु को पुकारा। नानकजी 4 पैसे ज्यों दायीं हथेली पर रखते हैं त्यों जो शक्कर कम थी वह पूरी हो जाती है। वजीर, तौलने वाले तथा राजा चकित हैं। पलड़ा बदला गया। जब दायें पलड़े पर शक्कर का थैला था वह उठाकर बायें पलड़े पर रखते हैं तो नानक जी भी अपने दायें पलड़े (हथेली) से पैसे उठाकर बायें पलड़े (हथेली) में रखते हैं और वहाँ शक्कर पूरी हुई जा रही है। ऐसा कई बार होने पर ʹखुदा की लीला है, नियति हैʹ, ऐसा समझकर राजा ने उस दुकानदार को छोड़ दिया।

● बाला, मरदाना ने सत्संग के बाद नानकजी से पूछाः “गुरुदेव ! आप पैसे छूते नहीं हैं फिर आज क्यों पैसे उठाकर हथेली बदलते जा रहे थे ?”

● नानकजी बोलेः “बाला और मरदाना ! मेरा वह सोभसिंह जो था, उसके ऊपर आपत्ति आयी थी। वह था बेगुनाह। अगर गुनहगार भी होता और सच्चे हृदय से पुकारता तब भी मुझे ऐसा कुछ करना ही पड़ता क्योंकि वह मेरा हो चुका है, मैं उसका हूँ। अब मैं उन दिनों का इंतजार करता हूँ कि वह मुझसे दूर नहीं, मैं उससे दूर नहीं, ऐसे सत् अकाल पुरुष को वह पा ले। जब तक वह काल में है तब तक प्रतीति में उसकी सत्-बुद्धि होती है, उसको अपमान सच्चा लगेगा, दुःखी होगा। मान सच्चा लगेगा, सुखी होगा, आसक्त होगा। मैं चाहता हूँ कि उसकी रक्षा करते-करते उसको सुख-दुःख दोनों से पार करके मैं अपने स्वरूप का उसको दान कर दूँ। यह तो मैंने कुछ नहीं उसकी सेवा की, मैं तो अपने-आपको दे डालने की सेवा का भी इंतजार करता हूँ।”

● शिष्य जब जान जाता है कि गुरु लोग इतने उदार होते हैं, इतना देना चाहते हैं, शिष्य का हृदय और भी भावना से, गुरु के सत्संग से पावन होता है। साधक की अनुभूतियाँ, साधक की श्रद्धा, तत्परता और साधक की फिसलाहट, साधक का प्रेम और साधक की पुकार गुरुदेव जानते हैं।

गुरुभक्तों के अनूठे वरदान (बोध कथा)….


मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ मांगो तुम मुझसे कोई एक वर मांग लो यदि आपको अपने गुरु से ऐसे वचन सुनने को मिले तो आप वरस्वरूप उनसे क्या मांगेंगे? यह प्रस्ताव कितना लुभावना सा है हमे सोचने को मजबूर कर ही देता है। भोगी से योगी तक सभी इस पर विचार करते है फ़र्क बस इतना ही है कि इसका जवाब गढ़ने के लिए एक सांसारिक अपनी बुद्धि की चतुराई लड़ाता है और एक साधक गुरुभक्त मन की भक्ताई लगाता है अर्थात भक्तिभावना लगाता है।

भागवत के एक ही प्रसंग में जब हिरण्यकश्यपु को मांगने का अवसर मिला तो उसने भरपूर बुद्धि भिड़ाई और बहुत ही टेढ़ी अंदाज में अमरता मांग ली मैं न पृथ्वी में मरु न आकाश में न भीतर मरु न बाहर मरु आदि आदि.. परन्तु हिरण्यकश्यपु वध के बाद जब भगवान नरसिंह ने भक्त प्रह्लाद को वर मांगने को कहा तो वह सजल आंखे लिए बोला- मेरी कोई कामना न रहे मेरी यही कामना है। मतलब की सांसारिक व्यक्ति की मांग मैं मेरे के स्वार्थी दायरों के बाहर नही आ पाती बड़ी छिछली सी होती है मगर एक शिष्य की एक गुरुभक्त की सोच व्यापकता को उपलब्ध होती है क्योंकि उसका प्रेम व्यापक से है व्यापकस्वरूप गुरुदेव से है।

कई भक्तो ने ऐसे अवसर पर अपने भक्तिभाव से सराबोर सुंदर और भक्ति वर्धिनी उदगार व्यक्त किये है इस अवसर पर कि तुम मुझसे कुछ वर मांगो।

पहला गुरुभक्त कहता है कि-

ऐसे में मैं गुरुजी से गुरुजी को मांग लूंगा। गुरुजी को मांगने का मतलब क्या है? यही कि गुरुदेव हमारे भीतर ऐसे समा जाए कि हमारे हर विचार हर व्यवहार हर कर्म पर वे झलके ताकि जब समाज हमे देखे तो समाज को गुरुमहाराज की ही याद आये उनकी ऊंचाई का भान हो और वह गदगद होकर कह उठे जब शिष्य ऐसे है तो साक्षात इनके गुरु कैसे होंगे।

इस अवसर पर दूसरा गुरुभक्त कहता है कि- जब भी श्री गुरुमहाराज इस धरा पर आए मैं भी उनके साथ ही आऊ और मैं उनकी आयु का ही होऊ और मेरी चेतना को यह ज्ञान हो कि मेरे गुरुवर साक्षात भगवान है और फिर मैं जी भर के उनकी सेवा करूँ और उनसे प्यार करूँ। तो भाई उनकी आयु के होने के पीछे क्या रहस्य है? गुरुदेव की आयु के होने से यह लाभ होगा कि मैं उनके अवतरण काल मे ज्यादा से ज्यादा जीवन बिता पाऊंगा और उनके सानिध्य का आनंद लाभ उठा पाऊंगा उनसे पहले आया तो हो सकता है कि उन्हें छोड़कर मुझे इस धरती से जाना पड़े, उनके अवतरण के काफी बाद में मेरा जन्म हुआ तो हो सकता है कि वे मुझे इस संसार मे अकेले छोड़कर चले जाएं।

तीसरा गुरुभक्त कहता है इस अवसर पर कि अगर गुरुमहाराज जी मुझसे वरदान मांगने को कहेंगे तो मैं यही मांगूंगा कि- वे मुझे एक ईंट के समान बनाये और वह ईंट उनके आश्रम के नींव में लगाई जाए इसके पीछे मेरी भावना बस यही है कि जबतक मै जियूँ छिप के..प्रदर्शन, नाम, बड़ाई से अछूता रहकर गुरुदेव की सेवा करता रहूं और जैसे एक ईंट मिट कर मिट्टी हो जाता है अंततः मैं भी गुरुदरबार की मिट्टी बनू, गुरुचरणों की रज बन जाऊं अर्थात सदा-सदा निमाणी भाव से उनका होकर रहूं।

इस अवसर पर चौथा गुरुभक्त कहता है कि-हे गुरुदेव! वर देना तो एक ऐसा दास बनाना जिसका अपना कोई मन मौजी सोच विचार न हो इस दास की बुद्धि में सिर्फ उन्ही विचारों को प्रवेश मिले जो गुरुदेव को पसंद हो जब विचार गुरुदेव के होंगे तो कार्य भी गुरुदेव के होंगे, कार्य गुरुदेव के होंगे तो जीवन भी गुरुदेव का होकर रह जायेगा इस दास को यह पता होगा कि मेरे मालिक अब क्या चाहते है जैसे महाराज जी हमारे कहने से पहले ही हमारे मन की बात जान जाते है वैसे ही दास को गुरुवर के कहने से पहले ही गुरुवर के मन की बात पता होगी। बात पता चलते ही वह सक्रिय होकर उन्हें पूरा करने लगेगा यदि मैं संक्षेप में कहूँ तो मुझे ऐसा दास बनने की चाह है जैसा गुरुदेव का हाथ जिसकी अपनी कोई मति नही, सोचते गुरुमहाराज जी है वही सोच हाथ तक पहुंच जाती है और बस हाथ उसे पूरा कर देता है। जो महाराज जी सोचे मैं भी अन्तर्वश उसे पूरा करता जाऊँ।

पांचवा भक्त इस अवसर पर कहता है कि- अगर गुरुमहाराज जी से मुझे कुछ मांगने का अवसर मिलेगा तो शायद मैं उस समय कुछ बोल ही नही पाऊंगा मेरी आँखों से बहते अश्रु गुरुदेव से अपनी इच्छा जरूर व्यक्त कर देंगे परन्तु मेरी वाणी मौन रहेगी।

इस अवसर पर छठा भक्त कहता है- जब आखिरी श्वास निकले तो गुरुदेव के श्री चरणों मे मेरा मस्तक हो उनका मुस्कुराता हुआ प्रसन्न चेहरा मेरी आँखों के सामने.. और वे गर्वोक्त स्वर में

मुझसे कहें कि बेटे तुझे जो कार्य मैने सौंपा था वह पूर्ण हुआ चल अब यहां से लौट चले।

इस अवसर पर सातवां गुरुभक्त कहता है कि- हे गुरुदेव! सुंदर भावों से युक्त मन मुझे दे दो क्योंकि मेरे पास भाव का ही अभाव रहता है और गुरुदेव की दृष्टि अगर हमसे कुछ खोजती है तो भावों को ही खोजती है वैभव सौंदर्य, वाक पटुता अन्य कुछ नही यदि हम भावों द्वारा उनसे जुड़े है तो वे हमेशा हमसे हमारे लिए उपलब्ध है इसलिए हे गुरुदेव! मैं तो वरदान स्वरूप में भावों की ही सौगात माँगूंगा।