Monthly Archives: April 2020

संक्रामक बीमारियों से कैसे हो सुरक्षा ?


आयुर्वेद में संक्रामक बीमारियों का वर्णन आगंतुक ज्वर (अर्थात् बाह्य कारणों से उत्पन्न बुखार या रोग) के अंतर्गत आया है । यह किसी को होता है और किसी को नहीं, ऐसा क्यों ?

(चरक संहिता (चिकित्सा स्थानः 3.11.12) में आचार्य पुनर्वसु कहते हैं- “एक ही ज्वररूपी अर्थ को ज्वर, विकार, रोग, व्याधि और आतंक – इन नामबोधक पर्याप्त शब्दों से कहा जाता है । शारीरिक व मानसिक दोषों के प्रकोप के बिना शारीरिक व मानसिक दोषों के प्रकोप के बिना शरीरधारियों को ज्वर (रोग) नहीं होता अतः शारीरिक वात, पित्त, कफ तथा मानसिक रजो-तमोगुणरूप दोष ज्वर के मूल कारण कहे गये हैं ।”

तात्पर्य, यदि शारीरिक व मानसिक दोष विकृत नहीं होंगे तो कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश करने पर रोग को उत्पन्न नहीं कर पायेगा, कुछ हलके-फुलके लक्षण दिखा सकता है ।

इसका अर्थ यह नहीं है कि असावधानी बरती जाय । रोगाणु शरीर में प्रवेश ही न करें इसकी सावधानी एवं नियम-पालन तो परम आवश्यक है किंतु साथ ही अनजाने में कोई रोगाणु शरीर में प्रवेश कर ले तो उसे अपना प्रभाव जमाने का मौका न मिले ऐसी सुरक्षात्मक सावधानी रखने के प्रति सजग करने का यहाँ उद्देश्य है ।

दोष विकृति के कारण

1. जठराग्नि की विकृतिः चरक संहिता (चि. स्था. 15.42-44) के अनुसार ‘भूख लगने पर भोजन न करने से, पहले खाया हुआ भोजन नहीं पचने पर भी बिना भूख के भोजन करने से, कभी ज्यादा-कभी कम, कभी समय पर तो कभी असमय भोजन करने से, पचने में भारी, ठंडे, अति रूखे, दूषित व प्रकृति-विपरीत पदार्थों के सेवन से, मल-मूत्रादि के वेगों को रोकने से, देश-काल-ऋतु के विपरीत आहार होने से दूषित हुई जठराग्नि पचने में हलके अन्न को उचितरूप में नहीं पचा पाती । नहीं पचा अन्न विष के समान हानिकर हो जाता है ।’

चरक संहिता (विमान स्थानः 2.9) में आता है कि ‘चिंता, शोक, भय, क्रोध, दुःख, शय्या (दिन में सोना) और देर रात तक (11-12 बजे के बाद) जागरण के कारण मात्रा से भी खाये हुए पथ्य अन्न का ठीक से पाचन नहीं होता है ।’

अतः स्वस्थ रहने की इच्छा वालों को उपरोक्त असावधानियों से बचना चाहिए ।

2. उचित आहार निद्रा और ब्रह्मचर्य का अभावः उचित आहार, उचित निद्रा एवं ब्रह्मचर्य-पालन – ये वात, पित्त और कफ को संतुलित रखते हुए शरीर को स्वस्थ व निरोग बनाये रखते हैं इसीलिए इन तीनों को आयुर्वेद ने शरीर के ‘उपस्तम्भ’ माना है । अतः उत्तम स्वास्थ्य के लिए इन तींनों का ध्यान रखना अनिवार्य है ।

3. हितकारक सेवन, आचार, कर्मों का अभावः मनुस्मृति (1.108) में आता है कि ‘सभी धर्मों (कर्तव्यों कर्मों) में ‘सदाचार’ सर्वोत्तम है ।’ इसका आचरण करने से जीवन सफल होता है व न करने से मनुष्य का विनाश हो जाता है ।

चरक संहिता (सूत्र स्थानः 7.60) में कहा गया हैः ‘इस संसार में और मरने के बाद सुख की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह आहार, आचार और सभी प्रकार की चेष्टाओं में हितकारक वस्तु के सेवन का परम प्रयत्न करे ।’ यहाँ आहार से तात्पर्य केवल स्थूल भोजन से नहीं लें । पाँच इन्द्रियों द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध – यह जो भी सेवन किया जाता है वह महापुरुषों व शास्त्रों द्वारा ‘आहार’ ही कहा गया है । इन सभी के सेवन में असावधानी रोग-बीमारियों को जन्म देती है ।

रोगाणुजन्य आगंतुक रोगों से बचने एवं उत्तम स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है कि दोष-विकृति करने वाले कारणों से बचा जाय ।

आगंतुक रोगों की उत्पत्ति रोकने का उपाय

रोगों की उत्पत्ति के बाद उनका उपचार करना, इससे भी अच्छा यह माना गया है कि रोग पैदा ही न हों, इसकी पहले से सावधानी रखी जाय, स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा की जाय – स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं…. (च.सं, सू.स्था. 30.26)

चरक संहिता (सू. स्था. 7.53-54) में आता है ‘प्रज्ञापराधों (बुद्धि की नासमझी से उत्पन्न अपराधों) का त्याग करना, इन्द्रियों का उपशम अर्थात् इन्द्रियों को अपने वश में रखना, स्मरणशक्ति उत्तम रखना, देशज्ञान, कालज्ञान (देश व काल के अनुरूप आहार-विहार का ज्ञान) और आत्मज्ञान का चिंतन करके उनको स्वभाव में आत्मसात् करना और सद्वृत्त (शास्त्र व संत सम्मत सदाचार) का पालन करना – यह आगंतुक रोगों के उत्पन्न न होने देने का मार्ग है । बुद्धिमान व्यक्ति को रोगोत्पत्ति होने से पहले ही ऐसा कार्य करने चाहिए जिनसे अपना हित हो सके ।’

आप्तोपदेश-पालन से लाभ

आप्तपुरुषों (ब्रह्मवेत्ता महापुरुषो) के उपदेशों को विशेषरूप से प्राप्त करना और ठीक प्रकार से उनका पालन करना – ये दो कारण मनुष्यों को रोगों की उत्पत्ति से रक्षा करते हैं और उत्पन्न रोगों को शीघ्र ही शांत करते हैं ।’ (चं.सं. सू.स्थाः 7.55)

हमारे शास्त्रों-महापुरुषों द्वारा बताये गये ऐसे निर्देशों की जिस व्यक्ति, समाज, देश द्वारा जितनी उपेक्षा की जाती है, उसे उसका उतना ही अधिक दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है और इन निर्देशों का जितना आदरपूर्वक पालन किया जाता है उतना ही ऊँचा लाभ उसे होता है ।

रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ायें

चिकित्सा विज्ञान कहता है कि जीवाणु या विषाणु (bacteria or virus) रोग प्रतिकारक शक्ति कम होने पर संक्रमित करते हैं । देशवासी सजग एवं विशेष तत्पर होकर ब्रह्मनिष्ठ संतों एवं सत्शास्त्रों द्वारा बताये गये जीवन को निरोगी, स्वस्थ, रोगप्रतिकारक शक्ति से सम्पन्न बनाने वाले निर्देशों का पालन करें तो बीमारियों एवं महामारियों से रक्षित होने में मदद मिलेगी ।

कैसा हो आहार-विहार ?

महामारियाँ मानव-समाज को बहुत कुछ सीख देती जा रही हैं, जैसेः-

1. व्यक्तिगत व सामाजिक स्वच्छता ।

2. कार्य के समय दूरी बनाये रखते हुए अपने स्वास्थ्य एवं आभा की रक्षा करना ।

3. दूसरों से हाथ न मिलाना एवं प्राणियों के स्पर्श व श्वासोच्छवास से बचना ।

4. अंडा, मांसाहार एवं व्यसनों से दूर रहकर शुद्ध, सात्त्विक, शाकाहारी आहार लेना ।

5. बिगड़ी हुई दिनचर्या को सुधारना ।

स्वास्थ्य रक्षा हेतु इनका भी ध्यान रखें-

1. पीने के लिए उबालकर ठंडे किये पानी का उपयोग करें ।

2. यदि उपलब्ध एवं अनुकूल हों तो सुबह तुलसी व नीम के पत्ते लें । (अथवा तुलसी अर्क व नीम अर्क पानी मिला के ले सकते हैं ।)

3. फ्रिज में रखी चीजों का सेवन जठराग्नि मंद करने के साथ अन्य हानियाँ भी करता है ।

4. बाजारू खान-पान से बचें ।

5. प्राणायाम, योगासन, सूर्यनमस्कार आदि यथाशक्ति करें ।

6. गुनगुने पानी में थोड़ी हल्दी व सेंधा नमक डाल के रोज 1-2 बार गरारे कर सकते हैं ।

करें रोगाणुरहित वातावरण निर्माण

घर में नित्य कपूर जलाने से  वातावरण के रोगाणु नष्ट होते हैं तथा शरीर पर बीमारियों का आक्रमण आसानी से नहीं होता ।

अथर्ववेद (कांड 19, सूक्त 38, मंत्र 1) में आता है कि ‘जिस मनुष्य के आसपास औषधिरूप गूगल की श्रेष्ठ सुगंध व्याप्त रहती है, उसे कोई रोग पीड़ित नहीं करता ।’ पूज्य बापू जी के सत्संग में आता है कि “जैसे बिल्ली को देखकर चूहे और शेर को देख के जंगली पशु भाग जाते हैं, ऐसे ही गूगल का धूप जहाँ होता है वहाँ से रोग के कीटाणु भाग जाते हैं । गोबर के कंडों (या गौ-चंदन धूपबत्ती के टुकड़ों) पर घी की बूँदें, चावल, कपूर, गूगल आदि धप सामग्री डालकर धुआँ करें या नीम के पत्तों का भी धुआँ कर सकते हैं ।

थोड़ा गोमूत्र पानी में डालकर घर में पोंछा आदि लगाया जाय । केमिकल वाला फिनायल तो रोगाणुओं को मारता है, पवित्रता नहीं लाता परंतु गोमूत्र तो रोगाणुरहति करते हुए पवित्रता भी लाता है । “(गोमूत्र से निर्मित पवित्रता लाने वाले गौ शुद्धि सुगंध (फिनायल) का भी उपयोग कर सकते हैं ।)”

डर नहीं, सावधानी है जरूरी

डर से तनाव बढ़ता है और तनाव से रोगप्रतिरोधक शक्ति का ह्रास होता है । अत) महामारी से भयभीत होने के बजाय इससे संबंधित सावधानियों और उपचार  सजग रहें । विश्व के लिए विषम काल में जनता तक सही, शास्त्रीय जनाकारी पहुँचाने वालों को साधुवाद है और भ्रामक बातें फैलाने वालों से सावधान रहना जरूरी है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 8-10 अंक 328-329

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

भगवान बड़े कि भगवान का नाम बड़ा ? –पूज्य बापू जी


जब हनुमान जी को मृत्युदंड देने उद्यत हुए श्रीराम जी !

(पिछले अंक में आपने पढ़ा कि देवर्षि नारद जी के बताये अनुसार हनुमान जी ने भरी सभा में विश्वामित्र जी को पीठ दिखायी और उनके सामने पूँछ झटक दी । इसे अपना अपमान जानकर विश्वामित्र जी ने श्रीरामजी को आज्ञा दी कि वे हनुमानजी को मृत्युदंड दें । इससे हनुमान जी राम जी के प्रति चिंतित हो गये । अब आगे….)

देवर्षि नारदजी कहते हैं- “हनुमान तुम चिंता क्यों करते हो ? मैंने तुमको काम सौंपा है तो यह मेरा काम है ।”

हनुमानजीः “तो मैं क्या करूँ ?”

“अभी निश्चिंत हो के सो जाओ । अभी तो रात है । जो होगा, सुबह होने के बाद होगा न !”

तुलसी भरोसे राम के, निश्चिंत होई सोय ।

अनहोनी होनी नहीं, होनी होय सो होय ।।

सुबह हुई । नारदजी बोलेः “देखो हनुमान ! जो अनंत ब्रह्माण्डों में रम रहा है उसी मूल तत्त्व से जुड़कर प्राण चलते हैं, हाथ उठता है, वही तो राम है ।

जीव राम घट-घट में बोले, ईश्वर राम दशरथ घर डोले ।

बिंदु (हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा, मन) राम का सकल पसारा, ब्रह्म राम है सबसे न्यारा ।।

‘जैसे घटाकाश, मठाकाश, मेघाकाश और महाकाश – ये चार दिखते हैं लेकिन आकाश चारों में एक है । ऐसे ही वही सर्वव्यापक राम सत्यस्वरूप है, वही मेरा मूल है और श्रीराम जी का हाथ भी उसी मूल की सत्ता से उठता है ।’ – ऐसा चिंतन करके जब रामजी का तीर चले तो तुम बोल देनाः ‘जय श्री राम ! भाव उसी ब्रह्म राम पर रखना । फिर देखो क्या होता है !”

रामचन्द्र जी ने बराबर बाण का संधान किया । हनुमान जी बोलें- ‘जय श्री राम !….’ तो गदा को छूने के पहले ही बाण ‘सट्’ करके नीचे गिर जाय । इस प्रकार रामजी का सारे बाण खत्म हो गये, अब एक बाण बचा । राम जी ने यह संकल्प करके संधान किया कि ‘यह मेरा बाण सफल हो ।’

नारदजी समझ गये कि राम जी भी उसी राम-तत्त्व में विश्रांति पाकर बाण के साथ संकल्प जोड़ रहे हैं तो विश्वामित्र जी को कहाः “देखो, हनुमानजी के प्राण अभी शेष हैं । राम रजी इतनी तीव्रता से बाण मारते हैं और वह हनुमान जी की गदा को छूता तक नहीं । अगर राम जी और भी कुछ करके मार भी देंगे तो महाराज ! लोग बोलेंगे कि ‘विश्वामित्र ऋषि अपमान न सह सके, रामजी के सेवक को मरवा दिया ।’ आपके नाम पर कलंक आ जायेगा । अतः अब आप खड़े होकर कह सकते हैं कि ‘रामचन्द्र जी ! हम इस हनुमान को क्षमा करते हैं ।’ तो लोगों के मन में आपके प्रति सद्भाव होगा, हनुमानजी का भी सद्भाव बढ़ेगा और रामजी का सिर आपके चरणों म  अहोभाव से झुकेगा । धर्मसंकट से रामजी भी बच जायेंगे, हनुमान जी भी बच जायेंगे और आपका नाम कलंक से बच जायेगा । अब बाजी आपके हाथ में है ।”

विश्वामित्रजीः “नारद ! तुम बड़े बुद्धिमान हो । बहुत-बहुत ठीक कहा है तुमने ।”

विश्वामित्र जी खड़े हो गये, बोलेः “हे श्रीराम ! रुक जाओ । हम हनुमान को क्षमा करके प्राणदान देते हैं ।”

‘साधो….. साधो….. ! जय श्री राम ! जय विश्वामित्र ! जय हो, जय हो !!’ जयघोषों से सारा वातावरण गूँजने लगा ।

नारद जी खड़े हो गये, बोलेः “सुनो, सुनो ! साधु स्वभाववाले सज्जनो ! सत्य के चाहक लोगो ! ‘भगवान बड़े कि भगवान का नाम बड़ा ? इसका निर्णय आज सरयू-तट पर प्रत्यक्ष हो गया । भगवान ने संधान करके इतने-इतने बाण मारे लेकिन भगवान के नाम ने उन बाणों को निरस्त कर दिया । अब इस पर कौन क्या शास्त्रार्थ करेगा ?”

रामु न सकहिं नाम गुन गाई ।

भगवान राम भी भगवन्नाम के गुणों को नहीं गा सकते ।

तो भगवान का नाम और फिर जब वह ब्रह्मवेत्ता सदगुरु के द्वारा मिल जाया है और उसका अर्थ समझ से अगर कोई जपता है तो महाराज ! उसके जन्म-जन्मांतर के कुसंस्कार, पाप-ताप मिट जाते हैं । भगवन्नाम, गुरुमंत्र जपने से 84 नाड़ियों, 25 उपत्यकाओं, 5 शरीरों और 7 मुख्य केन्द्रों में सात्त्विक भगवद्-आन्दोलन पैदा होते हैं । भगवन्नाम अकाल मृत्यु को टालता है, बुद्धि में सत्य का संचार करता है और जब सद्गुरु ने भगवन्नाम दिया है तो वह नाम ‘गुरुमंत्र’ अर्थात् बड़ा मंत्र हो जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 328-329

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

सुखमय जीवन की अनमोल कुंजियाँ


महामारी, रोग व दुःख शमन हेतु मंत्र

अग्नि पुराण में महर्षि पुष्कर जी परशुराम जी से कहते हैं कि ”यजुर्वेद के इस (निम्न) मंत्र से दूर्वा के पोरों की 10 हजार आहुतियाँ देकर होता (यज्ञ में आहुति देने वाला व्यक्ति या यज्ञ कराने वाला पुरोहित) ग्राम या राष्ट्र में फैली हुई महामारी को शांत करे । इससे रोग-पीड़ित मनुष्य रोग से और दुःखग्रस्त मानव दुःख से छुटकारा पाता है ।

काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषपरि ।

एवा नो दूर्वे प्रतनु सहस्रेण शतेन च ।। (यजुर्वेदः अध्याय 13, मंत्र 20)

विद्यालाभ व अद्भुत विद्वता की  प्राप्ति का उपाय

‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं वाग्वादिनी सरस्वति मम जिह्वाग्रे वद वद ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं नमः स्वाहा ।’ इस मंत्र को इस वर्ष गुजरात और महाराष्ट्र को छोड़कर भारतभर के लोग 8 जून को दोपहर 1-45 से रात्रि 11-45 बजे तक तथा केवल गुजरात और महाराष्ट्र के लोग 5 जुलाई को रात्रि 11-02 से 11-45 बजे तक या 6 जुलाई को प्रातः 3 बजे से रात्रि 11-12 बजे तक 108 बार जप लें फिर मंत्रजप के बाद उसी दिन रात्रि 11 से 12 बजे के बीच जीभ पर लाल चन्दन से ‘ह्रीं’ मंत्र लिख दें । जिसकी जीभ पर यह मंत्र इस विधि से लिखा जायेगा उसे विद्यालाभ व अद्भुत विद्वत्ता की प्राप्ति होगी ।

कर्ज निवारक कुंजी

प्रदोष व्रत यदि मंगलवार के दिन पड़े तो उसे ‘भौम प्रदोष व्रत’ कहते हैं । मंगलदेव ऋणहर्ता होने से कर्ज निवारण के लिए यह व्रत विशेष फलदायी है । भौम प्रदोष व्रत के दिन संध्या के समय यदि भगवान शिव एवं सद्गुरुदेव का पूजन करें तो उनकी कृपा से जल्दी कर्ज से मुक्त हो जाते हैं । पूजा करते समय यह मंत्र बोलें-

मृत्युञ्जय महादेव त्राहि मां शरणागतम् ।।

जन्ममृत्युजराव्याधिपीडितं कर्मबन्धनैः ।।

इस दैवी सहायता के साथ स्वयं भी थोड़ा पुरुषार्थ करें ।

(इस वर्ष ‘भौम प्रदोष व्रत’ 5 व 11 मई तथा 15 व 21 सितम्बर को है ।)

सुख-शांति व धनवृद्धि हेतु

सफेद पलाश के एक या अधिक पुष्पों को किसी शुभ मुहूर्त में लाकर तिजोरी में सुरक्षित रखने से उस घर में सुख-शांति रहती है, धन आगमन में बहुत वृद्धि होती है ।

संकटनाशक मंत्रराज

नृसिंह भगवान का स्मरण करने से महान संकट की निवृत्ति होती है । जब कोई भयानक आपत्ति से घिरा हो या बड़े अनिष्ट की आशंका हो तो भगवान नृसिंह के इस मंत्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए ।

ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।

नृसिंह भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ।।

पूज्य बापू जी के सत्संग में आता है कि “इस विशिष्ट मंत्र के जप और उच्चारण से संकट की निवृत्ति होती है ।

तो कल्पनातीत मेधाशक्ति बढ़ेगी-पूज्य बापू जी

नारद पुराण के अनुसार सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण के समय उपवास करे और ब्राह्मी घृत को उँगली से स्पर्श करे एवं उसे देखते हुए ‘ॐ नमो नारायणाय’ । मंत्र का 8000 (80 माला) जप करे । थोड़ा शांत बैठे । ग्रहण समाप्ति पर स्नान के बाद घी का पान करे तो बुद्धि विलक्षण ढंग से चमकेगी, बुद्धिशक्ति बढ़ जायेगी, कल्पनातीत मेधाशक्ति, कवित्वशक्ति और वचनसिद्धि (वाक् सिद्धि) प्राप्ति हो जायेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद अप्रैल मई 2020, पृष्ठ संख्या 48,49 अंक 328-329

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ