Monthly Archives: April 2020

यह कर लो तो सारी परेशानियाँ भाग जायेंगी ! – पूज्य बापू जी


एक होती है सत्-वस्तु, दूसरी होती है मिथ्या वस्तु । मन की जो कल्पनाएँ, जो फुरने हैं यह है मिथ्या वस्तु । ‘यह करूँगा तो सुखी होऊँगा’, ‘यह पाऊँगा तो सुखी होऊँगा’ ‘यहाँ जाऊँगा तो सुखी होऊँगा’…. इन वस्तुओं में उलझ-उलझकर ही आपने अपने जीवन को टुकड़े-टुकड़े कर डाला है ।

सत्-वस्तु से तात्पर्य है  अपना आत्मा-परमात्मा । सत्संग के द्वारा सत्त्वगुण बढ़ाकर हम अपने उस सत्यस्वरूप को पा लें । दो चीजें होती हैं, एक होती है नित्य, दूसरी होती है मिथ्या । बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो मिथ्या वस्तु के बजाय नित्य वस्तु को पसंद करे, सत्-वस्तु को पसंद करे । वास्तव में सत्-वस्तु तो एक ही है और वह है परमात्मा । फिर उसे परमात्मा कहो या आत्मा, ब्रह्म कहो या ईश्वर, राम कहो या शिव… सब तत्त्वरूप से एक ही है है ।

मानव को जो नित्य है उसकी प्राप्ति का यत्न करना चाहिए और जो मिथअया है उसका उपयोग करना चाहिए । परंतु आप करते क्या हैं ? जो नित्य है उसकी ओर ध्यान ही नहीं देते और मिथ्या की प्राप्ति में ही अपना पूरा जीवन नष्ट कर डालते हैं । जो वस्तु मिलती है वह पहले हमारे पास नहीं होती तभी तो मिलती है और बाद में भी वह हमारे पास से चली जाती है मिथ्या होने से । जो पहले नहीं था वह मिला और जो मिला उसे छोड़ना ही पड़ेगा । किंतु परमात्मा मिलता नहीं इसलिए वह छूटता भी नहीं, वह सदा प्राप्त है ।

ऐसी कोई मिली हुई वस्तु नहीं जिसे आप सदा रख सकें । आपको जो वस्तु मिली, मिलने से पूर्व वह आपके पास नहीं थी, तभी तो मिली । अतः जो वस्तु आपको मिली वह आपकी नहीं है और जो आपकी नहीं है वह आपके पास सदा के लिए रह भी नहीं सकती । देर-सवेर उसे आपको छोड़ना ही पड़ेगा या तो वह वस्तु स्वयं आपको छोड़कर चली जायेगी । चाहे फिर नौकरी हो, मकान हो, परिवार हो, पति हो, पत्नी हो, चाहे तुम्हारी स्वयं की देह ही क्यों न हो…. देह भी तुम्हें मिली है अतः देह को भी छोड़ना पड़ेगा ।

बचपन मिला था, छूट गया । जवानी तुम्हें मिली है, छूट जायेगी । बुढ़ापा तुम्हें मिलेगा, वह भी छूट जायेगा । मौत भी आकर छूट जायेगी लेकिन तुममें मिलना और छूटना नहीं है क्योंकि तुम शाश्वत हो । जो मिली हुई चीजी है उसको आप सदा रख नहीं सकते और अपने आपको आप छोड़ नहीं सकते, कितना सनातन सत्य है ! लोग बोलते हैं कि संसार को छोड़ना कठिन है किंतु संत कहते हैं, संतों का अनुभव है कि संसार को सदा रखना असम्भव है और परमात्मा को छोड़ना असम्भव है । ईश्वर को आप छोड़ नहीं सकते और संसार को आप रख नहीं सकते ।

बचपन को आपने छोड़ने की मेहनत की थी क्या ? नहीं ! छूट गया । जवानी को छोड़ना चाहते हो क्या ? अपने-आप छूट रही है । बुढ़ापे को आप छोड़ना चाहते हो क्या ? अरे, आप रखना चाहो तो भी छूट जायेगा । ऐसे ही निंदा छोड़ूँ… स्तुति छोड़ूँ…. मान छोड़ूँ…. अपमान छोड़ूँ… नहीं, सब अपने-आप छूटते जा रहे हैं । एक साल पहले जो तुम्हारी निंदा-स्तुति हुई थी उसका दुःख या सुख आज तुम्हें होता है क्या ? नहीं, पुराना हो गया ।

पहले दिन जो निंदा हुई वह बड़ी भयानक लगी होगी, जो स्तुति हुई वह मीठी लगी होगी किंतु आज देखो तो वे पुरानी हो गयी, तुच्छ हो गयीं । संसार की ऐसी कोई परिस्थिति नहीं जिसे आप रख सकें । आपको छोड़ना नहीं पड़ा है भैया ! सब छूटा चला जा रहा है । जिसको आप कभी छोड़ नहीं सकते वह है सत्-वस्तु और जिसको आप सदा रख नहीं सकते वह है मिथ्या वस्तु । अतः मिथ्या का उपयोग करो और सत् का साक्षात्कार कर लो । सत्संग यही सिखाता है ।

दो वस्तु देखी गयी हैः एक वह है जो बह रही है और दूसरी वह है जो रह रही है । बहने वाली वस्तु है संसार और रहने वाली वस्तु है परमात्मा । बहने वाली वस्तु के बहने का मजा लो और रहने वाली वस्तु का साक्षात्कार करके रहने का मजा ले लो तो सदा मजे में ही रहोगे । व्यक्ति तभी दुःखी होता है जब बहने वाली वस्तु को रखना चाहता है और रहने वाली वस्तु से मुख मोड़ लेता है ।

जब-जब दुःख और मुसीबतों से व्यक्ति घर जाय तब-तब वह समझ ले कि बहने वाले मिथ्या जगत की आसक्ति उसको परेशान कर रही है और रहने वाले आत्मा के विषय का उसको ज्ञान नहीं है, उसकी प्रीति नहीं है इसीलिए वह परेशान है । जब भी मुसीबत आये….. दुःख, चिंता, शोक, भय – ये तमाम प्रकार की जो मुसीबतें हैं, इन सारी मुसीबतों का एक ही इलाज है कि बहने वाली वस्तु को बहने वाली मानो और रहने वाले आत्मा से प्रीति कर लो तो सारी परेशानियाँ भाग जायेंगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 328-329

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…..तो 33 करोड़ देवता भी उसके आगे हो जायें नतमस्तक – पूज्य बापू जी


मैंने एक पौराणिक कथा सुनी है । एक बार देवर्षि नारद जी ने किसी बूढ़े को कहाः “काका ! इतने बीमार हो । संसार तो संसार है, चलो मैं तुम्हें स्वर्ग ले चलता हूँ ।”

बूढ़े ने कहाः “नारदजी ! मैं स्वर्ग दो जरूर आऊँ लेकिन मेरी एक इच्चा पूरी हो जाय बस ! मेरे दूसरे बेटे ने खूब सेवा की है । मैं जरा ठीक हो जाऊँ, बेटे का विवाह हो जाय फिर चलूँगा ।”

नारद जी ने आशीर्वाद दिया व कुछ प्रयोग बताये । काका ठीक हो गया, बेटे का विवाह हो गया । नारदजी आये, बोलेः “काका ! चलो ।”

काकाः “देखो, बहू नयी-नयी है । जरा बहू के घर झूला बँध जाय (संतान हो जाय) फिर चलेंगे ।”

महाराज ! झूला बँध गया । नारदजी आये, बोलेः “चलो काका !”

काका बोलाः “तुम्हें कोई और मिलता नहीं क्या ?”

नारदजीः “काका ! यह आसक्ति छुड़ाने के लिए मैं आ रहा हूँ । जैसे बंदर सँकरे मुँह के बर्तन में हाथ डालता है और गुड़-चना आदि मुट्ठी में भरकर अपना हाथ फँसा लेता है और स्वयं मुठ्ठी खोल के मुक्त नहीं होता । फिर बंदर पकड़ने वाले आते हैं और डंडा मार के जबरन उसकी मुठ्ठी खुलवाते हैं तथा उसके गले में पट्टा बाँध के ले जाते हैं । ऐसे ही मौत आयेगी और डंडा मारकर गले में पट्टा बाँध के ले जाय तो ठीक नहीं क्योंकि संत-मिलन के बाद भी कोई व्यक्ति नरक जाय तो अच्छा नहीं इसलिए पहले से बोल रहा हूँ ।”

“मैं नरक-वरक नहीं जाऊँगा । फिर आना, अभी जाओ ।”

नारदजी 2-4 वर्ष बाद आये, पूछाः “काका कहाँ गये ?”

“काका तो चल बसे, ढाई वर्ष हो गये ।”

नारद जी ने देखा कि वह लालिया (कुत्ता) हो के आया है, पूँछ हिला रहा है । नारदजी ने शक्ति देकर कहाः “क्या काका ! अभी लालिया हो के आये हो ! मैंने कहा था न, कि संसार में मजा नहीं है ।”

वह बोलाः “अरे ! पोता छोटा है, घर में बहू अकेली है, बहू की जवानी है, ये सुख-सुविधाओं का उपभोग करते थक जाते हैं तो रात को रखवाली करने के लिए मेरी जरूरत है । मेरा कमाया हुआ धन मेरा बेटा खराब कर देगा, बहू नहीं सँभाल सकेगी इसलिए मैं यहाँ आया हूँ और तुम मेरे पीछे पड़े हो !”

आसक्ति व्यक्ति को कैसा कर देती है ! नारदजी कुछ वर्षों के बाद फिर आये उस घर में । देखा तो लालिया दिखा नहीं, किसी से पूछाः “वह लालिया कहाँ गया ?”

“वह तो चला गया । बड़ी सेवा करता था ! रात को भौंकता था और पोता जब सुबह-सुबह शौच जाता तो उसके पीछे-पीछे वह भी जाता था तथा कभी पोते को चाट भी लेता था ।”

ममता थी पोते में । मर गया, एकदम तमस मे आया तो कौन-सी योनि में गया होगा ? नारदजी ने योगबल से देखा, ‘ओहो ! नाली में मेंढक हो के पड़ा है ।’

उसके पास गये, बोलेः “मेंढकराज ! अब तो चलो ।”

वह बोलाः “भले अब मैं नाली में रह रहा हूँ और मेरे को बहू, बेटा, पोता नहीं जानते लेकिन मैं तो सुख मान रहा हूँ कि मेरा पुत्र है, पोता है, मेरा घर है, गाड़ी है…. यह देखकर आनंद लेता हूँ । तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो ?”

संग व्यक्ति को इतना दीन करता है कि नाली में पड़ने के बाद भी उसे पता नहीं कि मेरी यह दुर्दशा हो रही है । अब आप जरा सोचिये कि क्या हम लोग उसी के पड़ोसी नहीं हैं ? जहाँ संग में पड़ जाता है, जहाँ आसक्ति हो जाती है वहाँ व्यक्ति न जाने कौन-कौनसी नालियों के रास्ते से भी ममता को पोसता है । आपका मन जितना इन्द्रियों के संग में आ जाता है, इन्द्रियाँ पदार्थों के संग में आ जाती है और पदार्थ व परिस्थितियाँ आपके ऊपर प्रभाव डालने लगते हैं उतना आप छोटे होने लगते हैं और उनका महत्त्व बढ़ जाता है । वास्तव में आपका महत्त्व होना चाहिए । हैं तो आप असंगी, हैं तो आत्मा, चैतन्य, अजन्मा, शुद्ध-बुद्ध, 33 करोड़ देवता भी जिसके आगे नतमस्तक हो जायें ऐसा आपका वास्तविक स्वरूप है लेकिन इस संग ने आपको दीन-हीन बना दिया ।

निःसङ्गो मां भजेद् विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रियः । (श्रीमद् भागवतः 11.25.34)

जितना आप निस्संग होते हैं, जितना आपका मनोबल ऊँचा है, मन शुद्ध है उतना आपका प्रभाव गहरा होता है । जो उस ब्रह्म को जानते हैं, अपने निस्संग स्वभाव को जानते हैं उनका दर्शन करके देवता लोग भी अपना भाग्य बना लेते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 328-329

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धर्म के लिए कितना समय देना चाहिए ?


पूज्य बापू जी के साथ प्रश्नोत्तरी

प्रश्नः महाराज श्री ! जीवन में धर्म के लिए कितना समय देना चाहिए ?

पूज्य बापू जीः धर्म क्या है ? जो सारे ब्रह्माण्डों को धारण कर रहा है और जो तुम्हारे शरीर को धारण कर रहा है । उसके लिए कितना समय देना चाहिए ? अरे ! मनुष्य जन्म मिला है मुक्त होने के लिए और उसी के लिए समय नहीं है तो फिर काहे के लिए समय है, बंधन के लिए समय है । धर्म के लिए थोड़ा समय…. धर्म कोई स्नानागार है कि थोड़े समय में नहा धो के बाहर आ जायें । धर्म के लिए कितना समय…. नहीं, सारा समय धर्ममय हो जाय । भोजन भी धर्ममय हो जाय, भगवान को भोग लगे । निद्रा भी धर्ममय हो जाय…. भगवच्चिन्तन करते-करते । पति-पत्नी का, परिवार का पालन भी भगवान के नाते धर्ममय हो जाय । धर्म के लिए कितना समय दें, यह सवाल ही उचित नहीं है । धर्म को छोड़कर जितना समय आप जी रहे हैं, वास्तव में उतना समय आप मर रहे हैं । उतना समय आप अपने दुश्मन हो रहे हैं । धर्म को छोड़ेंगे तो अधर्म होगा, अधर्म होगा तो दुःख होगा । जहाँ-जहाँ सुख है, शांति है, आनंद वह धर्म का फल है और दुःख है, बेचैनी, अशांति वह वह बेवकूफी, अज्ञान, मूढ़ता का फल है । दैनिक जीन धर्ममय होगा तो ही वास्तव में जीवन होगा और दैनिक जीवन को धर्म में अलग करेंगे तो वह पशु-जीवन हो जायेगा । इसलिए जो कुछ भी करो, इस भाव से करो ।

 खाऊँ पिऊँ सो करूँ पूजा, हरूँ फरूँ सो करूँ परिकरमा, भाव न राखूँ दूजा ।

भोजन करें तो भी ‘अंतर्यामी परमात्मा मेरे हृदय में विराजमान हैं, उनको भोजन करा रहा हूँ… उनको भोग लगा रहा हूँ….’ इस भाव से करें । भोजन करें. चलें-फिरें…. जो भी करें, इच्छा-वासना से प्रेरित हो के नहीं, कर्ताभाव से प्रेरित हो के नहीं अपितु भगवान की प्रसन्नता के लिए और भगवद्भाव से सराबोर होकर करें तो यह प्रभु की पूजा बन जाता है ।

सृष्टि आदि में ईश्वर-सत्ता थी, अब भी है और बाद में भी रहेगी । उसके साथ तालमेल करके जो भी हरकत करेंगे, जो भी व्यवहार करेंगे वह सब धर्म है । इससे आप तो उठते जाओगे, अपने सम्पर्क में आने वालों को भी ऊँचा उठाने में सक्षम हो जाओगे । माला घुमाने अथवा मंदिर में जानेमात्र से ही भजन, धर्म पूरा नहीं हो जाता । आपका प्रत्येक व्यवहार आपकी वास्तविक उन्नति, शाश्वत उन्नति करने वाला हो, इसका नाम धर्म है ।

जीवन जीना एक कला है । कला दो मिनट के लिए ही थोड़ी सीखी जाती है । कला व्यवहार में लायें तभी तो उसका लाभ है । इसलिए जीवन का पूरा समय धर्ममय होना चाहिए । तो परमात्म-सत्ता से एकाकार होकर उसका अधिक से अधिक लाभ उठाने की व्यवस्था का नाम है ‘धर्म’ । इसलिए धर्म के लिए कुछ समय नहीं, पूरा समय देना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020 पृष्ठ संख्या 2 अंक 328-329

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