Monthly Archives: June 2021

ऐसे समर्थ सद्गुरु व साधक विरले ही होते हैं – संत निलोबा जी


संत निलोबाजी अपने सद्गुरु संत तुकाराम जी को विरह-व्यथा से व्याकुल होकर पुकार रहे थे । तब भगवान विट्ठल प्रकट हुए । निलोबाजी ने उन्हें जो रोमांचकारी वचन कहे वे निलोबाजी की अभंग-गाथा में आज भी कोई पढ़ सकता है । प्रस्तुत है उन दिव्य वचनों का भावानुवादः

हे प्रभु ! आपको यहाँ किसने बुलाया ? किसी भी प्रकार की प्रार्थना किये बिना ही आप यहाँ क्यों आये हैं ? हिरण्यकशिपु दैत्य को दंड देने के लिए खम्भे से प्रकट होकर आप प्रह्लाद के रक्षक बन गये थे लेकिन इस प्रकार का कोई संकट मुझ पर आया नहीं है तो भी आपने व्यर्थ में यहाँ आने का परिश्रम क्यों किया ? हे भगवान ! तुम्हें पहचानने की क्षमता हममें नहीं है किंतु गुरुकृपा होने पर ही हम तुम्हारे वास्तविक रूप को पहचान सकते हैं । इसलिए हम तो केवल सद्गुरु श्री तुकारामजी को ही सदा पुकारते रहते हैं ।

कृपावंत सद्गुरुनाथ तुकाराम स्वामी ने आकर मेरे मस्तक पर अपना हाथ रखा और अपना कृपा-प्रसाद दे के मुझे परम सुख कर दिया । सद्गुरु के दिव्य स्वरूप का गुणगान करने के लिए मेरी मति को बढ़ा के मुझे स्फूर्ति दे दी । यहाँ मैं बोलता हुआ दिख रहा हूँ फिर भी यह जो बोलने की सत्ता है वह मेरी न हो के मेरे सद्गुरु तुकाराम जी की ही है ।

यह कोई सुनी-सुनाई बात नहीं है । वास्तव में सद्गुरु की महिमा ही अद्भुत है । वे जीव में स्थित जीवपने का कलंक मिटाकर अर्थत् तथाकथित जीव की जीवत्व की मलिन मान्यता हटा के उसे कभी न भंग होने वाले ब्रह्मस्वरूप में जगा देते हैं । वे जिनका भी हाथ पकड़ लेते हैं (जिन्हें भी अपनी शरण में लेते हैं) उन्हें अपने मूल स्वरूप में स्थित कर देते हैं । हृदयपूर्वक उनकी सेवा करने से वे जीव को परम भाग्यवान बना देते हैं ।

जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध स्वयं नहीं होता, सद्गुरु उसका अनुभव करा देते हैं यही सच्चे सद्गुरु की पहचान है । इस प्रकार सद्गुरु द्वारा शिष्यों को ब्रह्म का बोध कराया जाते हुए उनके (शिष्यों के) अंतःकरण में दिव्य ज्ञान-प्रकाश की क्या कमी रहेगी ? जो आत्मज्ञानरूपी सद्वस्तु के अभ्यास में नित्य तन्मय रहते हैं, उन्हें गुरुकृपा से अपने सच्चे स्वराज्य की प्राप्ति होती है । संत निलोबा जी कहते हैं कि ऐसी सद्गुरु की ब्रह्मबोध कराने की कला है किंतु ब्रह्मबोध कराने वाले ऐसे समर्थ सद्गुरु और वह बोध प्राप्त कर लेने वाला साधक – दोनों विरले ही होते हैं ।

शिष्य को गुरु की पूजा करनी चाहिए क्योंकि गुरु से बड़ा और कोई नहीं है । गुरु इष्टदेवता के पितामह हैं । भक्तों के लिए भगवान हमेशा गुरु के रूप में पथप्रदर्शक बनते हैं ।

गुरु ही मार्ग हैं, जीवन हैं और आखिरी ध्येय हैं । गुरुकृपा के बिना किसी को भी सर्वोत्तम सुख प्राप्त नहीं हो सकता ।

(स्वामी शिवानंद जी के ‘गुरुभक्तियोग’ सत्शास्त्र से)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2021, पृष्ठ संख्या 23 अंक 342

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परलोक के भोजन का स्वाद


एक सेठ ने अन्नसत्र खोल रखा था । उनमें दान की भावना तो कम थी पर समाज उन्हें दानवीर समझकर उनकी प्रशंसा करे यह भावना मुख्य थी । उनके प्रशंसक भी कम नहीं थे । थोक का व्यापार था उनका । वर्ष के अंत में अन्न के कोठारों में जो सड़ा गला अन्न बिकने से बच जाता था, वह अन्नसत्र के लिए भेज दिया जाता था । प्रायः सड़ी ज्वार की रोटी ही सेठ के अन्नसत्र में भूखों को प्राप्त होती थी ।

सेठ के पुत्र का विवाह हुआ । पुत्रवधु घर आयी । वह बड़ी सुशील, धर्मज्ञ और विचारशील थी । उसे जब पता चला कि उसके ससुर द्वारा खोले गये अन्नसत्र में सड़ी ज्वार की रोटी दी जाती है तो उसे बड़ा दुःख हुआ । उसने भोजन बनाने की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली । पहले ही दिन उसने अन्नसत्र से सड़ी ज्वार का आटा मँगवाकर एक रोटी बनायी और सेठ जब भोजन करने बैठे तो उनकी थाली में भोजन के साथ वह रोटी भी परोस दी । काली, मोटी रोटी देखकर कौतूहलवश सेठ ने पहला ग्रास उसी रोटी का मुख में डाला । ग्रास मुँह में जाते ही वे थू-थू करने लगे और थूकते हुए बोलेः “बेटी ! घर में आटा तो बहुत है ! यह तूने रोटी बनाने के लिए सड़ी ज्वार का आटा कहाँ से मँगाया ?”

पुत्रवधु बोलीः “पिता जी ! यह आटा परलोक से मँगाया है ।”

ससुर बोलेः “बेटी ! मैं कुछ समझा नहीं ।”

“पिता जी ! जो दान पुण्य हमने पिछले जन्म में किया वह कमाई अब खा रहे हैं और जो हम इस जन्म में करेंगे वही हमें परलोक में मिलेगा । हमारे अन्नसत्र में इसी आटे की रोटी गरीबों को दी जाती है । परलोक में हमें केवल इसी आटे की रोटी पर रहना है इसलिए मैंने सोचा कि अभी से हमें इसे खाने का अभ्यास हो जाय तो वहाँ कष्ट कम होगा ।”

सेठ को अपनी गलती का एहसास हुआ । उन्होंने अपनी पुत्रवधू से क्षमा माँगी और अन्नसत्र का सड़ा आटा उसी दिन फिंकवा दिया । तब से अऩ्नसत्र में गरीबों व भूखों को अच्छे आटे की रोटी मिलने लगी ।

आप दान तो करो लेकिन दान ऐसा हो कि जिससे दूसरे का मंगल-ही-मंगल हो । जितना आप मंगल की भावना से दान करते हो उतना दान लेने वाले का तो भला होता ही है, साथ में आपका भी इहलोक और परलोक सुधर जाता है । दान करते समय यह भावना नहीं होनी चाहिए कि लोग मेरी प्रशंसा करें, वाहवाही करें । दान इतना गुप्त हो कि देते समय आपके दूसरे हाथ को भी पता न चले ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2021, पृष्ठ संख्या 21 अंक 342

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आत्मबल कैसे जगायें ? – पूज्य बापू जी


हर रोज प्रातःकाल जल्दी उठकर सूर्योदय से पूर्व स्नानादि से निवृत्त हो जाओ । स्वच्छ, पवित्र स्थान में आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख हो के पद्मासन या सुखासन में बैठ जाओ । शांत और प्रसन्न वृत्ति धारण करो ।

मन में दृढ़ भावना करो कि ‘मैं प्रकृति-निर्मित इस शरीर के सब अभावों को पार करके (उन अभावों से संबंध विच्छेद करके), सब मलिनताओं-दुर्बलताओं से पिंड छुड़ाकर आत्मा की महिमा में जाग के ही रहूँगा ।’

आँखे आधी खुली-आधी बंद रखो । अब फेफड़ों में खूब श्वास भरो और भावना करो कि ‘श्वास के साथ मैं सूर्य का दिव्य ओज भीतर भर रहा हूँ ।’ श्वास को यथाशक्ति अंदर टिकाये रखो । फिर ‘ॐ’ का लम्बा उच्चारण करते हुए श्वास को धीरे-धीरे छोड़ते जाओ । श्वास के खाली होने के बाद तुरंत श्वास न लो । यथाशक्ति बिना श्वास रहो और भीतर-ही-भीतर ‘हरिॐ… हरिॐ….’ का मानसिक जप करो । फिर से फेफड़ों में खूब श्वास भरो । पूर्वोक्त रीति से श्वास यथाशक्ति अंदर रोककर बाद में धीरे-धीरे छोड़ते हुए ‘ॐ….’ का गुंजन करो ।

10-15 मिनट ऐसे प्राणायाम सहित उच्च स्वर से ‘ॐ….’ की ध्वनि करके शांत हो जाओ । सब प्रयास छोड़ दो । वृत्तियों को आकाश की ओर फैलने दो । आकाश के अंदर पृथ्वी है । पृथ्वी पर अनेक देश, अनेक समुद्र एवं अनेक लोग हैं । उनमें से एक आपका शरीर आसन पर बैठा हुआ है । इस पूरे दृश्य को आप मानसिक आँख से, भावना से देखते रहो । आप शरीर नहीं हो बल्कि अनेक शरीर, देश, सागर, पृथ्वी, ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र एवं पूरे ब्रह्माण्ड के द्रष्टा हो, साक्षी हो । इस साक्षीभाव में जाग जाओ ।

थोड़ी देर बाद फिर से प्राणायामसहित ‘ॐ’ का लम्बा उच्चारण करो और शांत हो के अपने विचारों को देखते रहो ।

सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी बिखरती रहती है । अतः वृत्तियों को बहकाओ नहीं । तमाम वृत्तियों को एकत्र करके साधनाकाल में आत्मचिंतन में लगाओ और व्यवहार काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ ।

विचारशील एवं प्रसन्न रहो । स्वयं अचल रहकर सागर की तरह सब वृत्तियों की तरंगों को अपने भीतर समा लो । जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो ।  सबसे स्नेह रखो । हृदय को व्यापक रखो । संकुचितता का निवारण करते रहो । खंडनात्मक वृत्ति (परमात्मा की सृष्टि में दोष देखने की वृत्ति) का सर्वथा त्याग करो ।

आत्मनिष्ठा में जागे हुए महापुरुषों के सत्संग और सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदांत से पुष्ट व पुलकित करो । कुछ ही दिनों के इस सघन प्रयोग के बाद अनुभव होने लगेगा कि ‘भूतकाल के नकारात्मक स्वभाव, संशयात्मक-हानिकारक कल्पनाओं ने जीवन को कुचल डाला था, विषैला कर दिया था । अब निश्चयबल के चमत्कार का पता चला । अंतरतम में आविर्भूत दिव्य खजाना अब मिला । प्रारब्ध की बेड़ियाँ अब टूटने लगीं ।’

जिनको ब्रह्मज्ञानी महापुरुष का सत्संग और आत्मविद्या का लाभ मिल जाता है, उनके जीवन से दुःख विदा होने लगते हैं । ॐ आनंद ! ठीक है न ? करोगे न हिम्मत ? शाबाश वीर….! शाबाश…!!

(आश्रम से प्रकाशित सत्साहित्य ‘जीवन रसायन’ से)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2021, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 342

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