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आध्यात्मिक अनुभव : सन 1991 में घटा वह चमत्कार जिसका गवाह था पूरा गाँव


सेवा-एकता-समर्पण-इष्टनिष्ठा विषयक आश्चर्यचकित करे ऐसा चमत्कार…

★ कडोली गाँव (तहसिल हिम्मतनगर, जिला साबरकांठा, गुजरात) के भाविक भक्तों द्वारा वर्णित आश्चर्य जताये ऐसी बात उनके ही शब्दों में :

★ ‘‘हमारे गाँव का अहोभाव है कि परम पूज्य आसारामजी बापू का दिव्य सत्संग समारोह ता : ५ से ८ दिसम्बर १९९१ दरमियान हमारे गाँव कडोली में आयोजित किया गया ।

★ गाँव के स्वयंसेवक, नेता लोग, कार्यकत्र्ता छोटे-बडे सभी इस मंगल पुण्यकार्य में आन्तरिक भाव से जुड गये थे । इस सत्संग समारोह के समय ऐसा एक भी काम न था जिसमें सभी का सहयोग न हो । छोटे या बडें सभी कामों में सभी साथ में मिलकर हिस्सा बँटाते ।

★ पूज्य बापू ने हमारे गाँव में जिस सत्संग की अमृतवर्षा की वह तो सचमुच अद्भुत ही है । प्रत्येक गाँव से भक्तों के समूह पूज्य बापू की अमृतवाणी श्रवण करने उमड पडते थे । मंडप छोटा लगता था । जनता बडी संख्या में आती थी ।

★ हमने चारों दिन डेरी में दूध देना बन्द कर दिया था । समूचा दूध, छाछ आदि दूसरे गाँवों से आनेवाले आगन्तुकों, मेहमानों की सेवा में उपयोग में आता । था : ८ को शाम के समय जब सत्संग समारोह की पूर्णाहुति हुई तब सत्संग में उपस्थित सबको पिडयों में प्रसाद बाँटा गया । उसके बाद पूज्य बापू की शोभायात्रा निकली । उसमें भी खूब प्रसाद बाँटा गया ।

★ किंतु अखण्ड भंडार कहाँ कम होने वाला था । बचे हुये प्रसाद से हमने दूसरे दिन हमारे गाँव और पडोस के गाँव, छोटी बडी दोनों करोली गाँव को भोजन कराया । फिर भी प्रसाद कम नहीं हुआ । तीसरे दिन शाम को हम जीप लेकर प्रसाद वितरण करने निकले । आसपास के पचीस गाँवों में प्रसाद बाँटा फिर भी पूज्य बापू की, परमात्मा की ऐसी कृपा कि प्रसाद कम नहीं हुआ ।

★ प्रसाद बाँटने वाले थके किंतु प्रसाद कम नहीं हुआ । तब हमारा अन्तर भर गया । हम म ही मन पूज्य बापू से प्रार्थना करने लगे कि, ‘बापू ! अब तो बस करो, अब हम बाँट-बाँटकर थक गये हैं । फिर हम रात को तीन बजे अपने गाँव को वापस आये । पूज्य बापू के फोटो के आगे दीपक, अगरबत्ती करके प्रार्थना की कि बापू ! अब तो यह प्रसाद खत्म करो ऐसी प्रार्थना की तब ही प्रसाद समाप्त हुआ ।

★ ‘मेरे-तेरे की खींचातानी चल रही है ऐसे कलियुग में पूज्य बापू की कृपा तो हमारे लिए गंगोत्री से निकली हुई गंगा से भी अधिक पावन है ।

★ कडोगी गाँव के भक्तों ने तीन दिन से दूध डेरी में न देकर ग्राम्यजनों तथा आने-जाने वाले मेहमानों को खुले दिल से देकर स्वागत किया । गाँव की एकता, स्नेह एवं त्याग, अतिथिसेवा और सत्संग में प्रीति अलौकिक थी । कडोली गाँव तो था ही किंतु आसपास के गाँव भी इस पुण्य सरिता में स्नान करने उमड पडे थे । धन्य है इस छोटे से गाँव के नागरिकों को ! काम धंधे तो बन्द किंतु डेरी में दूध जमा करना भी बंद करके ईश्वर-प्राप्ति के, पुण्य-प्राप्ति के दैवी कार्य में सभी लोग सभी तरह से जुड गये थे ।

गुरुकृपा का वह चमत्कार जिसे देख डॉक्टर भी रह गये हैरान


ऑपरेशन के वक्त पू. बापू के दर्शन एवं यौगिक चमत्कार |

★ मैं आमेट का एक नंबर का शराबी था । पानी की तरह शराब पीता रहता था । अपने आपको शेर मानता था । गाँव के लोग मुझसे डरते भी थे । मुझे पू. बापू के प्रथम दर्शन के साथ ही न जाने क्या हुआ कि मैंने पू. बापू से सपरिवार दीक्षा ले ली । इससे मेरी कमाई का बडा हिस्सा जो व्यसनों में बरबाद होता था वह अब बंद हो गया । पहले कई बार मेरे घर में आसुरी दृश्य खडे होते थे । उसकी जगह अब सब में भक्तिभाव का गहरा असर है । अब मेरा पूरा परिवार नियमित रूप से गुरुमंत्र का जप, आसारामायण का पाठ करता है ।

★ एक बार मैं उदयपुर से मोटर साइकिल पर आ रहा था । मेरा गुरुमंत्र जप निरंतर चल रहा था । गाँव केलवा के पास एक जीपवाले ने बुरी तरह झपट में ले लिया । मैं बेहोश था । मुझे आमेट अस्पताल में दाखिल किया गया । जब मुझे होश आया तब मैंने देखा कि मेरे परिवार के लोग पू. बापू को प्रार्थना कर रहे थे ।

★ मेरे बचने की कोई संभावना न थी । मुझे २०७ टांके आये थे । १५ दिन अस्पताल में रहकर आया । परंतु मेरे दाहिने हाथ मैं जो फ्रेक्चर हो गया था उसका दर्द जारी था । अब उदयपुर के डाक्टरों के पास ऑपरेशन होना था । यह ऑपरेशन अगर फेल हो तो हाथ खोने का भय था । सुबह चार बजे ऑपरेशन था । सारी रात मुझे नींद न आयी । रातभर गुरुमंत्र का जप एवं गुरुदेव को प्रार्थना करता रहा ।

★ दिनांक : ३-१२-८७ के दिन ‘अंकित आर्थोपेडिकङ्क (मधुवन, उदयपुर) के डॉ. श्री रतनलाल शर्मा ने मेरा ऑपरेशन किया । ऑपरेशन थियेटर में मुझे बेहोशी में लाने के लिए दो इंजेक्शन दिये गये । पर मेरे गुरुदेव की अलौकिक कृपा का चमत्कार देखो । जहाँ मुझे बेहोश किया जा रहा था, उसी वक्त मुझे होश मिल रहा था । मैं स्थूल शरीर से अलग हो गया । ऑपरेशन थियेटर के मुख्य द्वार के सामने मेरे गुरुदेव पू. बापू श्वेत वस्त्रों में सजे हुये फकीरी चाल में चले आ रहे थे । मैंने साष्टांग दंडवत् प्रणाम किया ।

★ मैं रोने लगा बापू ने कहा :

‘‘अरे ! क्यों रोता है ? तुझे कुछ नहीं होगा चिन्ता मत कर । अभी अपना ऑपरेशन देख ।

मैं एक कोने में खडा रहा । पू. बापू भी वहीं खडे रहे । दो डॉक्टर एक कम्पाउन्डर ऑपरेशन में लगे थे । नर्स ने मेरा हाथ पकडा हुआ था । मैं कभी तो ऑपरेशन को देखता, कभी पू. बापू को गद्गद् होकर देखता । जैसे ही ऑपरेशन पूरा हुआ, पूज्य बापू की कृपा मूर्ति और उसके साथ का श्वेत प्रकाश लुप्त हो गये । मुझे (स्थूल शरीर में) होश आया तब मेरी पत्नी पलंग के सामने गुरुमंत्र का जप कर रही थी ।

★ दूसरे दिन जब डॉक्टर और कम्पाउन्डर मेरा ड्रेसिंग करने आये तब मैं मेरा अलौकिक अनुभव ऑपरेशन का साक्षित्व आदि उन्हें बताया । भौतिकवाद में उलझे

डॉक्टर यह बात समझ नहीं सके कि बेहोश आदमी ने कैसे अपना ऑपरेशन देखा । उन्होंने कहा कि :

‘‘आप को विलक्षण अनुभूति कैसे हुई ? तब मैंने गले में पहना पू. बापू का चाँदी का पेंडल दिखाकर कहा कि यह मेरे मस्त मौला गुरुदेव की अद्भुत चमत्कारिक कृपा का फल है । वेदव्यासजी ने संजय को दिव्य दृष्टि दी और उसने महाभारत का युद्ध मीलों दूर बैठकर देखा । उससे भी विशेष दिव्य दृष्टि मेरे गुरुदेव ने दी जो मैंने बेहोशी में ही होश पाकर अपना ही ऑपरेशन देखा ।

★ फिर तो डॉक्टर, उनकी धर्मपत्नी और दूसरे लोग भी मुझ बापू के कृपापात्र को मिलने आने लगे ।

गुरुकृपा और गुरुमंत्र ने मेरी नई जिंदगी बनायी । भयानक दुर्घटना से भी मुझे मुक्त किया । मैं नित्य आसारामायण का पाठ करता हूँ । तब ये पंक्तियाँ मेरे लिए जानदार हो जाती हैं :

सबको निर्भय योग सिखायें,

सबका आत्मोत्थान करायें ।

सचमुच गुरु हैं दीनदयाल,

सहज ही कर देते हैं निहाल ।।

इनके पाठ पर मेरी आँखे भर जाती हैं ।

★ पू. बापू से मेरी यही प्रार्थना है कि ऐसे घोर कलिकाल में आप हमारे लिए वटवृक्ष हो प्रभु ! आप हमें अपनी छाया का दान देना और सबकी उन्नति करना । हे जगद्गुरु ! आप के श्रीचरणों में कोटि-कोटि साष्टांग दंडवत् प्रणाम्…!

धर्मनारायण कल्याणसिहजी मौर्य

आमेट, जि. राजसमंद (राज.)

सब में मेरे राम !!


★ हर साल जन्माष्टमी का महोत्सव पूज्यश्री के सान्निध्य में सुरत आश्रम में मनाया जाता है । मैं हर वक्त पर्व पर सुरत जाता था । जहाँ जहाँ गुरुदेव का कार्यक्रम होता है वहाँ गुरुदेव की कृपा मुझे खींच ले जाती है ।

★ हर साल की नांई इस साल १९९१ की जन्माष्टमी में भी सुरत जाने के लिए उत्सुक था लेकिन मेरा स्वास्थ्य गडबड हो गया । दिल में घबराहट होने लगी । कोई कहने लगा हार्टएटेक है । डाक्टर बुलाया गया । उसने कार्डियोग्राम ग्राफ लिया और तत्काल अस्पताल में भरती हो जाने की सूचना दी । उसने निदान किया कि हृदय का दौरा है ।

★ रात को नौ दस बजे अस्पताल में गये । आई.सी. कमरे में मुझे सुला दिया । पाँव से लेकर सिर तक कई उपकरण लगा दिये गये । मेरे हृदय की गति-विधियों का समाचार देनेवाले संकेत टी.वी. स्क्रीन पर दिखाई दे रहे थे । डॉक्टर लोग यह सब देख रहे थे और विचार विमर्श कर रहे थे ।

★ रात्रि के तीन बजे होंगे । मेरे मन में आया :

‘‘हे सद्गुरु ! हे प्रभु ! हर वक्त आपका जहाँ-जहां सत्संग-कार्यक्रम होता है वहाँ पहुँचने का प्रयास करता हूँ और आपकी कृपा से पहुँच जाता हूँ, लेकिन इस बार जाने अनजाने मुझसे कोई गलती हो गयी है जिससे आपकी कृपा से मैं वंचित रह गया हूँ । सुरत आश्रम के बजाय आज मैं अस्पताल में पडा हूँ । शरीर में तकलीफ है इसका कोई हर्ज नहीं है लेकिन आपके चरणों तक नहीं पहुँच पाया इसका मन में बहुत रंज है…

★ ऐसा सोचते सोचते मैं रो पडा । गुरुदेव को प्रार्थना करने लगा : ‘‘हे मेरे प्रभु ! हे मेरे मौला ! तू कृपा कर… कृपा कर… । इस प्रकार मैं प्रार्थना किये जा रहा था इतने में ही सामने लगे हुये काच के ऊपर गुरुदेव का मुखारविन्द दिखाई देने लगा । उनके इर्दगिर्द श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान शंकर, कई देवी-देवता और कई संत-महापुरुषों का मण्डल शोभायमान था । गुरुदेव का यह दर्शन करके मैं गद्गद् होकर तृप्त हो रहा था ।

★ गुरुदेव मुझसे कहने लगे :

‘‘मौला ! डाक्टर में मुझे देख… नर्स में मुझे देख… शरीर में लगे हुये यंत्र-उपकरणों में मुझे देख… गोली में मुझे देख… केप्शूल में मुझे देख… इन्जेक्शन की सुई की नोंक में मुझे देख और तेरे आसपास जो सगे-सम्बन्धी बैठे हैं उन सबमें मुझे देख । कण-कण में मुझे देख.. हर जीज में, हर वस्तु में मुझे देख… । अगर तू ऐसा देखेगा तो जहाँ तू पडा है वहाँ आश्रम हो जायेगा । कोई फिकर न कर ।

★ मेरा हृदय गुरुदेव के प्रति अहोभाव से भर आया । मैं भीतर ही भीतर अद्भुत विश्रांति का अनुभव करने लगा । सुबह में नौ बजे डाक्टर देखने आया । वह जाँच करके बोला : इनकी तबियत ठीक हो गयी है । अब दूसरे कमरे में ले जायेंंगे । कल छुट्टी दे देंगे ।

★ गुरुदेव की ऐसी कृपी हुई कि तीन ही दिन में अस्पताल से घर वापस आ गया । ‘कण-कण में मुझे देख, हर चीज में, हर वस्तु में, मुझे देख… वाला उपदेश और साकार दृश्य दोनों ने अद्भुत आरोग्य, आनंद और शांति का दान कर दिया । आश्चर्य है आत्मज्ञान और आश्चर्य है आत्मसाक्षात्कारी पुरुषों की करुणा-कृपा ।

अखिल ब्रह्मांडमां एक तुं श्री हरि ।

जुजवे रूपे अनंत भासे ।।

नरसिंह मेहता का यह वाक्य साकार रूप में दिखानेवाले गुरुदेव को प्रणाम ।

★ अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण ने विश्वरूप दिखाया और गुरुदेव आसारामजी ने मुझे दिखाया । अर्जुन युद्ध में स्वस्थ हुआ और मैं गंभीर बीमारियों से स्वस्थ हुआ । क्या अद्भुत है आत्मविचार का प्रभाव ! कैसी दिव्य है आत्मदृष्टि ।

वृजलाल भाटीया

कपडे के थोक व्यापारी

न्यू क्लॉथ मारकेट, अमदावाद ।