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सेवा का उद्देश्य क्या है ?


सेवा का उद्देश्य क्या है ? सेवा के द्वारा तुम्हारा हृदय शुद्ध होता है। अहंभाव, घृणा, ईर्ष्या, उच्चता की भावना और इसी प्रकार की सारी कुत्सित भावनाओं का नाश होता है तथा नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, सहिष्णुता और दया जैसे गुणों का विकास होता है। सेवा से स्वार्थ-भावना मिटती है, द्वैत भावना क्षीण होती है, जीवन के प्रति दृष्टिकोण विशाल और उदार बनता है। एकता का भान होने लगता है, आत्मज्ञान में गति होने लगती है। ‘एक में सब, सब में एक’ की अनुभूति होने लगती है। तभी असीम सुख प्राप्त होता है।

आखिर समाज क्या है ? अलग-अलग व्यक्तियों या इकाइयों का समूह ही तो है। ईश्वर ही के व्यक्त रूप के अलावा विश्व कुछ नहीं है। सेवा ही पूजा है। सेवा एवं आत्मज्ञानी महापुरुषों के कृपा-उपदेश से निष्काम कर्म करने वालों को पूर्णता प्राप्त होती है। जैसे हनुमान जी सेवा से तथा सीता जी और श्रीराम जी के उपदेश से ब्रह्मानुभूति सम्पन्न हुए।

भेद-भावना घातक होती है अतः उसे मिटा देना चाहिए। उसे मिटाने के लिए ब्रह्म-भावना का, चैतन्य की अद्वैतता का विकास और निःस्वार्थ सेवा की आवश्यकता है। भेद-भावना अज्ञान या माया द्वारा रचित एक भ्रममात्र है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2018,  पृष्ठ संख्या 17 अंक 309

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दरिद्रता कैसे मिटे और ‘पृथ्वी के देव’ कौन ?


एक निर्धन व्यक्ति ने महात्मा बुद्ध से पूछाः “मैं इतना गरीब क्यों हूँ ?”

बुद्ध ने कहाः “तुम गरीब हो क्योंकि तुमने देना नहीं सीखा।”

“महात्मन ! लेकिन मेरे पास तो देने के लिए कुछ भी नहीं है।”

“तुम्हारे पास देने को बहुत कुछ है। तुम्हारा चेहरा एक निर्दोष मुस्कान दे सकता है, तुम्हारा मुख परमात्मा और संतों का गुणगान कर सकता है, किसी को स्नेह-सांत्वनापूर्ण मधुर वचन बोल सकता है, तुम्हारे हाथ किसी निर्बल व्यक्ति की सहायता कर सकते हैं और उससे भी ऊँची बात तो यह है कि जो सत्य-ज्ञान तुमको मिल रहा है, उसे दूसरों तक पहुँचाने की सेवा तुम कर सकते हो। जब तुम इतना सब दूसरों को दे सकते हो तो तुम गरीब कैसे ? वास्तव में मन की दरिद्रता ही दरिद्रता है और वह बाहरी साधनों से नहीं मिटती, सत्य का साक्षात्कार कराने वाले सम्यक् ज्ञान से ही मिटती है।”

पूज्य बापू जी के सत्संगामृत में भी आता है कि “उनका  जीवन सचमुच में धन्य है जो लोगों तक मोक्षदायक सत्संग के विचार पहुँचाने की दैवी सेवा में जुड़ जाते हैं। वे अपना तो क्या, अपनी 21 पीढ़ियों का मंगल करते हैं। हीन विचार जब मानवता का विनाश कर देते हैं तो उत्तम विचार मानवता को उन्नत भी तो कर देते हैं ! अन्न दान, भूमि दान, कन्यादान, विद्या दान, गोदान, गोरस दान, स्वर्ण-दान – ये सात प्रकार के दान अपनी जगह पर ठीक हैं किंतु आठवें प्रकार का दान है ‘ब्रह्मज्ञान का सत्संग दान’, जिसे सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। ऐसे कलियुग में जो लोगों तक ब्रह्मज्ञान का सत्संग पहुँचाने में साझीदार होने की सेवा खोज लेते हैं, वे मानव-जाति के हितैषी, रक्षक बन जाते हैं और उन्हें ‘पृथ्वी के देव’ कहा जाता है।

ऋषि प्रसाद, ऋषि दर्शन एवं लोक कल्याण सेतु घर-घर पहुँचाकर समाज से सद्ज्ञान-दरिद्रता को उखाड़ फेंक के सबकी लौकिक, आध्यात्मिक एवं सर्वांगीण उन्नति करने वाले परोपकारी पुण्यात्मा धनभागी हैं ! इस सेवा से उनके जीवन में अनेक दिव्य अनुभव होते हैं। आप भी इन सेवाओं से जुड़कर लाभान्वित हो सकते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 16 अंक 309

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विजयी होने का संदेश देती है विजयादशमी-पूज्य बापू जी


(विजयदशमी, दशहराः 18 व 19 अक्तबूर 2018)

लौकिक विजय वही होती है जहाँ पुरुषार्थ और चेतना होती है। आध्यात्मिक विजय भी वहीं होती है जहाँ सूक्ष्म विचार होते हैं, बुद्धि की सूक्ष्मता होती है, चित्त की शांत दशा होती है। तो आध्यात्मिक और लौकिक – दोनों प्रकार की विजय प्राप्त करने का संदेश विजयदशमी देती है।

नौ दिन (नवरात्रि) के बाद दसवें दिन जो शक्ति वह अपने कार्यों में विजय प्राप्त करने में लगायी जाती है। भगवान राम ने इसी दिन रावण पर विजय पाने के लिए प्रस्थान किया था। इस दिन राजा रघु ने कुबेर को युद्ध के लिए ललकारा और कौत्स मुनि को गुरुदक्षिणा दिलाने के लिए स्वर्ण-मुहरों की वर्षा करवायी। छत्रपति शिवाजी ने औरंगजेब को मात देने इसी दिन प्रस्थान किया और वे हिन्दू धर्म की रक्षा करने में सफल हुए। जिसके पास मौन की शक्ति है, संयम की शक्ति है, जिनकी आध्यात्मिक शक्तियाँ विकसित हो गयी हैं उनके कार्य बिना चौघड़िये देखे भी सफल हो जाते हैं।

नायमात्मा बलहीनेने लभ्य….

दशहरे के दिन तुम्हारा मनरूपी घोड़ा परमात्मारूपी द्वार की तरफ न दौड़े तो कब दौड़ेगा ?

सत्संग मनुष्य को जीवन के संग्राम में विजय दिला देता है। दैवी सम्पदा की उपासना राम की उपासना है और वासना के वेग में बह जाना, अहंकार को पोषित करके निर्णय लेना यह आसुरी सम्पदा की उपासना है, रावण का रास्ता है। अहंकार को विसर्जित करके सबकी भलाई हो ऐसा यत्न करना, यह राम जी का रास्ता है।

विजयादशमी से हमें यह संदेश मिलता है कि भौतिकवाद भले कितना भी बढ़ा-चढ़ा हो, अधार्मिक अथवा बहिर्मुख व्यक्ति के पास कितनी भी सत्ताएँ हों, कितना भी बल हो फिर भी अंतर्मुख व्यक्ति डरे नहीं, उसकी विजय जरूर होगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2018, पृष्ठ संख्या 12 अंक 309

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