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यही आत्मसाक्षात्कार है – पूज्य बापू जी


 

(पूज्य बापू जी का 51वाँ आत्मसाक्षात्कार दिवसः 14 अक्तूबर 2015)

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।  (गीताः 3.27)

प्रकृति में ही गुण कर्म हो रहे हैं लेकिन अहंकार से जो विमूढ़ हो गये, वे अपने को कर्ता-भोक्ता, सुखी-दुःखी मानते हैं। भाव आये तो मैं दुःखी हूँ या मैं सुखी हूँ यह आयेगा अथवा तो ‘मेरे को यह करना है’ या ‘मैंने यह कर लिया….’ आयेगा। लेकिन आप समझना, ‘यह सब मन का खेल है’ तो आप बहुत ऊँची अवस्था में चले जाओगे। उस अवस्था में ऐसा नहीं कि सुन्न- मुन्न हो जाये, आलसी हो जाय, नींद आ जाय…. नहीं।

ऊठत बैठत ओई उटाने, कहत कबीर हम उसी ठिकाने।

ब्राह्मी स्थिति ऐसी ऊँची होती है। फिर भगवान आपके मित्र हो जायेंगे  जैसे घटाकार वृत्ति होने से घड़ा दिखेगा, सकोराकार वृत्ति से सकोरा (मिट्टी का छोटा प्याला) दिखेगा, ऐसे ही ब्रह्म परमात्मा के विषय में सुनते हैं तो ब्रह्माकार वृत्ति बनती है। यह संसार इन्द्रियों से दिखता है लेकिन ब्रह्म-परमात्मा सारी इन्द्रियों को देखने की सत्ता देता है तो वह कैसे दिखेगा ?

इन्द्रियों से जो दिखता है वह प्रकृति है, परिवर्तनशील है, इन्द्रियाँ जिसकी सत्ता से देखती हैं वह आत्मा ब्रह्म है और वह हम हैं। ऐसा साक्षात्कार हो जाय तो फिर भगवान भी आपके मित्र हो जायेंगे। जिस भाव से भगवान को देखो, उस भाव में अपना संकल्प पूरा हो जायेगा।

मेरे गुरु जी (साँईं श्री लीलाशाह जी) सत्संग करके कमरे में चले गये, फिर थोड़ी देर बाद बाहर देखा तो सत्संगी खड़े हैं, बोलेः “अभी तक तुम गये नहीं ! रात हो गयी।”
सत्संगी बोलेः “साँईं ! बरसात पड़ रही है न, भगवान को कौन बोले !”
“अरे, तुम्हारा भगवान है, मेरा तो बेटा लगता है !”
सत्संगी जरा नजदीक के थे, बोलेः “साँईं ! बेटे को बोल दो न, बरसात बंद कर दे।”
“बेटे ! बरसात बंद कर दो।”

बरसात बंद हो गयी और वे प्रणाम करके भागे घर। वे लोग घर पहुँचे तो फिर चालू हो गयी बरसात। भगवान को कोई बाप मानता है, कोई बेटा मानता है, कोई सखा और कोई सुहृद मानता है और वास्तव में बेटा भी वही परमात्मा है, बाप भी वही है। अगर वह बेटा नहीं बनता तो उसी में बाप कैसे बनेगा ? वही बेटा बन के बाप बनता है। उसको बेटा मानो तो नाराज नहीं होता। और ऐसा नहीं है कि मेरे गुरु जी भगवान को बेटा-ही-बेटा मानते थे, कभी भगवान को बेटा मान लेते थे तो कभी भगवान के बेटे हो जाते थे।

भगवान के साथ, ब्रह्म के साथ गुरु जी की एकाग्रता थी। तभी उनके संकल्प से आवरण भंग हुआ और आसुमल से आशाराम बन गये। नहीं तो 12 साल मैं तपस्या करता तो इतना नहीं मिलता, जितना उन शहंशाह (साँईं लीलाशाह जी) ने दे डाला ! 12-12 साल के तीन अनुष्ठान करता तो भी काम नहीं होता।

गुरुजी ने एक सेवक को शास्त्र पढ़ने को दिया, मेरे को बोलेः “ध्यान से सुन !”
ऐ ऐ…. आनंद-आनंद…. आवरण भंग ! जैसे लवण की पुतली को समुद्र में डुबा दिया, वह गल गयी और नाचने लगी समुद्र हो के। इतना आनंद, ऐसी ब्रह्माकार वृत्ति कि जहाँ तक नजर जाती है उतने में ही मैं नहीं हूँ, उसके पार भी हूँ, नजर तो सीमित है, मैं असीम हूँ, ऐसा अनुभव ब्रह्मवेत्ता को ही होता है।

योगी तो हृदय में एकाग्र होता है, कर्मी को कर्म में निष्कामता होती है, भक्त भाव में रहता है लेकिन यह भाव भी नहीं है, योग भी नहीं है, कर्म भी नहीं है। ‘सब हो-हो के बदल जाते हैं, सृष्टियों का महाप्रलय हो जाता है फिर भी जो ज्यों-का-त्यों रहता है, वही मैं हूँ’ – ऐसा अनुभव हो जाता है। वह शब्दों में नहीं आयेगा, शब्दों में कुछ भी आयेगा तो थोड़े-में-थोड़ा। उपनिषद कहती हैः

यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह।

जहाँ से मन के सहित वाणी आदि इन्द्रियाँ उसे न पाकर लौट आती हैं…. मन से दृश्य दिखेगा, द्रष्टा मन से नहीं दिखेगा। जो मन से दिखेगा वह आधिभौतिक या तो आधिदैविक होगा। अध्यात्म थोड़ा-सा दिखेगा – आनंद, समाधि लेकिन आनंद आया कि नहीं आया, समाधि लगी कि नहीं लगी कौन जानता है ? वह मैं हूँ।’ और मजहबों एवं सम्प्रदायों में यह ज्ञान नहीं मिलता तथा हिन्दू धर्म में भी सभी सम्प्रदायों में नहीं मिलता। यह वेदांत सम्प्रदाय में मिलता है। हमारे गुरु जी वेदांती थे, भक्ति भी थी, योग भी था, कर्मयोग भी था लेकिन आखिर में…..

सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।

‘हे अर्जुन ! सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान (तत्त्वज्ञान) में समाप्त हो जाते हैं।’ (गीताः 4.33)

ऐसे आत्मवेत्ता थे मेरे गुरु जी ! जिस पर ब्रह्मज्ञानी गुरु की छाया नहीं है वह चाहे हजारों वर्ष तपस्या कर ले, सोने की लंका पा ले, फिर वह बबलू है और जिनको ब्रह्मज्ञानी गुरु मिल गये, वे 40 दिन के अनुष्ठान से आसुमल में से आशाराम बापू बन गये। आशाओं के गुलाम नहीं, आशाओं के दास नहीं, आशाओं के राम !

तेनाधीतं श्रुतं तेन – उसने सब अध्ययन कर लिया…. तेन सर्वनुष्ठितम्। उसने सारे अनुष्ठान कर लिये…. येनाशाः पृष्ठतः कृत्वा नैराश्यमवलम्बितम्।। जिसने इच्छा वासना छोड़कर आशारहितता का सहारा लिया है। (हितोपदेशः 1.146)

पोथियों से ज्ञान नहीं लेना पड़े, अपना ज्ञान छलके। विषय-विकारों से सुख नहीं लेना पड़े, अपना सुख चमचम चमके और टॉनिकों से शक्ति नहीं लेने पड़े, अपनी शक्ति……!

आत्मसाक्षात्कारी कैसा होता है ?

‘गुरु और भगवान जैसे भी हैं (निराकार, साकार, सर्वव्यापक, अगम्य, अगोचर), हमारे हैं बस !’ – इससे साधक के चित्त का सारा कचरा धुल जाता है, सारी फरियाद, सारी कमजोरियाँ निकल जाती हैं। भगवान और गुरु के प्रति अपनत्व रखो बस, बहुत सारी गंदगी अपने-आप साफ हो जायेगी। मेरे को तो लगता है कि मेरे साधकों का बड़ा भाग्य है कि हयात आत्मसाक्षात्कारी गुरु मिले हैं। आत्मसाक्षात्कारी कैसा होता है ? कितने लांछन, कितना ये…. और अंदर कितनी समता, कितनी मस्ती ! यही आत्मसाक्षात्कार है। आपको दुःख छुए नहीं। जीवन्मुक्ति है यह, जीते जी मुक्तात्मा ! इसको ‘अविकम्प योग‘ बोलते हैं।

श्रीकृष्ण युद्ध के सूत्रधार हैं, घोड़ों की रास पकड़ी है, फिर भी निश्चिंत। हम भी अनेक सेवा प्रवृत्तियों के सूत्रधार हैं फिर भी निश्चिंत है। आत्मज्ञान बहुत बड़ा वैभव है। ‘मैं, ‘मैं’ (आत्मा-परमात्मा) हूँ – यह समझ हो जाय, इसी का नाम आत्मसाक्षात्कार है। ऐसा नहीं कि भड़ाका-धड़ाका हो’, ऐसा नहीं है। समता आ गयी, परिच्छिन्नता मिटती गयी, देहाध्यास मिट गया-

देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।

देहाध्यास गल जाय और परमात्म-तत्व को जान ले। जैसे तरंग अपने को पानी जान ले, ऐसे ही जीव अपने को ब्रह्म जान ले। हमारे गुरु जी ने तो 19 साल में साक्षात्कार कर लिया, हमने तो साढ़े 22 साल के बाद किया। हमारे गुरु जी हमारे से ज्यादा बहादुर थे, अब तुम भी बहादुर बन जाओ !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2015, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 273
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पथ्य-अपथ्य विवेक


 

आहार द्रव्यों के प्रयोग का व्यापक सिद्धान्त है-

तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्।।

‘ऐसे आहार-द्रव्यों का नित्य सेवन करना चाहिए, जिनसे स्वास्थ्य का अनुरक्षण (Maintenance) होता रहे अर्थात् स्वास्थ्य उत्तम बना रहे और जो रोग उत्पन्न नहीं हुए हैं उनकी उत्पत्ति भी न हो सके।’
(चरक संहिता, सूत्रस्थानम् 5.13)

जो पदार्थ शरीर के रस, रक्त आदि सप्तधातुओं के समान गुणधर्मवाले हैं, उनके सेवन से स्वास्थ्य की रक्षा होती है। ‘अष्टांगसंग्रह’कार वाग्भट्टाचार्यजी ने ऐसे नित्य सेवनीय पदार्थों का वर्णन किया है।

साठी के चावल, मूँग, गेहूँ, जौ, गाय का घी व दूध, शहद, अंगूर, अनार, परवल, जीवंती (डोडी), आँवला, हरड़, मिश्री, सेंधा नमक व आकाश का जल स्वभावतः धातुवर्धक होने के कारण सदा पथ्यकर है।

जो पदार्थ धातुओं के विरूद्ध गुणधर्मवाले व त्रिदोषों को प्रकुपित करने वाले हैं, उनके सेवन से रोगों की उत्पत्ति होती है। इन पदार्थों में कुछ परस्पर गुणविरूद्ध, कुछ संयोगविरूद्ध, कुछ संस्कार विरूद्ध और कुछ देश, काल, मात्रा, स्वभाव आदि से विरूद्ध होते हैं।

जैसे- दूध के साथ मूँग, उड़द, चना आदि दालें, सभी प्रकार के खट्टे व मीठे फल, गाजर, शकरकंद, आलू, मूली, जैसे कंदमूल, तेल, गुड़ दही, नारियल, लहसुन, कमलनाल, सभी नमक युक्त व अम्लीय पदार्थ संयोगविरूद्ध हैं। दही के साथ उड़द, गुड़, काली मिर्च, केला व शहद, शहद के साथ गुड़, घी के साथ तेल विरूद्ध है।
शहद, घी, तेल व पानी – इन चार द्रव्यों में से किसी भी दो अथवा तीन द्रव्यों का समभाग मिश्रण मात्राविरूद्ध है। उष्णवीर्य व शीतवीर्य (गर्म व ठंडी तासीर वाले) पदार्थों का एक साथ सेवन वीर्यविरूद्ध है। दही व शहद के गर्म करना संस्कार विरूद्ध है।

दूध को विकृत कर बनाये गये पनीर आदि व खमीरीकृत पदार्थ स्वभाव से ही विरूद्ध हैं।

हेमंत व शिशिर – इन शीत ऋतुओं में अल्प भोजन, शीत, पचने में हलके, रूक्ष, वातवर्धक पदार्थों का सेवन तथा वसंत, ग्रीष्म, शरद – इन उष्ण ऋतुओं में दही का सेवन काल विरूद्ध है। मरूभूमि में रूक्ष, उष्ण, तीक्ष्ण पदार्थों का सेवन तथा समुद्रतटीय प्रदेशों में चिकनाईयुक्त, शीत पदार्थों का सेवन व क्षारयुक्त भूमि के जल का सेवन देशविरूद्ध है।

अधिक परिश्रम करने वाले व्यक्तियों के लिए अल्प, रूक्ष, वातवर्धक पदार्थों का सेवन व बैठे-बैठे काम करने वाले व्यक्तियों के लिए स्निग्ध, मधुर, कफवर्धक पदार्थों का सेवन अवस्था विरूद्ध है।

अधकच्चा, अधिक पका हुआ, जला हुआ, बार-बार गर्म किया गया, उच्च तापमान पर पकाया गया (जैसे फास्टफूड) अति शीत तापमान में रखा गया (जैसे- फ्रिज में रखे पदार्थ) भोजन पाकविरूद्ध है।

वेग लगने पर मल-मूत्र का त्याग किये बिना, भूख के बिना भोजन करना क्रमविरूद्ध है।

इस प्रकार के विरोधी आहार के सेवन से बल, बुद्धि, वीर्य व आयु का नाश होता है। नपुंसकता, अंधत्व, पागलपन, अर्श, भगंदर, कुष्ठरोग, पेट के विकार, सूजन, अम्लपित्त, सफेद दाग तथा ज्ञानेन्द्रियों में विकृति व अष्टौमहागद अर्थात् आठ प्रकार की असाध्य व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। विरूद्ध अन्न का सेवन मृत्यु का भी कारण हो सकता है।

अतः पथ्य-अपथ्य का विवेक करके नित्य पथ्यकर पदार्थों का ही सेवन करें।

अज्ञानवश विरूद्ध आहार के सेवन से उपरोक्त व्याधियों में से कोई भी उत्पन्न हो गयी तो वमन-विरेचनादि पंचकर्म से शरीर की शुद्धि एवं अन्य शास्त्रोक्त उपचार करने चाहिए। ऑपरेशन व अंग्रेजी दवाएँ सब रोगों को जड़-मूल से नहीं निकालते।

ईमानदार एवं जानकार वैद्य की देखरेख में पथ्य पालन करते हुए किया गया पंचकर्म विशेष लाभ देता है। इससे रोग तो मिटते ही हैं, 10-15 साल आयुष्य भी बढ़ सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2015, पृष्ठ संख्या 31, अंक 274
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जब मुनीमरूप में आये भगवान….


विसोबा का जन्म पंढरपुर से लगभग 80 कोस दूर आँढा नामक शिवक्षेत्र में यजुर्वेदी ब्राह्मणकुल में हुआ। इनके यहाँ सराफे का काम होने के कारण ये सराफ कहे जाते थे और घर सम्पन्न था। इनका सादा और पवित्र गृहस्थ-जीवन था। घर के कामकाज करते हुए भी इनका चित्त श्री विट्ठल में लगा रहता था। विसोबा के घर में साध्वी पत्नी और चार लड़के थे। इनके यहाँ से कभी भी अतिथि बिना सत्कार पाये नहीं जाता था। अतिथि को साक्षात् नारायण समझकर ये उसकी पूजा करते थे।

एक बार दक्षिण भारत में घोर अकाल पड़ा। अन्न मिलना भी दुर्लभ हो गया। भूख से पीड़ित हजारों स्त्री पुरुष विसोबा के द्वार पर एकत्र होने लगे। विसोबा ने समझा कि ‘नारायण ने कृपा की है। इतने रूपों में वे सेवा का सौभाग्य देने पधारे हैं।’ विसोबा खुले हाथों से अन्न लुटाने लगे। भीड़ बढ़ती गयी। बहुत महँगा अन्न खरीदकर बाँटने लगे। विसोबा निर्धन हो गये पर भीड़ तो बढ़ती ही गयी। घर के गहने, बर्तन आदि बेचकर भी अभ्यागतों का विसोबा ने सत्कार किया। ‘जो एक दिन नगरसेठ था, वही कंगाल हो गया।’ ऐसा कहकर लोग हँसी उड़ाने लगे। कोई उन्हें मूर्ख कहता तो कोई पागल बताने लगा। विसोबा के पास धन होने पर जो चाटुकारी किया करते थे, वे ही व्यंग्य कसने लगे। किंतु सभी में अपने प्रभु को देखने वाले विसोबा को इन बातों की परवाह नहीं थी। निरंतर बाँटते रहने के कारण उनके पास कुछ भी नहीं बचा। अब कंगाल व भूखे अभ्यागतों का स्वागत कैसे हो ? अन्न आये कहाँ से ?

विसोबा ने अपने गाँव से कई कोस दूर कॉसे गाँव जाकर वहाँ के एक पठान से कई हजार रूपये ब्याज पर उधार लिये। इनके आनंद का पार नहीं रहा। पुनः अन्न खरीदकर दरिद्रनारायणों की सेवा में लगाने लगे। गाँव के लोगों को इनकी कर्ज लेने की बात का पता लग गया। द्रवेषियों ने जाकर पठान से इनकी वर्तमान दशा बता दी। वह आकर इनसे रुपये माँगने लगा। इन्होंने कहाः “मैं सात दिन में रूपये दे दूँगा।” पठान मान तो नहीं रहा था पर गाँव के सज्जन लोगों ने उसे समझाया। वे जानते थे कि विसोबा अपनी बात के पक्के हैं। पठान चला गया।

छः दिन बीत गये। विसोबा कहाँ से प्रबंध करें ? अब उन्हें कौन कर्ज देगा ? वे रात्रि में भगवान से प्रार्थना करने लगे, ‘नाथ ! आज तक आपने मेरी एक भी बात खाली नहीं जाने दी। आज मेरी लाज आपके हाथों में है। हे हरि ! मैं आपकी ही बाट देख रहा हूँ।’ सच्चे हृदय की कातर प्रार्थना कभी निष्फल नहीं होती। उन लीलाधर परमेश्वर ने विसोबा के मुनीम का रूप धारण किया और समय पर पठान के पास पहुँच गये। पठान को आश्चर्य हुआ कि ऐसे अकाल के समय इतने रूपय विसोबा को किसने दिये ! पर उन मुनीम-रूपधारी ने उसे समझा दिया कि विसोबा की साख तथा सच्चाई के कारण रूपये मिलने में कठिनाई नहीं हुई। कई आदमियों के सामने हिसाब करके ब्याज सहित पाई-पाई मुनीम ने चुका दी और भरपाई की रसीद लिखवा ली। दूसरे दिन विसोबा पूजा करके सीधे पठान के घर पहुँचे। उससे बोलेः “भाई ! मुझे क्षमा करो। मैं तुम्हारे रूपये पूरे ब्याज सहित दे दूँगा। मुझे कुछ समय दो।”

पठान आश्चर्य में आकर बोलाः “यह आप क्या कह रहे हैं? आपका मुनीम कल ही तो पूरे रूपये दे गया है। मैंने आपसे रूपये माँगकर गलती की। जितने रूपये चाहिए, आप ले जाइये। आपसे रसीद लिखवाने की मुझे कतई जरूरत नहीं थी।”

विसोबा के आश्चर्य का पार नहीं रहा। गाँव के लोगों ने भी बताया कि ‘आपका मुनीम रूपये दे गया है।’ घर लौटकर मुनीम से उन्होंने पूछा। बेचारा मुनीम भला क्या जाने ! वह हक्का-बक्का रह गया। अब विसोबा को निश्चय हो गया कि ‘यह सब मेरे सर्व-अंतर्यामी, सर्वाधार, सर्वसमर्थ प्रभु की ही लीला है।’ उन्हें बड़ी ग्लानि हुई कि उनके लिए पांडुरंग को इतना कष्ट उठाना पड़ा। सब कुछ छोड़-छाड़कर वे पंढरपुर चले आये और भजन-सुमिरन में लीन हो गये।

संत ज्ञानेश्वर जी के मंडल में विसोबा सम्मिलित हुए। उन्होंने योग वेदांत का अभ्यास किया और सिद्ध महात्मा माने जाने लगे। उन्होंने स्वयं कहा हैः “चाँगदेव को मुक्ताबाई ने अंगीकार किया और सोपानदेव ने मुझ पर कृपा की। अब जन्म-मरण का भय नहीं रहा।”

नामदेव जी को भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि वे संत विसोबा से दीक्षा लें। इस भगवदीय आज्ञा को स्वीकार करके जब नामदेव जी इनके पास आये तो ये एक मंदिर में शिवलिंग पर पैर फैलाये लेटे थे। नामदेव जी को इससे बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहाः “नाम्या ! मैं बूढ़ा हो गया हूँ। मुझसे पैर उठते नहीं। तू ऐसे स्थान पर मेरे पैर रख दे जहाँ शिवलिंग न हो।” नामदेव जी ने इनके चरण वहाँ से हटाकर नीचे रखे पर वहाँ भूमि में से दूसरा शिवलिंग प्रकट हो गया। जहाँ भी चरण रखे जाते, वहाँ शिवलिंग प्रकट हो जाता। अब नामदेव जी समझ गये। वे गुरुदेव के चरणों में गिर पड़े। इनकी कृपा से ही नामदेव जी को आत्मज्ञान हुआ। नामदेव जी ने अपने अभंगों में गुरु विसोबा जी की बड़ी महिमा गायी है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2016 पृष्ठ 6,7, अंक 286

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