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गुरुकृपा ने अड़बंग को अड़बंगनाथ बना दिया


एक बार गोरखनाथ जी व उनका शिष्य यात्रा करते हुए भामा नगर के निकटवर्ती स्थान पर तेज गर्मी के कारण वृक्ष के नीचे बैठ गये। पास में ही मणिक नाम का एक किसान अपने खेत में हल चलाने में व्यस्त था। वह भोजन करने के लिए एक वृक्ष के नीचे जा बैठा। गोरखनाथ जी व उनका शिष्य उसके पास पहुँचकर ‘अलख-अलख’ कहने लगे। किसान प्रणाम करते हुए बोलाः “साधु बाबा ! आप लोग कौन हैं ? क्या चाहते हैं ?”

गोरखनाथ जीः “हम योगी यति हैं। हमें भूख लगी है।”

“आप ठीक समय पर आये हैं। लीजिए, इन्हें खा लीजिये।”

भोजन से तृप्त होकर गोरखनाथ जी उसका नाम पूछने लगे तो मणिक ने कहाः “क्या करोगे नाम जानकर ? भोजन मिल ही गया, अब अपना रास्ता देखो।”

गोरखनाथ जी बोलेः “अच्छा भाई ! मत बताओ। किंतु तुमने हमें भोजन से तृप्त किया है इसलिए हमसे कुछ माँग ही लो। जो चाहोगे वह मिलेगा।”

मणिक हँस पड़ाः “अरे महाराज ! जाओ। तुम स्वयं तो दर-दर की भीख माँगते हो और हमसे कहते हो कि कुछ ले लो ! यह कैसी अनोखी बात करते हो ?”

“अरे, माँगो तो सही, हम सब कुछ दे सकते हैं।”

मणिक तीव्र स्वर में बोलाः “अब आप मुझ पर कृपा करिये और यहाँ से पधारिये।”

गोरखनाथ जी समझ गये कि यह व्यक्ति बहुत अड़बंग(हठी) है इसलिए  उसके  कल्याण के लिए उन्होंने कहाः “अच्छा तो मुझे एक वचन दे दो।”

“माँगो, क्या चाहते हो ?”

“इतना ही दे दो कि अब से अपनी इच्छा के विपरीत कार्य किया करो। करोगे ऐसा    ?”

“अजी, यह भी कोई बड़ी बात है ? माँगने बैठे तो क्या ऊटपटाँग माँगा ! लगता है तुम कोई मजाकिया हो या कोई धूर्त। तुम्हारा कुछ और ही प्रयोजन प्रतीत होता है।”

“हम तो अभी जा रहे हैं किंतु यह बताओ कि तुमने हमारी माँगी बात मान ली न ?”

वह झल्लायाः “मान ली, मान ली…. मेरा पीछा तो छोड़ो किसी प्रकार !”

जब गोरखनाथ जी व उनके शिष्य चले गये, तब मणिक के चित्त में विचार उठा कि ‘जो मुझे कहना था सो कह दिया, अब उनका कहा भी मानना चाहिए।’

भूख लगती तब वह पानी पीकर रह जाता। प्यास लगती तब कुछ खा लेता। सोने की इच्छा होती तो वह जागता, खड़े होने की इच्छा होती तो लेट जाता या बैठ जाता। इस प्रकार सभी कार्य अपनी इच्छा के विरुद्ध करने से उसके स्वास्थ्य पर बड़ा विपरीत प्रभाव पड़ा। उसका शरीर सूखने लगा। उसकी धर्मपत्नी व अन्य परिवार वालों ने बहुत समझाया कि ‘यह हठ छोड़ दो” किसी के भी समझाने-बुझाने का उस पर कुछ भी प्रभाव न हुआ और वह अपने वचन पर बराबर दृढ़ रहा। इस प्रकार उसे  बारह वर्ष व्यतीत हो गये।

गोरखनाथ जी बदरिकाश्रम से यात्रा करते हुए लौट रहे थे। तभी उन्होंने अपने गुरु मत्स्येन्द्रनाथ जी से निवेदन किया कि “‘मणिक किसान के पास से होते हुए चलेंगे।” मत्स्येन्द्रनाथ जी, गोरखनाथ जी और चौरंगीनाथ जी – तीनों ही उसके पास आये।

गोरखनाथ जी ने पूछाः “भाई ! ऐसे निस्तेज, रोगी और दुर्बल क्यों हो रहे हो ?” मणिक उन्हें देखते ही पहचान गया।

“यह सब तुम्हारी ही करामात है साधु बाबा ! आपको जो वचन दिया है उसके पालन करने का यह परिणाम हुआ।”

गोरखनाथ जी को मन-ही-मन बड़ी प्रसन्नता हुई कि ‘यह अभी तक अपने वचन पर अडिग है। इसे दीक्षा दी जाये। परंतु यदि इसको कहूँगा तो उलटा ही करेगा।’ उन्होंने कहाः “अच्छा भाई ! अब तेरा कष्ट दूर हो जायेगा परंतु तू मुझे अपना शिष्य  बना ले और गुरुमंत्र दे।”

वह बोलाः “मैं गुरुमंत्र क्या जानूँ और न गुरु ही बनूँगा। मैं तो यह चाहता हूँ कि तुम मुझे गुरुमंत्र दो और अपना शिष्य बना लो।”

“अरे, यह कैसी बातें करता है ? तुझमें ऐसे बहुत गुण हैं, जो हममें नहीं हैं। इसलिए हम तुझे अपना गुरु बनाना चाहते हैं।”

“नहीं जी, मुझमें कोई गुन-बुन नहीं हैं। मैं ही तुम्हारा चेला बनूँगा। अब देर मत करो, शीघ्र ही गुरुमंत्र दे डालो।”

गोरखनाथ जी ने उसे मंत्रदीक्षा देकर अपना शिष्य बना लिया। उसके सिर पर हाथ फेरा तो उसका रोग और निर्बलता नष्ट हो गयी, स्वास्थ्य एवं सूझबूझ बढ़ी और वह गोरखनाथ जी के प्रति श्रद्धा-भक्ति से भर गया। गोरखनाथ जी ने मत्स्येन्द्रनाथ जी की ओर संकेत करके कहा कि “ये हमारे पूज्य गुरुदेव हैं, इन्हें प्रणाम करो।” उसने तुरन्त मत्स्येन्द्रनाथ जी के चरणों में दण्डवत प्रणाम किया और उन्होंने उसे आशीर्वाद देकर नाथ पंथ की दीक्षा दी। उसके अड़बंग (हठी) होने के कारण उसका नाम ‘अड़बंगनाथ’ रखा गया। उसके पश्चात गोरखनाथ जी ने उसे अनेक विद्याओं में पारंगत किया और नाथ योगी बना दिया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2016, पृष्ठ संख्या 14,15 अंक 282

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काँवरियों की सेवा हो जाय तो मुझे बहुत आनंद होगा


पूज्य बापू जी

(श्रावण मासः 20 जुलाई 2016 से 18 अगस्त 2016 तक)

अहंकार लेने की भाषा जानता है और प्रेम देने की भाषा जानता है। अहंकार को कितना भी हो, और चाहिए, और चाहिए…. और प्रेमी के पास कुछ भी नहीं हो फिर भी दिये बिना दिल नहीं मानता। शिवजी की जटाओं से गंगा निकलती है फिर भी प्रेमी भक्त काँवर में पानी लेकर यात्रा करते हैं और शिवजी को जल चढ़ाते हैं।

पुष्कर में एक बार मैं सुबह अजमेर के रास्ते थोड़ा सा पैदल घूमने गया तो कई काँवरिये मिले। उनको देखकर मेरा हृदय बहुत प्रसन्न हुआ कि 15-17-20 साल के बच्चे जा रहे थे पुष्कर से जल ले के। मैं खड़ा हुआ तो पहचान गये, “अरे ! बापू जी हैं।”

मैंने कहाः “कब आये थे।”

बोलेः “रात को आये थे।”

“कहाँ सोये थे ?”

“वहाँ पुष्करराज में सो गये थे ऐसे ही। सुबह जल भर कर जा रहे हैं।”

“कहाँ चढ़ाओगे ?”

“अजमेर में भगवान को चढ़ायेंगे।”

उन बच्चों को पता नहीं है कि वे काँवर से जल उठाकर जा के देव को चढ़ाते हैं, देव को तो पानी की जरूरत नहीं है लेकिन इससे उनका छुपा हुआ देवत्व कितना जागृत होता है ! बहुत सारा फायदा होता है। अगर वे युवक को पुष्करराज में नहीं आते तो रात को सोते और कुछ गपशप लगाते। जो शिवजी को जल चढ़ा रहे हैं कि ‘चलो पुष्कर अथवा चलो गंगा जी’ तो भाव कितना ऊँचा हो रहा है ! पहले काँवरिये इतने नहीं थे जितने मैं देख रहा हूँ। मुझे तो लगता है भारत का भविष्य उज्जवल होने के दिन बड़ी तेजी से आयेंगे। तो यह संतों का संकल्प है कि भारत विश्वगुरु बनेगा। जिस देश में काँवरिये बच्चे या भाई लोग नहीं दिखाई देते उस देश के लेडी-लेडे (युवक-युवतियाँ) तो चिपके रहते हैं, सुबह देर तक सोये रहते हैं, परेशान रहते हैं फिर नींद की गोलियाँ खाते हैं, न जाने क्या-क्या करते हैं ! इससे तो हमारे काँवरियों को शाबाश है ! मैं सोचता हूँ हमारे युवा सेवा संघ के युवक ऐसा कुछ करें कि जहाँ भी काँवरिये जाते हों, रोक के उनको आश्रम की टॉफियाँ, आश्रम का काई प्रसाद दे दें, कोई पुस्तक दे दें। सावन महीने में काँवरियों की सेवा हो जाय तो मुझे तो बहुत आनंद होगा। बड़े प्यारे लगते हैं, ‘नमः शिवाय, नमः शिवाय…..’ करके जाते हैं न, तो लगता है कि उन्हें गले लगा लूँ ऐसे प्यारे लगते हैं मेरे को।

‘बं बं बं…… ॐ नमः शिवाय…..’ इस  प्रकार कीर्तन करने से कितना भाव शुद्ध, पैदल चलने से क्रिया शुद्ध होती है। और उनमें कोई व्यसनी हो तो उसे समझाना कि ‘काँवर ली तो पान-मसाला नहीं खाना बेटे ! सुपारी नहीं खाना। गाली सुनाना नहीं, सुनना नहीं। इससे और मंगल होगा।’

भाव शुद्ध व क्रिया शुद्ध होने का फल है कि हृदय मंदिर में ले जाने वाले कोई ब्रह्मज्ञानी महापुरुष मिल जायें, उनका सत्संग मिल जाय। जो मंदिर मस्जिद में नहीं जाते, तीर्थाटन नहीं करते उनकी अपेक्षा वहाँ जाने वाले श्रेष्ठ हैं किंतु उनकी अपेक्षा हृदय-मंदिर में पहुँचने वाले साधक प्रभु को अत्यंत प्रिय हैं। जिसको हृदय-मंदिर में पहुँचाने वाले कोई महापुरुष मिल जाते हैं, उसका बाहर के मंदिर में जाना सार्थक हो जाता है।

घरमां छे काशी ने घरमां मथुरा,

घरमां छे गोकुळियुं गाम रे।

मारे नथी जावुं तीरथ धाम रे।।

घर का मतलब तुम्हारा चार दीवारों वाला घर नहीं बल्कि हृदयरूपी घर। उसमें यदि तुम जा सकते हो तो फिर तीर्थों में जाओ-न-जाओ, कोई हरकत नहीं। यदि तुम भीतर जा सके, पहुँच गये, किसी बुद्ध (आत्मबोध को उपलब्ध) पुरुष के वचन लग गये तुम्हारे दिल में तो फिर तीर्थों से तुम्हें पुण्य न होगा, तुमसे तीर्थों को पवित्रता मिलेगी। तीर्थ तीर्थत्व को उपलब्ध हो जायेंगे।

तीर्थयात्रा से थोड़ा फल होता है लेकिन उससे ज्यादा फल भगवान के नाम में है। उससे ज्यादा गुरुमंत्र में है और उससे ज्यादा गुरुमंत्र का अर्थ समझकर जप करने में है। भगवान को अपना और अपने को भगवान का, गुरु को अपना और अपने को गुरु का मानने वाले को…… मदभक्तिं लभते पराम्। (गीताः 18.54) पराभक्ति व तत्तव ज्ञान का सर्वोपरि लाभ होता है।

आत्मलाभात् परं लाभं न विद्यते।

आत्मसुखात परं सुखं न विद्यते।

आत्मज्ञानात् परं ज्ञानं न विद्यते।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2016,  पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 282

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Rishi Prasad 269 May 2015

यह केस भी उसी षड्यंत्र की कड़ी है – श्री उदय संगाणी


जोधपुर सत्र न्यायालय में 13, 15, 16 व 17 अप्रैल 2015 को श्री उदय संगाणी के बयान हुए। इन्होंने पूज्य बापू जी के ऊपर हो रहे षड्यंत्र की सच्चाई न्यायालय के सामने रखी और समाज व देश के कल्याण के लिए बापू जी द्वारा दिये गये योगदान के बारे में बताया। बयान के मुख्य अंशः

पिछले 50 वर्षों से पूज्य बापू जी के द्वारा समाजोत्थान हेतु अनेकानेक कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। जगह-जगह पर सत्संग होते हैं और उनमें बापू जी लोगों से नशा छुड़वाते हैं। पूज्य बापू जी से प्रेरित होकर लाखों लोगों ने बीड़ी, तम्बाकू, सिगरेट, शराब आदि छोड़ दिये। यहाँ तक कि बापू जी सत्संग में चाय एवं कोल्ड ड्रिंक्स से होने वाले नुक्सान भी बताते हैं, जिससे लोगों ने चाय व कोल्ड ड्रिंक्स भी पीना छोड़ दिया है।
आदिवासी क्षेत्रों में समय-समय पर भंडारे होते हैं। उनको अन्न, वस्त्र तथा अन्य जीवनोपयोगी चीजें दी जाती हैं। कइयों को मकान भी बनवा के दिये गये हैं।
पिछड़े क्षेत्रों में जहाँ धर्मांतरण होता था, वहाँ जाकर बापू जी ने लोगों को जागृत किया और बापू जी की प्रेरणा से हजारों लोगों ने फिर से हिन्दू धर्म अपनाया है, इसीलिए धर्मांतरण वाले लोग बापू जी से ईर्ष्या करते हैं।

आश्रम द्वारा देशभर में अनेक गौशालाएँ चलायी जा रही हैं। इनमें कत्लखाने ले जाने से बचायी गयी हजारों गायों का भी पालन-पोषण व रक्षण किया जा रहा है। यहाँ हजारों दूध न देने वाली और बीमार गायें भी पोषित होती हैं।

पूज्य बापू जी हमेशा से अपने सत्संगों में कन्या भ्रूणहत्या एवं समस्त भ्रूणहत्या को रोकने के बारे में जोर देते रहे हैं। बापू जी द्वारा नारी सशक्तिकरण के लिए ‘महिला उत्थान मंडलों’ की स्थापना की गयी है, जिनके माध्यम से महिलाओं की जागृति व उत्थान के विभिन्न प्रकल्प सतत चलाये जाते हैं।

14 फरवरी को वेलेंटाईन डे की जगह ‘मातृ-पितृ पूजन दिवस’ मनाने की प्रेरणा बापू जी ने दी, जिसे हर जगह पर मनाया जा रहा है और राष्ट्रपति, केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों इत्यादि ने इसी भूरि-भूरि प्रशंसा की है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह जी ने अपने राज्य के हर शासकीय विद्यालय में इसे अनिवार्य घोषित कर दिया है।

अनेक प्रधानमंत्री (पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री गुलजारी लाल नंदा, श्री चंद्रशेखर, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री एच.डी.देवगौड़ा तथा वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी) पूज्य बापू जी के सत्संग से लाभान्वित हुए हैं। पूर्व राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटील एवं डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने आश्रम के सेवाकार्यों की प्रशंसा की है।

वर्ष 2008 में अहमदाबाद गुरुकुल के दो बच्चों के पानी में डूबने से आकस्मिक मृत्यु हुई थी। उस समय ऐसी अफवाह फैलायी गयी थी कि उन बच्चों की तांत्रिक विधि से हत्या की गयी है। मीडिया में भी इस केस को बहुत उछाला गया था। उस समय से ही आश्रम एवं बापू जी के विरूद्ध षड्यंत्र किये जा रहे हैं। अमृत प्रजापति, महेन्द्र चावला, राजू चांडक आदि ने मीडिया में ऐसे झूठे बयान दिये कि ‘आश्रम में तांत्रिक विधि होती है।’

उस समय सी.आई.डी. क्राइम के डिटेक्टिव पुलिस इन्स्पैक्टर ने अखबारों में यह सूचना छपवायी थी कि ‘जिस-किसी को आश्रम की कोई भी अनैतिक गतिविधियों के बारे में कुछ भी पता हो तो वे आकर हमें बतायें। उनके नाम गुप्त रखे जायेंगे और उन्हें इनाम भी दिया जायेगा।’ पर कोई भी बयान देने नहीं आया। यह बात जाँच अधिकारी ने गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष दिये शपथपत्र में कही है। साथ में यह भी कहा है कि वे और उनके उच्च अधिकारी श्री जी.एस. मलिक (डी.आई.जी. क्राइम) एफ.एस.एल. के अधिकारी, फोटोग्राफर, विडियोग्राफर ने जाकर पूरे आश्रम के एक-एक कमरे एवं चप्पे की जाँच की पर तांत्रिक विधि के संदर्भ में कोई भी सबूत प्राप्त नहीं हुए। सर्वोच्च न्यायालय में इस मुद्दे पर कहा गया था कि ‘आश्रम में किसी प्रकार के कोई भी तांत्रिक विधि के सबूत प्राप्त नहीं हुए।’ इन्हीं षड्यंत्रकारियों ने उस समय इस मुद्दे को जोर-शोर से उछाला था, जो अंततः झूठा साबित हुआ।

8 अगस्त 2008 को अमृत प्रजापति, महेन्द्र चावला, राजू चांडक आदि ने मिल के आश्रम में बापू जी के नाम से फैक्स किया कि ‘एक सप्ताह के अंदर हमें 50 करोड़ रूपये दे दो अन्यथा तुम और तुम्हारा परिवार जेल की हवा खाने को तैयार हो जाओ। बनावटी मुद्दे तैयार हैं, तुम्हें पैसों की हेराफेरी में, जमीनी एवं लड़कियों के झूठे केसों में फँसायेंगे।’

उसके बाद अब तक कई बार ऐसे प्रयास किये गये, कई लड़कियों को भी भेजा गया पर उनके प्रयास असफल रहे। यह केस भी उसी षड्यंत्र की एक कड़ी है। यह उनकी कार्यप्रणाली है। दिल्ली का एक व्यक्ति इन षड्यंत्रकारियों के बीच घुस गया था एवं उनके द्वारा किस प्रकार से लड़कियों को तैयार किया जाता है और क्या-क्या षड्यंत्र चल रहे हैं, उनका स्टिंग ऑपरेशन किया था। उसके बाद इनके षड्यंत्र की पोल खुल गयी थी।

इन सभी षड्यंत्रकारियों के लिए बापू जी ने कई बार जाहिर सत्संग में कहा है और लोगों को सावधान किया है। न्यायालय में वर्ष 2010 में हुए बापू जी के सत्संग की सी.डी. भी चलायी गयी थी, जिसमें बापू जी ने जाहिर में यह बात कही है कि किस तरह से उन्हें फँसाने के लिए लड़कियों को उनके पास भेजा जाता था एवं पैसों के बारे में भी फँसाने का प्रयास किया गया था।

महेन्द्र चावला को वीणा चौहान नामक महिला ने आश्रम में रेकी (मुआयना) करने एवं आश्रम के बारे में जानकारी प्राप्त करने हेतु भेजा था और इसी साजिश के तहत उसने झूठे बयान दिये हैं।

राजू चांडक को गौशाला के पैसों में गबन करने के कारण आश्रम से निकाला गया था।
इसलिए इन लोगों तथा धर्मांतरण वालों ने एकजुट होकर आश्रम के विरुद्ध षड्यंत्र किया।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2015, पृष्ठ संख्या 7,8 अंक 269
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