(श्रीराम नवमीः 28 मार्च)
जब हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी की सुग्रीव से मित्रता कराते हैं, तब सुग्रीव अपना दुःख, अपनी असमर्थता, अपने हृदय की हर बात भगवान के सामने निष्कपट भाव से रख देता है। सुग्रीव की निखालिसता से प्रभु गदगद हो जाते हैं। तब सुग्रीव को धीरज बँधाते हुए भगवान श्रीराम प्रतिज्ञा करते हैं-
सुनु सुग्रीव मारिहुँ बालिहि एकहिं बान।…. (श्रीरामचरित. कि.कां. 6)
“सुग्रीव ! मैं एक ही बाण से बालि का वध करूँगा। तुम किष्किन्धापुरी जाकर बालि को चुनौती दो।” सुग्रीव आश्चर्य से भगवान का मुँह देखने लगे, बोलेः “प्रभो ! बालि को आप मारेंगे या मैं ?”
भगवान बोलेः) “मैं मारूँगा।”
“तो फिर मुझे क्यों भेज रहे हैं ?”
“लड़ोगे तुम और मारूँगा मैं।”
भगवान का संकेत है कि ‘पुरुषार्थ तो जीव को करना है परंतु उसका फल देना ईश्वर के हाथ में है।’
लक्ष्मणजी ने भगवान श्रीराम से पूछाः “प्रभो ! सुग्रीव की सारी कथा सुनकर तो यही लगता है कि भागना ही उसका चरित्र है। आपने क्या सोचकर उससे मित्रता की है ?”
रामजी हँसकर बोलेः “लक्ष्मण ! उसके दूसरे पक्ष को भी तो देखो। तुम्हें लगता है कि सुग्रीव दुर्बल है और बालि बलवान है पर जब सुग्रीव भागा और बालि ने उसका पीछा किया तो वह सुग्रीव को नहीं पकड़ सका। भागने की ऐसी कला कि अभिमानरूपी बालि हमें बन्दी न बना सके। और सुग्रीप पता लगाने की कला में भी कितना निपुण और विलक्षण है ! उसने पता लगा लिया कि बालि अन्य सभी जगह जा सकता है परन्तु ऋष्यमूक पर्वत पर नहीं जा सकता। सीता जी का पता लगाने के लिए इससे बढ़कर उपयुक्त पात्र दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।”
जब सुग्रीव बालि से हारकर आया तो भगवान राम ने उसे माला पहनायी। लक्ष्मण जी ने भगवान श्रीराम से कहाः “आपने तो सृष्टि का नियम ही बदल दिया। जीतने वाले को माला पहनाते तो देखा है पर हारने वाले को माला…..!” प्रभु मुस्कराये और बोलेः “संसार में तो जीतने वालों को ही सम्मान दिया जाता है परंतु मेरे यहाँ जो हार जाता है, उसे ही मैं माला पहनाता हूँ।” भगवान राम का अभिप्राय यह है कि सुग्रीव को अपनी असमर्थताओं का भलीभाँति बोध है। कुछ लोग असमर्थता की अनुभूति के बाद अपने जीवन से हतोत्साहित हो जाते हैं पर जो लोग स्वयं को असमर्थ जानकर सर्वसमर्थ भगवान व सदगुरु की सम्पूर्ण शरणागति स्वीकार कर लेते हैं, उन्हें जीवन की चरम सार्थकता की उपलब्धि हो जाती है।
लक्ष्मणजी पूछते हैं- “महाराज ! नवधा भक्ति में कौन-कौन सी भक्ति आपको सुग्रीव में दिखाई दे रही है।” प्रभु ने कहाः “प्रथम भी दिखाई दे रही है और नौवीं भी – प्रथम भक्ति संतन्ह कर संगा। हनुमान जी जैसे संत इन्हें प्राप्त हैं। नवम सरल सब सन छलहीना। अंतःकरण में सरलता और निश्छलता है। अपनी आत्मकथा सुनाते समय सुग्रीव ने अपने भागने को, अपनी पराजय को, अपनी दुर्बलता को कहीं भी छिपाने की चेष्टा नहीं की।”
सुग्रीव के चरित्र का एक अन्य श्रेष्ठ पक्ष है ऋष्यमूक पर्वत पर निवास करना। वहाँ ऋषि लोग मूक (मौन) होकर निवास करते थे। ऋष्यमूक पर्वत पर बालि नहीं आ सकता था। सुग्रीव जब उस पर्वत से नीचे उतर आता है तो उसे बालि का डर बना रहता था। यहाँ पर संकेत है कि जब तक हम महापुरुषों के सत्संगरूपी ऋष्यमूक पर्वत पर बैठते हैं, सत्संग से प्राप्त ज्ञान का आदर करते हैं, तब तक सब ठीक रहता है परंतु ज्यों ही सत्संग के उच्च विचारों से मन नीचे आता है तो फिर से अभिमानरूपी बालि का भय बना रहता है।
हनुमानजी ने बालि का नहीं सुग्रीव का साथ दिया। हनुमानजी शंकरजी के अंशावतार हैं और भगवान शंकर मूर्तिमान विश्वास हैं। इसका अभिप्राय यह है कि जीवन में चाहे सब चला जाय पर विश्वास न जाने पाये। जिसने विश्वास खो दिया, निष्ठा खो दी उसने सब कुछ खो दिया। सब खोने के बाद भी जिसने भगवान और सदगुरु के प्रति विश्वास को साथ ले लिया, उसका सब कुछ सँजोया हुआ है।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2015, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 267
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भगवन्नाम का ऐसा प्रभाव, भरता सबके हृदय में सद्भाव
एक गाँव में एक गरीब के 2 पुत्र व एक पुत्री थी। खराब संगत से वे तीनों बिगड़ गये। जब बड़े हुए तो भाइयों ने एक कुटिल योजना बनायी कि ‘किसी धनवान के साथ बहन का विवाह रचाते हैं फिर किसी तरह इसके पति को मरवा देंगे। इससे उसका धन अपने कब्जे में आ जायेगा। फिर बहन की शादी कहीं और करवा देंगे।’
भागदौड़ करने पर उन्हें एक धनी युवक घनश्याम मिल गया, जो कि सत्संगी और भगवन्नाम-जप की महिमा में दृढ़ आस्थावान था। उससे उन्होंने बहन की शादी करा दी। विदाई के समय बहन को सब समझा दिया। बहन ससुराल गयी और शादी के तीसरे दिन पति के साथ मायके फेरा डालने के लिए चल पड़ी। राह में प्यास का बहाना बनाकर वह पति को कुएँ के पास ले गयी। पति ज्यों ही कुएँ से पानी निकालने लगा, त्यों ही उसने पति को धक्का मार दिया और मायके पहुँच गयी।
ससुराल से सारा सोना, चाँदी, नकद पहले ही साथ बाँध लायी थी। भाई अति प्रसन्न हुए। उधर उसका पति तैरना जानता था। कुएँ के भीतर से आवाज सुन राहियों ने उसे बाहर निकाला। वह सीधे ससुराल पहुँच गया। उसे जीवित देख सभी चकित एवं दुःखी हुए। घनश्याम ने इस षड्यंत्र के बारे में सब समझने के बावजूद भी ऐसे व्यवहार किया जैसे कोई घटना ही नहीं घटी हो। रीति अनुसार अगले दिन ससुराल से पति ने पत्नी सहित विदाई ली। घनश्याम पत्नी को सत्संग में ले गया। सत्संग और सत्संगी महिलाओं के सम्पर्क से उसकी सूझबूझ सुंदर हो गयी, पवित्र हो गयी।
घनश्याम गृहस्थ के सभी कर्तव्यों को निभाता हुआ भक्तिमार्ग पर भी आगे बढ़ रहा था। उसके दो पुत्र हुए। पुत्रों के विवाह के बाद घनश्याम की ईश्वर-परायणता और भी ब़ढ़ गयी। ब्राह्ममुहूर्त में उठना, दिनभर जप, पाठ स्वाध्याय, सत्संग एव साधु-संतों, जरूरतमंदों की सेवा में निमग्न रहना उसका नियम बन गया था। एक बार बड़ी बहू ने पूछाः “पिता जी ! आप भगवन्नाम इतना क्यों जपते हैं ?”
घनश्यामः “बहू ! भगवान से बड़ा भगवान का नाम होता है। भगवन्नाम में असीम शक्ति एवं अपरिमित सामर्थ्य होता है। भगवान में असीम शक्ति एवं अपरिमित सामर्थ्य है। इसने केवल मेरी जान ही नहीं बचायी है बल्कि मुझे क्रोध, झगड़ा, वैर-विरोध, अशांति तथा न जाने कितनी ही बुराइयों से बचाया है। दूसरों में दोष न देखना, किसी की निंदा न करना, न सुनना, नीचा दिखाने के लिए कभी किसी की बुराई न उछालना बल्कि पर्दा डालकर उसकी बुराई को दूर करने में सहयोगी बनना, उसे उन्नत करना… ये सब सदगुण जापक में स्वतः आ जाते हैं। मैंने संत-महापुरुषों से सुना एवं अनुभव किया है कि कलियुग के दोषों से बचने के लिए भगवन्नाम महौषधि है।”
“पिताजी ! आपकी जान कब बची थी ?”
बहू के इस प्रश्न को घनश्याम ने टाल दिया। ससुर बहू की इस वार्ता को दरवाजे के पास खड़ी घनश्याम की पत्नी भी सुन रही थी। उसकी आँखों से पश्चाताप के आँसू बहने लगे। वह सामने आ गयी और पूर्व में हुई पूरी घटना बताते हुए बोलीः “बेटी ! पतिहंता होते हुए भी पति की मेरे प्रति अतुलनीय क्षमा, सौहार्द व प्रेम है। ऐसे देवतुल्य पति का साथ पाक मैं तो धन्य हो गयी !”
बहू बोलीः “माँ जी ! मैं भी पहले नास्तिक थी। मुझे भगवान, संत-महापुरुषों और भारतीय संस्कृति में श्रद्धा नहीं थी। मैं तो अपने माता-पिता की बात ही नहीं सुनती थी। परंतु यहाँ आने के बाद ससुरजी के कारण मेरे स्वभाव में परिवर्तन आया और आज नाम-जप की महिमा सुनकर अपनी संस्कृति की महानता मालूम हुई। माँ जी ! अब मैं भी ससुरजी के गुरुदेव के पास जाकर मंत्रदीक्षा लूँगी और अपना एवं अपने बच्चों का जीवन उन्नत बनाऊँगी।”
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2015, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 267
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प्राणिमात्र के कल्याण का हेतु होता है संत अवतरण – पूज्य बापू जी
पूज्य बापू जी का 75वाँ अवतरण दिवसः 10 अप्रैल
संतों को नित्य अवतार माना गया है। कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं संत होंगे और उनके हृदय में भगवान अवतरित होकर समाज में सही ज्ञान व सही आनंद का प्रकाश फैलाते हैं। उनके नाम पर, धर्म के नाम पर कहीं कितना भी, कुछ भी चलता रहता है फिर भी संत-अवतरण के कारण समाज में भगवत्सत्ता, भगवत्प्रीति, भगवद्ज्ञान, भगवद्-अर्पण बुद्धि के कर्मों का सिलसिला भगवान चलवाते रहते हैं।
तो आपके कर्म भी दिव्य हो जायेंगेः
साधारण आदमी अपने स्वार्थ से काम करता है, भगवान और महात्मा परहित के लिए काम करते हैं। महात्माओं का जन्मदिवस मनाने वाले साधक भी परहित के लिए काम कर रहे हैं तो साधकों के भी कर्म दिव्य हो गये।
इस दिवस पर जो भी सेवाकार्य करते हैं, वे करने का राग मिटाते हैं, भोगने का लालच मिटाते हैं और भगवान व गुरु के नाते परहित करते हैं। उन साधकों को जो आनंद आता होगा, जो कीर्तन में मस्ती आती होगी या गरीबों को भोजन कराने में जो संतोष का अनुभव होता होगा, विद्यार्थियों को नोटबुक बाँटने में तथा भिन्न-भिन्न सेवाकार्यों में जो आनंद आता होगा, वह सब दिव्य होगा। इस दिन के निमित्त प्रतिवर्ष गरीबों में लाखों टोपियाँ बँटती हैं, लाखों बच्चों को भोजन मिलता है और लाखों-लाखों कापियाँ बँटती हैं। औषधालयों में, अस्पतालों में, और जगहों पर – जिसको जहाँ भी सेवा मिलती है, वे सेवा ढूँढ लेते हैं। अपने स्वार्थ के लिए कर्म करते हैं तो उससे कर्मबंधन हो जाता है और परहित के लिए कर्म करते हैं तो कर्म दिव्य हो जाता है।
आपको जगाने के लिए क्या-क्या कर्म करते हैं
आप जिसका जन्मदिवस मना रहे हैं, वास्तव में वह मैं हूँ नहीं, था नहीं। फिर भी आप जन्म दिवस मना रहे हैं तो मैं इन्कार भी नहीं करता हूँ। आपने मुकुट पहना दिया तो पहन लिया, फूलों की चादर ओढ़ा दी तो ओढ़ ली। इस बहाने भी आपका जन्म-कर्म दिव्य हो जाये। वे महापुरुष हमें जगाने की न जाने क्या-क्या कलाएँ, क्या-क्या लीलाएँ करते रहते हैं ! नहीं तो ये टॉफी बाँटना, रंग छिड़कना, प्रसाद लेना-बाँटना – ये हमारी दुनिया के आगे बहुत-बहुत छोटी बात है। लेकिन करें तो करें क्या ? आध्यात्मिकता में जिनकी बचकानी समझ है, एक दो की नहीं लगभग सभी की है, उन्हें उठाना-जगाना है। यह अपने-आप में बहुत भारी तपस्या है। एकाग्रता के तप से भी ऊँचा तप है। वे महापुरुष नित्य नवीन रस अद्वैत ब्रह्म में हैं लेकिन नित्य द्वैत के व्यवहार में उतरते हुए हमको ऊपर उठाते हैं।
यह जो कुछ आँखों से दिखता है, जीभ से चखने में आता है, नाक से सूँघने में आता है, मन और बुद्धि से सोचने में आता है – ये सब वास्तव में हैं ही नहीं। जैसे स्वप्न में सब चीजें सच्ची लगती हैं, आँख खोली तो वास्तविकता में नहीं हैं, ऐसे ही ये सब सचमुच में, वास्तविकता में नहीं है।
आप भी इसका मजा लो
वास्तव में प्रकृति और चैतन्य परमात्मा है, बाकी कुछ भी ठोस नहीं है। सिर्फ लगता है यह ठोस है। 10 मिनट हररोज भावना करो कि ‘यह सब स्वप्न है, परिवर्तनशील है। इन सबके पीछे एक सूत्रधार चैतन्य है और अष्टधा प्रकृति है।’ यह याद रखो और स्वप्न का मजा लो तो उसकी गंदगी अथवा विशेषता से आप बंधायमान नहीं होंगे।
भगवान व गुरु भक्त का पक्ष लेते हैं
भगवान और गुरु के साथ एकतानता हो जाय तो भगवान और गुरु का अनुभव एक ही होता है। ब्रह्म-परमात्मा तटस्थ हैं, गुरु और भगवान पक्षपाती हैं। ब्रह्म-परमात्मा प्रकाश देते हैं, चेतना देते हैं, कोई कुछ भी करे …. लेकिन भगवान और गुरु भक्त का पक्ष लेते हैं। भक्त अच्छा करेगा तो प्रोत्साहित करेंगे, बुरा करेगा तो डाँटेंगे, बुराई से बचने में मदद करेंगे, भक्त की रक्षा करेंगे। ‘चतुर्भुजी नारायण भगवान नन्हें हो जाओ’ तो माता की प्रार्थना पर ‘उवाँ…..उवाँ……’ करते हुए रामजी बन गये, श्रीकृष्ण बन गये। भक्त के पश्र में वराह अवतार, मत्स्य अवतार, अंतर्यामी अवतार, प्रेरक अवतार ले लेते हैं।
जन्मदिवस मनाने का उद्देश्य क्या ?
यह जन्म दिवस मनाने के पीछे भी एक ऊँचा उद्देश्य है। ‘मैं कौन हूँ ?….. ‘ – ‘मैं फलाना हूँ….’ पर यह तो शरीर है, इसको जानने वाला मन है, निर्णय करने वाली बुद्धि है। ये सब तो बदलते हैं फिर भी जो नहीं बदलता है, वह मैं कौन हूँ ?’ – ऐसा खोजते-खोजते गुरु के संकेत से सदाचारी जीवन जिये तो ‘मैं कौन हूँ ?’ इसको जान लेना और जन्म दिव्य हो जायेगा। जन्म दिव्य होते ही कर्म दिव्य हो जायेंगे क्योंकि सुख पाने की लालसा नहीं है, दुःख से बचने का भय नहीं है और ‘जो है, बना रहे’ ऐसी उसकी नासमझी नहीं है।
मरने वाले शरीर का जन्मदिवस तो मनाओ पर उसी निमित्त मनाओ, जिससे सत्कर्म हो जायें, सदबुद्धि का विकास हो जाये। इस उत्सव में नाच कूद के बाहर की आपाधापी मिटाकर सदभाव जगा के फिर शांत हो जायें। श्रीमद् आद्यशंकराचार्यजी ने कहा हैः
मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं….
‘मैं शरीर भी नहीं हूँ, मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त भी नहीं हूँ। तो फिर क्या हूँ?’ बस, डूब, जाओ, तड़पो….. प्रकट हो जायेगा।
स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2015, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 267
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