All posts by Gurukripa

‘प्रणव’ (ॐ) की महिमा


चतुर्दशी आर्द्रा नक्षत्र योगः

सूत जी ने ऋषियों से कहाः “महर्षियो ! ‘प्र’ नाम है प्रकृति से उत्पन्न संसाररूपी महासागर का। प्रणव इससे पार करने के लिए (नव)  नाव है। इसलिए इस ॐकार को ‘प्रणव’ की संज्ञा देते हैं। ॐकार अपना जप करने वाले साधकों से कहता है- ‘प्र-प्रपंच, न-नहीं है, वः-तुम  लोगों के लिए।’ अतः इस भाव को लेकर भी ज्ञानी पुरुष ‘ॐ’ को ‘प्रणव’ नाम से जानते हैं। इसका दूसरा भाव हैः ‘प्र-प्रकर्षेण, न-नयेत्, वः-युष्मान् मोक्षम् इति वा प्रणवः। अर्थात् यह तुम सब उपासकों को बलपूर्वक मोक्ष तक पहुँचा देगा।’ इससे भी ऋषि-मुनि इसे ‘प्रणव’ कहते हैं। अपना जप करने वाले योगियों के तथा अपने मंत्र की पूजा करने वाले उपासकों के समस्त कर्मों का नाश करके यह उन्हें दिव्य नूतन ज्ञान देता है, इसलिए भी इसका नाम प्रणव – प्र (कर्मक्षयपूर्वक) नव (नूतन ज्ञान देने वाला) है।

उन मायारहित महेश्वर को ही नव अर्थात् नूतन कहते हैं। वे परमात्मा प्रधान रूप से अर्थात् शुद्धस्वरूप हैं, इसलिए ‘प्रणव’ कहलाते हैं। प्रणव साधक को नव अर्थात् नवीन (शिवस्वरूप) कर देता है, इसलिए भी विद्वान पुरुष इसे प्रणव के नाम से जानते हैं अथवा प्र-प्रमुख रूप से नव- दिव्य परमात्म-ज्ञान प्रकट करता है, इसलिए यह प्रणव है।

यद्यपि जीवन्मुक्त के लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह सिद्धरूप है, तथापि दूसरों की दृष्टि में जब तक उसका शरीर रहता है, तब तक उसके द्वारा प्रणव जप की सहज साधना स्वतः होती रहती है। वह अपनी देह का विलय होने तक सूक्ष्म प्रणव मंत्र का जप  और उसके अर्थभूत परमात्म-तत्त्व का अनुसंधान करता रहता है। जब शरीर नष्ट हो जाता है, तब वह पूर्ण ब्रह्मस्वरूप शिव को प्राप्त कर लेता है – यह सुनिश्चित है। जो अर्थ का अनुसंधान न करके केवल मंत्र का जप करता है, उसे निश्चय ही योग  की प्राप्ति होती है। जिसने इस मंत्र का 36 करोड़ जप कर लिया हो, उसे अवश्य ही योग प्राप्त हो जाता है। ‘अ’ शिव है, ‘उ’ शक्ति है और  ‘मकार’ इन दोनों की एकता है। यह त्रितत्त्वरूप है, ऐसा समझकर ‘ह्रस्व प्रणव’ का जप करना चाहिए। जो अपने समस्त पापों का क्षय करना चाहते हैं, उनके लिए ह्रस्व प्रणव का जप अत्यंत आवश्यक है।

वेद के आदि में और दोनों संध्याओं की उपासना के समय भी ॐकार का उच्चारण करना चाहिए।”

भगवान शिव ने भगवान ब्रह्माजी और भगवान विष्णु से कहाः “मैंने पूर्वकाल में अपने स्वरूपभूत मंत्र का उपदेश किया है, जो ॐकार के रूप में प्रसिद्ध है। वह महामंगलकारी मंत्र है। सबसे पहले मेरे मुख से ॐकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध कराने वाला है। ॐकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है। प्रतिदिन ॐकार का निरन्तर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है।

मुनीश्वरो !  प्रतिदिन दस हजार प्रणव मंत्र का जप करें अथवा दोनों संध्याओं के समय एक-एक हजार प्रणव का जप किया करें। यह क्रम भी शिवपद की प्राप्ति कराने वाला है।

‘ॐ’ इस मंत्र का प्रतिदिन मात्र एक हजार जप करने पर सम्पूर्ण  मनोरथों की सिद्धि होती है।

प्रणव के ‘अ’, ‘उ’ और ‘म्’ इन तीनों अक्षरों से जीव और ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन होता है – इस बात को जानकर प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए कि हम तीनों लोकों की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा, पालन करने वाले विष्णु तथा संहार करने वाले रूद्र जो स्वयंप्रकाश चिन्मय हैं, उनकी उपासना करते हैं। यह ब्रह्मस्वरूप ॐकार हमारी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों को, मन की वृत्तियों को तथा बुद्धि की वृत्तियों को सदा भोग और मोक्ष  प्रदान करने वाले धर्म एवं ज्ञान की ओर प्रेरित करे।’ प्रणव के इस अर्थ का बुद्धि के द्वारा चिंतन करता हुआ जो इसका जप करता है, वह निश्चय ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। अथवा अर्थानुसंधान के बिना भी प्रणव का नित्य जप करना चाहिए।”

(शिव पुराण अंतर्गत विद्येश्वर संहिता से संकलित)

भिन्न-भिन्न काल में ॐ की महिमा

आर्द्रा नक्षत्र से युक्त चतुर्दशी के योग में (दिनांक 14 जनवरी 2014 को सुबह 7-22 से 15 जनवरी सुबह 7-52 तक)  प्रणव का जप किया जाय तो वह अक्षय फल देने वाला होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद,  दिसम्बर 2013, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 252

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

 

कानून के रखवाले ही कानून का मजाक क्यों बना रहे हैं ?


अहमदाबाद, 21 नवम्बर। कानून की रखवाली कही जाने वाली पुलिस ने बिना कोई सर्च वॉरेन्ट दिखाये ही अहमदाबाद आश्रम में छानबीन करके खुद कानून का उल्लंघन किया है। सुबह 6.15 बजे सूरत पुलिस की 8-10 गाड़ियाँ आश्रम में आयीं और आते ही पुलिस ने टेलिफोन कार्यालय से सबको बाहर निकाल दिया तथा शाम 5 बजे तक पुलिस का पहरा उस कार्यालय पर रहा। पूरे आश्रम-परिसर में पुलिसवाले तैनात कर दिये गये। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को आश्रम में प्रवेश करने तथा आश्रम के साधकों को बाहर जाने से रोक दिया गया। पुलिस अपने साथ असामाजिक तथा अपराधी प्रवृत्ति के अमृत प्रजापति व महेन्द्र चावला  भी लेकर आयी थी, जिन्होंने चेहरे पर कपड़ा बाँधा हुआ था।

डीसीपी शोभा भूतड़ा के साथ पुलिस की एक टीम अमृत प्रजापति व महेन्द्र चावला को लेकर आश्रम के सभी कमरों की तलाशी लेने लगी। जिन कमरों में ताले लगे थे और चाबी नहीं थी या लाने में देर हुई तो ग्रांइडर (कटर) से उन दरवाजों के तालों को तोड़ा गया। कमरों में जाँच के दौरान पुलिस ने आश्रम के सेवकों को नहीं जाने दिया। वहाँ से क्या सामान लिया, कौन-से कागजात उठाये यह किसी को नहीं बताया गया। ऐसे में पुलिस तो कुछ भी सामान रखकर सबूत बना सकती है ! एफएसएल की टीम दिन भर एकाउंट रूम में बैठी रही, कौन से पेपर लिये, क्या डाटा लिया, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गयी।

धार्मिक आस्था के स्थान जैसे मोक्ष कुटीर शांति कुटिया तथा व्यास  भवन आदि जहाँ पर भक्त लोग बड़े श्रद्धाभाव से आकर ध्यान भजन करते हैं, माथा टेकते हैं वहाँ पुलिस अमर्याद ढंग से जूते पहन के घुसी, जिससे भक्तों की भावनाओं को गहरी चोट पहुँची। सत्संग मंडप में सुबह की संध्या कर रहे लोगों को पूछताछ के नाम पर वहीं पर बिठा के रखा। सुबह 5 बजे से संध्या में बैठे लोगों को दोपहर तक उठने नहीं दिया गया। साधकों को पेशाब के लिए भी नहीं जाने दिया।

वरिष्ठ अधिवक्ता श्री बी. एम. गुप्ता को जब आश्रम बुलाया गया तो वे तुरन्त आश्रम पहुँचे और वहाँ पुलिस की कार्यवाही के बारे में साधकों ने उनसे बात की। पुलिस की इस गैर कानूनी कार्यवाही पर नाराजगी जताते हुए उन्होंने मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कीः “नियम कहता है कि रेड भी डालनी हो तो पहले मेजिस्ट्रेट या किसी ऑफिसर का सर्च वारंट होना चाहिए पर ये लोग सर्च वारेंट लिये बगैर आ गये। पुलिस जो भी यहाँ से माल बरामद करेगी उसकी सूची बनानी पड़ेगी, उसकी कॉपी आश्रम को देनी पड़ेगी और बरामद किये गये माल की सूची न्यायालय में पेश करनी पड़ती है और वहाँ से कानून  का ऑर्डर लेकर फिर ये उन वस्तुओं को ले जा सकते हैं। बाकी यह सब जो चल रहा है, वह हकीकत में गैर कानूनी है।”

इसके बाद तो पुलिस में खलबली मच गयी।  दोपहर में पुलिस की कई गाड़ियाँ आश्रम से बाहर गयीं और आयीं। फिर शाम को 7.15 बजे पुलिस द्वारा आश्रम व्यवस्थापक को एक प्रस्ताव दिया गया, जिसमें लिखा था कि ‘हमें अहमदाबाद आश्रम में नारायण साँईं तथा अन्य दो लोगों के छिपे होने की आशंका है इसलिए सर्च करना चाहते हैं।’ व्यवस्थापक द्वारा प्रस्ताव पर समय व दिनांक के साथ हस्ताक्षर किये गये। समय डालने पर पुलिस ने नाराजगी जतायी क्योंकि इससे उनकी गैर-कानूनी जाँच न्यायालय के सामने आ जायेगी। रात्रि 8-15 बजे पूरे 14 घंटे बाद पुलिस वापस गयी।

पुलिस 13 घंटे बाद आश्रम में आने का कारण बताती है। किसी भी धार्मिक संस्था में घुसकर कारण बताये बिना ही 11 घंटे तक टेलिफोन कार्यालय बंद कर दिया जाता है। दर्शन के लिए आश्रम में आने वाले भक्तों को 12 बजे तक आश्रम में प्रवेश नहीं दिया जाता है। क्या यह पुलिस ने नया कानून बनाया है ?

अमृत प्रजापति और महेन्द्र चावला, जिनका आश्रम के खिलाफ षड्यन्त्र रचने का आपराधिक रिकॉर्ड है और पिछले 3 महीनों से जो लगातार मीडिया में आकर आश्रम व बापू जी पर झूठे, मनगढ़ंत और घृणित आरोप लगा रहे हैं, उनको लेकर सूरत पुलिस ने आश्रम की तलाशी क्यों ली ? उन लोगों को यदि कानून के तहत लाया गया था तो फिर चेहरे पर कपड़ा क्यों बाँधे हुए थे ? तलाशी के दौरान सरकारी कैमरे द्वारा ली गयी विडियो क्लिप मीडिया को कैसे मिली ? इतना ही नहीं, पुलिस ने मौन मंदिर (पिरामिड के आकार का एक कमरा जो ध्यान भजन के लिए विशेष लाभदायी होता है) को गुप्त तहखाना बताया। जबकि वास्तविकता तो यह है कि आश्रम में ऐसा कोई तहखाना नहीं है। इस विषय में पहले ही सीआईडी द्वारा कई बार आश्रम की छानबीन करने के बाद आश्रम को क्लीन चिट दी गयी है। पुलिस ने देश की जनता को गुमराह क्यों किया ? इसमें गहरे षड्यंत्र की बू आ रही है।

विश्व-मांगल्य में रत पूज्य संतों के खिलाफ षड्यंत्र तथा उनके आश्रमों पर हो रहे अत्याचार आखिर कब समाप्त होंगे ? यह एक चर्चित सवाल है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2013, पृष्ठ संख्या 27-28, अंक 252

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

गहरी साजिश के तहत सेवादारों को फँसाया गया


भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के षड्यंत्र के तहत बापू जी पर झूठे, बेबुनियाद आरोप लगाकर उन्हें जेल भेज गया। साथ ही बापू जी के सेवादारों को भी इस घिनौनी साजिश के तहत झूठे आरोपों में फँसाया गया है। बापू जी के सत्संग से तो कितने ही हताश-निराश लोगों को जीवन जीने की नयी दिशा मिली है, उनका जीवन उन्नत हुआ है। बापू जी के बारे में ऐसी बातों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इस कलियुग में जहाँ अपनी खुद की संतान भी बात मानने को तैयार नहीं होती, ऐसे समय में एक दो नहीं करोड़ों लोग पूज्य बापू जी को आदर से सुनते-मानते हैं, इसके पीछे हैं पूज्य बापू जी का संयम, सदाचार, जप, तप, तितिक्षा और विश्वमानव के परोपकार की मंगल भावना। पूज्य बापू जी के बारे में चल रही अनर्गल बातों में यदि जरा-सी भी सच्चाई होती तो यह समझने वाली बात है कि करोड़ों लोग पूज्य बापू जी से जुड़ते ही क्यों ! और इन करोड़ों लोगों में कितने ही देश-विदेश के उद्योगपति, राजनेता, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक आदि ऊँचे-ऊँचे पदों में हैं। साथ ही इस केस में जिनको आरोपी बनाया गया है, वे भी सम्पन्न  घरों के शिक्षित लोग हैं। वे क्यों सब कुछ छोड़कर आश्रम में आते !

छिंदवाड़ा गुरुकुल में डायरेक्टर पद पर कार्यरत  शरदचन्द्र भाई हैदराबाद के निवासी थे। उन्होंने हैदराबाद से ‘बायो मेडिकल इंजीनियरिंग’ और यूएसए से ‘एमएस’ की डिग्री प्राप्त की हुई है। शरदचन्द्र भाई ब्रह्मचारी हैं। उन पर आरोप लगाया गया है कि ‘वे बापू जी के पास लड़कियों को भेजते थे।’ यह बात बिल्कुल वाहियात और झूठा आरोप है। यह तो सोचने वाली बात है कि यदि आश्रम  में ऐसी घटनायें होतीं तो इतना पढ़ा लिखा, धन-धान्य से सम्पन्न व्यक्ति बापू जी के पास ही क्यों आता ! दूसरी बात यदि उसे ऐसे काम करने होते तो वह आश्रम क्यों आता ! आश्रम तो भगवदभक्ति व साधना के लिए हैं, समाज सेवा के लिए हैं।

शिल्पी गुप्ता छिंदवाड़ा गुरुकुल में छात्रावास अध्यक्ष और संचालिक के रूप में सेवारत थी। शिल्पी बहन के ऊपर आरोप लगाया है कि वे लड़कियों को बहला-फुसलाकर बापू जी के पास भेजती थीं। यह आरोप सरासर झूठा और बेबुनियाद है क्योंकि शिल्पी बहन पोस्टग्रेजुएट हैं, तथा एक सम्पन्न परिवार से हैं। उन्हें घर में पैसों की कोई कमी नहीं है कि वे पैसे के लालच  में ऐसा काम करें। शिल्पी बहन के पिता जी रायपुर में ‘नगर तथा ग्राम  निवेश’ में संयुक्त संचालक (Joint Director) के पद पर हैं। यदि ऐसा कुछ होता रहता तो वे बापू जी से जुड़ती ही क्यों ? शिल्पी बहन ने बताया था कि “ईश्वर की कृपा से मेरे घऱ में कोई कमी नहीं है। बापू जी के द्वारा मुझे कभी कोई प्रलोभन नहीं दिया गया है और न फ्लैट दिया गया है और न ही ऐसा कोई ऑफर आया है कि मुझे कोई बड़ी संचालिका बना देंगे। मेरी बचपन से इच्छा थी कि सेवा करूँ और यहाँ पर आकर मुझे लगा कि यहाँ मेरा निःस्वार्थ सेवा का संकल्प पूरा हो रहा है। मेरा और पूज्य बापू जी का संबंध एक पिता और पुत्री का ही है।  मैं बापू जी को पिता ही मानती हूँ।”

किशोर देवड़ा बापू जी का अंगद सेवक है, ब्रह्ममचारी है। उन्होंने अपने फार्म में बापू जी के लिए कुटिया बनवायी थी। बापू जी यदि ऐसा काम करते तो यह व्यक्ति कुटिया क्यों बनवाता ? बिल्कुल मनगढ़ंत कहानी बनाकर साजिशकर्ताओं द्वारा बापू जी पर  घृणित आरोप लगवाये जा रहे हैं।

अब देश की जागरूक जनता इस षड्यंत्र को समझे और विचार करे कि बापू जी और उनके सेवादारों को आखिर क्यों सताया जा रहा है ? क्या उनका यही गुनाह है कि उन्होंने देश, संस्कृति व समाज को  नोचने व तोड़ने वाली ताकतों से देशवासियों को बचाने का प्रयत्न किया ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बरर 2013, पृष्ठ संख्या 16, अंक 252

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ