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अनुभव का आदर कर लो तो काम बन जाय


पूज्य बापू जी की मधुमय, ज्ञानवर्धक अनुभवमय अमृतवाणी

जीवन में रस हो लेकिन रस उद्गम स्थान पर ले जाय । जीवन में रस तो है लेकिन उद्गम स्थान से दूर ले जाता है तो वह जीवन नीरस हो जाता है । जैसे पान मसाले का रस, पति-पत्नी का विकारी रस अथवा वाहवाही का रस । रावण की वाहवाही बहुत होती थी लेकिन रस के उद्गम स्थान से रावण दूर चला गया । राम जी के जीवन में रस का उद्गम स्थान था, सत्संग था । श्रीकृष्ण के जीवन में रस था लेकिन उद्गम स्थानवाला था । पत्ते हरे-भरे हैं, फूल महकते हैं तो मूल में रस है तभी पत्तों तक पहुँचा । ऐसे ही आपका मूल परमात्म-रस है तो व्यवहार रसीला हो जाता है । आपका दर्शन रसमय,  आपकी वाणी रसमय….।

प्रेम की बोली का नाम संगीत है और प्रेम की चाल का नाम नृत्य है तथा परमात्म-प्रेम से भरे हुए व्यवहार का नाम भक्ति है और परमात्म-प्रेम से भरी हुई निगाहों का नाम ही नूरानी निगाहें है । श्रीकृष्ण निकलते थे तब सब लोग काम छोड़कर ‘कृष्ण आये, कृष्ण आये’ करके देखने को भागते थे, रस आता था उनसे, लेकिन कंस आता था तो ‘कंस आया, कंस आया’ करके घर में भाग जाते थे क्योंकि वह अहंकार को पोषता था, दूसरों को शोषित करके बाहर से रस भीतर भरता था और श्रीकृष्ण भीतर से रस बाँटते थे ।

राम जी आते तो रामजी को देखने के लिए किरात, भील, ये-वो भाग-भाग के आते लेकिन रावण निकलता तो लोग अपने घरों में भाग जाते । तो जो बाहर से अंदर रस भरता है वह रावण के रास्ते जाता है और जो अंदर से बाहर रस छलकाता है वह राम जी के रास्ते है  । मर्जी तुम्हारी है, तुम बीच में हो । संसार में जाते हो तो रावण के रास्ते का रस लेने वालों में उलझ जाते हो । सत्संग में आते हो तो राम का रस लेने वालों के सम्पर्क में आते हो । तुम्हारे जीवन में दोनों अनुभूतियाँ हैं । बिना वस्तु के, बिना व्यक्ति के सुखमय, रसमय दिन बीत जाते हैं सत्संग के, यह तुम्हारा अनुभव है और घर में सारे रस के साधन होते हुए भी जीवन थकान भरा हो जाता है, बोझीला हो जाता है । बिल्कुल तुम्हारे अनुभव का तुम आदर करो ।

तुम शास्त्र की बात न मानो, गुरु की बात न मानो, धर्म की बात न मानो, केवल अपना अनुभव मान लो तो भी तुम्हारा जीवन धन्य हो जायेगा । संसार के सुख में दुःख छुपा है, हर्ष में शोक छुपा है, जीवन में मृत्यु छुपी है, संयोग में वियोग छुपा है, मित्रता में नफरत, शत्रुता और एक दूसरे का त्याग छुपा है लेकिन भगवान में नित्य नवीन रस छुपा है… । उसमें भी थोडी चरपराहट आती है लेकिन प्रेम में कमी नहीं होती । शुद्ध प्रेम नित्य नवीन रस देता है । काम दिन-दिन क्षीण होता है और विकृतरूप होता है और प्रेम दिन-दिन बढ़ता है, सुकृतरूप होता है ।

संसारी विकार भोगने के बाद आप थक जाते हैं, हताश हो जाते हैं, असारता लगती है । श्मशान में जाते हैं तो लगता है कि ये सब मर ही गये, अपन भी मरने वाले हैं ।

तो शरीर मर जायेगा यह भी अपना अनुभव है और विकार भोगने के बाद जीवन नीरस हो जाता है शरीर थक जाता है यह भी अनुभव है । तो इस अनुभव का आदर करके संयम और सत्य रस पाने का इरादा कर लो । आपका तो काम बन जायेगा, आपकी आँखों से जो तन्मात्राएँ निकलेंगी, आपको छूकर जो हवामान में, वातावरण में तरंगे निकलेंगी वे कइयों को सुख, शांति और आनंद बख्शेंगी । इसको बोलते हैं ‘चिन्मय रस’ । ऐसा आपका आत्मा-परमात्मा का रस है !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 11, 17 अंक 228

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भगवान के वास्तविक स्वरूप को जानो


(आत्मनिष्ठ बापू जी के मुखारविंद से निःसृत ज्ञानगंगा)

भगवान कहते हैं-

मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युजन्मदाश्रयः ।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ।।

‘हे पार्थ ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्तचित्त तथा अनन्यभाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्य आदि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन ।’ (गीताः 7.1)

अब यहाँ ध्यान देने योग्य जैसी बात है कि भगवान बोलते हैं, ‘मुझमें….’ । अगर भगवान का ‘मैं’ हमने ठीक से समझा और हमारे में आसक्ति का जोर है तो हम भगवान के किसी रूप को भगवान समझेंगे तथा हमारे चित्त में द्वेष है तो कहेंगे कि भगवान कितने अहंकारी हैं, कहते हैं कि मेरे में ही आसक्त हो ।

श्रीकृष्ण का ‘मैं’ जब तक समझ नहीं आता अथवा श्रीकृष्ण के ‘मैं’ की तरफ जब तक नज़र नहीं जाती, तब तक श्रीकृष्ण के उपदेश को अथवा श्रीकृष्ण के इस अदभुत इशारे को हम समझ नहीं सकते । मय्यासक्तमनाः पार्थ…. मुझमें आसक्त…. मेरे में जिसकी प्रीति है । हमारे में राग है तो श्रीकृष्ण के साकार रूप में ही प्रीति होगी और हमारे में द्वेष है तो कहेंगे श्रीकृष्ण बोलते हैं, ‘मेरे में ही प्रीति….’ यह तो एकदेशीयता हुई । सच पूछो तो श्रीकृष्ण का जो ‘मैं’ है, वह एकदेशीयता को तोड़कर व्यापकता की खबरें सुनाने  वाला है ।

श्रीकृष्ण ने ‘गीता’ कही नहीं, श्रीकृष्ण के द्वारा ‘गीता’ गूँज गयी । हम कुछ करते हैं तो या तो अनुकूल करते हैं या प्रतिकूल करते हैं । करने वाले परिच्छिन्न जीव रहते हैं । श्रीकृष्ण ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो परिच्छिन्नता को मौजूद रखकर कुछ कहें । श्रीकृष्ण का तो इतना खुला जीवन है, इतनी सहजता है, स्वाभाविकता है कि वे ही कह सकते हैं कि मेरे में आसक्त हो । आसक्ति शब्द, प्रीति शब्द…. शब्द तो बेचारे नन्हें पड़ जाते हैं, अर्थ हमें लगाना पड़ता है । जो हमारी बोलचाल की भाषा है वही श्रीकृष्ण बोलेंगे, वही गुरु बोलेंगे ।

भाषा तो बेचारी अधूरी है, अर्थ भी उसमें हमारी बुद्धि के अनुसार लगता है लेकिन हमारी बुद्धि जब हमारे व्यक्तित्व का, हमारी देह के दायरे का आकर्षण छोड़ दे तो फिर कुछ समझने के काबिल हो पाते हैं और समझने के काबिल  होते-होते यह समझा जाता है कि हम जो कुछ समझते हैं वह कुछ नहीं । आज तक जो हमने समझा है, जाना वह कुछ नहीं । जिसको जानने से सब जाना जाता है वह हमने नहीं जाना, जिसको पाने से सब पाया जाता है उसको नहीं पाया, जिसको समझने से सब समझा जाता है उसको नहीं समझा । तो बुद्धि में यदि अकड़ है तो तुच्छ-तुच्छ जानकारियाँ एकत्रित करके हम अपने को विद्वान या ज्ञानी या जानकार मान लेते हैं । अगर बुद्धि में परमात्मा के प्रति प्रेम है, आकांक्षाएँ नहीं हैं तो फिर हमने जो कुछ जाना है उसकी कीमत हमको नहीं दिखती, जिससे जाना जाता है उसको समझने की हमारे क्षमता आती है ।

भगवान बोलते हैं- मय्यासक्तमनाः पार्थ…. अर्थात् मेरे में जिसकी प्रीति है… उपवास में पानी पीने में, न पीने में, खाने में अथवा न खाने में, मिठाई में अथवा तीखे में – यह खण्ड-खण्ड में प्रीति नहीं, मुझ अखण्ड में जिसकी प्रीति हुई है ऐसे अर्जुन ! मैं तेरे को अपना समग्र स्वरूप सुनाता हूँ । और जिसने भगवान के समग्र स्वरूप को जान लिया, उसको और कुछ जानना बाकी नहीं बचता । जिसने उस एक को, समग्र स्वरूप को न जाना और बाकी सब कुछ जाना, हजार-हजार, लाख-लाख जाना तो उसका लाख-लाख जानना सब बेकार हो जाता है ।

जिसने एक को जान लिया उसने और किसी को नहीं जाना तो भी चल जाता है । रामकृष्ण परमहंस ने एक को जाना, बाकी का न जाना तो भी काम चल गया । हिटलर ने बाकी बहुत कुछ जाना, एक को नहीं जाना तो मरा मुसीबत में । विश्वामित्र जी ने एक को जाना तो भगवान राम और लक्ष्मण पैरचम्मी कर रहे हैं । रावण ने एक को नहीं जानकर बहुत-बहुत जाना तो हर बारह महीने में दे दियासिलाई !

अनंत-अनंत ब्रह्माण्डों में जो फैल रहा है वही तुम्हारे हृदय में बस रहा है लेकिन हमारी संसार की जो आसक्तियाँ हैं, मान्यताएँ हैं उनको छोड़ने की युक्ति हमको नहीं है ।

श्वास छोड़ते समय भावना करें कि ‘मेरी इच्छाएँ, अहंकार, वासना अलविदा…. अब तो सर्वत्र मेरा परमात्मा है, मेरा आत्मा ही रह गया है । इच्छाएँ-वासनाएँ चली गयीं तो ईश्वर ही तो रह गया । मैं ईश्वर में डूब रहा हूँ, मेरा आत्मा ही परमात्मा है । ॐ आनंद आनंद….’ इस प्रकार का भाव करके जो ध्यान करता है, चुप होता है वह भगवान में प्रीतिवाला हो जाता है । रस आने लगेगा तो मन उस तरफ लगेगा । मन को रस चाहिए । इस ढंग से यदि तुम मन को रस लेना सिखा दो तो भगवान में प्रीति हो जायेगी और भगवान का समग्र स्वरूप संत जब बतायेंगे और भगवान के वाक्य जब तुम सुनोगे तो समग्र स्वरूप का साक्षात्कार हो जायेगा ।

जितना हेत हराम से, उतना हरि होये ।

कह कबीर ता दास, पला न पकड़े कोय ।।

फिर यमदूत की क्या ताकत है कि तुम्हें मार सके, मौत की क्या ताकत है कि तुम्हें आँख दिखा सके ! वह तो तुम्हारे शरीर से गुजरेगी लेकिन तुम उसके साक्षी होकर अपने स्वरूप में जगमगाते रहोगे ।

भगवान बोलते हैं- मय्यासक्तामनाः पार्थ योगं युंजन्मदाश्रयः । जो मेरे में… ‘मेरे में’ माना रथ पर बैठे हुए श्रीकृष्ण अपने को उस रूप में ‘मैं’ नहीं कह रहे थे । श्रीकृष्ण का ‘मैं’ तो समग्र ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है, सबके दिलों में फैला हुआ है । हे पार्थ ! अनन्य प्रेम से मुझमे आसक्तचित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, सम्पूर्ण  बल, सम्पूर्ण ऐश्वर्य आदि जिसकी सत्ता से चमक रहा है, जिसका है उसको जान ले तो तेरा बेड़ा पार हो जायेगा ।

यह कठिन नहीं है, बड़ा आसान है । इसको जानने अथवा परमात्मा को पाने जैसा दुनिया में और कोई सरल कार्य नहीं लेकिन मनुष्य इतना छोटी बुद्धि का हो गया कि थोड़ी-थोड़ी चीजों में उलझ जाता है । ईंट, चूना, लोहा, लक्कड़ के मकान में जिंदगी खो देगा, मिटने वाले मित्रों में समय खो देगा, जलने वाले शरीर में समय खो देगा इसलिए ज्ञान दुर्लभ हो जाता है, वरना यह दुर्लभ नहीं ।

तुम्हें कोई सम्राट दिखता है, कोई शहंशाह दिखता है, कोई धनवान दिखता है तो उसके धन को और शहंशाही को अपने से पृथक नहीं मानकर उस धन और शहंशाही की इच्छाओं और वासनाओं को बढ़ाकर नहीं लेकिन उस धन और शाहाना नज़र को अपनी नज़र समझकर तुम मज़ा लूटो । किसी का धन देख के, किसी का सौंदर्य देख के, किसी की सत्ता देख के तुम वैसा बनने की कोशिश करोगे तो बनते-बनते युग बीत जायेंगे, वह रहेगा नहीं लेकिन जो धनवान है, सत्तावान है, ऐश्वर्यवान है उसमें भी मैं ही उस रूप में मज़ा ले रहा हूँ – ऐसा सोचोगे तो बेड़ा जल्दी पार हो जायेगा ।

समग्र ऐश्वर्य, समग्र सत्ता, समग्र रूप सच पूछो तो उस तुम्हारे चैतन्य के ही हैं । जैसे रात्रि के स्वप्न में तुम देखते हो कि कोई कनाडा का प्रधानमंत्री है, कोई भारत का राष्ट्रपति है लेकिन वे सब स्वप्न में तुम्हारे बनाये हुए हैं । तुम्हीं ने सत्ता दी है उनको । स्वप्न में तो तुम्हारी चैतन्य सत्ता ने स्वप्न समष्टि को सत्ता दी, ऐसे ही जाग्रत में तुम तो लगते हो व्यष्टि…. ‘मैं एक छोटा व्यक्ति और ये बड़े-बड़े ।’ तुम अपने वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते हो तब तुम छोटे दिखते हो और वे बड़े-बड़े दिखते हैं । तुम अपने को जानो तो तुमको पता चलेगा कि ये सब मेरे बनाये हुए पुतले हैं ।

संसार तजल्ली1 है मेरी….. अंदर-बाहर मैं ही हूँ ।

सब मुझी से सत्ता पाते हैं….. हर हर ॐ हर हर ॐ…

1 प्रकाश, प्रताप

ऐसा अनुभव करने के लिए भगवान में प्रीति हो जाय, भगवान में अनन्य भाव हो जाय । मूर्तियाँ अन्य-अन्य, रूप अन्य-अन्य, रंग अन्य-अन्य, भाव अन्य-अन्य… उन सबको देखने वाला एक अनन्य आत्मा मैं ही तो हूँ । जैसे तुम्हारे शरीर में अन्य-अन्य को देखने वाले तुम अनन्य हो, अन्य नहीं हो ऐसे ही सबकी देहों में भी तुम्हीं हो । इस प्रकार का यदि तुम्हें अनुभव होने लगे, अरे महाराज ! फिर तो तुम्हारी जिस पर नज़र पड़े न, वह भी निहाल हो जाय, वह भी खुशहाल हो जाय ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 4-6 अंक 228

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मन का चिंतन ऊँचा करो-पूज्य बापू जी


एक होती है ‘आधि’, दूसरी होती है ‘व्याधि’ । मन के दुःखों को आधि बोलते हैं, शरीर के दुःखों को व्याधि बोलते हैं । जो आधि-व्याधि को सत्य मानता है और उनको अपने में थोपता है तो समझो वह अभी संसार का खिलौना है । मन में दुःख आये, चिंता आये तो बोलेः “मैं दुःखी हूँ, मैं चिंतित हूँ ।’ शरीर में रोग आये तो बोलेः ‘मैं रोगी हूँ । मेरे को यह है, मेरे को वह है ।’ अरे ! मन का चिंतन ऊँचा करो ।

‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ में आता है कि ‘अंध कुएँ में गिरे हुए दीर्घतपा नाम के ऋषि को मानसिक यज्ञों से स्वर्ग प्राप्त हुआ । ऋषि दीर्घतपा अकस्मात किसी अंधे कुएँ में गिर पड़े । वहाँ मन से ही उन्होंने यज्ञ किया । उससे इन्द्र प्रसन्न हुए । उन्हें कुएँ से निकालकर अपने लोक को ले गये । मनुष्य होते हुए भी इन्दु के पुत्रों ने पुरुषोद्योग से ध्यान द्वारा ब्रह्मा का पद प्राप्त किया । इस संसार में सावधान मन वाला कोई भी पुरुष स्वप्न में अथवा जाग्रत में कभी भी दोषों से जरा भी जड़ीभूत नहीं हुआ । इसलिए पुरुष इस संसार में पुरुष-प्रयत्न के साथ मन से ही मन को, अपने से ही अपे को पवित्र मार्ग में लगाये ।’

आप अपने मन से क्या सोचते हैं ? अपने को पंजाबी मानते हैं तो पंजाबी लगते हैं । हम अपने को जैसा मानते हैं वैसे लगते हैं । ‘मैं दुःखी हूँ, मैं सुखी हूँ, मेरी यह जाति है…..’ वास्तव में तो ये भी मान्यताएँ ही हैं । अपने को ब्रह्मस्वरूप माने तो ब्रह्म हो जायेगा । ‘मैं शुद्ध-बुद्ध, शांत, चेतन आत्मा हूँ । सत् हूँ, चेतन हूँ, आनंदस्वरूप हूँ, ज्ञानस्वरूप हूँ ।’ जो असली है उसको माने तो असली स्वरूप प्रकट हो जायेगा ।

संकर सहज सरूपु सम्हारा । लागि समाधि अखंड अपारा ।।

शिवजी कहते हैं कि ‘सती जाती है तो जाय । उसके मन की करे ।’ मन के अनुकूल होता है तो सुख होता है और मन के प्रतिकूल होता है तो दुःख होता है । दुःखी-सुखी क्यों होना !

मन की मूढ़ता से ही जगत भासता है । रागबुद्धि, द्वेषबुद्धि जीव को संसार में भटकाती है और ब्रह्मबुद्धि जीव को अपने ब्रह्मस्वभाव में जगा देती है ।

‘बेटा नहीं है, बेटा नहीं है ।’ बेटे की इच्छा करके दुःखी होना है तो दुःखी हो ! ऐसी भी कई माइयाँ हैं, कहती है कि ‘अच्छा है जो हम संसार के झंझट में नहीं पड़ीं । हमको संतान ही नहीं ! संतानवालों को अपनी संतानों को सँभालना पड़ता है, अपन तो ऐसे ही भले’, तो उनको दुःख नहीं होता ।

जैसे केसरी सिंह बल करके पिंजरे से निकल आता है, ऐसे ही बल करके मन की दुःखद और सुखद वासनाओं, कल्पनाओं से बाहर निकल जाओ । ॐ का जप करो फिर शांत हो जाओ । जितनी देर जप करो उतनी देर शांत हो जाओ ।

वसिष्ठ जी कहते हैं- ‘हे राम जी ! मूढ़ जीव पशुवत विषयरूपी कीच में फँसे हैं और उससे बड़ी आपदा को प्राप्त होते हैं । उन मूढ़ों को आपदा में देख के पाषाण भी रूदन करते हैं ।’

जो कीट बने हैं, पतंग बने हैं, कृमि बने हैं वे भी कभी मनुष्य थे और जो इन्द्र बने हैं, देवताओं से सम्मानित होते हैं, वे भी कभी मनुष्य थे । उन्होंने इन्द्र बनने की भावना से यज्ञ-याग, संयम किया तो इन्द्र बन गये और जो आये वह खाये, मन में आये वैसा करने लगे तो नीच से नीच गति को चले जाते हैं । इसलिए शास्त्र, महापुरुषों व धर्म के अनुरूप मन को ऊर्ध्वगामी किया जाता है । मन में जो आये ऐसा करने लग गये तो मन अधोगामी हो जाता है । ऐसों को देखकर, ऐसों के संग से भी बड़ा बुरा हाल होता है, उनके वचनरूपी वायु से राख उड़ती है जो आँखों को धूमिल कर देती है । वैराग्य-बुद्धि को नष्ट कर देती है । विवेक को नष्ट कर देती है ।

‘यह चाहिए, वह चाहिए…’ अपने अंतरात्मा के सुख में आना है कि ‘यह चाहिए, वह चाहिए….’ यह देखूँ, वह करूँ, यह पढ़ूँ, यह प्रमाणपत्र ले लूँ…’ तो फिर भटको संसार में ! संत कबीर जी ने कहाः

भलो भयो गँवार, जाहि न व्यापि जग की माया ।

अच्छा है अनपढ़ है, ईश्वर में प्रीति तो है, जगत की माया से तो बच गया ! पढ़-पढ़ के भी संसार की ही वासना हुई तो और जन्मेगा-मरेगा । कितना भी देखे, कितना भी घूमे, कितने भी प्रमाणपत्र ले ले, क्या करेगा ? आखिर तो मौत ठिकाना है ।

कब सुमिरोगे भगवान को ? भगवत्सुख कब लोगे ? भगवत्-आनंद कब लोगे ? भगवन्माधुर्य कब लोगे ? ‘मन की चाल को देखने वाला मैं साक्षी हूँ’ – ऐसा ज्ञान कब लोगे ? ऐसे तो कीट-पतंग, सुअर भी खाते-पीते हैं, मजा करते रहते हैं । दिखता है मजा पर देखो कि सुअर की क्या जिंदगी है ! बाल-बच्चे तो उसको भी हैं, बकरे को भी हैं । कुत्ते को भी कुतिया है तो क्या हो गया ! आयुष्य तो नष्ट हो रहा है ।

आत्मा चैतन्य है, ज्ञानस्वरूप है, अमर है, सुखस्वरूप है । दुःख आया तो मन के साथ जुड़ो नहीं । दुःख आया है तो मन में आया है । काहे को दुःखी होना ! भूतकाल को याद करके काहे को तप मरना ! भविष्य की चिंताएँ कर-करके काहे को परेशान होना ! वर्तमान में भगवदाकार, ब्रह्माकार भाव में मस्त रहें ।

वसिष्ठ जी कहते हैं- ‘हे राम जी ! जैसे पिता बालक को अनुग्रह करके समझाता है, वैसे ही मैं भी तुमको समझाता हूँ ।’

जैसे पिता बच्चे को समझाता है, वैसे ही गुरु अनुग्रह करके शिष्य को समझाते हैं । गुरु के अनुभव से अपना मन मिलाना चाहिए । नहीं तो मूढ़ों के सम्पर्क में आओगे तो पाषाण भी रुदन करते हैं । वासना तो सबके मन में होती है, यदि वासना के अनुसार मिल जाता है तो फिर दूसरी वासना, तीसरी वासना बढ़ती है । वासना के अनुसार नहीं होता है तो दुःख होता है । तो अब वासना कैसे मिटे ?

वासना के पेट में भगवान की माँग डाल दो । भगवान की माँग होगी तो वासना का पेट फाड़कर भगवान का सुख प्रकट हो जायेगा । वासना के पेट में भगवत्प्राप्ति का भाव डाल दो । कभी वासना उठे कि ‘यह चाहिए, वह चाहिए’ तो बोलोः ‘नहीं, पहले मुझे ईश्वर चाहिए ।’

बोलेः ‘मैं पढ़ लूँ ?’

‘ठीक है, बेशक पढ़ना लेकिन पहले ईश्वरप्राप्ति कर लो ।’

‘मैं यह कर लूँ, मैं वह कर लूँ ?’

‘सब करना लेकिन पहले ईश्वरप्राप्ति कर लो, फिर यह सब आसानी से हो जायेगा ।’ सोचे, और सब कर लूँ, फिर भगवान को पाऊँगा, तो भटकेगा, कुछ नहीं मिलेगा । यह भी जायेगा, वह भी जायेगा ।

अतो भ्रष्टः ततो भ्रष्टः ।

इसलिए पहले भगवत्प्राप्ति करो ।

श्रीराम जी हैं- ‘हे मुनीश्वर ! जैसे आकाश में वन होना आश्चर्य है, वैसे ही युवावस्था में वैराग्य, विचार, शांति और संतोष होना भी बड़ा आश्चर्य है ।’

जवानी में काम-विकार से बचना, संसार की इच्छा-वासना से बचना ही भगवान की कृपा है । ॐ आनंद ॐ…. कोई भी इच्छा आये तो कह दो, ‘पहले ईश्वरप्राप्ति हो जाये फिर । पहले ईश्वर से, अपने आत्मदेव से मिल लें फिर देखा जायेगा ।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 228

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