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रस्सा काट दो !


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

एक दिन सुबह शिवाजी की माँ दातुन  कर रही थीं। उन्होंने शिवाजी से हाथ का इशारा करते हुए कहाः “शिवा ! ये देखो, मैं रोज सुबह दुष्टों का झंडा देखती हूँ। इसका कुछ उपाय करो।”

शिवाजी ने सोचा, ‘यह ताना जी का काम है और वे छुट्टी पर हैं। कोई दूसरा इसे नहीं कर सकता।’ ताना जी शिवाजी के खास आदमी थे। उनके लड़के की शादी भी इसलिए वे छुट्टी लेकर घर गये थे। शिवाजी ने आदमी भेजा। तानाजी अपने बेटे को घोड़े पर बिठाकर शादी के लिए भेज रहे थे। आदमी ने आकर कहाः “शिवाजी आपको याद कर रहे थे। कोंढाणा का किला जीतने जाना था लेकिन आपको मैं कैसे बोलूँ ! आपके लड़के की शादी तो आज ही है।”

ताना जी ने कहाः “शादी है तो वह करता रहेगा। मेरे मालिक ने बुलाया है तो अब कैसे रुकूँ !”

तानाजी नौकर थे, शिष्य तो नहीं थे। इतना वफादार नौकर ! लड़के की शादी होनी होगी तो होगी, नहीं होनी होगी तो नहीं होगी। वापस शिवाजी के पास चले गये। शिवाजी ने कहाः

“तुम शादी छोड़कर आ गये !”

ताना जी ने कहाः “जब आपने याद किया तो मुझे रुकने की क्या जरूरत !”

देखो, कैसे-कैसे लोग हो गये ! ताना जी फौज को लेकर गये। पहले के जमाने में किले होते थे। पतली गोह को चढ़ाया…. नहीं चढ़ी। दूसरी बार भी नहीं चढ़ी। तीसरी बार बोला कि “नहीं जायेगी तो काट डालूँगा।” वह चढ़ गयी। फिर रस्सा बाँधा और सेना कूद पड़ी किले में। ये लोग तो गिने-गिनाये थे और मुगलों की संख्या ज्यादा थी। युद्ध का सारा सामान उनके पास था। वे इन पर टूट पड़े। ताना जी के कुछ सैनिक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए, बाकी घबरा गये। एक बूढ़ा सैनिक गया और जिस रस्से के सहारे वे किले में आये थे, उसे काटकर आ गया। आकर सैनिकों को कहाः “रस्सा काटकर आ गया हूँ। अब तो उतरने की गुँजाइश भी नहीं है। दीवाल से कूदोगे तब भी मरोगे। लड़कर मरो अथवा कूदकर।”

सैनिकों ने देखा, किसी भी हाल में मरना ही है तो लड़कर मरेंगे। जोश आ गया। लग पड़े और किला जीत लिया। ऐसे ही जो लोग संन्यास ले लेते हैं, दीक्षा ले लेते हैं, उन्हें दृढ़ता से आसक्तिरूपी रस्से को काट डालना चाहिए। जैसे हमने भी दाढ़ी रखी और साधुताई के वस्त्र पहन लिये, पूँछड़ा काट दिया तो हमारा काम बन गया। मुझे गुरु जी कुछ कहते अथवा थोड़ी प्रतिकूलता लगती तब यदि हम बोलतेः ‘अच्छा गुरु जी ! जाता हूँ।’ तो हमारा क्या भला होता ! हम गुरु जी के चरणों में कैसे-कैसे रहते थे हमारा दिल जानता है ! हमें कभी ऐसा विचार नहीं आया कि चलो अहमदाबाद चलकर शक्कर बेचें और भजन करें। जब आये हैं तो अपना काम ‘साक्षात्कार’ करके ही जायें। ईश्वर के लिए कदम रख दिया तो फिर कायर होकर क्या भागना ! देर-सवेर संसार से तो रोकर ही जाना है।

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं।

हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं।।

ऐसे दृढ़ निश्चय से व्यक्ति चलेगा  तब परमात्मा मिलेगा। नहीं तो न इधर का, न उधर का। संसार दुःखों का घर है। दुःख तो नहीं देखा है तो संसार में जाओ। ऐसा कौन संसारी है जिसने दुःख नहीं देखा है ? दो आदमियों को दुःख नहीं दिखता है। एक तो ज्ञानी को नहीं दिखता है और दूसरा जो अत्यंत बेवकूफ है, जिसमें संवेदना नहीं है, उसको आदत पड़ जाती है। नाली के कीड़े को बदबू नहीं आती है। कसाईखाने में कसाई को बदबू नहीं आती है। तुम वहाँ से पसार होओ तो दिमाग खराब हो जाय। कसाई तो वहीं मजे से चाय पियेंगे। आदत पड़ जाती है न ! जैसे जिसे नासूर हो जाय उसे बदबू का असर नहीं होता है, ऐसे ही संसार की परेशानियाँ सहते-सहते लोग नकटे हो जाते हैं। फिर उसी में रचे-पचे रहते हैं और अपने को सुखी भी मानते हैं। जो भगवान के रास्ते चल रहा है उसे कहेंगे कि ‘इसने तो अपना जीवन बिगाड़ लिया। हमारा तो इतना लाख दुकान में है, यह है, वह….’ लेकिन जब मरेगा तो पेड़ बनेगा, कुल्हाड़े सहेगा तब पता चलेगा। भैंसा बनेगा, चौरासी लाख शीर्षासन करेगा तब पता चलेगा। कमाया तो क्या किया !

जैसे मटमैले पानी में मुँह नहीं दिखता, ऐसे ही विषय भोगों से सुख लेने की जिसकी रूचि है, समझो उसकी बुद्धि मलिन है, उस मलिन बुद्धि में आत्मा का सुख नहीं आता, श्रद्धा भी नहीं टिकती। अपवित्र बुद्धि डाँवाडालो हो जाती है परंतु दृढ़ निश्चयवाले को प्रतिकूलता में भी राह मिल जाती है। दृढ़ संकल्प के बल से मीराबाई ने विष को अमृत में बदल दिया था और विषधर सर्प भी नौलखा हार बन गया था। स्वामी रामतीर्थ भी दृढ़ता से लगे तो अपने परम लक्ष्य तक पहुँच गये। कहते हैं कि महात्मा बुद्ध भी वृक्ष के नीचे दृढ़ संकल्प करके बैठे और अंत में लक्ष्यप्राप्ति करके ही उठे। ऐसे ही आप भी ईश्वरप्राप्ति का दृढ़ संकल्प करें और संसार की आसक्तिरूपी रस्सा काट दें तो निश्चित ही आपकी विजय होगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 28,29 अंक 225

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अमूल्य औषधि


भगवन्नाम की महिमा का वर्णन करते हुए संत विनोबाजी भावे कहते हैं- “मेरी तो यह धारणा है कि सभी रोगों और कष्टों की अचूक दवा ईश्वर में श्रद्धा रखकर भक्तिभाव से उपासना में तल्लीन रहना ही है। यदि आसपास भगवद्भक्ति का वातावरण रहे, भगवान के भक्तों द्वारा भजन होता रहे, तब कुछ पूछना ही नहीं है। इससे रोगी को परम शांति मिलेगी और उसके जीवन की बीमारी भी दूर हो जायेगी।

दो दिन मुझे बुखार आया पर सुबह-शाम की प्रार्थना ज्यों-की-त्यों चलती रही। मेरी धारणा है कि बीमार मनुष्य के आसपास भगवान के भक्तों, संतों महात्माओं के द्वारा लिखित भजनों का, भगवन्नाम का मधुर स्वर में गान करने से बेहतर न तो कोई दवा हो सकती है और न तो कोई सेवा। जो शांति और आराम नामस्मरण से प्राप्त होता वह वह अन्यत्र दुर्लभ है। और जहाँ अनेक भक्त मिलकर सामूहिक प्रार्थना करते हों, भजन गाते हों, वहाँ का तो पूछना ही क्या है !

परंतु लोग श्रद्धारूपी अचूक दवा के रहते हुए भी नाना प्रकार की, नाना रूप की कृत्रिम दवाएँ लेते देते हैं। सूर्य, पानी और आकाश आदि प्राकृतिक चीजों का उपयोग न करके महँगे गलत इलाज करते हैं।

एक ऋषि ने सोमदेव से औषधि के लिए पूछा तो सोमदेव ने ऋषि को उत्तर दिया कि ‘पानी में सभी औषधियाँ निहित हैं। पानी का सेवन और परमेश्वर का स्मरण करो। सारे रोग दुर होंगे।’ ऐसा ऋग्वेद में लिखा है। पानी के साथ हवा और आकाश की मदद रोग से बचने के लिए लेनी चाहिए।

भगवान यह नहीं देखते कि भक्त बैठकर भजन कर रहा है या सो करके, खाकर अथवा स्नान करके। वे तो सिर्फ हृदयपूर्वक की हुई भक्ति चाहते हैं। (बीमारी के कारण) दो दिनों तक मैं पड़ा-पड़ा प्रार्थना सुनता था पर तीसरे दिन बैठने की इच्छा हुई। भगवान बड़े दयालु हैं। वे इन सब बातों पर ध्यान नहीं देते। वे तो हृदय की भक्ति देखकर ही प्रसन्न होते हैं।

भक्तों द्वारा जहाँ प्रेम से भजन गाये जाते हैं, वहाँ भगवान निश्चित रूप से रहते हैं और जहाँ सामूहिक भजन श्रद्धावान भक्तों द्वारा हो, वहाँ तो ईश्वर का रहना लाजिमी ही है ऐसा भगवान का कहना है।

नाहं वसामि  वैकुण्ठे योगिनां हृदय न वै।

मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।

‘हे नारद ! मैं कभी वैकुण्ठ में भी नहीं रहता, योगियों के हृदय का भी उल्लंघन कर जाता हूँ, परन्तु जहाँ मेरे प्रेमी भक्त मेरे गुणों का गान करते हैं, वहाँ मैं अवश्य रहता हूँ।’ (पद्म पुराणः 94.23)

इसलिए सभी लोगों से मेरा नम्र निवेदन है कि आप लोग निरंतर भगवान के नाम के जप में, प्रार्थना में श्रद्धा के साथ अपने समय को लगाओ। कुछ दिनों के बाद अपने-आप ही भक्तिरस का अनुभव होने लगेगा और सभी प्रकार के रोगों से आप मुक्त हो जायेंगे, फिर रोग चाहे जैसे हों – शारीरिक अथवा मानसिक।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 8, अंक 225

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नाहक की कमाई


पुराने समय की बात है। दिल्ली में एक बादशाह राज्य करता था। एक रात को वह वेश बदलकर घूमने निकला तो क्या देखा कि खजाने में रोशनी हो रही है। उसने मन में सोचा, ‘इस समय आधी रात को खजाने में कौन है और क्या कर रहा है ?’ जाकर देखा तो खजानची बैठकर हिसाब कर रहा था।

बादशाह ने कहाः “अरे भाई ! इतनी रात तक क्यों जग रहे हो ?”

“महाराज ! हिसाब में कुछ गड़बड़ हुई है।”

“घाटा हुआ है कि मुनाफा हुआ है ?”

“महाराज ! घाटा हुआ होता तो उतनी चिंता की बात नहीं थी। घाटा नहीं फायदा हुआ है।

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोई।

आप ठगे सुख उपजे, और ठगे दुःख होई।।

खजाने में हिसाब से जितना धन होना चाहिए, उससे ज्यादा जमा हुआ है।”

“अब सो जाओ, कल हिसाब कर लेना।”

“नहीं महाराज ! पता नहीं किस गरीब के पसीने की कमाई हमारे खजाने में आकर मिल गयी है। अब हमारे लिए यह नाहक की कमाई है। संतों के सत्संग में सुना है कि ‘नाहक की कमाई आते समय तो दिखती है पर कुछ वर्षों के बाद मूलसहित चली जाती है। जाते समय दिखती भी नहीं है।’ यह नाहक की सम्पदा रात भर भी क्यों रहे हमारे खजाने में ! क्या भरोसा कल सुबह तक मेरी मौत हो गयी तो ! मेरा तो कर्मबंधन बन जायेगा, जिसे चुकाने को फिर से जन्म लेकर उस गरीब के घर आना पड़ेगा। इसलिए अभी निकाल देता हूँ। कल उसको वापस कर दी जायेगी।”

“तुम्हारे जैसा सत्संगी खजानची जब तक मेरे राज्य में है, तब तक मेरे राज्य को कोई खतरा नहीं है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 7 अंक 225

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