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पपीहे जैसा नियम हो तो प्रभुप्राप्ति इसी जन्म में हो जाय


जयदयालजी गोयन्दका

कोई भी मनुष्य यदि दृढ़ निश्चय कर ले कि आज भगवान अवश्य मिलेंगे तो इसमें कोई संदेह नहीं कि उसे भगवान आज मिलेंगे। ऐसा निश्चय करना तो अपना काम है। इसमें भगवान की दया को भी निमित्त बना लें। जैसे कोई परम मित्र के पहुँचने का तार आ जाय तो हम उसके स्वागत के लिए कितनी व्यवस्था करते हैं और प्रतीक्षा करते हैं, ऐसे ही प्रभुप्राप्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए। प्रभु इस बात को जानते हैं कि कौन उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। आज उन्हें सच्चे मन से पुकारेंगे तो आज ही आपसे मिलनि की उन्हें फुर्सत मिल जायेगी।

उसमें दो प्रकार की दशाएँ होती हैं – एक तो आर्तभाव, परम व्याकुलता जैसे मछली को जल से अलग होने पर होती है जड़ तो जड़ है, प्रभु चैतन्य हैं, वे बड़े दयालु हैं। दूसरा भाव प्रेम का है। जैसे मित्र के आने का दृढ़ निश्चय होता है, उसमें प्रसन्नता एवं प्रतीक्षा होती  है इसी प्रकार प्रभु में प्रेम होने पर वे अवश्य पहुँच जाते हैं। नियम और प्रेम दोनों रखें। नियम पपीहे का होता है, वह स्वाति की बूँद से ही अपनी प्यास बुझाना चाहता है। बादल बरसें तब भी उसका नियम नहीं टूटता, प्रेम में कमी नहीं आती। यहाँ तक कि उसके प्राण भी चले जायें, तब भी वह नियम नहीं तोड़ता। इसमें बादल तो जड़ हैं, वैसे ही बरस जाते हैं। प्रभु तो चैतन्य हैं और बड़े दयालु हैं, वे अपने प्रेमी को मरने नहीं देते।

इसी प्रकार हम भी नियम ले लें कि सिवाय प्रभु के और कुछ भी नहीं चाहिए। किसी का चिंतन न करें तो हमें प्रभु अवश्य ही मिलेंगे। ‘हमें कैसे मिलेंगे ?’ पहले से ही ऐसा विपरीत निश्चय नहीं करना चाहिए। दृढ़ विश्वास होना चाहिए।

कई लोग सोचते हैं कि अमुक महाराज दया कर दें, कह दें तो हमको ईश्वरप्राप्ति हो जायेगी, भगवान मिल जायेंगे। ऐसी अवस्था में भगवान से मिलने की आवश्यकता ही क्या है, जब किसी के कहने से मिलें।

करोड़ों में कोई एक भगवत्प्राप्त मनुष्य होता है और उनमें भी कोई विरला ही होता है जो भगवान को मिला सके। कोई कहे कि भगवत्प्राप्त पुरुष मार्ग तो बतला सकते हैं। यह ठीक है तो फिर लोग इतने अच्छे मार्ग पर क्यों नहीं चलते ? इसका उत्तर यही है कि इस विषय में उन्हें विश्वास नहीं है। इसी कारण समस्त संसार की यह दशा हो रही है।

बात रही महापुरुष की दया की, भगवान की दया की वह तो सतत रहती ही है। फिर भी काम नहीं होता तो यह मानना पड़ेगा कि हमें उनकी दया में विश्वास नहीं है। हमने उनकी दया को माना नहीं है, बात वास्तव में यही है।

गजेन्द्र, द्रौपदी आदि ने विश्वास से भगवान को बुलाया तो भगवान इनके पास अतिशीघ्र पहुँच गये। यद्यपि इनको दुःख-निवारण की ही आवश्यकता थी।

केवल भगवान से मिलने के लिए भगवान को चाहे तो वह तो बात ही कुछ और होती है। ऐसे भक्त से शीघ्र मिलने की भगवान की भी इच्छा हो जाती है, इसलिए ऐसा समझना चाहिए कि प्रभु की इच्छा तो पूरी होगी ही। हमारी इच्छा पूरी हो इसमें हम लाचार हैं, पर प्रभु की इच्छा पूरी न हो ऐसा नहीं हो सकता।

जब हमारी इच्छा केवल और केवल उनसे मिलने की हो जायेगी तो सारा भार भगवान पर आ जायेगा और ऐसे प्रेमी भक्त के वश होकर भगवान उससे मिल जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 17,19 अंक 213

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महात्मा गाँधी की सेवानिष्ठा


(महात्मा गाँधी जयंतीः 2 अक्तूबर)

(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

महात्मा गाँधी के पास एक डॉक्टर सेवक था, जो कि विदेश होकर आया था। एक माई बड़ी बीमार थी, वह गाँधी जी के पास आयी। गाँधी जी ने उस डॉक्टर से कहाः “इस गरीब माई को नीम की पत्तियाँ खिलाओ और छाछ पिलाओ, ठीक हो जायेगी।”

डॉक्टर उस माई को इलाज बताकर आ गया। दो-चार घंटे के बाद गाँधी जी ने पूछाः “उस माई को नीम की पत्तियाँ दीं ?”

डॉक्टरः “जी ! ले ली होंगी उसने।”

गाँधी जीः “छाछ पिलायी ?”

डॉक्टरः “हाँ ! पी होगी।”

गाँधी जीः “तो तू डॉक्टर काहे का बना ! पी होगी। वह माई गरीब है, उसने पी कि नहीं पी तुमने जाँच की ? डॉक्टर केवल नब्ज देखकर, दवा लिखकर आ जाय ऐसा नहीं होता। जब तक मरीज ठीक नहीं हो जाता तब उसे क्या-क्या तकलीफें हैं, उन्हें दूर करना इसकी जिम्मेदारी डॉक्टर की होती है।”

गाँधी जी स्वयं उस गरीब महिला के पास गये और उससे पूछाः “माता जी ! तुमने छाछ पी ?”

माई बोलीः “बापू जी ! पैसे नहीं हैं। एक गिलास छाछ के लिए एक पैसा तो चाहिए न ! वह कहाँ से लाऊँ ?”

उस माई की ऐसी गरीब हालत देखकर गाँधी जी को बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने डॉक्टर को डाँटते हुए कहाः “तू गाँव से माँगकर या अपने पैसे से खरीदकर एक प्याली छाछ नहीं पिला सकता था !”

गाँधी जी ने उस माई को नीम की पत्ती खिलायी और छाछ पिलायी, जिससे वह एकदम ठीक हो गयी।

गरीबों के प्रति कितना प्रेम, अपनापन, दया व करूणा से भरा था गाँधी जी का हृदय ! तभी तो आज करोड़ों हृदय उन्हें महात्मा के रूप में याद करते हैं।

महात्मा गाँधी की सूझबूझ

एक दिन गाँधी जी रेलगाड़ी से यात्रा कर रहे थे। बाहर का दृश्य बड़ा मनोरम था। वे दरवाजे के पास खड़े होकर भारत की प्राकृतिक सुषमा का अवलोकन कर रहे थे। उसी समय उनके एक पैर की चप्पल रेलगाड़ी से नीचे गिर गयी। गाड़ी तीव्र गति से अपनी मंजिल की तरफ भाग रही थी। गाँधी जी ने बिना एक पल गँवाये दूसरे पैर की चप्पल भी नीचे फेंक दी। उनके साथी ने पूछाः “आपने दूसरे पैर की चप्पल क्यों फेंक दी ?”

गाँधी जी ने कहाः “वह मेरे किस काम की थी ? मैं तो उसे पहन नहीं सकता था और नीचे गिरी चप्पल को पाने वाला भी उसका उपयोग न कर पाता अब दोनों पैर की चप्पल पाने वाला ठीक से उपयोग तो कर सकता है !” प्रश्नकर्ता इस परोपकारिता भरी सूझबूझ से प्रभावित और प्रसन्न हुआ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 28, अंक 213

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लालबहादुर ही क्यों ?


(लालबहादुर शास्त्री जयंतीः 2 अक्टूबर)

लालबहादुर शास्त्री जी के बाल्यकाल की एक घटना है। एक दिन वे सोचने लगे कि परिवार में सभी लोगों का नाम प्रसाद व लाल पर है लेकिन माँ ने मेरा नाम ‘बहादुर’ क्यों रखा।

बालक माँ के पास गया और बोलाः “माँ ! मेरा नाम लालबहादुर क्यों रखा है, जबकि हमारे यहाँ तो किसी का नाम बहादुर पर नहीं है ? अपने रिश्तेदारों में भी तो सभी लाल या प्रसाद हैं, फिर मेरा नाम इतना खराब क्यों है ? मुझे यह नाम अच्छा नहीं लगता।”

पास ही बैठे उनके मामा ने कहाः “क्यों नहीं है, देखो इलाहाबाद के नामी वकील है तेज बहादुर।”

तभी माँ रामदुलारी देवी हँसी और बोलीं- “नन्हें का नाम ‘वकील बहादुर’ बनने के लिए तुम्हारे जीजा जी ने नहीं रखा है बल्कि उन्होंने ‘कलम बहादुर’ बनाने के लिए और मैंने अपने नन्हें को ‘करम बहादुर’ बनाने के लिए इसका नाम लालबहादुर रखा है। मेरा लाल ‘बहादुर’ बनेगा अपनी हिम्मत व साहस का….।”

और इतना कहते-कहते उनकी आँखें डबडबा आयीं। पति की स्मृति उनके मानस-पटल पर आ गयी। उन्होंने अपने ‘लाल बहादुरि’ को गोद में बैठाकर अनेकानेक आशीष दे डाले। ये ही आशीर्वाद जेल-जीवन की यातनाओं तथा पारिवारिक समस्याओं में उनका साहस बढ़ाते रहे। माता के आशीर्वाद फलीभूत हुए और इतिहास साक्षी है कि वे सहनशीलता, शालीनता, विनम्रता और हिम्मत में कितने बहादुर हुए। उनका धैर्य, साहस, संतोष तथा त्याग असीम था।

बाल्यावस्था बहुत नाजुक अवस्था होती है, इसमें बच्चों को आप जैसा बनाना चाहते हैं, वे वैसे बन जायेंगे। आवश्यकता है तो बस अच्छे संस्कारों के सिंचन की।

लालबहादुर एक बार बालमित्रों के साथ मेला देखने जा रहे थे। उनके पास नाविक को देने के लिए पैसे नहीं थे। स्वाभिमान के धनी ‘लाल’ यह बात किसी को कैसे बताते ! वे गंगा जी की वेगवती धारा में कूद पड़े और तैरकर ही उस पार पहुँच गये।

एक बार लालबहादुर शास्त्री इलाहाबाद की नैनी जेल में थे। घर पर उनकी बेटी पुष्पा बीमार थी और गम्भीर हालत में थी। साथियों ने उन पर दबाव डाला कि ‘आप घर जाकर बेटी की देखभाल करें।’ वे राजी भी हो गये। उनका पेरोल भी मंजूर हो गया परंतु उन्होंने उस पेरोल पर छूटने से मना कर दिया क्योंकि उसके अनुसार उन्हें यह लिखकर देना था कि वे जेल के बाहर आन्दोलन के समर्थन में कुछ न करेंगे। उधर बेटी जीवन और मौत की लहरों में गोते खाने लगी, इधर शास्त्री जी अपने स्वाभिमान पर दृढ़ थे। आखिर जिलाधीश इनकी नैतिक, चारित्रिक दृढ़ता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इन्हें बिना किसी शर्त के मुक्त कर दिया।

शास्त्रीजी घर पहुँचे पर उसी दिन बेटी ने शरीर छोड़ दिया। शास्त्री जी अग्नि संस्कार करके लौटे। घर के भीतर किसी से मिलने भी नहीं गये, सामान उठाकर ताँगे में बैठ गये। लोगों ने बहुत कहाः ”अभी तो पेरोल बहुत बाकी है।” शास्त्री जी ने उत्तर दियाः “मैं जिस कार्य के लिए पेरोल पर छूटा था, वह खत्म हो गया है। अतः सिद्धान्ततः अब मुझे जेल जाना चाहिए।” और वे जेल चले गये।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 10, अंक 213

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