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मनुष्य की विलक्षणता


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

एक होती है कामना, जो जीवमात्र में होती है – खाने की, पीने की, भोगने की, रखने की। कुत्ते का भी जब पेट भर जाता है तब उसे कोई बढ़िया चीज मिलती है तो वह उसे उठाकर ले जाता है और गड्ढा खोदकर गाड़ देता है कि ‘कल खायेंगे’, यह कामना है। ‘पैसे अभी हैं पर थोड़े बैंक में पड़े रहे हैं, फिर काम आयेंगे’ – यह कामना है। पेड़-पौधों को भी कामना होती है परंतु उनकी कामना और होती है, मनुष्य की कामना और होती है, कुत्ते की कामना और होती है पर कामना सभी जीवों में होती है। मनुष्य में दो चीजें ऐसी होती हैं जो और जीवों में नहीं होतीं। पेड़ पौधों में कामना होती है खाद-पानी की, कीट-पतंग में कामना होती है अपने आहार की, अपने बच्चों को सुरक्षित रखने की लेकिन मनुष्य में कामना के साथ लालसा भी होती है और जिज्ञासा भी होती है। यह बहुत ऊँची चीज है। इस ऊँची चीज को महत्त्व दे और कामना को प्रारब्ध के, भगवान के हवाले छोड़ दे तो देखते-देखते मनुष्य महान आत्मा बन जायेगा, दिव्यात्मा बन जायेगा। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य-जीवन देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। देवताओं में भी लालसा और जिज्ञासा तो होती है परंतु देवताओं के यहाँ इतनी सुविधा, इतना सुख-वैभव है कि कामना-कामना में वे इतने मशगूल हो जाते हैं कि इन दो चीजों का फायदा उठाने से रह जाते हैं। जब पुण्य नष्ट होते हैं तो फिर मनुष्य शरीर में आते हैं परंतु मनुष्य-जन्म में ये चीजें ज्यों-की-त्यों बरकरार रहती हैं – लालसा और जिज्ञासा।

लालसा होती है भगवान का रसपान करने की, भगवान का माधुर्य पाने की। कितना भी धन हो जाये फिर भी अंदर से धनी भी भगवान की तरफ जाते हैं, किसी-न-किसी को मानते हैं। लगभग सभी लोग भगवान को मानते हैं, कोई-कोई नहीं मानता होगा। जो नहीं मानते, समझो उनकी मनुष्यता ही खो गयी।

मनुष्य में यह लालसा रहती है कि भगवत्सुख मिले, भगवत्प्रीति मिले, भगवदरस मिले, भगवदधाम मिले। हम लोग स्वर्ग बोलते हैं, कोई बिहिश्त बोलता है, कोई पैराडाइज बोलता है, कोई कुछ बोलता है किंतु यह लालसा मनुष्य में रहती है।

जिज्ञासा होती है ‘हम वास्तव में कौन हैं ?’ इसे जानने की। शरीर मर जाता है फिर भी हम तो रहते हैं। अगर हम नहीं रहते तो स्वर्ग में कौन जाता है, नरक में कौन जाता है ? मरने के बाद भी हम तो हैं न ! तो हम कौन हैं और भगवान क्या हैं ? हमारे और भगवान के बीच क्या संबंध है, क्या दूरी है और वह कैसे मिटे, कैसे जानें ? यह जो जानने की भावना होती है वह जिज्ञासा है। भगवदरस पाने का जो लालच होता है उसे लालसा बोलते हैं और संसारी चीजों को पाने की इच्छा को वासना बोलते हैं।

तो मनुष्य में तीनों होती हैं – वासना, लालसा और जिज्ञासा। अगर वासना-ही-वासना है तो मनुष्य और कुत्ते में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। दुःख आया तो मनुष्य दुःखी हो गया, घबड़ा गया… कुत्ता भी दुःख में घबड़ाता है, पूँछ दबा देता है और सुख आया तो पूँछ हिलाता है, खुशी दिखाता है, मनुष्य भी दिखाता है लेकिन कुत्ते से मनुष्य बहुत ऊँचा है। बैल, घोड़े, गधे, – सभी प्राणियों से मनुष्य ऊँचा है क्योंकि दो रत्न और भी हैं – लालसा और जिज्ञासा। मनुष्य उन रत्नों को महत्त्व दे दे तो वह देवताओं से भी आगे निकल जायेगा। देवता भगवान के बाप नहीं बने हैं परंतु मनुष्य भगवान के बाप भी बने हैं। देवता भगवान के गुरु नहीं बने हैं पर मनुष्य भगवान के गुरु भी बने हैं।

मनुष्यैः क्रियते यत्तु तन्न शक्यं सुरासुरैः।

‘जो ऊँचाई मनुष्य पा सकता है, वह सुर और असुर भी नहीं पा सकते।’

(ब्रह्म पुराणः 27.70)

मनुष्य अपनी जिज्ञासा और लालसा को महत्त्व देकर इतना ऊँचा उठ सकता है, इतना ऊँचा उठ सकता है कि जहाँ ऊँचाई की हद हो जाय ! यदगत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। जहाँ जाने के बाद पतन ही नहीं होता। न तदभासयते सूर्यो न शशांको न पावकः। वहाँ सूर्य का प्रकाश, चन्द्रमा का प्रकाश या अग्नि का प्रकाश नहीं। अग्नि, चंदा और सूर्य को भी जो प्रकाशित करता है उस प्रकाशमय सत्त्व को, तत्त्व को, आत्मा को जानकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। बाहर से इतनी गरीबी है कि शरीर पर केवल लँगोटी है, तीन थिगली (पैवंद) लगी हैं, सब्जी में नमक डालने के पैसे नहीं हैं किंतु जिज्ञासा और लालसा बढ़ गयी तो ऐसे पद को पाता है कि इन्द्र भी उसके आगे बबलू हो जाता है।

जिज्ञासा से ब्रह्मज्ञान हो जाता है, लालसा से ब्रह्म-परमात्मा का रस पैदा होता है। मैं तो आपको सलाह देता हूँ कि आपके अंदर ये दो दिव्य शक्तियाँ हैं, उनको सहयोग करो। लालसा और जिज्ञासा को बढ़ाओ। कामना में समय बर्बाद मत करो। कामनाएँ क्षीण होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें, यह सच्ची सफलता है।

कामनावाले से तो वृक्ष भी डरते हैं। आप बस-स्टैंड पर खड़े हैं और कोई भिखमंगा कामना करके आता है तो आपको अच्छा नहीं लगता है। जान छुड़ाने के लिए कुछ पैसे डाल देते हो। औज जिनको कामना नहीं है ऐसे संत को हाथ जोड़कर, माथा टेककर भी पीछे-पीछे घूमते हो कि “बाबाजी ! जरा यह फल-फूल ले लो।” बाबाजी बोलते हैं- “नहीं चाहिए बेटे !” आप फिर से ‘बाबा ! बाबा !!’ करते हैं, मानो उन्होंने लिया तो हम पर मेहरबानी कर दी। कामना रहित पुरुष को कुछ देते हैं तो वह महापुण्य बन जाता है और कामनावाले को देते हो तो जान छुड़ाने के लिए। आप भगवान से, समाज से या प्रकृति से भिखमंगे होकर कामनापूर्ति के गुलाम मत बनो तो प्रकृति आपके पीछे-पीछे घूमेगी। मैंने अपने आश्रमों में बोर्ड लगा रखे हैं कि ‘चीज-वस्तु, रूपये पैसे की कोई जरूरत नहीं है। आश्रम के नाम पर कोई रूपया-पैसा माँगता है तो मुख्यालय को खबर करो।’ आज तक मैंने कोई आश्रम बनाने के लिए चंदा नहीं किया, फिर भी आपको पता है कि कितने सारे आश्रम चल रहे हैं। कितनी गौशालाएँ चल रही हैं, कितने औषधालय चल रहे हैं और गरीबों को रोजी-रोटी नहीं मिलती, काम-धंधा नहीं मिलता तो आश्रमों में, समितियों में ‘भजन करो, भोजन करो, दक्षिणा पाओ’ केन्द्र चल रहे हैं। मैंने कामना नहीं की आप मुझे यह चीज दो, रूपया दो। अरे, जो प्रारब्ध में होगा, आयेगा। बच्चा माँ के गर्भ से जन्म लेता है तो क्या कामना करता है कि मेरे लिए दूध बन जाय, दूध बन जाय ? प्रकृति और परमात्मा की व्यवस्था है, अपने आप दूध बन गया न ! तो प्रारब्ध-वेग से सब मिलता रहता है। क्या आप कामना करते हो कि श्वास मिल जाय, मिल जाय ? अरे, आपकी आवश्यकता है तो श्वास मिलता रहता है। इसलिए कामना करके अपनी इज्जत मत बिगाड़ो, लालसा और जिज्ञासा करके, उनको बढ़ाकर अपना खजाना पा लो बस !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 212

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जो यहाँ मिला वह कहीं नहीं


मेरा नाम जेम्स हिगिन्स है। मैं नौटिंघम (इंगलैंड) का रहने वाला हूँ। फरवरी 2007 को प्रयागराज के अर्धकुंभ के अवसर पर मैं भारत आया था। मेरा परम सौभाग्य था कि मेले में घूमते-घामते मैं संत श्री आसारामजी बापू के पावन सान्निध्य में जा पहुँचा। बापू जी के सत्संग में जाने का मेरा यह पहला अवसर था।

सत्संग-मंडप में अपार भीड़ थी इसलिए मुझे पीछे री बैठने की जगह मिली। कौन बोल रहे हैं, यह मैं नहीं देख पा रहा था। मुझे सत्संग जरा भी समझ में नहीं आ रहा था क्योंकि मुझे हिन्दी बिल्कुल नहीं आती थी, पर मेरे मन में उठकर चले जाने का विचार नहीं आया क्योंकि बड़ा आनन्द और शांति का अनुभव हो रहा था।

दूसरे दिन पुनः मैं सत्संग में गया। इस बार मुझे आगे बैठने को मिला। यह मेरे लिए परम सौभाग्य का दिन था। पूज्य बापूजी के सान्निध्यमात्र से मुझे गुरुतत्त्व की महत्ता समझ में आ गयी। उसके कुछ ही समय पश्चात् मैं इंग्लैंड वापस चला गया लेकिन 3 माह बाद मैं बापू जी के दर्शन के लिए बेचैन हो उठा।

मैं भारत वापस आ गया। उस समय बापूजी हरिद्वार में पूरा एक महीना रूके थे। मैं वहाँ जा पहुँचा, प्रतिदिन नियमित रूप से सत्संग सुनता। यद्यपि अब भी मैं सत्संग बिल्कुल नहीं समझ पाता था लेकिन बापू जी को ओर से आने वाला अतुलनीय प्रेम और आनंद का प्रवाह मुझे सुबह और शाम दोनों सत्रों में बाँधे रखता था। जब बापू जी हरिद्वार से जाने वाले थे, तब उन्होंने मुझे व्यासपीठ के पास बुलाया और शक्तिपात वर्षा का अनुपम प्रसाद दिया। उसी क्षण मेरे नेत्र आँसुओं से भर गये और मैं दंडवत् उनके श्रीचरणों में जा पड़ा, मुझे ऐसा अनुभव हुआ जिसका मैं वर्णन नहीं कर सकता।

उस दिन से मैं बापू जी का भक्त बन गया हूँ। अभी समय निकाल के आश्रम में आता रहता हूँ। बापू जी के सान्निध्य के इन थोड़े-से-दिनों में मुझे ढेर सारा प्रसाद मिला है। मेरा जन्म एक धनाढय परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता के पास मिलियन्स की (अरबों की) जमीन-जायदा है। मैं खूब घूमा-फिरा हूँ और अनेक देशों की यात्राएँ की हैं, लेकिन जो प्रेम और शांति मैंने पूज्य बापू जी के दिव्य सान्निध्य में पायी है वह मुझे दुनिया में कहीं नहीं मिली। कितना भी धन हो उससे वह आनंद नहीं खरीदा जा सकता, जो एक ब्रह्मज्ञानी संत दे सकते हैं। मेरी माता जी ने भी बापू जी से मंत्रदीक्षा ली है और बापू जी के श्रीचरणों में उनकी अटूट श्रद्धा है। वे साल में एक दो बार गुरुदेव के श्रीचरणों में प्रणाम करने व उनके आनंददायी सत्संग का श्रवण करने आती हैं।

सचमुच, यह भारत देश का परम सौभाग्य है कि संत श्री आसाराम जी बापू जैसे ब्रह्मज्ञानी संत यहाँ पर मौजूद हैं। अन्य संस्कृतियाँ तो उदय हुई और चली गयीं पर शाश्वत सनातन धर्म ऐसे संतों की बदौलत आज भी खड़ा है। मैं हिन्दू संस्कृति को विश्व की महानतम संस्कृति मानता हूँ कि मुझे पूज्य बापू जी से मंत्रदीक्षा मिली है और उनके सान्निध्य में रहने का अवसर मिला है। भारतीय लोग निश्चय ही धन्य हैं कि यह संस्कृति उन्हें धरोहर में मिली है और मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि यह चिरस्थायी हो। भारतमाता की जय, सदगुरुदेव की जय !

Mr James W. Higgins

27, Church Street, South Wells

NG25 OHQ, U.K.

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 31, अंक 212

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निंदकों, कुप्रचारकों की खुल गयी पोल – ईश्वर ने उगला सच


धर्मांतरणवालों के सुनियोजित षड्यंत्र के तहत आश्रम पर झूठे आरोप लगाने वाले ईश्वर नायक को आखिर न्यायाधीश श्री डी.के. त्रिवेदी जाँच आयोग में विशेष पूछताछ के दौरान सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ा। परम पूज्य बापू जी ने करूणा कृपा कर महामृत्युंजय मंत्र द्वारा मृत्युशय्या पर पड़े ईश्वर नायक को नवजीवन दिया था। उसने माना कि ‘मैं जब कनाडा में बीमार पड़ा और मुझे अस्पताल में भर्ती किया गया तो उस दौरान मेरी पत्नी ने फोन द्वारा पूज्य बापू जी का सम्पर्क किया और उनकी सूचना के अनुसार मेरे बिस्तर के पास मंत्रजप किया, उससे मैं ठीक हो गया। मैं मंत्र की शक्ति में मानता हूँ।’

उसने यह भी कहा कि ‘पूज्य बापू जी पीड़ित व्यक्ति को ठीक करने के लिए उससे अथवा तो उसके मित्र-परिवार के पास से कोई पैसा, वस्तु नहीं लेते। पूज्य बापू जी द्वारा पीड़ित व्यक्ति को दुःख से मुक्त करने का जो कार्य किया जाता है, वह मेरी दृष्टि से पूज्य बापू जी की समाज सेवा का एक कार्य है।’

ईश्वर नायक ने यह भी माना कि आश्रम आने के पूर्व उसकी तथा उसके परिवार के लोगों की मानसिक स्थिति बिगड़ी हुई थी और व्यक्ति के खुद के कर्मों का उसके शरीर के अवयवों पर असर होता है। जैसे कर्म हों उसके अनुसार उसकी शारीरिक स्थिति में फर्क पड़ता है।

आश्रम के पवित्र वातावरण में रहकर ईश्वर नायक ने सुख-शांति का अनुभव किया। उसने स्वीकार किया कि ‘आश्रम में रहकर साधना करने के दौरान मैंने ऐसी स्थिति का अनुभव किया कि मैं जैसे किसी दिव्य जगत में हूँ। मैं एकदम प्रफुल्लित था और ध्यान में मार्मिक हास्य भी करता। मुझे अदभुत आनंद हुआ। आश्रमवासी सेवक (साधक) शयन के पूर्व शास्त्र की चर्चा, माला द्वारा मंत्रजप और ध्यान करके सोते हैं – यह आश्रम एक नित्यक्रम है।’

साजिशकर्ता ने तथा झूठी कहानियाँ बनाने वाले अखबार ने आश्रम के बड़ बादशाह (वटवृक्ष) के बारे में समाज में मिथ्या भ्रम फैलाये। इस बारे में ईश्वर नायक ने सच्चाई को स्वीकार करते हुए कहा कि ‘आश्रम में स्थित वटवृक्ष की परिक्रमा करने से साधकों के प्रश्नों का निराकरण हुआ है, लौकिक लाभ भी हुए हैं – ऐसा मैं जानता हूँ। वटवृक्ष की महिमा के बारे में लोगों के अनुभवों के पत्र एकत्रित करके मेरी पत्नी ने एक पुस्तक भी लिखनी शुरू की थी।’

ईश्वर नायक ने यह भी स्वीकार किया कि ‘पंचेड़, रतलाम (म.प्र.) के पास कोई एक गाँव में पूज्य बापूजी द्वारा एक भंडारे का आयोजन किया गया था। उसमें अनेक आदिवासी आये और भोजन किया। भोजन कराने के बाद पूज्य बापू जी द्वारा मुझे नोटों का एक बंडल उन आदिवासियों में बाँटने के लिए दिया। उस समय मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि पूज्य बापू जी द्वारा मुझे दिये नोट वहाँ उपस्थित सभी आदिवासियों में बाँटने के बाद भी कम नहीं होते थे ! इससे मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने ऐसा चमत्कार देखा कि नोटों का जो बंडल मुझे बाँटने के लिए दिया गया था, वह बढ़ गया है।’

कृतघ्नता का कोई प्रायश्चित नहीं है। परम पूज्य बापू जी के अनगिनत उपकारों को भूलकर षड्यंत्रकारियों का साथ देने वाले ईश्वर नायक ने स्वयं ही अपने हाथों मानो, अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलायी है, जिससे वह सज्जनों की दृष्टि में धिक्कार का पात्र बन गया है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 7, अंक 212

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