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वास्तविक लाभ पाने का दिनः लाभपंचमी


(लाभपंचमीः 23 अक्तूबर 2009)

(पूज्य बापू जी का पावन सन्देश

कार्तिक शुक्ल पंचमी ‘लाभपंचमी’ कहलाती है । इसे ‘सौभाग्य पंचमी’ भी कहते हैं । जैन लोग इसे ‘ज्ञान पंचमी’ कहते हैं । व्यापारी लोग अपने धंधे का मुहूर्त आदि लाभपंचमी को ही करते हैं । लाभपंचमी के दिन धर्मसम्मत जो भी धंधा शुरु किया जाता है उसमें बहुत-बहुत बरकत आती है । यह सब तो ठीक है लेकिन संतों-महापुरुषों के मार्गदर्शन-अनुसार चलने का निश्चय करके भगवद्भक्ति के प्रभाव से काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इन पाँचों विकारों के प्रभाव को खत्म करने का दिन है लाभपंचमी । महापुरुष कहते हैं-

दुनिया से ऐ मानव ! रिश्त-ए-उल्फत (प्रीति) को तोड़ दे ।

जिसका है तू सनातन सपूत, उसी से नाता जोड़ दे ।।

‘मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं’ – इस  प्रकार थोड़ा भगवद्चिंतन, भगवत्प्रार्थना, भगवद्स्तुति करके संसारी आकर्षणों से, विकारों से अपने को बचाने का संकल्प करो ।

1. लाभपंचमी के पाँच अमृतमय वचनों को याद रखोः

‘पहली बातः भगवान हमारे हैं, हम भगवान के हैं’ – ऐसा मानने से भगवान में प्रीति पैदा होगी । ‘शरीर, घर, संबंधी जन्म के पहले नहीं थे और मरने के बाद नहीं रहेंगे लेकिन परमात्मा मेरे साथ सदैव हैं’ – ऐसा सोचने से आपको लाभपंचमी के पहले आचमन द्वारा अमृतपान का लाभ मिलेगा ।

दूसरी बातः हम भगवान की सृष्टि में रहते हैं, भगवान की बनायी हुई दुनिया में रहते हैं । तीर्थभूमि में रहने से पुण्य मानते हैं तो जहाँ हम-आप रह रहे हैं वहाँ की भूमि भी तो भगवान की है, सूरज, चाँद, हवाएँ, श्वास, धड़कन सब के सब भगवान के हैं, तो हम तो भगवान की दुनिया में, भगवान के घर में रहते हैं । मगन निवास, अमथा निवास, गोकुल निवास ये सब निवास ऊपर-ऊपर से हैं लेकिन सब-के-सब भगवान के निवास में ही रहते हैं । यह सबको पक्का समझ लेना चाहिए । ऐसा करने से आपके अंतःकरण में भगवद्धाम में रहने का पुण्यभाव जगेगा ।

तीसरी बातः आप जो कुछ भी भोजन करते हैं भगवान का सुमिरन करके, भगवान को मानसिक रूप से भोग लगा के करें । इससे आपका पेट तो भरेगा, हृदय भी भगवद्भाव से भर जायेगा ।

चौथी बातः माता-पिता की, गरीब की, पड़ोसी की, जिस किसी की सेवा करो तो ‘यह बेचारा है… मैं इसकी सेवा करता हूँ… मैं नहीं होता तो इसका क्या होता….’ ऐसा नहीं सोचो, भगवान के नाते सेवाकार्य कर लो और अपने को कर्ता मत मानो ।

पाँचवीं बातः अपने तन-मन को, बुद्धि को विशाल बनाते जाओ । घर से, मोहल्ले से, गाँव से, राज्य से, राष्ट्र से भी आगे विश्व में अपनी मति को फैलाते जाओ और ‘सबका मंगल, सबका भला हो, सबका कल्याण हो, सबको सुख-शांति मिले, सर्वे भवन्तु सुखिनः….’ इस प्रकार की भावना करके अपने दिल को बड़ा बनाते जाओ । परिवार के भले के लिए अपने भले का आग्रह छोड़ दो, समाज के भले के लिए परिवार के हित का आग्रह छोड़ दो, गाँव के लिए पड़ोस का, राज्य के लिए गाँव का, राष्ट्र के लिए राज्य का, विश्व के लिए राष्ट्र का मोह छोड़ दो और विश्वेश्वर के साथ एकाकार होकर बदलने वाले विश्व में सत्यबुद्धि तथा उसका आकर्षण और मोह छोड़ दो । तब ऐसी विशाल मति जगजीत प्रज्ञा की धनी बन जायेगी ।

मन के कहने में चलने से लाभ तो क्या होगा हानि अवश्य होगी क्योंकि मन इन्द्रिय-अनुगामी है, विषय-सुख की ओर मति को ले जाता है । लेकिन मति को मतीश्वर के ध्यान से, स्मरण से पुष्ट बनाओगे तो वह परिणाम का विचार करेगी, मन के गलत आकर्षण से सहमत नहीं होगी । इससे मन को विश्रांति मिलेगी, मन भी शुद्ध-सात्त्विक होगा और मति को परमात्मा में प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा, परम मंगल हो जायेगा ।

लाभपंचमी के ये पाँच लाभ अपने जीवन में ला दो ।

2 लाभपंचमी की दूसरी पाँच बातें-

1. अपने जीवन में कर्म अच्छे करना ।

2. आहार शुद्ध करना ।

3. मन को थोड़ा नियंत्रित करना कि इतनी देर जप में, ध्यान मे बैठना है तो बैठना है, इतने मिनट मौन रहना है तो रहना है ।

4. शत्रु और मित्र के भय का प्रसंग आये तो सतत जागृत रहना । मित्र नाराज न हो जाय, शत्रु ऐसा तो नहीं कर देगा इस भय को तुरंत हटा दो ।

5. सत्य और असत्य के बीच के भेद को दृढ़ करो । शरीर मिथ्या है । शरीर सत् भी नहीं, असत् भी नहीं । असत् कभी नहीं होता और सत् कभी नहीं मिटता, मिथ्या हो-होके मिट जाता है । शरीर मिथ्या है, मैं आत्मा सत्य हूँ । सुख-दुःख, मान-अपमान, रोग-आरोग्य सब मिथ्या है लेकिन आत्मा-परमात्मा सत्य है । लाभपंचमी के दिन इसे समझकर सावधान हो जाना चाहिए ।

3. पाँच काम करने में कभी देर नहीं करनी चाहिएः

1. धर्म का कार्य करने में कभी देर मत करना ।

2. सत्पात्र मिल जाय तो दान-पुण्य करने में देर नहीं करना ।

3. सच्चे संत के सत्संग, सेवा आदि में देर मत करना ।

4. सत्शास्त्रों का पठन, मनन, चिंतन तथा उसके अनुरूप आचरण करने में देर मत करना ।

5. भय हो तो भय को मिटाने में देर मत करना । निर्भय नारायण का चिंतन करना भय जिस कारण से होता है उस कारण को हटाना । यदि शत्रु सामने आ गया है, मृत्यु का भय है अथवा शत्रु जानलेवा कुछ करता है तो उससे बचने में अथवा उस पर वार करने में भय न करना । यह ‘स्कंद पुराण’ में लिखा है । तो विकार, चिंता, पाप-विचार ये सब भी शत्रु हैं, इनको किनारे लगाने में देर नहीं करनी चाहिए ।

4. पाँच कर्मदोषों से बचना चाहिएः

1. नासमझीपूर्वक कर्म करने से बचें, ठीक से समझकर फिर काम करें ।

2. अभिमानपूर्वक कर्म करने से बचें ।

3 रागपूर्वक अपने को कही फँसायें नहीं, किसी से संबंध जोड़े नहीं ।

4. द्वेषपूर्ण बर्ताव करने से बचें ।

5. भयभीत होकर कार्य करने से बचें । इन पाँच दोषों से रहित तुम्हारे कर्म भी लाभपंचमी को पंचामृत हो जायेंगे ।

5. बुद्धि में पाँच बड़े भारी सद्गुण हैं, उनको समझकर उनसे लाभ उठाना चाहिए ।

1. अशुभ वृत्तियों का नाश करने की, शुभ की रक्षा करने की ताकत बुद्धि में है ।

2. चित्त को एकाग्र करने की शक्ति बुद्धि में है । श्वासोच्छवास की गिनती से, गुरुमूर्ति, ॐकार अथवा स्वस्तिक पर त्राटक करने से चित्त एकाग्र होता है और भगवान का रस भी आता है ।

3. उत्साहपूर्वक कोई भी कार्य किया जाता है तो सफलता जरूर मिलती है ।

4. अमुक कार्य करना है कि नहीं करना है, सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा, हितकर-अहितकर इसका बुद्धि ही निर्णय करेगी, इसलिए बुद्धि को स्वच्छ रखना ।

5. निश्चय करने की शक्ति भी बुद्धि में है । इसलिए बुद्धि को जितना पुष्ट बनायेंगे, उतना हर क्षेत्र में आप उन्नत हो जायेंगे ।

तो बुद्धिप्रदाता भगवान सूर्यनारायण को प्रतिदिन अर्घ्य देना और उन्हें प्रार्थना करना कि ‘मेरी बुद्धि में आपका निवास हो, आपका प्रकाश हो ।’ इस प्रकार करने से तुम्हारी बुद्धि में भगवद्सत्ता, भगवद्ज्ञान का प्रवेश हो जायेगा ।

6. लाभपंचमी को भगवान को पाने के पाँच उपाय भी समझ लेनाः

1. ‘मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं । मुझे इसी जन्म में भगवत्प्राप्ति करनी है ।’ – यह भगवत्प्राप्ति का भाव जितनी मदद करता है, उतना तीव्र लाभ उपवास, व्रत, तीर्थ, यज्ञ से भी नहीं होता । और फिर भगवान के नाते सबकी सेवा करो ।

2. भगवान के श्रीविग्रह को देखकर प्रार्थना करते-करते गद्गद होने से हृदय में भगवदाकार वृत्ति बनती है ।

3. सुबह नींद से उठो तो एक हाथ तुम्हारा और एक प्रभु का मानकर बोलोः ‘मेरे प्रभु ! मैं तुम्हारा हूँ और तुम मेरे हो….. मेरे हो न… हो न…?’ ऐसा करते हुए जरा एक-दूसरे का हाथ दबाओ और भगवान से वार्तालाप करो । पहले दिन नहीं तो दूसरे दिन, तीसरे दिन, पाँचवें, पंद्रहवें दिन अंतर्यामी परमात्मा तुम पर प्रसन्न हो जायेंगे और आवाज आयेगी कि ‘हाँ भाई ! तू मेरा है ।’ बस, तुम्हारा तो काम हो गया !

4. गोपियों की तरह भगवान का हृदय में आवाहन, चिंतन करो और शबरी की तरह ‘भगवान मुझे मिलेंगे’ ऐसी दृढ़ निष्ठा रखो ।

5. किसी के लिए अपने हृदय में द्वेष की गाँठ मत बाँधना, बाँधी हो तो लाभपंचमी के पाँच-पाँच अमृतमय उपदेश सुनकर वह गाँठ खोल देना ।

जिसके लिए द्वेष है वह तो मिठाई खाता होगा, हम द्वेषबुद्धि से उसको याद करके अपना हृदय क्यों जलायें ! जहर जिस बोतल में होता है उसका नहीं बिगाड़ता लेकिन द्वेष तो जिस हृदय में होता है उस हृदय का सत्यानाश करता है । स्वार्थरहित सबका भला चाहें और सबके प्रति भगवान के नाते प्रेमभाव रखें । जैसे माँ बच्चे को प्रेम करती है तो उसका मंगल चाहती है, हित चाहती है और मंगल करने का अभिमान नहीं लाती, ऐसा ही अपने हृदय को बनाने से तुम्हारा हृदय भगवान का प्रेमपात्र बन जायेगा ।

हृदय में दया रखनी चाहिए । अपने से छोटे लोग भूल करें तो दयालु होकर उनको समझायें, जिससे उनका पुण्य बढ़े, उनका ज्ञान बढ़े । जो दूसरों का पुण्य, ज्ञान बढ़ाते हुए हित करता है वह यशस्वी हो जाता है और उसका भी हित अपने-आप हो जाता है । लाभ-पंचमी के दिन इन बातों को पक्का कर लेना चाहिए ।

धन, सत्ता, पद-प्रतिष्ठा मिल जाना वास्तविक लाभ नहीं है । वास्तविक लाभ तो जीवनदाता से मिलाने वाले सद्गुरु के सत्संग से जीवन जीने की कुंजी पाकर, उसके अनुसार चलके लाभ-हानि, यश-अपयश, विजय-पराजय सबमें सम रहते हुए आत्मस्वरूप में विश्रांति पाने में है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2009, पृष्ठ संख्या 21-23 अंक 202

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आदर तथा अनादर….


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

दुर्लभो मानुषो देहो देहीनां क्षणभंगुरः ।

तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम् ।।

‘मनुष्य देह मिलना दुर्लभ है । वह मिल जाय फिर भी वह क्षणभंगुर है । ऐसी क्षणभंगुर मनुष्य देह में भी भगवान के प्रिय संतजनों का दर्शन तो उससे भी अधिक दुर्लभ है ।’

यह शरीर, जो पहले नहीं था और मरने के बाद नहीं रहेगा, उसी के मान-सम्मान में अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर जीवन व्यर्थ में खो देना बुद्धिमानी नहीं है । जहाँ जरा सा आदर मिला वहाँ चक्कर काटते हैं । उद्घाटन समारोहों में फीता काटते फिरते हैं कि मान मिलेगा, अख़बार में नाम आयेगा । अरे ! उन फीता काटने वालों को ब्रह्मज्ञानी गुरुओं के पास जाना चाहिए और फीता काटने का शौक कम करना चाहिए । मस्का पालिश करने वाले दस-बीस-पचास आदमी तुम्हारा जयघोष कर देंगे, लाख आदमी जयघोष कर देंगे तो क्या हो जायेगा ? अधिक वाहवाही के गुलाम हो जाओगे तो अनर्थ कर लोगे, चापलूसों के चक्कर में आकर अन्य कर बैठोगे ।

नहीं-नहीं, आदर करवा के अपने शरीर में अहं मत लाओ और अनादर के भय से अपनी साधना और ईश्वरप्राप्ति का मार्ग मत छोड़ो । ये सब धोखा देने वाले हैं, इनसे सावधान हो जाओ ! आदर हो गया, अनादर हो गया, स्तुति हो गयी, निंदा हो गयी….  कोई बात नहीं, हम तो करोड़ काम छोड़कर प्रभु को पायेंगे । बस, फिर तो प्रभु तुम्हारे हृदय में प्रकट होने का इंतजार करेंगे । पहले तो तुम्हारा शोक और चिंता मिटेगी, फरियाद मिटेगी फिर धीरे-धीरे अंदर प्रकाश होगा, कई रहस्य प्रकट होने लगेंगे ।

लोग ईश्वरप्राप्ति के लिए वेश बदल लेते हैं लेकिन मान मिलता है तो फिर मान के ऐसे आदी हो जाते हैं कि देखते रहते हैं कि कहीं हमारे मान में कमी तो नहीं हुई !… तो मान के गुलाम हुए तो काहे की समझदारी रही ?

मान पुड़ी है जहर की, खाये तो मर जाय ।

चाह उसी की राखता, वह भी अति दुःख  पाय ।।

आदर तथा अनादर, वचन बुरे क्यों भले ।

निंदा स्तुति जगत की, धर जूते के तले ।।

मान चाहने वाला भगवान का भक्त नहीं रहता, वह तो मान का भक्त हो जाता है । लोग मान दें साधु के नाते, भगवान के नाते लेकिन आप अमानी रहो, आप मान-अपमान के भोगी नहीं बनो । क्या करना है मान पाके, सहज में जीवन जियो ।

‘ईश्वर मान-मरतबा, इज्जत-आबरू बनाये रखे…. मेरी इज्जत बनी रहे….’ अरे, पानी की बूँद से तो तेरी यात्रा शुरु हुई थी बुद्धू ! और मुठ्ठी भर राख में तू समाप्त हो जायेगा । साधु संन्यासी है तो गाड़ देंगे, जीवाणु बन जायेंगे, जंतु बन जायेंगे, जला देंगे तो राख बन जायेगी । क्यों अभिमान करना ? न साधुताई का अभिमान, न सेठपने का अभिमान, न नेतापने का अभिमान, न धनी होने का अभिमान करो, अगर अभिमान करना ही है तो एक ही अभिमान करो जो तारने वाला हैः ‘मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं । मैं भगवान की जाति का हूँ । हम हैं अपने-आप हर परिस्थिति के बाप !’ यह अभिमान तारने वाला है । शरीर का नाम, इज्जत-आबरू ये सब फँसाने वाले हैं ।

मत कर रे भाया गरव गुमान गुलाबी रंग उड़ी जावेलो ।

उड़ी जावेलो रे, फीको पड़ी जावेलो रे, काले मर जावेलो…

धन रे दौलत धारा माल खजाना रे…

छोड़ी जावेलो रे पलमां उड़ी जावेलो ।।

पाछो नहीं आवेलो… मत कर रे गरव….

‘यह धन मेरा, मैं धनवान ।’ धन को पता ही नहीं कि मैं इसका हूँ । ‘यह मकान मेरा, मैं मकानवाला’, ‘यह खेत मेरा, मैं खेतवाला’, ‘यह पैसा मेरा, मैं पैसेवाला’, ‘ये गहने गाँठे मेरे, मैं गहने गाँठोंवाली’ लेकिन माई ! देवि ! ये इतने बेवफा हैं कि तेरे को पहचानते ही नहीं हैं । इनको कोई उठाकर ले जाय तो बोलेंगे भी नहीं कि ‘मौसी हम जा रहे हैं । बाय-बाय ! टाटा !….’ कुछ नहीं करेंगे । ये बड़े बेवफा हैं । इनकी चिंता या चिंतन करके फँस मरने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है । तुम्हारा जन्म तो महान परमात्मा का ज्ञान पाकर महान बनने के लिए हुआ है । उस लक्ष्य को अगर पाना है, महान बनना है, अपने स्वरूप को जानना है तो

आदर तथा अनादर, वचन बुरे क्यों भले ।

निंदा स्तुति जगत की, धर जूते के तले ।।

खुशामदखोर स्तुति करके तुमसे गलत न करवा लें अथवा कोई अखबारें पैसा दबाकर तुम्हारी निंदा लिख दें तो डरो मत । अंग्रेजों के पिट्ठू गाँधी जी की कितनी निंदा करते थे, फिर भी गाँधी जी डटे रहे । देशवासी गाँधी जी की सराहना करते थे, फिर भी वे अभिमान में कभी चूर नहीं हुए । स्तुति करने वाले की अपनी सज्जनता है, भगवान की लीला है, निंदा करने वाले का अपना नजरिया है !  न निंदा में सिकुड़ो न स्तुति  फूलो, भगवान को सामने रखो, अपने लक्ष्य को सामने रखो ।

जिनको काम बनवाना होगा वे तो स्तुति कर लेंगे, खुशामद कर लेंगे, आप उनके प्रलोभन में न आइये, सावधान रहिये, अपना कर्तव्य करते जाइये । इससे आप स्तुति के योग्य रह जायेंगे । स्तुति में फिसले तो स्तुति नहीं टिकेगी ।

निंदा से भिड़े तो निंदा बनी रहेगी, निंदनीय काम किये तो निंदा बनी रहेगी लेकिन सत्य के आपके हृदय में जगमग-जगमग प्रकाशित होगा । फिर आपकी कोई निंदा करे तो आपको परवाह नहीं, उसकी मति कुदरत मार देगी । कई लोग पैसे देकर अखबारों में क्या-का-क्या लिखवाते हैं, अपने पैसे नष्ट करते हैं और अपनी आबरू भी गँवाते हैं । मेरे सत्संग में तो लोगों की संख्या बढ़ रही है । भीड़ कम भी हो जाय तो मेरे को क्या लेना है उससे !

तो आप निंदनीय कार्य नहीं करते फिर भी कोई निंदा करता है और आप अपनी महिमा में मस्त रहते हैं तो निंदा करने वाले को भगवान सद्बुद्धि देंगे । अगर सद्बुद्धि ली तो ठीक है, नहीं तो फिर प्रकृति की खूब मार पड़ती है, प्रकृति घुमा-घुमाकर प्रहार करती है ।

एक आदमी था । वह जरा बोलाः ‘यह ऐसा क्या है ?’ फिर थोड़ा और जोरों से निंदा करने लगा । फिर प्रकृति ने ऐसा घुमा-घुमाकर दिया कि दुर्घटना में लँगड़ा हो गया । फिर उसे कुछ स्वप्न आया, अब तो वह समिति में सेवा करता है बेचारा । तो आप अपनी तरफ से किसी का  अहित नहीं सोचो, किसी की निंदा न करो । आप भगवान के लिए सत्कर्म में लगे रहो तो बाकी सब भगवान देख लेते हैं ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2009, पृष्ठ संख्या 26,27 अंक 201

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उन्नति चाहो तो विनम्र बनो


अनेक विद्यालयों के सूचना-पट्ट पर ये शास्त्रवचन लिखे होते हैं –

विद्या ददाति विनयम् । विद्या विनयेन शोभते ।

अर्थात् विद्या विनय प्रदान करती है और वह विनय से ही शोभित होती है ।

वास्तव में प्रत्येक व्यक्ति जीवनरूपी पाठशाला का एक विद्यार्थी ही है और वह सतत इस पाठशाला में कुछ-न-कुछ सीखता ही रहता है । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इस शास्त्रवचन का आदर करना चाहिए और वह वास्तविक विद्या प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए जो विनय प्रदान करे और जीवन में अर्जित ज्ञान को सुशोभित करे ।

अहंकारी व्यक्ति कितना भी विद्यावान हो, वह शोभा नहीं पाता । इसलिए वेद भी हमें आज्ञा करते हैं- पर्णाल्लघीयसी भव । ‘हे मानव पत्ते से भी हलका बन अर्थात् नम्र बन ।’ (अथर्ववेदः 10.1.29)

हमारा सबका अनुभव है कि जो नम्र बनता है, वह सभी का प्यारा हो जाता है क्योंकि नम्रता एक ऐसा सद्गुण है जो अन्य अनेक सद्गुणों और सम्पदाओं को शींच लाता है ।

शास्त्र कहते हैं-

सुशीलो भव धर्मात्मा मैत्रः प्राणिहिते रतः ।

निम्नं यथापः प्रवणाः पात्रमायान्ति सम्पदः ।।

‘हे मनुष्य ! तू सुशील, पुण्यात्मा, प्रेमी और समस्त प्राणियों का हितैषी बन क्योंकि जैसे नीचे भूमि की ओर लुढ़कता हुआ जल अपने-आप ही पात्र में आ जाता है, वैसे ही सत्पात्र, विनम्र मनुष्य के पास सम्पत्तियाँ स्वयं आ जाती हैं ।’ (विष्णु पुराणः 1.11.15)

जीवन में कोई ऊँची विद्या न हो तो भी पेट पालने की विद्या तो हर व्यक्ति के पास होती ही है । फिर ‘विद्या ददाति विनयम् ।’ सूक्ति के अनुसार विश्व के सभी लोग विनयी होने चाहिए । परंतु देखा यह जाता है कि विनय का सद्गुण बहुत ही विरलों के पास होता है । फिर क्या यह शास्त्रवचन गलत है ? नहीं । शास्त्रकार यहाँ विद्या शब्द के द्वारा आत्मविद्या की ओर संकेत करना चाहते हैं, जो हमारे तुच्छ अहं को दूर करने में सक्षम है । इसलिए हमें उसे पाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए । भगवान श्रीकृष्ण ‘गीता’ में अर्जुन को आत्मविद्या का उपदेश दे रहे हैं और इन्हीं उपदेशों में विनम्र बनने का उपदेश भी आता है-

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।

‘उस ज्ञान को तू  तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझ, उनको भलीभाँति दण्डवत प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म-तत्त्व को भली भाँति जानने वाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश करेंगे ।’ (गीताः 4.34)

भारतवर्ष के सम्राट राजा भर्तृहरि ने जब आत्मविद्या को पूर्णरूप से आत्मसात किया और आत्मानंद में निमग्न हुए, तब उन्होंने लिखाः

जब स्वच्छ सत्संग कीन्हों, तभी कछु कछु चीह्नयो

जब स्वच्छ सत्संग किया, तभी कुछ-कुछ जाना । क्या जाना ?

मूढ़ जान्यो आपको, हर्यो भरम ताप को ।।

मुझ बेवकूफ को पता ही नहीं था कि मैं बड़ा बेवकूफ था । अब भ्रम और ताप को मैंने मिटा दिया है ।

आत्मविद्या कितनी निरहंकारिता, कितनी विनम्रता प्रदान करती है !

वैसे तो सेल्समैनों में, वेटरों में बड़ी विनम्रता दिखती है परंतु वह ऊपर-ऊपर की है, अंदर से हृदय स्वार्थभाव से सना रहता है । वह विनम्रता भी अच्छी है परंतु सरल, निष्कपट, वास्तविक विनम्रता तो सीधे-अनसीधे अध्यात्म-विद्या का ही प्रसाद है ।

एक बार गाँधी जी एक स्थान पर वक्तव्य देने गये । वे अपने सादे वेश में थे । लोगों ने उन्हें सब्जी काटने व पानी लाने की आज्ञा दी । उन्होंने मुस्कराते हुए इन कार्यों को सम्पन्न किया ।

किसी की विनम्रता का प्रकटरूप देखना हो तो उसे पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू के दर्शन करने चाहिए । वे अपने सत्संग-कार्यक्रम के अंतिम सत्र में हाथ जोड़कर कहा करते हैं- “सत्संग में जो अच्छा-अच्छा आपको सुनने को मिला वह तो मेरे गुरुदेव, शास्त्रों का, महापुरुषों का प्रसाद था और कहीं कुछ खारा-खट्टा आ गया हो तो उसे मेरी ओर से आया मानकर क्षमा करना ।” आत्मविद्या के सागर पूज्यश्री की यह परम विनम्रता देखकर सत्संगियों की आँखों से अश्रुधाराएँ बरसने लगती हैं ।

समुद्र में अनेक नदियाँ आकर मिलती हैं परंतु वह शांत रहता है, उसमें बाढ़ नहीं आती । आप भी गंभीर और नम्र बनो । विद्या, धन, वैभव, उच्च पदवी, मान और सम्मान पाकर फूल मत जाओ, अपनी मर्यादा से बाहर मत हो जाओ । जो वृक्ष फलों से लद जाता है वह झुक जाता है, ऐसे ही जो व्यक्ति सच्ची विद्या को पा लेता है वह विनम्र हो जाता है । जो गागर नल के नीचे झुकने को तैयार हो जाती है वही जल से पूर्ण हो जाती है । जो व्यक्ति विनम्रभाव से आत्मज्ञानी महापुरुषों के सत्संग में बैठता है वही ज्ञानसम्पन्न हो जाता है । विनम्रता से विद्या मिलती है और विद्या से पुनः विनम्रता पोषित होती है, यह नियम है । जो विनम्र है उसे न किसी से भय होता है और न पतन की चिंता । जो विनम्र है उसका सर्वत्र आदर होता है । जो अभिमानी होता है उसका सर्वत्र तिरस्कार होता है । जिसके पेट में अभिमान की हवा भरी हुई है, उसको फुटबाल की तरह ठोकरें खानी ही पड़ती हैं । विनम्र व्यक्ति लोगों से आदर-सत्कार पाता है ।

नम्रता मानव-जीवन का भूषण है । नम्रता से मनुष्य के गुण सुवासित और सुशोभित हो उठते हैं । नम्रता विद्वान की विद्वता में, धनवान के धन में, बलवान के बल मे और सुरूप के रूप में और चार चाँद लगा देती है । सच्चा बड़प्पन और सभ्यता भी नम्रता में ही है । हम किसी को छोटा न समझें ।

यजुर्वेद (18.75) में आता हैः

उत्तानहस्ता नमसोपसद्य ।

जब दूसरों से मिलें तो दोनों हाथ उठाकर नमस्ते करें ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2009, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 201

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