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दिव्य दृष्टि


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

भगवान श्रीरामचन्द्रजी अरण्य में विश्राम कर रहे थे और लखन भैया तीर-कमान लेकर चौकी कर रहे थे । निषादराज ने श्रीरामजी की यह स्थिति देखकर कैकेयी को कोसना शुरु कियाः “यह कैकेयी, इसे जरा भी ख्याल नहीं आया ! सुख के दिवस थे प्रभु जी के और धरती पर शयन कर रहे हैं ! राजाधिराज महाराज दशरथनंदन राजदरबार में बैठते । पूर्ण यौवन, पूर्ण सौंदर्य, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण प्रेम, पूर्ण प्रकाश, पूर्ण जीवन के धनी श्रीराम जी को धकेल दिया जंगल में, कैकेयी की कैसी कुमति हो गयी !”

लखन भैया के सामने कैकेयी को उसने कोसा । निषादराज ने सोचा कि ‘लक्ष्मणजी मेरी व्यथा को समझेंगे और वे भी कैकेयी को कोसेंगे’ लेकिन लखन लाला ऐन्द्रिक जीवन में बहने वाले पाशवी जीवन से ऊँचे थे । वे मानवीय जीवन के सुख-दुःखों के थपेड़ों से भी कुछ ऊँचे उठे हुए थे । उन्होंने कहाः “तुम कैकेयी मैया को क्यों कोसते हो ?

काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता ।

कोई किसी को सुख-दुःख देने वाला नहीं है ।”

जो बोलता है फलाने ने दुःख दिया, फलाने ने दुःख दिया, वह कुछ नहीं जानता है, अक्ल मारी हुई है उसकी । कुछ लोगों ने करोड़ों रूपये खर्च करके बापू का कुप्रचार कराया और यदि मैं बोलता कि ‘इन्होंने कुप्रचार करके मुझे दुःखी किया, हाय ! दुःखी किया’ तो मैं सचमुच ‘दुःख मेकर’ (दुःख बनाने वाला) हो जाता । वे कुप्रचार वाले कुप्रचार करते रहे और हम अपनी मस्ती में रहे तो मेरे पास तो सत्संगियों की भीड़ और बढ़ गयी । यह नियति होगी ।

निषादराज बोलता हैः “यह अच्छा नहीं हुआ ।” और लखन भैया कहते हैं कि “कोई किसी के सुख-दुःख का दाता नहीं होता है, सबका अपना-अपना प्रारब्ध होता है, अपना-अपना सोच-विचार होता है, इसी से लोग सुखी-दुःखी होते हैं । तुम कैकेयी अम्बा को मत कोसो ।”

निषादराज कहता है “क्या श्रीरामचन्द्रजी अपना कोई प्रारब्ध, अपने किसी पाप का फल भोग रहे हैं ? आपका क्या कहना है ?”

लक्ष्मण जी कहते हैं- “श्रीराम जी दुःख नहीं भोग रहे हैं, दुःखी तो आप हो रहे हैं । श्रीराम जी तो जानते हैं कि यह नियति है, यह लीला है । सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मरण ये सब खिलवाड़ हैं, मैं शाश्वत तत्त्व हूँ और रोम-रोम में रम रहा हूँ, अनंत ब्रह्माण्डों में रम रहा हूँ । यह तो नरलीला करने के लिए यहाँ राम रूप से प्रकट हुआ हूँ । श्रीराम जी प्रारब्ध का फल नहीं भोग रहे हैं । श्रीराम जी तो गुणातीत हैं, देशातीत हैं, कालातीत हैं और प्रारब्ध से भी अतीत हैं । महापुरुष प्रारब्ध का फल नहीं भोगते, वे प्रारब्ध को बाधित कर देते हैं । प्रारब्ध होता है शरीर का, मुझे क्या प्रारब्ध ! यश-अपयश शरीर का होता है, बीमारी-तन्दुरुस्ती शरीर को होती है, मेरा क्या ! हम हैं अपने आप, हर परिस्थिति को जानने वाले उसके बाप ! ऐसा तो सब ज्ञानवान जानते हैं फिर श्रीरामचन्द्र जी तो ज्ञानियों में शिरोमणि हैं । वे कहाँ दुःख भोग रहे हैं ! दुःख तो निषादराज आप बना रहे हैं ।”

अब ध्यान देना, इस कथा से आप कौनसा नजरिया (दृष्टि) लेंगे ? कैकेयी कुटिल रही, स्वार्थी रही और अपने बेटे के पक्ष में वरदान लिया, यह अनुचित किया – ऐसा समझकर आप अगर अनुचित किया – ऐसा समझकर आप अगर अनुचित से बचना चाहते हैं तो इस पक्ष को स्वीकार करके अपने अंतःकरण को गलतियों से, कुटिलता से बचा लें तो अच्छी बात है । अगर, कैकेयी में प्रेम था और राम जी के दैवी कार्य में कैकेयी ने त्याग और बलिदान का परिचय दिया है, इतनी निंदा सुनने के बाद भी, लोग क्या-क्या बोलेंगे, यह समझने के बाद भी कैकेयी ने यह किया है ऐसा आप मानते हैं तो कैकेयी के इस त्याग, प्रेम को याद करके अंतःकरण में सद्भाव को स्वीकार करिये । कैकेयी को कोसकर आप अपना दिल मत बिगाड़िये अथवा कैकेयी ने श्रीराम जी को वनवास दिया, अच्छा किया और हम भी ऐसा ही आचरण करें – ऐसा सोचकर अपने दिल में कुटिलता को मत लाइये । जिससे आपका दिल, दिलबर के ज्ञान से, दिलबर के प्रेम से, दिलबर की समता से, परम मधुरता से भरे, वही नजरिया आपके लिए ठीक रहेगा, सही रहेगा, बढ़िया रहेगा ।

कोई भाभी, कोई देवरानी, कोई जेठानी, कोई सास या बहू अऩुचित करती है तो आप यह अनुचित है ऐसा समझकर अपने जीवन में उस अनुचित को न आने दें, तब तक तो ठीक है लेकिन ‘यह अनुचित करती है, यह निगुरी ऐसी है, वैसी है…’ – ऐसा करके आप उन पर दोषारोपण करके अपने दिल को बिगाड़ने की गलती करते हैं तो आप पशुता में चले जायेंगे । यदि सामने वाली सास-बहू, देवरानी-जेठानी सहनशक्तिवाली है तो उसका सद्गुण लेकर आप समता लाइये । किसी में कोई सद्गुण है तो वह स्वीकारिये और किसी में दुर्गुण है तो उससे अपने को बचाइये । ऐसा करके आप अपने अंतःकरण का विकास कीजिये । न किसी का दोष देखिये और न किसी को दोषी मानकर आरोप करिये और न किसी की आदत के गुलाम बनिये ।

किसी के दोष देखकर आप मन में खटाई लायेंगे तो आपका अंतःकरण खराब होगा लेकिन दोष दिखने पर आप उन दोषों से बचेंगे और उसको भी निर्दोष बनाने हेतु सद्भावना करेंगे तो आप अपने अंतःकरण का निर्माण कर रहे हैं । संसार तो गुण-दोषों से भरा है, अच्छाई-बुराई से भरा है । आप किसी की अच्छाई देखकर उत्साहित हो जाइये, आनंदित होइये और बुराई दिखने पर अपने को उन बुराइयों से बचाकर अपने अंतःकरण का निर्माण करिये और गहराई में देखिये कि यही अच्छाई-बुराई के ताने-बाने संसार को चलाते हैं, वास्तव में तत्त्वस्वरूप भगवान सच्चिदानंद हैं, मैं उन्हीं में शांत हो रहा हूँ । जहाँ-जहाँ मन जाय, उसे घुमा-फिराकर छल, छिद्र, कपट से रहित, गुण-दोष के आकर्षण से रहित अपने भगवत्स्वभाव में विश्रांति दिलाइये, विवेक जगाइये कि ‘मैं कौन हूँ ?’ अपने को ऐसा पूछकर शांत होते जाइये ।

आप पुरुषार्थ करके अपनी मति को ऐसा बनाइये कि आपको लगे कि भगवान पूर्णरूप से मेरे ही हैं ।  के दस बेटे होते हैं, हर बेटे को माँ पूर्णरूप से अपनी लगती है, ऐसे ही भगवान हमको पूरे-के-पूरे अपने लगने चाहिए । ऐसा नहीं कि भगवान बापू जी के हैं, आपके नहीं हैं । जितने बापू जी के हैं उतने-के-उतने आपके हैं ।

‘ऋग्वेद’ कहता हैः मन्दा कृणुध्वं धिय आ तनुध्वम् । तुम अपनी बुद्धि को तीक्ष्ण बनाओ और कर्म करो ।’ (10,101,2) और कर्म में ऐसी कुशलता लाओ कि कर्म तो हो लेकिन कर्म के फल की लोलुपता नहीं हो और कर्म में कर्तृत्व अभिमान भी नहीं हो । कर्म प्रारब्ध-प्रवाह से होता रहे और आप कर्म को कर्मयोग बनाकर नैष्कर्म्य सिद्धि प्राप्त करके भगवान में विश्राम पाओ, भगवान में प्रीति बढ़ाओ, ब्रह्मस्वभाव में जगो, ब्राह्मी स्थिति बनाओ ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2009, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 196

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कल्याणकारी छः बातें


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

परमात्मदेव का ज्ञान, परमात्मदेव की प्रीति, परमात्मदेव में विश्रांति मिले ऐसे कर्म, ऐसा चिंतन, ऐसा संग, ऐसे शास्त्रों का अध्ययन करना, ऐसा भाव बनाना पुरुषार्थ है और इसके विपरीत करना प्रमाद है । प्रमाद मौत की खाई में गिराता है । बार-बार जन्मो, बार-बार मरो, बार-बार माँ की कोख में फँसो… इस प्रकार न जाने कितने जन्म बीत गये, कितने माँ-बाप, कितने मित्र, कुटुम्बी छोड़के आये हो । तो अब यह जीवन विफल न हो इसलिए इन छः बातों का याद रखें-

1 अपना लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए ।

2 अपने जीवन में उत्साह बना रहे ।

3 भगवान में, अपने-आप में श्रद्धा बनी रहे ।

4 किस पर भरोसा करें, किस पर नहीं ? सावधान रहें ।

5 जीवन में धर्म होना चाहिए ।

6 अपनी अंतिम यात्रा कैसी हो ?

एक तो अपने लक्ष्य का निश्चय कर लें, अपना लक्ष्य ऊँचा बना लें । दो प्रकार के लक्ष्य होते हैं- एक होता है वास्तविक लक्ष्य, दूसरा होता है अवांतर लक्ष्य । परम सुख, परम ज्ञान, परम मुक्त अवस्था को पाना, आत्मा-परमात्मा का ज्ञान पाना यह वास्तविक लक्ष्य है । खाना-पीना, कमाना और इनके सहायक कर्म यह अवांतर लक्ष्य है । किसी से पूछा जाय कि ‘आपके जीवन का उद्देश्य क्या है ?’ तो बोलेंगे- ‘मैं वकील बनूँ, मैं सेठ बनूँ….’ नहीं, यह जीवन का वास्तविक उद्देश्य नहीं है, जीवन का वास्तविक उद्देश्य है शाश्वत सुख पाना और उसके सहायक सब कर्म साधन हैं ।

कुछ लोग लक्ष्य बना लेते हैं, ‘मैं डॉक्टर बनूँगा ।’ डॉक्टर बन गया बस । यह क्या लक्ष्य है ! यह तो मजूरी है । यदि तुमने वकील बनने का लक्ष्य बना लिया तो यह तो अवांतर लक्ष्य है बेटे ! मुख्य लक्ष्य है अपने आत्मा-परमात्मा को पाकर सदा के लिए दुःखों, कष्टों, चिंताओं से मुक्त हो जाना । फिर भी शरीर रहेगा तब तक ये दुःख, कष्ट आयेंगे लेकिन आप तक नहीं पहुँचेंगे, आप  अपने पृथक परमेश्वर स्वभाव में, अमर पद में प्रतिष्ठित रहोगे । तो ऐसे लक्ष्य का निश्चय कर लो ।

दूसरी बात है मन में उत्साह बना रहे । उत्साह का मतलब है सफलता, उन्नति, लाभ और आदर के समय चित्त में काम करने का जैसा जोश, तत्परता, बल बना रहता है, ठीक ऐसा ही प्रतिकूल परिस्थिति में बना रहे । जिसका उत्साह टूटा, मानो उसका जीवन सफल हो गया । उत्साहहीन जीवन व्यर्थ है ।

उत्साहसमन्वितः…. कर्ता सात्त्विक उच्यते ।

‘उत्साह से युक्त कर्ता सात्त्विक कहा जाता है ।’ (भगवद्गीताः 18.26)

जो काम करें उत्साह से करें, तत्परता से करें, लापरवाही न बरतें । उत्साह से काम करने से योग्यता बढ़ती है, आनंद आता है । उत्साहहीन होकर काम करने से कार्य बोझ बन जाता है ।

उत्साह बिनु जो कार्य हो, पूरा कभी होता नहीं ।

उत्साह होता है जहाँ, होती सफलता है वहीं ।

उत्साह न छोड़ें और लापरवाही न करें, जीवन में धैर्य रखें ।

तीसरी बात है ईश्वर पर और अपने पर भरोसा रखें । ऊँचे लोगों पर भरोसा रखें । ऊँचे-में-ऊँचे हैं परमात्मा, जो परमात्मा के नाते जीवनयापन करते है ऐसे लोगों की बातो पर दृढ़ विश्वास रखें ।

चौथी बात है किस पर कितना विश्वास रखें, किस पर न रखें ? कर्म करने में, विचार करने में, संग करने में, विश्वास करने में सावधान रहें । किसकी बात पर विश्वास करें ? जो स्वार्थी हैं, द्वेषी हैं, निंदक हैं, कृतघ्न है, बेईमान हैं उनकी बातों पर विश्वास करें कि जो भगवान के रास्ते चल रहे हैं, भगवत्सुख में हैं, भगवद्ज्ञान में है, ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय’ जिनका जीवन है उनकी बातों प ? किसका संग करना चाहिए और किसके संग से बचना चाहिए ? जो बहिर्मुख हैं, झगड़ालू हैं, विषय विकारों में पड़ रहे हैं, निंदक हैं उनसे बचें । जो अपने सजातीय हैं अर्थात् भगवान के रास्ते हैं, प्रीति में हैं, ज्ञान में हैं उनका संग करें, उनकी बातों में श्रद्धा करें । श्रद्धावान के संग से श्रद्धा निखरती है, साधक के संग से साधना निखरती है और शराबी के संग से जुआरीपना आता है तो हमको क्या चाहिए उसी प्रकार का ऊँचा संग करें ।

‘श्री योगवासिष्ठ महारामायण’ में वसिष्ठजी महाराज कहते हैं कि अच्छा संग करना चाहिए, अपने अंतःकरण का शोधन हो ऐसा संग करना चाहिए, सत्शास्त्रों का आश्रय लेना चाहिए । संतजनों का संग करके संसार-सागर से तरने का उपाय करना चाहिए अर्थात् आसुरी वृत्तियों से बचना चाहिए । जो हमारा समय, शक्ति, बुद्धि, जीवन खराब कर दें ऐसे संग से, ऐसे भोगों से ऐसे चिंतन से, ऐसे साहित्य से बचकर श्रेष्ठ साहित्य, श्रेष्ठ संग, श्रेष्ठ चिंतन और श्रेष्ठ में श्रेष्ठ परमात्मा की बार-बार स्मृति करके उसमें गोता मारने का अभ्यास कर दो तो अंत में जीवन भगवान से मिलाने वाला हो जायेगा ।

पाँचवी बात है जीवन में धर्म का नियंत्रण हो । जीवन में धर्म का नियंत्रण होगा तो अनुचित कार्यों पर रोक लग जायेगी और उचित होने लगेगा, अऩुचित में समय-शक्ति बर्बाद नहीं होगी । आप अनुचित नहीं करते तो लोग आपको बदनाम करने की साजिशें रचकर आपकी निंदा करवाते हों फिर भी आपके अंतःकरण में खलबली नहीं मचेगी । आपके जीवन में धर्म है, आपके जीवन में परोपकार, है, आपकी बुद्धि भगवत्प्रसादजा है तो आपका कुप्रचार करने वाले थक जायें, फिर भी आपका बाल बाँका नहीं होगा । जीवन में धर्म का फल है कि हर परिस्थिति में हम सम रहें । जैसे धर्मराज युधिष्ठिर को दुर्योधन ने कितना कष्ट दिया लेकिन धर्मराज का बाल बाँका नहीं हुआ ।

छठी बात है अपनी अंतिम यात्रा कैसी हो ? आखिर में कैसे मरना है यह याद रहे, मरना तो पड़ेगा ही । चिंता लेकर मरना है, तड़पते हुए मरना है, अधूरा काम छोड़कर मरना है, कुछ पाते-पाते या छोड़ते-छोड़ते मरना है, भय लेकर मरना है अथवा वासना के जाल में छटपटाते हुए मरकर बाद में कई जन्मों में भटकना पड़े ऐसे मरना है ? नहीं ! निश्चिंत होकर, पूर्णकाम होकर, आप्तकाम होकर मरना है । कोई इच्छा, कोई वासना न रहे, हमारे जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाय बस ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान ।…..

तो वैसा अभ्यास और वैसी यात्रा रोज करते रहना चाहिए । इससे जीवन निर्भार रहेगा, निर्दुःख रहेगा । इस जीवन को अपने पूर्ण तत्त्व का अनुभव करने वाला जीवन बनाना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2009, पृष्ठ संख्या 2,3 अंक 196

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आत्महत्याः कायरता की पराकाष्ठा


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

मृत्यु एक ईश्वरीय वरदान है, फिर भी यदि कोई आत्महत्या करता है तो वह महापाप है । परमात्मा ने हमें यह अमूल्य मानव चोला दिया है तो हमारा कर्तव्य है कि हम इसे साफ सुथरा रखें, इसे स्वस्थ-तन्दुरुस्त रखें । ऐसा नहीं कि मृत्यु जरूरी है तो अनाप-शनाप खाकर मौत को आमंत्रण दें, आत्महत्या करें । यद्यपि कपड़ा मैला होता है, गलता है, फटता है लेकिन उसे जानबूझकर फाड़ देना तो बेवकूफी है । ऐसे ही शरीर बूढ़ा होता है, बीमार होता है, मरता है – यह प्रकृति की व्यवस्था है, शरीर को जानबूझकर मौत के मुँह में धकेलना ठीक नहीं ।

कुछ विद्यार्थी जो परीक्षा में विफल हो जाते हैं, व्यापारी जो बाजार की मंदी की चपेट में आ जाते हैं उनमें से कमजोर मनवाले कई घबरा के अथवा चिंता-तनाव से घिर के आत्महत्या कर लेते हैं । ऐसे लोगों को चाहिए कि वे कभी नकारात्मक न सोचें, पलायनवादिता के या हलके विचार न करें । असफल हो जायें तब भी भागने के या आत्महत्या के विचार न करें, फिर से पुरुषार्थ करें तो अवश्य सफल होंगे ।

मनुष्य का जीवन कुदरत ने ऐसा लचीला बनाया है कि वह जितनी चाहते उतनी उन्नति कर सकता है । कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझकर, दुःख-मुसीबतों और विघ्न बाधाओं के सिर पर पैर रखकर परम पद तक पहुँच सकता है । बस, उस योग्यता का पता चल जाय, उस योग्यता पर पूरा विश्वास हो जाय ।

भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई । जिसके भौंह के इशारे मात्र से सृष्टि का प्रलय हो जाता है, ऐसा सर्वसमर्थ परब्रह्म परमात्मा तुम्हारा सखा होकर बैठा है और जरा सी मंदी आयी तो तुम फाँसी लगाकर मर गये, खेत-खली में जरा सी गड़बड़ हुई और तुम आत्महत्या करने लगे, क्या तुच्छ बुद्धि है ! धिक्कार है आत्महत्या करने वालों को ! ऐसे लोगों को हिजड़ा कहेंगे तो हिजड़े नाराज हो जायेंगे । बोलेंगेः ‘बाबा ! हम कहाँ आत्महत्या करते हैं ? हम तो चुनाव लड़कर राज्य भी कर लेते हैं । हमारा नाम ऐसे लोगों को क्यों देते हो ?’ ऐसे लोगों को गधा कह दें तो गधे भी नाराज हो जायेंगे । बोलेंगे- “बाबा ! हमने कहाँ आत्महत्या की ? हम तो डंडे सहते हैं, सर्दी-गर्मी सहते हैं, दुःख सहते हैं । खाने को मिला न मिला तो भी चुप्पी रखकर दूसरे दिन बोझा उठाते हैं, फिर भी हम कभी आत्महत्या नहीं करते ।’ आत्महत्यारे को कुत्ता बोलें तो कुत्ता बोलेगाः ‘हम भूख-प्यास फटकार सहते रहते हैं, डंडे पत्थर सहते हैं फिर भी आत्महत्या नहीं करते । हमें कहीं पूँछ दबानी पड़ती है, कहीं हिलानी पड़ती है लेकिन हम तो जी रहे हैं ।’ तो आत्महत्यारों को कुत्ता बोलोगे तो कुत्तों की बदनामी होगी । जो आत्महत्या करते हैं उनको गधा कहो, कुत्ता कहो, हिजड़ा कहो तो ये सब नाराज हो जायेंगे ।

मनुष्य विषय-विलास, शराब-कबाब और डिस्को करके पिशाच-सा जीवन जीकर मरने को नहीं आया है । आत्महत्या करनी भोगी और कायर मन की पहचान है । सत्कर्म, सदगुरुओं का सान्निध्य-सेवन और आत्मसाक्षात्कार करके मुक्त होना यह साधक, भक्त और योगी मन की पहचान है ।

नासमझ लोग क्या करते हैं ? जरा सा दुःख पड़ता है तो दुःख देने वाले पर लांछन लगाते हैं, परिस्थितियों को दोष देते हं अथवा अपने को पापी समझकर अपने को ही कोसते हैं । कुछ कायर तो आत्महत्या करने तक का सोच लेते हैं । कुछ पवित्र होंगे तो किन्हीं संत-महात्मा के पास जाकर दुःख से मुक्ति पाते हैं ।

जो गुरुओं के द्वार पर जाते हैं उनको कसौटियों से पार होने की कुंजियाँ सहज में ही मिल जाती हैं । इससे उनके दोनों हाथों में लड्डू होते हैं । एक तो संत-सान्निध्य से हृदय की तपन शांत होती है, समस्या का हल मिलता है, साथ ही साथ जीवन को नयी दिशा भी मिलती है ।

मानव को किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या का विचार नहीं करना चाहिए तथा अपने मन को दुःखी होने से बचाना चाहिए । दुनिया में जो भी दुःख है वह अज्ञान का फल है, नासमझी का ही फल है । जहाँ-जहाँ दुःख है, वहाँ-वहाँ नासमझी है । बिना नासमझी के दुःख टिक नहीं सकता, हो नहीं सकता । शरीर की बीमारी को अपनी बीमारी मानते हैं यह बेवकूफी है । नश्वर सफलता को अपनी सफलता मानते हैं, नश्वर विफलता को अपनी विफलता मानते हैं, अपने-आपको शरीर मानते हैं और जो छूट जाने वाली हैं उन चीजों को मेरी मानते हैं । यह अज्ञान है कि नहीं है ? मरने के बाद भी  जो रहेगा उसको नहीं जानते और जो मन जाने वाला है उसको मैं मानते हैं । बेवकूफी है कि नहीं है ?

छोटे-मोटे नहीं, गेटे जैसे विद्वान भी कभी आत्महत्या का विचार कर लेते हैं परंतु डर के मारे कर नहीं पाते । कई विद्वान भी आत्महत्या कर लेते हैं क्योंकि वेदव्यास जी का ज्ञान नहीं है । नहीं तो एक कुत्ता जिसकी टाँग कटी है, पूँछ कटी है, शरीर में घाव पड़े हैं उसको कोई मारने जाय तो अपने जीवन की रक्षा के लिए सब प्रयत्न करेगा और आज का मानव आत्महत्या कर लेता है, कितनी बेवकूफी है ! यह बरसात के पतंगे हैं न, दीये में आते हैं और अंग जल जाते हैं, फरफराते हैं, फिर भी आप उनको मारने की कोशिश करो तो बचने के लिए वे भी छटपटायेंगे, वहाँ से भागेंगे ।

जीवनदाता ने जीवन दिया है तो अपनी तरफ से उसको बचाने का सब प्रयत्न करना चाहिए । जो आत्महत्या करते हैं उनको कई वर्षों तक शरीर नहीं मिलता और भटकते रहते हैं । जो आत्महत्या करके मर गया, उसको कंधा देने वाले को भी हानि होती है, दुःख उठाना पड़ता है । ‘पाराशर स्मृति’ व ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में तो यहाँ तक लिखा गया है कि जिसने आत्महत्या की उसने प्रकृति की, ईश्वर की दी हुई शरीर रूपी सौगात से खिलवाड़ किया है, उसका अपमान किया है, उस अभागे को कंधा मत दो । किसी गंदगी उठाने वाले को बोलो कि उसका शव रस्सी से बाँधकर मार्ग से घसीटता हुआ ले जाय, ताकि उसको देखकर दूसरा ऐसी बेवकूफी न करे ।

आप सत्य का, ईश्वर का आश्रय लीजिये और परिस्थितियों के प्रभाव से बचिये । जो लोग परिस्थितियों को सत्य मानते हैं वे उनसे घबराकर कभी आत्महत्या की बात भी सोचते करते हैं, यह बहुत बड़ा अपराध है ।

मैंने सूरत में सत्संग किया (दिसम्बर 2008 में) तब आर्थिक मंदी की चपेट में आये रत्न-कलाकारों को संदेश दिया कि जो मुसीबत में आकर आत्महत्या करने का विचार करते हैं उन्हें चाहिए कि अपनी दैन्य अवस्था का, लाचारी का तो पता चल गया, अब भगवान के सामर्थ्य का थोड़ा चिंतन करो और कमरा बंद करके भगवान को आर्त भाव से प्रार्थना करो, आँसू बहाओः ‘भगवान ! मैं कुटुम्ब का पालन नहीं कर सकता हूँ और आप सर्वसमर्थ हो…’ ऐसी प्रार्थना करते-करते भगवान को दंडवत प्रणाम करके लेट जाओ, भगवान के गले पड़ जाओ । अपनी तरफ से पुरुषार्थ में कमी न करो लेकिन जब आत्महत्या करने की नौबत आ रही है तो अहं का विसर्जन करो । उसी समय नहीं तो एकाध दिन में रास्ता निकल आयेगा ।

रात अँधियारी हो, काली घटायें छायी हों ।

मंजिल तेरी दूर हो, हर तरफ से मजबूर हों ।।

फिर क्या करोगे ?

अच्युतानन्त गोविन्द नामोच्चारणभेषजात् ।

नश्यन्ति सकला रोगाः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।।

‘हे अच्युत ! हे अनंत ! हे गोविन्द ! – इस नामोच्चारणरूप औषध से तमाम रोग नष्ट हो जाते हैं, यह मैं सत्य कहता हूँ…. सत्य कहता हूँ ।’

आत्महत्या यह मानस रोग है । मन की कायरता की पराकाष्ठा होती है तभी आदमी आत्महत्या का विचार करता है तो उस समय भगवान को पुकारो ।

‘स्कंद पुराण’ के काशी खंड पूर्वार्द्ध (12.12,13) में आता हैः ‘आत्महत्यारे घोर नरकों में जाते हैं और हजारों नरक-यातनाएँ भोगकर फिर देहाती सूअरों की योनि में जन्म लेते हैं । इसलिए समझकर मनुष्य को कभी भूलकर भी आत्महत्या नहीं करनी चाहिए । आत्महत्यारों का न तो इस लोक में और न परलोक में ही कल्याण होता है ।’

‘पाराशर स्मृति (4.1,2)’ के अनुसार ‘आत्महत्या करने वाला मनुष्य 60 हजार वर्षों तक अंधतामिस्र नरक में निवास करता है ।’

मीडिया को समाज की यह सेवा करनी चाहिए कि जो आत्महत्या करते हैं उनकी तस्वीर देकर नीचे ऐसे कड़क शब्द लिखने चाहिए कि पढ़ने वाले कभी आत्महत्या का विचार न करें ।

जहाँ भी आत्महत्याएँ होती हों वहाँ इस सत्संग का जरा प्रचार होना चाहिए ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल 2009, पृष्ठ संख्या 18-20 अंक 196

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