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ईश्वरीय अंश कैसे विकसित करें ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

पशुता हर जीव में होती है, मानवता मनुष्य में होती है और ईश्वरत्व जड़-चेतन सभी में होता है। मनुष्य एक ऐसी जगह पर खड़ा है कि उसके एक तरफ पशुता है तो दूसरी तरफ ईश्वरत्व है और मनुष्यता उसे लानी पड़ती है। खुद मनुष्य-शरीर में होते हुए भी उसमें मनुष्यता हो, यह जरूरी नहीं है।

मनुष्य दो पैर वाले प्राणी के रूप में जन्मता है और उसमें मनुष्यता आती है व्रतों से, नियमों से, साधन-भजन से। मनुष्यता आती है तभी सद्गुरुओं का ज्ञान हजम होता है। सदगुरु का ज्ञान पशु को हजम नहीं होता।

मेरे आश्रम की गाय मुझे लात मार सकती है। मेरे आश्रम का बैल मुझे गिरा सकता है क्योंकि वह पशु है। उसको पता नहीं है कि ‘मैं आश्रम का चारा खाता हूँ…. बापू मेरी भलाई चाहते हैं….’

मैं एक बैल को प्यार करता था, स्नेह करता था। विनोद में उसके साथ थोड़ी कुश्ती भी करता था। एक उसने कुश्ती में ऐसा गिराया कि ‘फ्रैक्चर’ हो गया तो भी मैंने उसको लाठी नहीं मारी क्योंकि वह पशु है।

मनुष्य देह में पशुता भी छुपी है, मानवता भी छुपी है और देवत्व भी छुपा है तो क्या करना चाहिए ?

पशुता को क्षीण करना और मनुष्यता को निखारना चाहिए। फिर मनुष्यता को निखारते-निखारते ईश्वरत्व को निखारना चाहिए।

पशु और मनुष्य में यही फर्क है कि  पशु जैसा मन में आया वैसा करते हैं। फिर भले ही उसे डंडे खाने पड़ें, जूते मारे जायें अथवा मरना ही क्यों न पड़े ! पतंगे दीपक में जलकर मर जाते हैं, मछली काँटे में फँसकर मर जाती है, भ्रमर कमल में फँसकर मर जाता है, हिरण सुर-ताल-लय में सुधबुध खोकर अपनी जान गँवा देता है, हाथी घास की हथिनी के पीछे फँस जाता है और सारी जिंदगी महावत की गुलामी करता है। ऐसे ही मनुष्य भी शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श के पीछे जीवन पूरा कर देते हैं तो उन्हें क्या करना चाहिए ?

मनुष्य को चाहिए की शास्त्र और धर्म के अनुसार अपनी मनुष्यता विकसित करते-करते ईश्वरत्व को विकसित करे। ऐसा नहीं कि भ्रम में फँस जाये कि ‘मैं ब्रह्म हूँ… मैं आत्मा हूँ…’ और मनमानी करने लग जाये तथा स्वयं पशुता में गिर जाय ! पशुता में गिर जायेगा तो ब्रह्म क्या रहेगा ? मनुष्यता से गिर जायेगा तो ईश्वरत्व में कैसे पहुँचेगा ?

मनुष्य-शरीर में संयम का पालन नहीं किया तो ईश्वरत्व को कैसे पायेगा ? संयम नियम का पालन करने से सच्चाई आती है कि सच्चाई से सत्य को जानने की जिज्ञासा होती है जिससे श्रद्धा दृढ़ होती है, बुद्धि में सत्व आता है, जो सत्य स्वरूप ईश्वर में स्थिति कराता है। जो सच्चाई का आश्रय नहीं लेता है उसको सत्य की जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती है। कोई सत्य का उपदेश सुनकर कह दे कि ‘मैं ब्रह्म हूँ’ तो इससे काम नहीं चलता है।

सत्य की तीव्र जिज्ञासा के बिना आदमी वफादारी से गुरु की शरण नहीं जाता है। जब कभी मौका मिलेगा तब इंद्रियलोलुप व्यक्ति गद्दारी कर लेगा और जो अपने साथ गद्दारी करता है, वह गुरु के साथ भी गद्दारी कर सकता है।

अतः अपने जीवन में कड़क नियम रखो, सजगता रखो, कड़क निगरानी रखो। जैसे, आपके पास अगर हीरे-जवाहरात हैं तो आप उनकी ऐसी निगरानी रखते हैं कि कोई उन्हें चुरा न ले जाये। ऐसे ही हीरे-जवाहरातों से भी ज्यादा कीमती आपका जीवन है। अतः काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, घृणा आदि विकार आपके कीमती जीवन को कहीं चुरा न लें इसकी पहरेदारी आप अवश्य रखें। अपने मन को विकारों में गिरने के लिए कभी भी ढील न दें। पूज्यपाद लीलाशाह बापू की ‘मन को सीख’ पुस्तक बार-बार पढ़ें ताकि मन को नियंत्रण में रखा जा सके।

मन को नियंत्रण में रखें तथा बुद्धि को परमात्मा में लगायें तभी ईश्वरत्व में स्थिति हो सकती है। ईश्वरत्व में स्थिति के लिए अपनी बुद्धि को जगत के नश्वर पदार्थों से हटाकर अमर आत्मा में लगाना चाहिए। आत्मविषयिणी बुद्धि करनी चाहिए। आत्मा के विषय में ही बार-बार सुनें, उसी का मनन करें तथा खानपान और आचार-विचार में संयम रखें।

पुण्यपुंज होने से सत्संग की प्राप्ति होती है और सात्विक विवेक जगता है तभी परमात्मा को पाने की प्यास जगती है। जिसका आचरण ऊँचा है और पुण्य अधिक हैं उसे ही आत्मा- परमात्मा को जानने पाने की इच्छा होती है। दूसरों को तो सिर खपा-खपाकर उठाना पड़ता है। एक दो व्यक्ति नहीं, लाखों-लाखों व्यक्ति महापुरुषों के प्रयत्न से थोड़े ऊपर उठते हैं परन्तु जिनका स्वयं का प्रयत्न है, उनको महापुरुष मिलते हैं तो वे जल्दी ऊपर उठ जाते हैं। इसको आत्मविषयिणी बुद्धि बोलते हैं।

आत्मविषयिणी बुद्धि बनाना सबसे ऊँची बात है। ईश्वरीय अंश जगाना सबसे ऊँची बात है।

ईश्वरीय अंश जगता कैसे है पशुता कैसे मिटती है ?

मनुष्य की पशुता अपने-आप नहीं छूटती। जब वह अपने मन को सद्गुरु की आज्ञा में चलायेगा तब पशुता आसानी से छूटेगी। बच्चा बेवकूफी कब छोड़ता है ? जब शिक्षक के कहे अनुसार चलता है, तब उसकी बेवकूफी छूटती है और वह विद्वान बनता है। ऐसे ही शिष्य सद्गुरु की आज्ञा में चलता है, तब पशुता और मानवता को बाधित करके ईश्वरीय अंश जगा पाता है। इसीलिए कहा गया हैः

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परम मंगलम्।

गुरु की कृपा क्या अपने-आप आती है कि कुछ करना पड़ता है ?

अपने-आप क्या आयेगा ? जो होता है वह करने से ही होता है। साधक को चाहिए कि वह गुरु की आज्ञा के अनुसार साधन-भजन, जप-ध्यान, सेवा-सुमिरन आदि करे। गुरु की आज्ञा के अनुसार अपने को ढाले, इससे उसकी पशुता मिटेगी और ईश्वरीय अंश विकसित होगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2002, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 114

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सेठ की समझ


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

किसी सेठ ने एक महात्मा से कई बार  प्रार्थना की कि आप हमारे घर में अपने श्रीचरण घुमायें। आखिर एक दिन महात्मा जी ने कह दियाः

“चलो, तुम्हारी बात रख लेते हैं। फलानी तारीख को आयेंगे।”

सेठ जी बड़े प्रसन्न हो गये। बाबा जी आने वाले हैं इसलिए बड़ी तैयारियाँ की गयीं। बाबा जी के आने में केवल एक दिन ही बाकी था। सेठ ने अपने बड़े बेटे को फोन कियाः “बेटा ! अब तुम आ जाओ।’

बड़े बेटे ने कहाः “पिता जी ! मार्केट बड़ा टाइट है। मनी टाइट है। बैंक में बेलेन्स सेट करना है। पिता जी ! मैं अभी नहीं आ पाऊँगा।”

मझले बेटे ने भी कुछ ऐसा ही जवाब दिया। सेठ ने अपने छोटे बेटे को फोन किया तब उसने कहाः

“पिता जी ! काम तो बहुत हैं लेकिन सारे काम संसार के हैं। गुरु जी आ रहे हैं तो मैं अभी आया।”

छोटा बेटा पहुँच गया संत सेवा के लिए। उसने अन्न, वस्त्र, दक्षिणा आदि के द्वारा गुरुदेव का सत्कार किया और बड़े प्रेम से उनकी सेवा की। बाबा जी ने सेठ से पूछाः “सेठ ! तुम्हारे कितने बेटे हैं ?”

सेठः “एक बेटा है।”

बाबा जीः “मैंने तो सुना है कि आपके तीन बेटे हैं !”

सेठः “वे मेरे बेटे नहीं हैं। वे तो सुख के बेटे हैं, सुख के क्या वे तो मन के बेटे हैं। जो धर्म के काम में न आयें, संत-सेवा में बुलाने पर भी न आवें वे मेरे बेटे कैसे ? मेरा बेटा तो एक ही है जो सत्कर्म में उत्साह से लगता है।”

बाबा जीः “अच्छा, सेठ ! तुम्हारी उम्र कितनी है ?”

सेठः “दो साल, छः माह और सात दिन।”

बाबा जीः “इतने बड़े हो, तीन बेटों के बाप हो और उम्र केवल दो साल, छः माह और सात दिन !”

सेठः “बाबा जी ! जबसे हमने दीक्षा ली है, जप ध्यान करने लगे हैं, आपके बने हैं, तभी से हमारी सच्ची जिंदगी शुरु हुई है। नहीं तो उम्र ऐसे ही भोगों में नष्ट हो रही थी। जीवन तो तभी से शुरु हुआ जबसे संत-शरण मिली, जबसे सच्चे संत मिले। नहीं तो मर ही रहे थे, गुरुदेव ! मरने वाले शरीर को ही मैं मान रहे थे।”

बाबा जीः “अच्छा सेठ ! तुम्हारे पास कितनी सम्पत्ति है ?”

सेठः “मेरे पास सम्पत्ति कोई खास नहीं है। बस, इतने हजार हैं।”

बाबा जीः “लग तो तुम करोड़पति रहे हो ?”

सेठः “गुरुदेव ! यह सम्पत्ति तो इधर ही पड़ी रहेगी। जितनी सम्पत्ति आपकी सेवा में, आपके दैवी कार्य में लगायी उतनी ही मेरी है।”

कैसी बढ़िया समझ है सेठ की ! जिसके जीवन में सत्संग है, वही यह बात समझ सकता है। बाकी के लोग तो शरीर को ‘मैं’ मानकर, बेटों को मेरे मानकर तथा नश्वर धन को मेरी सम्पत्ति मानकर यूँ ही आयुष्य पूरी कर देते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2002, पृष्ठ संख्या 19, अंक 113

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श्रीमद् आद्यशंकराचार्य


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

(श्रीमद् आद्यशंकराचार्य जयंतीः 17 मई 2002)

जब-जब वसुधा पर धर्म का होने लगता ह्रास है।

तब-तब अवतरित हो संत-सुमन फैलाते धर्म-सुवास हैं।।

जब भारत में बौद्ध धर्म के अनुयायी वेदधर्म (सनातन धर्म) की निंदा कर समाज को पथभ्रष्ट करने में लगे थे तथा तांत्रिक और कापालिक समुदाय भी धर्म के नाम पर जनता को गुमराह कर रहे थे, ऐसे समय में पूरे भारत में पुनः सनातन धर्म की स्थापना करने के लिए जिन महापुरुष का आविर्भाव हुआ था, वे थे श्रीमद् आद्यशंकराचार्य।

शंकराचार्य जी ने 16 वर्ष की उम्र में ही समस्त वेद-वेदांगों का अध्ययन कर अन्य ग्रन्थों के अलावा ‘ब्रह्मसूत्र’ पर भी भाष्य की रचना कर दी थी और भारत के विभिन्न भागों में घूम-घूमकर शास्त्रार्थ में विभिन्न मतवादियों को परास्त करके पूरे भारत में सनातन धर्म का ध्वज फहरा दिया था।

श्री शंकराचार्य के यश, तेज और प्रभाव से तत्कालीन तांत्रिकों और कापालिकों का प्रभाव घटने लगा था। अतः वे शंकराचार्य से द्वेष करने लगे तथा उनकी हत्या करने का अवसर खोज रहे थे।

एक बार उग्रभैरव नामक कापालिक ने आद्य शंकराचार्य को एकांत में बैठे हुए देखा। वह कपटपूर्वक उनकी हत्या के उद्देश्य से आचार्य के पास गया और उनकी स्तुति करते हुए बोलाः

“इसी देह से कैलास जाने के लिए और वहाँ महादेव के साथ रमण करने के लिए मैंने कई वर्षों तक अत्यंत उग्र तपस्या की। मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव न कहाः

“यदि तुम मेरी प्रसन्नता के लिए किसी आत्मज्ञानी महापुरुष या किसी राजा के सिर का हवन करोगे तो अपने इच्छित पुरुषार्थ को अवश्य प्राप्त करोगे।”

उसी दिन से मैं सर्वज्ञ महापुरुष अथवा राजा के सिर की खोज में लगा हूँ। आज सौभाग्य से आपके दर्शन हो गये। अब लगता है कि मेरा मनोरथ अवश्य सिद्ध होगा।

आपने परोपकार के लिए शरीर धारण किया है, आप विरक्त हैं, देहाभिमान से शून्य हैं। अतः आप मेरा मनोरथ पूरा करें।”

शंकराचार्य ने कहाः

पतत्यवश्यं हि विकृष्यमाणं कालेन यत्नादपि रक्ष्यमाणम्।

वर्ष्मामुना सिध्यति चेत् परार्थः स एव मर्त्यस्य परः पुमर्थः।।

“यह शरीर यत्न से रक्षा किये जाने के बावजूद भी काल के द्वारा खींचे जाने पर एक दिन अवश्य नष्ट हो जाता है। यदि इस शरीर से किसी दूसरे का अर्थ सिद्ध हो जाय तो यह मनुष्य का बड़ा भारी पुरुषार्थ है। (श्रीशंकर दिग्विजय, सर्गः 11.26)

….किन्तु मेरे शिष्यों के सामने तुम मेरा सिर नहीं ले सकोगे। तुम कोई ऐसा समय और स्थान निश्चित करो कि जहाँ मेरे शिष्य न देख सकें।”

उग्रभैरवः “महाराज ! अमावस्या की रात को आप श्रीशैल पर्वत पर पधारिये। मैं आपको वहाँ ले जाऊँगा।”

शंकराचार्य जी नियत समय पर श्रीशैल पर्वत पर पहुँच गये। वह पर्वत उस समय कापालिकों का गढ़ था। वहाँ पहले से ही त्रिशूल-तलवार आदि तैयार रखे हुए थे।

कापालिक बोलाः “महाराज ! आप इस शिला पर बैठ जाइये। इस यज्ञकुण्ड में आपके सिर का होम कर दिया जायेगा और मेरा मनोरथ पूरा हो जायेगा।”

शंकराचार्यः “तनिक ठहरो। मैं जरा ध्यानस्थ हो जाऊँ। यह शरीर मैं नहीं हूँ, मन मैं नहीं हूँ, इन्द्रियाँ मैं नहीं हूँ, बुद्धि मैं नहीं हूँ। जन्म और मरण मैं नहीं हूँ। चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं…. की अनुभूति में मैं जरा समाधिस्थ हो जाऊँ। फिर तुम अपना काम कर लेना।”

शंकराचार्य समाधिस्थ हो गये अपने परमेश्वरीय स्वभाव में। वे परमेश्वर-स्वभाव में बैठ गये तो प्रकृति में उथल-पुथल मच गयी। शंकराचार्य जी के शिष्य पद्मपाद को स्वप्न आया जिसमें यह सारा दृश्य दिखायी पड़ा। दृश्य देखकर पद्मपाद ने अपने इष्टदेव नृसिंह भगवान से प्रार्थना कीः “मेरे गुरुदेव की रक्षा करें, प्रभो !”

भगवान नृसिंह का सूक्ष्म तत्व पद्मपाद में प्रविष्ट हो गया था वे गर्जना करते हुए उसी पर्वत की ओर भागे जहाँ कापालिक लोग तैयार थे। जिस तलवार से कापालिक शंकराचार्य जी का मस्तक काटना चाहता था, उसी तलवार से नृसिंह भगवान ने कापालिक का ही सिर काटकर यज्ञकुण्ड में होम कर दिया। फिर वे गर्जने लगे। उनकी गर्जना सुनकर शंकराचार्य जी की समाधि खुल गयी। आचार्य ने देखा कि पद्मपाद में तो नृसिंह भगवान का आवेश आया है। उन्होंने  प्रार्थना की तो नृसिंह भगवान शिष्य में से अंतर्धान हो गये और आचार्य कुशलक्षेम पूर्वक अपने निवास पर पहुँच गये।

जो अपने परमेश्वरीय स्वभाव में स्थित हैं ऐसे शंकराचार्य जी ने देखा कि कर्नाटक देश में तांत्रिक विद्या का बड़ा फैलाव हो गया है और दिव्य ब्रह्मज्ञान को छोड़कर लोग उसी में अपना जीवन तबाह कर रहे हैं। अतः आचार्य कर्नाटक देश जाने की तैयारी करने लगे। उस वक्त राजा सुधन्वा अपने सैनिकों सहित आचार्य के साथ ही थे।

कर्नाटक देश में आचार्य के पहुँचने पर कापालिकों का सरदार क्रकच उनसे मिलने आया तथा आचार्य को परास्त करना चाहा किन्तु वह घड़ी भर में ही शंकराचार्य जी से परास्त हो गया।

अपने अपमान से लज्जित होकर क्रकच ने कापालिकों के झुण्ड को लड़ने के लिए भेजा किन्तु राजा सुधन्वा तथा उनकी सेना के द्वारा सब कापालिक मारे गये। युद्ध में अपने अनुयायियों को नष्ट हुआ देखकर क्रकच का क्रोध और भड़का। उसने अपनी तांत्रिक विद्या से भैरव को प्रकट किया तथा भैरव से प्रार्थना कीः

“आपके भक्त से द्रोह करने वाले इस शंकर को दृष्टिमात्र से मार डालिये।”

यह सुनकर भैरव बोलेः “ये शंकर तो मेरे ही स्वरूप हैं। इनकी सत्ता से ही हम पूजे जाते हैं। क्या तुम मेरे ही स्वरूप से द्रोह करते हो ?” इतना कहकर भैरव ने क्रकच कापालिक का सिर काट डाला।

कितना विरोध हुआ आचार्य शंकर का ! यहाँ तक कि जब उन महापुरुष की माँ का देहान्त हुआ तब माँ को कंधा देने के लिए समाज का एक भी व्यक्ति उन्हें नहीं मिला !

अनेकों विरोधों के बावजूद भी आचार्य मानव-कल्याण के कार्यों में डटे रहे। सनातन धर्म की रक्षा में उन्होंने अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया। ऐसे महापुरुषों की करुणा-कृपा को याद करने वाले कहाँ ! जब ऐसे महापुरुष धरा पर विद्यमान होते हैं तब लोग उनका विरोध करते हैं और बाद में उन्हीं को भगवान मानकर पूजते हैं। कैसा दुर्भाग्य है समाज का !

काश ! ऐसे महापुरुषों की उपस्थिति काल में समाज उनसे पूर्ण लाभ उठाये तो कितना अच्छा हो ! गोरखनाथ ने कहा हैः

गोरख ! जागता नर सेविये….

16 वर्ष की नन्हीं सी उम्र में ही ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखने  वाले, पूरे भारत में वैदिक ज्ञान तथा सनातन ज्ञान का डंका बजाने वाले उन महापुरुष श्रीमद् आद्यशंकराचार्य के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2002, पृष्ठ संख्या 21,22 अंक 113

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