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भक्ति की महिमा


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

श्रीकृष्ण कहते हैं-

न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव।

न स्वाध्यायस्तपस्तयागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता।।

ʹउद्धव ! योग-साधन, ज्ञान-विज्ञान, धर्मानुष्ठान, जप-पाठ और तप-त्याग मुझे प्राप्त कराने में उतने समर्थ नहीं हैं जितनी दिनों-दिन बढ़ने  वाली अनन्य प्रेममयी मेरी भक्ति।ʹ (श्रीमद् भागवतः 11.14.20(

भले ही कोई धन-दौलत के अंबार पर खड़ा हो, बड़ा सत्ताधीश हो उसका हृदय तो तपता ही रहता है लेकिन जिसको भगवान की भक्ति का छोटा-सा भी सूत्र मिल जाता है, उसके हृदय में शांति होती है, शीतलता होती है, तृप्ति होती है।

अधिक धन मिलने से, बड़ी सत्ता मिलने से, अधिक अधिकार मिलने से कोई व्यक्ति सुखी हो जाये ऐसी बात नहीं है। धन, सत्ता व अधिकार के बिना भी यदि हृदय में भगवद् प्रीति हो, संतों के लिए प्रेम हो, सत्कर्म में रूचि हो और परमेश्वर को पाने की ललक हो तो वह व्यक्ति तो धन्य है ही, उसके माता-पिता धन्य हैं, उसका कुल धन्य है और वह जिस घऱ में रहता है वह धरती भी धन्य मानी जाती है।

भक्ति के बिना मनुष्य पशु से भी बदतर है। पशु को बेटे-बेटी की शादी की कोई चिंता नहीं होती, महँगाई की कोई चिंता नहीं होती, तबादले का कोई तनाव नहीं होता। ʹनो इन्कमटैक्सʹ…. ʹनो सेल्सटैक्सʹ… ʹनो सरचार्जʹ…. ʹनो अदर चार्जʹ…. उसे कोई चिन्ता नहीं होती, जबकि मनुष्य को ये सब चिंताएँ होती हैं।

गाय कभी गाली नहीं देती, हाथी कभी झूठ नहीं बोलता, पहाड़ कभी चोरी नहीं करता फिर वे वही के वहीं हैं। जबकि मनुष्य गाली भी देता है, झूठ भी बोलता है, चोरी भी करता है फिर भी सभी से ऊँचा माना जाता है क्योंकि वह चाहे तो जप-तप करके, साधन-भजन करके, सत्संग-स्वाध्याय करके महान भी बन सकता है।

मनुष्य के गिरने की नौबत आ जाती है लेकिन उसे सत्संग मिल जाये, संत-सान्निध्य मिल जाये तो वह इतना ऊँचा उठ जाता है कि भगवान का सखा बन जाता है, मित्र बन जाता है, सत्पुरुष भी बन जाता है। अरे ! भगवान का माई-बाप भी बन जाता है।

शास्त्र में आता हैः भजनस्य किं लक्षणम् ? भजन का लक्षण क्या है ?

भजनस्यं लक्षणम् रसनम्। अंतरात्मा का रस जिससे उभरे, उसका नाम है भजन।

वस्तु, व्यक्ति, भोग-सामग्री के बिना भी हृदय में जो आनंद आता है, रस आता है वह भजन का रस है। वस्तु के बिना, व्यक्ति के बिना, विशेष परिस्थिति के बिना ही आपके हृदय में अपने अंतर्यामी आत्मदेव का रस आने लगे तो समझना कि भजन हो रहा है।

ताल-लय के साथ राग अलापने का नाम भजन नहीं है, माला घुमाने का नाम भजन नहीं है लेकिन हृदय में अंतरात्मा का रस प्रगट हो जाये तो समझना कि भजन हो रहा है। फिर चाहे शबरी भीलन की भाँति प्रभु के लिए बुहारी करते हो तो भजन है, शिवाजी की तरह गुरुआज्ञा मानकर शत्रुओं से भिड़ते हो तो भी भजन है और हनुमान जी की नाँई प्रभुसेवा में लंका जला देते हो तो भी भजन है। बस, अंतःकरण से शुद्ध रस प्रगट हो जाये तो समझना कि हो गया भजन।

मनु महाराज कहते हैं किः “मनुष्य को तब तब सत्कर्म और निष्काम कर्म खोज-खोजकर करने चाहिए जब तक आत्मसंतोष न हो, आत्मरस न प्रगटे।”

जब आत्मरस प्रगट होता है तो भजन अपने आप हो जाता है, भक्त भगवद्-कृपा का अधिकारी हो जाता है। भगवान की कृपा के आगे दुनिया का पाप क्या महत्त्व रखता है ? ऐसा कौन-सा अपराध है जो भगवान की कृपा से बड़ा हो ? ऐसा कौन सा रोग है जो परमात्मा से बड़ा हो ? भगवान कहते हैं-

यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात्।

तथा मद्विषया भक्तिरूद्धवैनांसि कृत्स्नशः।।

ʹउद्धव ! जैसे धधकती हुई आग लकड़ियों के बड़े ढेर को जलाकर खाक कर देती है, वैसे ही मेरी भक्ति भी समस्त पाप-राशि को पूर्णतया जला डालती है।ʹ (श्रीमद् भागवतः 11.14.19)

भक्ति फलरूपा भी है, रसरूपा भी है। भक्ति रस भी देती है और मुक्ति का फल भी देती है। भक्ति करते समय भी रस आता है और अंत में फल भी भगवत्प्राप्ति का मिलता है।

कर्म में प्रतिवाद आये तो प्रायश्चित करना पड़ता है लेकिन भक्ति में प्रतिवाद का प्रायश्चित नहीं करना पड़ता है क्योंकि भगवान समझते हैं किः ʹबच्चा है, कोई बात नहीं। मुझे प्रेम करता है न !ʹ प्रेम में कोई नियम नहीं होता। बच्चे की नाक बहती है, वह गंदगी कर देता है फिर भी माँ समझती है कि ʹबच्चा है, अपना है।ʹ उसे प्रेम से उठाकर उसकी गंदगी साफ कर देती है। ऐसे ही भगवान के होकर जीते हैं तो भगवान भी कहते हैं- ʹचलो जाने दो अपना ही बालक है।ʹ

जिसके जीवन में क्रूरता नहीं है, हिंसा नहीं है, असहिष्णुता नहीं है, द्वेष नहीं है एवं भगवान के लिए प्रीति है, जो भगवान के प्रभाव को, दयालुता को, सर्वव्यापकता को जानता है और भगवान के अटल-अविनाशी नियम को मानता है उसके हृदय में स्वाभाविक ही प्रसन्नता, निःस्वार्थता, नम्रता, सरलता, परदुःखकातरता आदि सदगुण आ जाते हैं।

फलरूपा और रसरूपा भक्ति भगवदर ले आती है और जब भगवदरस आता है तब भगवान के गुण भी स्वाभाविक ही आ जाते हैं। जैसे, सूर्योदय से पहले आकाश में लालिमा छा जाती है फिर सूर्य उदय होता है, ऐसे ही भगवददर्शन के पहले हृदय में भक्ति आती है और भगवान के गुण भी आ जाते हैं। भक्त के जीवन में अमानीत्व आ जाता है। ऑफिस में चाहे कोई कितना भी बड़ा साहब होकर, कुर्सी पर बैठकर कार्य करे लेकिन संतों की सभा में जाकर वह भी सरलता से जमीन पर बैठता है। अमानीत्व, अदांभित्व, सरलता, विनम्रता, परदुःखकातरता आदि सदगुण सहज ही भक्त के जीवन में आ जाते हैं और इन सदगुणों का रस भी उसके जीवन में आ जाता है।

कबीरा आप ठगाइये, और न ठगिये कोई।

ʹआप ठगे सुख उपजे, और ठगे दुःख होई।।

भक्त को बाहर से भले थोड़ा घाटा पड़े, फिर भी वह भीतर से दूसरे का हित करता है। ऐसा करने से बाहर की वस्तु भले थोड़ी कम हो जाये लेकिन भीतर की जो खुशी मिलती है, भीतर का जो बल बढ़ता है और भीतर का जो आनंद आता है उसे भक्त ही जानता है।

जो भक्ति के रास्ते चलते हैं उऩकी कुटिलता हटती जाती है, सरलता बढ़ती जाती है, हिंसात्मक वृत्ति मिटती जाती है। अहिंसात्मक वृत्ति बढ़ती जाती है। हिंसा करना तमोगुण है, प्रतिहिंसा करना रजोगुण है, अहिंसा सत्त्वगुण है। भक्ति करने से सत्त्व गुण बढ़ता है।

भक्त कभी कभार जरूरत पड़ने पर प्रतिक्रिया करता भी है लेकिन हिंसा की वृत्ति से नहीं, वरन् सामने वाले की भलाई के लिए करता है ताकि उसकी गलती दूर हो और वह सत्य की ओर चल पड़े।

भक्ति में यह ताकत है कि वह जीव को संसारी विषय-विकारों के सुख में नहीं, वरन् आत्मा परमात्मा के सुख में पहुँचा देती है, परम सुखस्वरूप, परम रसस्वरूप परमात्मा के अनुभव में जगा देती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2000, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 95

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निर्वासनिक बनें….


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ʹश्रीयोगवाशिष्ठ महारामायणʹ में आता हैः

ʹहे राम जी ! बहुत शास्त्र और वेद मैं तुम्हें किसलिये सुनाऊँ और कहूँ ? वेदान्तशास्त्र का सिद्धान्त यही है कि किसी भी प्रकार से वासना से रहित हो, इसी का नाम मोक्ष है। वासनासहित का नाम बंधन है।

हे राम जी जो निर्वासनिक हुआ है, उसका दर्शन पाने की सभी इच्छा करते हैं और दर्शन करके प्रसन्न होते हैं। जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी खिल जाते हैं और उल्लास को प्राप्त होते हैं, वैसे ही उनका दर्शन करके सब आह्लादित होते हैं।ʹ

जो निर्वासनिक हो गये हैं एवं जिन्होंने अपना-आपा, अपना वास्तविक स्वरूप जान लिया है उनको देखकर सब आनंदित होते हैं, उल्लसित होते हैं।

जो समदर्शी पुरुष हैं, जिन्होंने भगवान के साथ अपनी एकता का अनुभव कर लिया है, जो ब्रह्मज्ञानी हो गये हैं, ऐसे महापुरुषों को देखकर संसार के लोग भी आध्यात्मिक होने लगते हैं।

नानक जी ने कहा हैः

ब्रहम गिआनी को खोजे महेशवरु। ब्रहम गिआनी आप परमेश्वरू।।

ब्रहम गिआनी का कथिया न जाइ आधा अख्खर। ब्रहम गिआनी सरब का ठाकरू।।

जो ईश्वर को समर्पित होकर कर्म करता है उसको ईश्वर की प्रीति प्राप्त होती है और धीरे-धीरे ईश्वरत्व का ज्ञान हो जाता है। फिर उसको पता चलता है कि कई जन्मों तक संसार के लिए कर्म करता रहा – पति के लिए, पत्नी के लिए, पुत्र के लिए, अपने शरीरादि के लिए… किन्तु किया कराया सब मृत्यु की झपेट में चौपट होता रहा। ʹलखपति करोड़पति….ʹ होकर आनंद ले लिया, आखिर क्या ? जब तक अपने असली आनंद को नहीं जाना तब तक कितनी भी गाड़ियों में घूमे, कितना ही धन इकट्ठा कर लिया, आखिर क्या ?

जिसका कर्म शुभ होता है, दान-पुण्य, जप-ध्यान, सेवा-साधना में जिसकी रूचि होती है उसकी बुद्धि शुद्ध होने लगती है एवं बुद्धि शुद्ध होते-होते वह आत्मा-परमात्मा को जानने में सफल हो जाता है, जीवन्मुक्त हो जाता है। ऐसे पुरुष को देखकर संसारी लोग आह्लादित होते हैं, आनंदित होते हैं, उनसे सत्प्रेरणा पाते हैं एवं अपना जीवन धन्य बना लेते हैं।

यदि अपने आत्मतत्त्व को नहीं जाना तो बाकी का सब तो यहीं छोड़कर जाना है। कोई ज्यादा कमायेगा तो ज्यादा छोड़कर मरेगा, कोई कम कमायेगा तो कम छोड़कर मरेगा, लेकर तो कोई भी नहीं जायेगा। अतः मिले तो आत्म तत्त्व का ज्ञान मिले जो कभी बिछुड़ता नहीं है।

जेकर मिले त राम मिले, ब्यो सब मिल्यो त छा थ्यो ?

दुनिया में दिल जो मतलब, पूरो थियो त छा थ्यो ?

संसार की आसक्ति जितनी-जितनी मिटेगी और भगवान की प्रीति जितनी-जितनी बढ़ेगी, उतना-उतना मानव भीतर से महान होगा। जितनी-जितनी आसक्ति बढ़ेगी, उतना-उतना वह भीतर से साधारण होता जायेगा। फिर उसकी आवश्यकताएँ बढ़ जायेंगी और उसे डर भी ज्यादा लगेगा। जितनी संसार की वासना ज्यादा, उतना भीतर से डरपोक रहेगा और जितने ईश्वर की प्रीति ज्यादा, उतना भीतर से निर्भय़ रहेगा। जितना संसार से प्रेम करेगा, उतना भीतर से कमजोर होता जायेगा और जितना ईश्वर से प्रेम करेगा उतना भीतर से मजबूत होता जायेगा। अतः ऐसा प्रयत्न करें कि संसार की वासना कम हो जाये और भगवान की प्रीति बढ़ जाये।

वशिष्ठजी महाराज कहते हैं- “हे राम जी ! निर्वासनिक पुरुष उस सुख को प्राप्त होता है। जिस सुख में त्रिलोकी के सारे सुख तृणवत भासते हैं। हे राम जी ! जो पुरुष निर्वासनिक हुआ है, उसको सारी पृथ्वी गोपद के समान तुच्छ भासती है, मेरू पर्वत एक टूटे हुए वृक्ष के समान भासती है क्योंकि वह उत्तम पद को प्राप्त हुआ है। उसने जगत को तृणवत जानकर त्याग दिया है और वह सदा आत्मतत्त्व में स्थित है, उसको फिर किस की उपमा दीजिये ?”

जो आत्मतत्त्व में स्थित हैं उनको किसकी उपमा दें ? तस्य तुलना केन जायते…. अपने आत्मा-परमात्मा का चिंतन एवं ध्यान करके, गुरुकृपा से जो जाग गये हैं उनके सुख और उनकी अनुभूति की तुलना किससे करोगे ?

“हे राम जी ! व्यवहार तो उसका भी अज्ञानी की नाईं ही दिखता है परन्तु हृदय से वह अदभुत पद में स्थित रहता है और कभी-भी उससे नहीं गिरता है।”

ऐसे निर्वासनिक महापुरुषों की महिमा तो श्रीकृष्ण भी गाते हैं, श्रीरामजी भी गाते हैं, वशिष्ठजी भी गाते हैं। शास्त्र एवं उपनिषद भी ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की महिमा से भरे हुए हैं।

वह शास्त्र, शास्त्र ही नहीं है जिसमें ब्रह्मज्ञान की महिमा नहीं है। वह तो केवल संसारी किताब है। कोई भी शास्त्र हो, उसमें ब्रह्मज्ञान की एवं ब्रह्मज्ञान को पाये हुए महापुरुष की महिमा अवश्य होगी – चाहे रामायण हो चाहे गीता हो, चाहे पुराण हों चाहे वेद हों। सब ब्रह्मज्ञान की महिमा से युक्त हैं और ब्रह्मज्ञान का विलक्षण आनंद प्रगट होता है, वासनाक्षय, मनोनाश और परमात्मा को अपने आत्मरूप में जानने से।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2000, पृष्ठ संख्या 10, 11 अंक 95

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ʹगहना कर्मणो गतिःʹ


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

कर्म की गति बड़ी गहन है।

गहना कर्मणो गतिः।

कर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए, अकर्म का तत्त्व भी जानना चाहिए। कर्म ऐसे करें कि कर्म दुष्कर्म न बनें, बंधनकारक न बनें, वरन् ऐसे कर्म करें कि कर्म विकर्म में बदल जायें, कर्त्ता अकर्त्ता हो जाये और वह अपने परमात्म-पद को पा ले।

अमदावाद में वासणा नामक एक इलाका है। वहाँ एक कार्यपालक इंजीनियर रहता था जो नहर का कार्यभार सँभालता था। वही आदेश देता था कि किस क्षेत्र में पानी देना है।

एक बार एक किसान ने उसे 100-100 रूपयों की दस नोटें एक लिफाफे में देते हुए कहाः “साहब ! कुछ भी हो, पर फलाने व्यक्ति को पानी न मिले। मेरा इतना काम आप कर दीजिये।”

साहब ने सोचा किः “हजार रूपये मेरे भाग्य में आने वाले हैं इसीलिए यह दे रहा है। किन्तु गलत ढंग से रुपये लेकर मैं क्यों कर्मबन्धन में पड़ूँ ? हजार रुपये आने वाले होंगे तो कैसे भी करके आ जायेंगे। मैं गलत कर्म करके हजार रूपये क्यों लूँ ? मेरे अच्छे कर्मों से अपने-आप रूपये आ जायेंगे।ʹ अतः उसने हजार रूपये उस किसान को लौटा दिये।

कुछ महीनों के बाद इंजीनियर एक बार मुंबई से लौट रहा था। मुंबई से एक व्यापारी का लड़का भी उसके साथ बैठा। वह लड़का सूरत आकर जल्दबाजी में उतर गया और अपनी अटैची गाड़ी में ही भूल गया। वह इंजीनियर समझ गया कि अटैची उसी लड़के की है। अमदावाद रेलवे स्टेशन पर गाड़ी रूकी। अटैची पड़ी थी लावारिस… उस इंजीनियर ने अटैची उठा ली और घर ले जाकर खोली। उसमें से पता और टैलिफोन नंबर लिया।

इधर सूरत में व्यापारी का लड़का बड़ा परेशान हो रहा था किः “हीरे के व्यापारी के इतने रूपये थे, इतने लाख का कच्चा माल भी था। किसको बतायें ? बतायेंगे तब भी मुसीबत होगी।” दूसरे दिन सुबह-सुबह फोन आया किः “आपकी अटैची ट्रेन में रह गयी थी जिसे मैं ले आया हूँ और मेरा यह पता है, आप इसे ले जाइये।”

बाप-बेटे गाड़ी लेकर वासणा पहुँचे और साहब के बँगले पर पहुँचकर उन्होंने पूछाः “साहब ! आपका फोन आया था ?”

साहबः “आप तसल्ली रखें। आपके सभी सामान सुरक्षित हैं।”

साहब ने अटैची दी। व्यापारी ने देखा कि अंदर सभी माल-सामान एवं रुपये ज्यों-के-त्यों हैं। ʹये साहब नहीं, भगवान हैं….ʹ ऐसा सोचकर उसकी आँखों में आँसू आ गये, उसका दिल भर आया। उसने कोरे लिफाफे में कुछ रुपये रखे और साहब के पैरों पर रखकर हाथ जोड़ते हुए बोलाः

“साहब ! फूल नहीं तो फूल की पंखुड़ी ही सही, हमारी इतनी सेवा जरूर स्वीकार करना।”

साहबः “एक हजार रूपये रखे हैं न ?”

व्यापारीः “साहब ! आपको कैसे पता चला कि एक हजार रूपये हैं ?”

साहबः “एक हजार रूपये मुझे मिल रहे थे बुरा कर्म करने के लिए। किन्तु मैंने वह बुरा कार्य नहीं किया यह सोचकर कि यदि हजार रूपये मेरे भाग्य में होंगे तो कैसे भी करके आयेंगे।”

व्यापारीः “साहब ! आप ठीक कहते हैं। इसमें हजार रूपये ही हैं।”

जो लोग टेढ़े-मेढ़े रास्ते से कुछ लेते हैं वे तो दुष्कर्म कर पाप कमा लेते हैं लेकिन जो धीरज रखते हैं वे ईमानादारी से उतना ही पा लेते हैं जितना उनके भाग्य में होता है।

श्रीकृष्ण कहते हैं- गहना कर्मणो गतिः।

एक जाने माने साधु ने मुझे यह घटना सुनायी थीः

बापू जीः यहाँ गया जी में एक बड़े अच्छे जाने माने पंडित रहते थे। एक बार नेपाल नरेश साधारण गरीब मारवाड़ी जैसे कपड़े पहन कर  पंडितों के पीछे भटका किः ʹमेरे दादा का पिण्डदान करवा दो। मेरे पास पैसे बिल्कुल नहीं हैं। हाँ, थोड़े से लड्डू लाया हूँ, वही दक्षिणा में दे सकूँगा।

जो लोभी पंडित थे उन्होंने तो इन्कार कर दिया लेकिन यहाँ का जो जाना-माना पंडित था उसने कहाः “भाई ! पैसे की तो कोई बात ही नहीं है। मैं पिण्डदान करवा देता हूँ।”

फटे-चिथड़े कपड़े पहनकर गरीब मारवाड़ी के वेश में छुपे हुए नेपाल नरेश के दादा का पिण्डदान करवा दिया उस पंडित ने। पिण्डदान सम्पन्न होने के बाद उस नरेश ने कहाः

“पंडित जी ! पिण्डदान करवाने के बाद कुछ न कुछ दक्षिणा तो देनी चाहिए। मैं कुछ लड्डू लाया हूँ। मैं चला जाऊँ उसके बाद यह गठरी आप ही खोलेंगे, इतना वचन दे दीजिये।”

“अच्छा भाई ! तू गरीब है। तेरे लड्डू मैं खा लूँगा। वचन देता हूँ कि गठरी भी मैं ही खोलूँगा।”

गरीब जैसे वेश में छुपा हुआ नेपाल नरेश चला गया। पंडित ने गठरी खोली तो उसमें से एक-एक किलो के सोने के उन्नीस लड्डू निकले !

वे पंडित अपने जीवन काल में बड़े-बड़े धर्मकार्य करते रहे लेकिन वे सोने के लड्डू खर्च में आयें ही नहीं।

जो अच्छा कार्य करता है उसके पास अच्छे काम के लिए कहीं-न-कहीं से धन, वस्तुएँ अनायास आ ही जाती हैं। अतः उन्नीस किलो के सोने के लड्डू  ऐसे ही पड़े रहे।

जब-जब हम कर्म करें तो कर्म को विकर्म में बदल दें अर्थात् कर्म का फल ईश्वर को अर्पित कर दें अथवा कर्म में से कर्त्तापन हटा दें तो कर्म करते हुए भी हो गया विकर्म। कर्म तो किये लेकिन कर्म का बंधन नहीं रहा।

संसारी आदमी कर्म को बंधनकारक बना देता है, साधक कर्म को विकर्म बनाता है लेकिन सिद्ध पुरुष कर्म को अकर्म बना देते हैं। रामजी युद्ध जैसा घोर कर्म करते हैं लेकिन अपनी ओर से युद्ध नहीं करते, रावण आमंत्रित करता है तब करते हैं। अतः उनका युद्ध जैसा घोर कर्म भी अकर्म में परिणत हो जाता है। आप भी कर्म करें तो अकर्ता होकर करें, न कि कर्त्ता होकर। कर्त्ता भाव से किया गया कर्म बंधन में डाल देता है एवं उसका फल भोगना ही पड़ता है।

राजस्थान में सुजानगढ़ के ढोंगरा गाँव की घटना हैः

एक बकरे को देखकर ठकुराइन के मुँह में पानी आ गया एवं बोलीः “देखो जी ! यह बकरा कितना हृष्ट-पुष्ट है !”

बकरा पहुँच गया ठाकुर किशन सिंह के घर एवं हलाल होकर उसे पेट में भी पहुँच गया।

बारह महीने के बाद ठाकुर किशन सिंह के घर बेटे का जन्म हुआ। बेटे का नाम बाल सिंह रखा गया। बाल सिंह तेरह साल का हुआ तो उसकी मँगनी भी हो गयी एवं चौदहवाँ पूरा होते-होते शादी की तैयारी भी हो गयी।

शादी के वक्त ब्राह्मण ने गणेश-पूजन के लिए उसको बिठाया किन्तु यह क्या ! ब्राह्मण विधि शुरु करे उसके पहले ही लड़के ने पैर पसारे और लेट गया। ब्राह्मण ने पूछाः

“क्या हुआ….. क्या हुआ ?”

कोई जवाब नहीं। माँ रोयी, बाप रोया। अड़ोस-पड़ोस के लोग आये, सारे बाराती इकट्ठे हो गये। पूछने लगे किः “क्या हुआ ?”

लड़काः “कुछ नहीं हुआ है। अब तुम्हारा-मेरा लेखा-जोखा पूरा हो गया है।”

पिताः “वह कैसे, बेटा ?”

लड़काः “बकरियों को गर्भाधान कराने के लिए उदरासर के चारण कुँअरदान ने जो बकरा छोड़ रखा था, वही बकरा तुम ठकुराइन के कहने पर उठा लाये थे। वही बकरा तुम्हारे पेट में पहुँचा और समय पाकर तुम्हारा बेटा होकर पैदा हुआ। वह बेटा लेना-देना पूरा करके अब जा रहा है। राम-राम….”

बकरे की काया से आया हुआ बाल सिंह तो रवाना हो गया किन्तु किशन सिंह सिर कूटते रह गये।

तुलसीदास जी कहते हैं-

करम प्रधान बिस्व करि राखा।

जो जस करइ सो तस फलु चाखा।।

(श्रीरामचरित. अयो. 298.2)

बुरा कर्म करते समय तो आदमी कर डालता है लेकिन बाद में उसका कितना भयंकर परिणाम आता है इसका पता ही नहीं चलता उस बेचारे को।

जैसे चौदह साल के बाद भी दुष्कृत्य कर्त्ता को फल दे देता है, ऐसे ही सुकृत भी भगवद् प्रीत्यर्थ कर्म करने वाले कर्त्ता के अन्तःकरण को भगवद् ज्ञान, भगवद् आनंद एवं भगवद् जिज्ञासा से भरकर भगवान का साक्षात्कार करा देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2000, पृष्ठ संख्या 12-14, अंक 95

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