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आखिरी बात


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

एक बार एक ब्रह्मवेत्ता महापुरुष को उनके शिष्य समुदाय ने घेर लिया एवं प्रार्थना कीः “गुरुजी ! हम सब आपके दर्शन तो कई बार करते हैं और अब हमें प्रभु के दर्शन करना चाहिए, प्रभुतत्त्व का साक्षात्कार करना चाहिए-यह सब भी हम समझते हैं, मानते हैं। अतः गुरुजी ! अब एक बार आप हमें आखिरी बात सुनाने की कृपा कर दीजिये।”

गुरुः “हम तो ढूँढते ही रहते हैं कि आखिरी बात सुनने वाला कोई मिल जाए। लगता है तुम लोगों को भगवान ने ही भेजा है।”

शिष्यः “गुरुजी ! अब आप आखिरी बात सुना ही दीजिये।”

गुरुः “जिस किसी को भी आखिरी बात सुननी है, वह मेरे जन्मदिन पर आ जाये।”

शिष्यः “किस जन्मदिन पर ?”

गुरुः “जिस दिन मेरे गुरु ने मुझे आत्म-साक्षात्कार कराया था, जिस दिन गुरूरूप में मेरा जन्म हुआ था, उस दिन तुम लोग आ जाना।”

चारों तरफ खबर फैल गयी कि अपने आत्म-साक्षात्कार के दिन गुरु जी आखिरी बात बताने वाले हैं। अतः दूर दराज से लोग गुरु आश्रम में एकत्रित होने लगे। कई विद्वान, पंडित एंव शास्त्रज्ञ लोग भी आये। इस प्रकार वहाँ बड़ी भीड़ जमा हो गयी। बड़े-बड़े मण्डप बन गये। किन्तु उन महापुरुष को मानो, इन सबसे कोई लेना देना ही नहीं था। वे तो अपनी कुटिया से सहज स्वाभाविक मस्ती में बाहर निकले।

सदगुरु महाराज की जय….

इस जयघोष से गगनमंडल गूँज उठा। जयघोष के बाद दो चार प्रतिनिधि साधकों ने आगे बढ़कर कहाः “गुरुजी ! आज वही दिन है, जिस दिन आप आखिरी बात सुनाने वाले हैं।”

गुरुजीः “ठीक है। अच्छा हुआ, मुझे याद दिला दिया। आज आखिरी बात सुनानी है। सब लोग तैयार होकर बैठ जाओ।”

सब लोग शांत होकर बैठ गये ताकि गुरुजी की आखिरी बात का एक शब्द भी कहीं छूट न जाये। आज तो मानो, कानों को भी आँखें फूट निकलीं कि हम सुनेंगे भी और देखेंगे भी। मानो, आँखों को कान फूट निकले कि हम निहारेंगे भी और सुनेंगे भी।

इतने में वे महापुरुष मंच पर आये और सो गये। दस…. बीस…. तीस… चालीस…. पचास मिनट हो गये, घण्टा… दो घण्टा हो गये… शिष्यों ने सोचा किः ʹपता नहीं, गुरु जी को क्या हो गया है ?ʹ लल्लू पंजू शिष्य तो रवाना हो गये लेकिन जो जिज्ञासु थे उन्होंने सोचा किः “बैठे बैठे तो गुरु जी को कई बार सुना है, आज वे लेट गये हैं तो लेटे लेटे ही कुछ न कुछ कहेंगे।ʹ

इस प्रकार सब अपनी अपनी मति एवं भावना के अनुसार विचारने लगे। फिर उनमें से भी कुछ लोग ऊबकर चले गये।

इस प्रकार लगभग चार घण्टे व्यतीत हो गये। अब कुछ गिने गिनाये लोग ही बचे। तब गुरु जी उठे। उन्हें उठा हुआ देखकर प्रतिनिधि शिष्यों ने कहाः “गुरुजी ! आज तो आपने बहुत देर तक आराम किया। अब तो चारों ओर लोग आपकी और हमारी मखौल उड़ायेंगे कि ʹअच्छी आखिरी बात सुनायी….ʹ गुरु जी ! आपने तो कुछ सुनाया ही नहीं, वरन् आराम करने लगे। आप कुटिया में आराम कर लेते। इधर लोगों के सामने मंच पर….? गुरु जी ! आपने यह क्या किया ?”

गुरुजीः “मैं सोया नहीं था।”

शिष्यः “आप सोये नहीं थे ?”

गुरुजीः “नहीं। तुम लोगों ने आखिरी बात सुनाने के लिए कहा था न ? मैंने वही आखिरी उपदेश दिया था। आत्म-साक्षात्कार कैसा होता है, यही मैंने बताया।

गहरी नींद में क्या होता है ? क्या उस वक्त पता चलता है कि ʹमैं हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई पारसी, गुजराती, पंजाबी या सिंधी हूँ ?ʹ अथवा ʹकुछ है…. कुछ खोया है?ʹ या फिर ʹकुछ लेना है…. कुछ देना है….ʹ आदि ? नहीं। गहरी नींद में कुछ पता नहीं चलता, उस वक्त कोई स्फुरणा नहीं होती। ऐसे ही आत्म-साक्षात्कार का भी मतलब है कि चित्त में कोई स्फुरणा न हो। ज्ञानी के सब काम निःस्फुरण, निःसंकल्प एवं कर्त्तृत्वभाव से रहित होते हैं। अभी तक मैं यह बात सैद्धान्तिक तौर पर तो बोल ही रहा था किन्तु तुमने सुना नहीं, अतः आज मैंने प्रयोग करके बताया।”

शिष्यः “गुरुजी ! क्या आत्म-साक्षात्कार सचमुच ऐसा ही होता है ?”

गुरुजीः “हाँ सचमुच में, झूठमूठ में नहीं। जब आत्म-साक्षात्कार करना हो तो उठो… जागो…. अपने-आपसे पूछो किः “मैं कौन हूँ ?ʹ अपने आपको खोजो। खोजते समय जो कुछ तुम्हारे देखने में आता जाये, उसको हटाते जाओ। जैसे, यह भी नहीं….. यह भी नहीं…. मैं हाथ भी नहीं… पैर भी नहीं…. हाथ और पैरों को क्रिया करने की प्रेरणा देने वाला मन भी नहीं… मन को चलाने वाला प्राण भी नहीं… प्राण को चलाने वाली चिदावली भी नहीं…. इस प्रकार सूक्ष्म दृष्टि से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि को हटाते-हटाते जब तुम्हारी वृत्ति सूक्ष्म हो जायेगी, तब मौन को उपलब्ध हो जाओगे।

जैसे, अन्धेरे कमरे में पड़ी हुई किसी वस्तु को देखना है तो दीया, टॉर्च आदि काम आता है किन्तु वही दीया जब सूर्य के सामने रखा जाता है तो उसका प्रकाश सूर्य के प्रकाश में समा जाता है। ऐसे ही व्यवहार-काल में, लेन-देन में, इधर-उधर के प्रसंगों में अथवा परमात्मा की खोज में मन-बुद्धि काम तो आते हैं किन्तु जब वे परमात्मप्रकाश में आ जाते हैं तो उनका यानी मन-बुद्धि का, टिमटिमाते दीये जैसा प्रकाश परमात्मा के प्रकाश में लीन हो जाता है। वे अंतर्मुख हो जाते हैं… शुद्ध हो जाते हैं।

मन-बुद्धि से तुम जगत को जान सकते हो, परमात्मा को नहीं। फिर भी मन-बुद्धि ज्यों-ज्यों परमात्मा के अभिमुख होते जाते हैं, त्यों-त्यों परमात्मा में तदाकार होते जाते हैं। जैसे, नमक की पुतली सागर की थाह पाने जाये तो स्वयं सागर में ही समा जायेगी। फिर उसका अपना अलग से अस्तित्व नहीं रह जायेगा। ऐसे ही जब बुद्धि परमात्मा में स्थिर हो जाती है तो फिर वह बुद्धि, बुद्धि नहीं रहती, ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाती है।

महापुरुष जब परमात्मा में डुबकी लगाकर कोई कार्य करते हैं, तब लोगों को लगता है कि उनके मन-बुद्धि एवं इन्द्रियों से कार्य हो रहा है। स्वयं महापुरुषों को कभी नहीं लगता कि ʹये मन, बुद्धि एवं इन्द्रियाँ हैं।ʹ वे तो सदैव एक चैतन्य का अनुभव करते हैं…. फिर भी यह बात वाणी से नहीं कही जा रही है। अन्यथा उस अनुभव के आगे तो वाणी भी अधूरी है। नानक जी ने कहा हैः

मत करो वर्णन हर बेअंत है। क्या जाने वो कैसो है ?

फिर भी उसके इर्द-गिर्द की बातें सुनने से जो पुण्य होता है वह पुण्य न तो तप करने से होता है, न यज्ञ करने से चऔर न ही चांद्रायण व्रत करने से। इसीलिए बड़े-बड़े तपस्वी, यति-योगी, संन्यासी आदि भी सत्संग के अभाव में कई बार आत्म-साक्षात्कार की बात से चूक जाते हैं।

संत निश्चलदासजी ने ʹविचारसागरʹ नाम का एक ग्रन्थ लिखा है। उसमें आत्म-साक्षात्कार से संबंधितच बातें भरी हुई हैं। एक दिन संत निश्चलदासजी ने कुछ साधुओं से कहाः “सुबह पाँच बजे के समय बुद्धि सात्त्विक रहती है। वह समय ध्यान-भजन के लिए भी उपयुक्त रहता है। यदि तुम लोग चाहो तो उस समय तुम्हें ʹविचार सागरʹ पढ़ाऊँगा।”

उनके पास अनेकों साधु आते थे। ʹविचार सागरʹ का सत्संग एक दिन… दो दिन…. तीन दिन…. चार दिन… चला। फिर एक-एक करके साधु कम होने लगे। ज्यों-ज्यों संत गहरी बात सुनाते गये, त्यों-त्यों लोग ऊबते गये। आखिरकार धीरे-धीरे सब साधु भाग गये क्योंकि मन को रूखा लगता था न !

मन को थोड़ा मनोरंजन चाहिए। इन्द्रियों को भी इन्द्रियविषयक भोगों का त्याग करते-करते, मन का त्याग करते-करते जब पूर्ण त्याग की घड़ियाँ आती हैं तब आत्म-साक्षात्कार हो जाता है। जैसे लोहे के टुकड़े को एक बार पारस का स्पर्श करा दो तो फिर उसे कीचड़ में रखने पर भी जंग नहीं लगता, ऐसे ही मन बुद्धि को परमात्मतत्त्व का एक बार अनुभव हो जाये, तो फिर उनमें जगत की सत्यता नहीं टिकती।

फिर वह पुरुष व्यवहार करता हुआ तो दिखेगा लेकिन उसका व्यवहार दिखने मात्र का होगा। जैसे भुना हुआ बीज और कच्चा बीज, दोनों दिखते तो एक जैसे हैं लेकिन कच्चा बीज, दोनों दिखते तो एक जैसे हैं लेकिन कच्चा बीज दूसरे बीज उत्पन्न करने की क्षमता रखता है जबकि भुना हुआ बीज दिखने मात्र का होता है, वह अपनी वंश परंपरा नहीं चला सकता। ऐसे ही मन जब ब्रह्मविद्या में भुना जाता है, तो उस मन से प्रारब्धवेग से थोड़ा-बहुत सांसारिक व्यवहार होता है लेकिन वह दूसरे कर्मों की जाल उत्पन्न नहीं करता। उसका जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। इसीलिए कबीर जी कहते हैं-

मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब छूट।

गगनमंडल में घर किया, काल रहा सिर कूट।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1999, पृष्ठ संख्या 2-4, अंक 77

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संत महिमा


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

गुजरात में नड़ियाद के पास पेटलाद नामक ग्राम में रमणलाल नाम के एक धर्मात्मा सेठ रहते थे। वे चाहते थे क हमारे पेटलाद में शराब की बोतलें नहीं अपितु हरिनाम की, हरिरस की प्यालियाँ बँटे। साधु संतों के प्रति उनका बड़ा झुकाव था।

अति पापियों को तो संत-दर्शन की रुचि भी नहीं होती। जिसके पाप नष्ट होते हैं, उसी की श्रद्धा साधु-संतों में टिकती है। अगर कोई कुकर्म करता है तो उसके पाप जोर पकड़ते हैं एवं वह साधु-संतों का विरोधी हो जाता है।

किसी आदमी के कुल का विनाश होगा या विकास होगा – यह जानना हो तो देखो कि उस आदमी को साधु-संतों के प्रति श्रद्धा है या उनकी निंदा करता है ? उस आदमी के विचार ऊँचे हैं या हल्के हैं ?

मुझे भविष्य में सुख मिलेगा कि दुःख – यह मैं अभी जान सकता हूँ। अगर मेरे मन में कुकर्म के विचार आ रहे हैं, परदोष दर्शन हो रहा है, दूसरे को गिराकर, छल-कपट करके ऊँचा होना चाहता हूँ तो मेरे भविष्य में अशांति और दुःख लिखा है। अगर मैं दूसरे की भलाई चाहता हूँ, कष्ट सहकर भी परोपकार करना चाहता हूँ तो मेरा भविष्य उज्जवल है।

अगर मन में बुरे विचार आते हैं तो हमारा कर्त्तव्य है कि उन्हें काट दें। जो व्यक्ति अपने-आपको नहीं संभालता है, उसको देवता भी कब तक संभालेंगे ? भगवान भी कब तक संभालेंगे ?

हिम्मते बंदा तो मददे खुदा। बेहिम्मत बंदा तो बेज़ार खुदा।।

सत्कर्म करने में हिम्मत करनी चाहिए। मन तो धोखा देगा कि ʹअपना क्या…. अपना क्या ? अरे ! अपने पेट के लिए, अपने परिवार के लिए तो कुत्ता भी जी लेता है लेकिन जो रब के लिए, समाज की आध्यात्मकि उन्नति के लिए जीते हैं, उनका जीवन धन्य हो जाता है।

रमणलाल ऐसे ही पुण्यात्मा सेठ थे। गाँव में साधु-संतों को बुलाकर, उनका बड़ा आदर-सत्कार करते थे। भगवत्परायण साधु-संतों को सदगुरु मानकर उनके आश्रम में स्वयं भी यदा-कदा जाया करते एवं जहाँ जाकर चुपचाप सेवा करते थे।

संतों का हृदय ही ऐसा होता है कि वे किसी की सेवा नहीं लेते हैं और यदि लेते भी हैं तोत उसका कल्याण करने के लिए लेते हैं।

संत की महिमा वेद न जाने। जेता जाने तेता बखाने।।

एक संत हजारों असंतों को संत बना सकते हैं लेकिन हजारों संसारी मिलकर भी एक संत नहीं बना सकते। संत बनना कोई मजाक की बात नहीं है। एक नेता जाता है तो उसकी कुर्सी पर दस आ जाते हैं लेकिन भारत में दस ब्रह्मज्ञानी संत इस संसार से चले और एक भी उनकी जगह पर नहीं आया।

एक संत कइयों की डूबती नैया को पार लगा सकते हैं, कई पापियों को पुण्यात्मा बना सकते हैं, कई अभागियों को भाग्यवान बना सकते हैं, कई नास्तिकों को आस्तिक बना सकते हैं, अभक्तों को भक्त बना सकते हैं, अशांतों को शांत बना सकते हैं और शांत में शांतानंद प्रगट कराके उसको मुक्त महात्मा बना सकते हैं।

राजा सुषेण नाव में यात्रा करते-करते कहीं जा रहे थे। मार्ग में आँधी तूफान आने की वजह से उनकी नाव खतरे में पड़ गयी, जिससे उनकी पत्नी, उनके इकलौते पुत्र, उनके स्वयं के तथा एक महात्मा के प्राण संकट में पड़ गये।

यह देखकर राजा सुषेण पुकार उठेः “बचाओઽઽઽ ! और किसी को भले नहीं, लेकिन इन महात्मा जी को बचा लो….”

वे एक बार भी यह नहीं बोले कि ʹरानी को बचाओ…. पुत्र को बचाओ…. मुझे बचाओ…..ʹ नहीं नहीं। उन्होंने तो बस, रट लगा  दी कि ʹबाबाजी को बचाओ…. बाबा जी को बचाओ….ʹ

बड़ी मुश्किल से, दैवयोग से नाव किनारे लगी। राजा के जी-में-जी आया। किनारे पर उतरकर मल्लाह ने कहाः “राजन ! आपने एक बार भी नहीं कहा कि मुझे बचाओ, रानी को बचाओ, राजकुमार को बचाओ। बस, बाबाजी को बचाओ, ऐसा क्यों ?”

राजाः “ऐसा बेटा तो दूसरा भी आ सकता है। रानियाँ भी कई आती और जाती हैं। मेरे जैसे राजा भी कई हैं। मेरे मर जाने के बाद दूसरा गद्दी पर आ जायेगा लेकिन ये हजारों के दिल की गद्दी पर दिलबर को बैठाने वाले संत बड़ी मुश्किल से आते हैं इसलिए ये बच गये तो समझो, सब बच गये। इनकी सेवा हो गयी तो समझो, सबकी सेवा हो गयी।”

सेठ रमणलाल भी इसी भाव के अनुसार अपनी संपत्ति को संतसेवा में लगा देते। लोग उन्हें कहते कि ʹकुछ हमारा पैसा भी स्वीकार कर लेंʹ तो वे कहतेः “अभी नहीं, भाई ! दान के पैसे हैं लोहे के चने। इसका सदुपयोग करेंगे तो कुल आबाद होगा, नहीं तो सात पीढ़ी कंगाल हो जायेगी। मुझे अभी जरूरत नहीं है। जब जरूरत होगी, तब तुमसे ले लूँगा। पहले अपना लगाऊँगा।”

दान अपने घर से शुरु होता है, सेवा अपने शरीर से शुरु होती है, भक्ति अपने मन से शुरु होती है और आत्मज्ञान अपनी सदबुद्धि से शुरु होता है।

सत्संग सुनते-सुनते सेठ रमणलाल की बुद्धि बहुत तेजस्वी हो गयी। देखो, सत्संगी हो चाहे कुसंगी हो, अच्छा आदमी हो चाहे बुरा आदमी हो, चढ़ाव-उतार के दिन तो सबके आते ही हैं। श्रीराम के भी आते हैं और रावण के भी आते हैं। तब भी श्रीराम हृदय से पवित्र रहते हैं, सुखी रहते हैं और चढ़ाव के दिन आते हैं तब भी निरहंकारी रहते हैं। जबकि पापी आदमी के चढ़ाव के दिन आते हैं तो वह घमंड में मरता है और उतार के दिन आते हैं तो विषाद में कुचला जाता है।

सन् 1950-52 के आसपास का समय था। सेठ रमणलाल के भी उतार के दिन आये। पेटलाद में हाहाकार मच गया कि ʹइतना धर्मात्मा किन्तु दिवाला निकलने की नौबत !ʹ सेठ रमणलाल स्वयं भी बड़े चिंतित थे। उस समय लोग कहने लगेः ʹअरे ! इतना बड़ा सत्संग हाल बनाया, संतों की इतनी सेवा की, फिर भी उनका दिवाला निकल रहा है…!ʹ

वास्तव में सत्संग करने से सेठ रमणलाल का धंधा ठप्प नहीं हो रहा था, वरन् इस समय बाजार की मंदी एवं उतार का समय होने से धंधा ठप्प हो रहा था। किन्तु सत्कर्मों की वजह से ऐसी विकट परिस्थिति में भी सेठ रमणलाल में काफी समझ थी। अतः वे एक महात्मा के पास गये, जिनका नाम था नारायण मुनि। उनके पास जाकर रमणलाल ने कहाः

“महाराज ! दिल खोलकर बात बताता हूँ कि नौकरों ने कुछ उल्टा-सीधा किया है, बाजार थोड़ी मंदी है और जिन लोगों ने मेरे पास डिपाजिट रखी थी, उन लोगों का विश्वास टूट गया है। सब एक साथ डिपाजिट लेने आ रहे हैं। अतः अब रातों-रात दिवाला निकलने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं रह गया है। फिर भी सत्संग किया है, सत्कर्म किया है इसलिए बुद्धि में यह प्रेरणा आयी है कि चलूँ, संत से कुछ मार्गदर्शन ले लूँ।”

यह सत्संग का फल है। कष्ट है, भारी कष्ट है। सात पीढियों को कलंक लगे कि ʹयह दिवालिया है।ʹ और उधर परलोक में भी दुःख भोगना पड़े, ऐसा अवसर आ रहा है। फिर भी बचने की जगह पर जा रहे हैं।

नारायण मुनि ने कहाः “जब दिवाला निकालने का तुमने सोच ही लिया है तो कुछ-न-कुछ रकम अपने हाथों में करने की योजना बनायी होगी। कोई भी आदमी दिवाला निकालने के पहले अपना कुछ-न-कुछ पैसा बचा लेता है। सच बता, तूने कितना सरकाया है ?”

रमणलालः “महाराज ! अभी थोड़ा इधर-उधर करूँगा, तो लाख-सवा लाख रूपये मेरे हाथ में आ जायेंगे।”

नारायण मुनिः “अच्छा, तो वह सवा लाख रूपये तू मुझे दे दे। मैं उससे इधर पाठशाला खोलूँगा और तेरी रक्षा भगवान करेंगे।”

रमणलालः “जो आज्ञा, महाराज !”

दिवाला निकलने में जो लाख-सवा लाख रूपये की रकम बचेगी, उसे भी नारायण मुनि माँग रहे हैं और रमणलाल स्वीकार कर रहे हैं…. कैसी उत्तम समझ है “!

नारायण मुनि ने घोषणा कर दी कि ʹसेठ रमणलाल की तरफ से मैं पाठशाला बनवा रहा हूँ।”

डिपाजिट माँगने वालों ने सुना कि ʹसेठ दिवालियाँ हैं और वे तो सवा लाख रूपये पाठशाला के लिए दे रहे हैं ! वे दिवालिया कैसे हो सकते हैं ? अरे ! डिपाजिट दें तो उन्हीं को दें।ʹ

सारी डिपाजिट उनके पास वापस आ गयी और रमणलाल गिरते-गिरते ऐसे चढ़े कि बाद में तो उन्होंने कई सत्कर्म किये, कई भण्डारे किये और साधु-संतों की खूब सेवा की। ʹरमणलाल औषधालयʹ, नाराण मुनि पाठशाला आदि आज भी उनके सत्कर्म की खबरें दे रहे हैं…. आदमी चाहे छोटा हो तो भी अपने सत्कर्मों से महान बन जाता है।

सूरत से कीरत भली बिना पाँख उड़ जाय।

सूरत तो जाती रही कीरत कबहुँ न जाय।।

शबरी भीलन को पता था क्या ? धन्ना जाट को पता था क्या ? बाला-मरदाना को पता था क्या कि लोग हमें याद करेंगे ? नहीं। वे तो लग गये गुरु की सेवा में, बस… और ऐसा नहीं कि गुरु ने सदैव वाहवाही ही की होगी कि ʹशाबाश बेटा ! शाबाश।ʹ नहीं, कई बार डाँटा और फटकारा भी होगा।

जो वाहवाही का गुलाम होकर धर्म का काम करेगा, उसकी वाहवाही कम होगी या डाँट पड़ेगी तो वह विरोधी हो जायेगा। लेकिन जिसको वाहवाही की परवाह ही नहीं है, भगवान के लिए भगवान का काम करता है, गुरु के लिए गुरु का काम करता है, समाज को ऊपर उठाने के लिए सत्कर्म करता है तो उसको हजार फटकार पड़े तब भी वह गुरु का द्वार, हरि का द्वार, संतों का द्वार नहीं छोड़ेगा।

तीन प्रकार के लोग होते हैं- किसी का मन होता है तमोगुण प्रधान श्रद्धावाला। किसी की राजसिक श्रद्धा होती है और किसी-किसी की सात्त्विक श्रद्धा होती है।

तामसिक श्रद्धावाला देखेगा कि इतना दूँ और फटाक से फायदा हो जाये। अगर फायदा हुआ तो और दाव लगायेगा। जैसे सटोरी होते हैं न, पंजे से छक्का, अट्ठे से दहलावाले… एक बार-दो बार आ गया तो ठीक, वह दारू भी पिला देगा महाराज को और मुर्गियाँ भी ला देगा और महाराज भी ऐसे ही होते हैं।

आगे गुरु पीछे चेला। दे नरक में ठेलम ठेला।।

….तो तामसी लोग ऐसा धंधा करते हैं और आपस में झगड़ मरते हैं।

राजसी आदमी की श्रद्धा टिकेगी लेकिन कभी-कभी डिगेगी भी, कभी टिकेगी-कभी डिगेगी, कभी टिकेगी-कभी डिगेगी। अगर टिकते-टिकते उसका पुण्य बढ़ गया, सात्त्विक श्रद्धा हो गई तो हजार विघ्न आ जायें, हजार बाधाएँ आ जायें, हजार मुश्किलें आ जायें फिर भी उसकी श्रद्धा नहीं डिगती और वह पार पहुँच जाता है। इसीलिए सात्त्विक लोग बार-बार प्रार्थना करते हैं- “हे मुकद्दर ! तू यदि धोखा देना चाहता है तो मेरे दो जोड़ी कपड़े, गहने-गाँठें कम कर देना, रूपये पैसे कम कर देना लेकिन भगवान और संत के श्रीचरणों के प्रति मेरी श्रद्धा मत छीनना।ʹ

श्रद्धा बढ़ती-घटती, कटती-पिटती रहती है लेकिन उनके बीच से जो निकल जाता है, वह निहाल हो जाता है। उसका जीवन धन्य हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1998, पृष्ठ संख्या 16-19, अंक 71

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श्रीहरि की स्मृति से ही मनुष्य जन्म सार्थक


पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी बापू

ʹश्रीरामचरितमानसʹ के उत्तरकाण्ड के 78वें दोहे में गोस्वामी तुलसीदासजी ने काकभुशुण्डिजी से कहलाया हैः

रामचन्द्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।

ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूंछ बिषान।।

ʹश्रीरामचन्द्रजी के भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान होने पर भी बिना पूँछ और सींग का पशु है।ʹ

सारे कर्मों का तात्पर्य, मनुष्य जन्म का फल यही है कि कैसे भी करके इस जीव को परमात्म-प्राप्ति हो, परम पद की प्राप्ति हो।

शुकदेवजी महाराज परीक्षित से कहते हैं, सूत जी महाराज शौनकादि ऋषियों से कहते हैं

एतान्वान्सांख्ययोगाभ्यां सर्वधर्मपरिनिष्ठया।

जन्मलाभ ततः पुंसां अन्ते नारायणस्मृतिः।।

ʹमनुष्य जन्म का इतना ही लाभ है कि चाहे जैसे भी हो-ज्ञान से, भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठा से, जीवन को ऐसा बना लिया जाये कि मृत्यु के समय भगवान श्रीहरि की स्मृति बने रहे।ʹ

परीक्षित ने प्रार्थना करते हुए शुकदेवजी से पूछाः ʹʹमनुष्य को क्या करना चाहिए ? किसका श्रवण करना चाहिए ? किसका स्मरण करना चाहिए ? किसका जप करना चाहिए ? भजन किसका करें और त्याग किसका करें ?”

शुकदेवजी ने कहाः “देहाध्यास का त्याग करें और श्रीहरि का भजन करें। विषय-विकार व अहंता-ममता का त्याग करें और प्रभुनाम में प्रीति बढ़ायें।”

तस्मात्सर्वमात्मनः राजन् हरि सर्वत्र सर्वदा।

श्रोतव्यो कीर्तितव्यश्च स्मृतव्यो भगवन्नृणाम्।।

इसलिए शुकदेवजी महाराज कहते हैं- “मनुष्य को चाहिए कि सब समय और सभी स्थितियों में अपनी संपूर्ण शक्ति से भगवान श्रीहरि का ही आश्रय ले। उन्हीं का श्रवण करे, कीर्तन करे और स्मरण करे। यही मनुष्य जन्म का फल है। इसी में मानव का कल्याण है।”

महाभारत के एक प्रसंग में आता है कि विदुरजी धृतराष्ट्र से कहते हैं- “आप पाण्डवों का हिस्सा दे दीजिये। धर्मात्मा युधिष्ठिर एवं गांडीवधारी अर्जुन आदि के प्रति अन्याय न करें। इसी में आपका कल्याण है। यह दुर्योधन न मानो पापरूप में आपके कुल में जन्मा है, कलियुग के स्वरूप में जन्मा है। अतः इसके मोह में न पड़कर धर्माचरण करें।”

यह बात दुर्योधन सुन रहा था। उसने विदुरजी का घोर अपमान कर दिया और विदुरजी वहाँ से चल दिये। उसी समय से कौरव कुल के विनाश का आरंभ हो गया क्योंकि पुण्यात्मा विदुरजी का अपमान किया था दुर्योधन ने।

माण्डव्य ऋषि के श्राप से साक्षात् यमराज ही धर्मात्मा विदुर दासी पुत्र के रूप में जन्मे थे। थोडे से सत्संग मात्र से ही उनका देह में अहं, कर्म में कर्त्तापन और जगत में सत्यभाव मिट चुका था। वे ज्ञातज्ञेय हो चुके थे। आत्मा की असंगता, निर्लेपता और शुद्ध-बुद्ध सच्चिदानंदस्वरूप का उन्हें ज्ञान हो चुका था।

महाभारत का युद्ध हुआ और पाण्डव विजयी हुए। महाराज युधिष्ठिर धृतराष्ट्र एवं गांधारी को बड़े आदर से देखते थे।

महाभारत का युद्ध हुआ और पाण्डव विजयी हुए। महाराज युधिष्ठिर धृतराष्ट एवं गांधारी को बड़े आदर से देखते थे।

विदुरजी यात्रा करते-करते अपने ज्ञातज्ञेय पद में जागकर, अपने शुद्ध-बुद्ध आनंदस्वरूप आत्मा को ʹमैंʹ रूप में जानकर, निःशोक पद में प्रतिष्ठित हुए थे। वे जब हस्तिनापुर आये, तब युधिष्ठिर ने बड़े आदर-स्नेह से उनका सत्कार किया। अर्घ्य-पाद्य आदि से उनकी आवभगत करते हुए पाँचों भाइयों ने उनका सम्मान किया।

धर्मात्मा युधिष्ठिर ने उनसे कहाः “काका ! हम बालक थे, तभी से आपने हमारी खूब-खूब संभाल ली, हमारी सहायता की। लाक्षागृह से हमें जीवित बचाने में समय-समय पर आप हमें सन्मार्ग बताते आये हैं। आप कुशल तो हैं ? यात्रा में आपको कैसे-कैसे अनुभव हुए ? किन-किन महात्माओं के दर्शन हुए एवं किन-किन महात्माओं से क्या-क्या प्रभु-प्रसाद मिला ?”

युधिष्ठिर विदुरजी के साथ काफी देर तक इस प्रकार की ज्ञानचर्चा करते रहे। बाद में विदुरजी धृतराष्ट से मिले एवं बोलेः “जिन पाण्डवों को आपने लाक्षागृह में जल मरने के लिए भिजवाने में, भूमि न देने में, अन्याय करने में अपने दुष्ट पुत्र दुर्योधन का साथ दिया था, उन्हीं पाण्डवों के टुकड़ों पर अपने इस नश्वर कलेवर को कब तक पालते-पोसते रहेंगे ?

यह वृद्ध शरीर काल का ग्रास है। इससे अब आप क्या सिद्ध करना चाहते हैं ? इस शरीर को आप कितना भी संभालेंगे, किन्तु रहेगा नहीं। इन प्राणों का मोह आप कब तक करते रहेंगे ? ये प्राण असावधानी में ही निकल जायें, उसकी अपेक्षा आप प्राणनाथ का अनुसरण करें।

भाई ! इस सृष्टि में जो भी जन्मा है, वह मरा अवश्य है। अतः आपके लिये यही उचित है कि देह, संबंधियों एवं कुटुंबियों के मोह और गेह में सत्यबुद्धि की इस अविद्या को त्यागकर एकांत में श्रीहरि की उपासना कर अपना जीवन सफल कर लें।

अभी-भी वक्त है, चेत जायें। अनजाने में ही काल-कराल के ग्रास हो जाएँ, उससे पहले सावधानीपूर्वक उस अकाल की यात्रा कर लें तो अच्छा है।

छोड़ दें देह की अहंता और संबंधियों की ममता को। अकेले आये थे और अकेले जाना है। यह बीच का झमेला कब तक संभालेंगे ?”

किसी संत पुरुष ने ठीक ही कहा हैः

दुनियाँ के हँगामों में गर आँख हमारी लग जाये।

तू मेरे ख्वाबों में आना प्यार भरा पैगाम लिये।।

न कोई संगी-साथी ऐसा जो जीवन में साथ चले।

इन मेलों में रहकर मजबूर हम अकेले चले।।

इस संसार में जीवात्मा को अकेले जाना पड़ेगा, उससे पहले अपने ईश्वरत्व का अनुभव कर ले तो कितना अच्छा होगा ! कुटुम्बी अग्निदान कर दें, उससे पहले ब्रह्मविद्या का दान पा लें तो कितना अच्छा होगा ! कान की सुनने की क्षमता क्षीण हो जाये, उससे पहले सुनने की आसक्ति मिट जाये तो कितना अच्छा होगा ! नेत्रज्योति देखऩे से इन्कार करने लगे, उससे पहले देखने की आसक्ति मिटा दे तो कितना अच्छा होगा ! पैर चलने से जबाव देने लग जायें, उससे पहले संसार में भटकने की इच्छा मिट जाये तो कितना अच्छा होगा !

ज्यों-ज्यों दिन बढ़े, त्यों-त्यों अपनी वासनाएँ मिटाने जाना चाहिए, संसारी आकर्षण घटाते जाना चाहिए, संसारी संबंध कम करते जाना चाहिए और सत्यस्वरूप परमेश्वर का स्मरण-चिंतन बढ़ाते जाना चाहिए। इसी में आपका कल्याण है।

विदुर जी की बातें सुनकर धृतराष्ट्र गंगा किनारे तपस्या करने के लिए तैयार हो गये। किन्तु तपस्विनी गांधारी कैसे चुप बैठती ? वह भी साथ हो ली। माता कुन्ती भी उन्हीं के साथ हो ली।

चुपचाप रातों-रात ही हस्तिनापुर की राज्यलक्ष्मी को नमस्कार करके गांधारी और कुंती समेत धृतराष्ट्र निकल पड़े। विदुरजी के उपदेश ने काम किया। सोया वैराग्य जाग उठा।

सुबह हुई। महाराज युधिष्ठिर संध्या-वंदन, यज्ञ-यागादि करके प्रणाम करने के लिए आये तो देखा कि ʹधृतराष्ट्र जी नहीं हैं, गांधारी माँ नहीं हैं और माँ कुन्ती भी नहीं हैं। अरे ! मेरे से ऐसा कौन-सा अपराध हो गया कि वे चले गये ? क्या गंगाजी में कूद पड़े होंगे ? हम नन्हें थे, तब हमें पिता की तरह पालने वाले धृतराष्ट्र कहाँ गये ?ʹ

वे विह्वल हो संजय से पूछने लगे।

संजय के आगे महाराज युधिष्ठिर अपनी व्यथा व्यक्त करने लगेः “हाय रे हाय ! मैं कैसा अधम हूँ कि पिता-तुल्य धृतराष्ट्र नाराज हो गये ! माता गांधारी एवं माँ कुन्ती भी न जाने मेरे किस अपराध के कारण मुझे छोड़कर चली गयीं ?”

संजय ने कहाः “मुझे भी पता नहीं कि वे महात्मा लोग कहाँ गये ?”

युधिष्ठिर महाराज विलाप कर ही रहे थे कि इतने में एकाएक देवर्षि नारद वहाँ आये और बोलेः “हे युधिष्ठिर ! तुम शोक न करो।”

नारदजी त्रिकालज्ञानी हैं। जो होने वाला है वह भी नारदजी को दिख रहा है, जो हुआ है वह भी दिख रहा है। धृतराष्ट्र गये तो पूर्व रात्रि को ही हैं किन्तु मानो छः महीने का भविष्य प्रत्यक्ष दिख रहा है।

नारदजी कहते हैं “हे युधिष्ठिर ! धृतराष्ट्रादि हस्तिनापुर से निकल कर गंगाजी में आत्महत्या करने के लिए नहीं गये हैं वरन् वे चलते-चलते सप्तर्षि पहुँचेंगे। तुम उन्हें विक्षेप न करना, युधिष्ठिर !

कौन किसका काका और कौन किसका भतीजा ? कौन किसका पिता और कौन किसका पुत्र ? वे कब तक तुम्हारे साथ रहेंगे और तुम कब तक उनकी रक्षा करोगे ? मनुष्य का तो ऐसा हाल है कि जैसे मेढक खुद तो साँप के मुँह में पड़ा है और अपना मुँह फाड़कर अन्य जन्तुओं को निगलना चाहता है, वैसे ही मनुष्य स्वयं तो काल के मुख में पड़ा है फिर भी विषय-भोगरूपी जीव-जन्तुओं को खाने के लिए दौड़ रहा है।

जहाँ वास्तविक रक्षा हो सकती है वहीं, ऋषियों के चरणों में वे पहुँचे हैं। सप्तर्षि की प्रसन्नता के लिए गंगाजी जहाँ सात धाराओं में विभक्त होकर बह रही हैं, उस सप्तर्षि के क्षेत्र में ही वे लोग पहुँचे हैं। मृत्यु के समय कुटुंबियों एवं मित्रों के संग एवं आसक्ति का त्याग करना ही श्रेयस्कर है, इसीलिए वे चुपाचाप चले गये हैं। तुम उनका पीछा न करना और उनके मार्ग में तुम अवरोध न बनना। इस मोहपाश को तुम भी काटो और उऩको भी मोहपाश काटने में सहयोग दो। अतः तुम यहीं रहो।”

नारदजी भगवान का संकल्प हैं। नारदजी महात्मा हैं। जो परमात्मा से मिलाने की बात करें, जो परमात्मा के रास्ते आने वाले विघ्नों को हटाने का मार्ग बता दें, वे महात्मा हैं।

शुकदेवजी महाराज कहते हैं-

एतावान्सांख्ययोगाभ्यां सर्वधर्मपरिनिष्ठया।

जन्मलाभ ततः पुंसां अन्ते नारायणस्मृतिः।।

ʹमनुष्य जन्म का इतना ही लाभ है कि चाहे कैसे भी हो-ज्ञान से भक्ति से अथवा अपने धर्म की निष्ठा से, जीवन को ऐसा बना लिया जाये कि मृत्यु के समय भगवान श्रीहरि की स्मृति बनी रहे।”

नारदजी आगे कहते हैं- “हे युधिष्ठिर ! धृतराष्ट्र अपने तन की आसक्ति एवं मन के संबंधों को समेटकर सच्चे संबंधी परमात्मा तक की यात्रा करने गये हैं। तीन दिन में एक बार भोजन करते हैं और कहीं आपस में बातें करने में समय नष्ट न हो जाये, इसलिए मुँह में गंगाजी का छोटा-सा पत्थर रख लिया है। गांधारी भी व्रत-उपवास का अवलंबन लेती हैं। कुन्ती भी अपना समय दोनों की सेवा और साधना में बिताती हैं। धृतराष्ट्र ने अपना अंतिम समय सार्थक कर लिया, अतः तुम शोक न करो।”

विदुर जी के कुछ वचनों को सुनकर ही धृतराष्ट्र ने अपना अंतिम समय सँवार लिया। इसी प्रकार तुम भी संतों के वचनों को सुनकर अपना जीवन सार्थक कर लो तो कितना अच्छा !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 1998, पृष्ठ संख्या 3-5, अंक 71

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