कर्म ही पूजा है
संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्यं सिद्धिं विन्दति मानवः।। ʹजिस परमात्मा से सर्वभूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सर्व जगत व्याप्त है उस परमेश्वर को अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त होता है।ʹ (श्रीमद् भगवद् गीताः 18.46) अपने स्वाभाविक कर्मरूपी पुष्पों …