ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

सच्चे कर्मवीरो ! अमृतकलश उठाओ… आगे बढ़ते रहो !


भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज नवयुवको ! पृथ्वी जल रही है । मानव समाज में जीवन के आदर्शों का अवमूल्यन हो रहा है । अधर्म बढ़ रहा है, दीन-दुःखियों को सताया जा रहा है, सत्य को दबाया जा रहा है । यह सब कुछ हो रहा है फिर भी तुम सो रहे हो ! …

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साँप मर गया, नेवला वहीं रह गया !


आत्मा पर आवरण क्या है ? असलियत यह है कि आत्मा पर कोई आवरण नहीं है। वह तो नित्य-शुद्ध-बुद्ध-मुक्त ब्रह्म ही है। परंतु बहुत सारी बातें आपके मन में बिना सोचे-समझे बिठा दी गयी है, साँप को भगाने के लिए आपके मन में नेवला को लाकर बैठा दिया गया है। पंचतंत्र की यह कहानी आपने …

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आत्मसंतोषरूपी धन ही सबसे ऊँचा है


वैराग्य शतक के 29वें श्लोक  भर्तृहरि जी महाराज कहते हैं- “जो लोग संतोष से सदा प्रसन्न रहते हैं, उनके आनंद छिन्न-भिन्न नहीं होते हैं, कम नहीं होते हैं अपितु बढ़ते हैं। और जो दूसरे लोग, जिनकी बुद्धि धन के लोभ से आकुल है, की चाह समाप्त नहीं होती अपितु बढ़ती ही जाती है। ऐसी दशा …

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