ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

माँ और मैं एक ही हैं


स्वामी श्री अखंडानंद सरस्वती जी बताते हैं कि “एक बार आनंदमयी माँ के भक्त आये और उन्होंने श्री उड़िया बाबाजी से पूछा कि “महाराज जी ! आप श्री आनंदमयी माँ को क्या मानते हैं ?” इस प्रश्न में जो असंगति है उसको आप देखो। मानी वह चीज जाती है जो परोक्ष (अप्रत्यक्ष) होती है। जैसे …

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जीवन वृथा जा रहा है अज्ञानियों का


श्री योगवाशिष्ठ महारामायण में श्री वसिष्ठ जी कहते हैं-  हे राम जी ! अपना वास्तविक स्वरूप ब्रह्म है। उसके प्रमाद से जीव मोह (अज्ञान) और कृपणता को प्राप्त होते हैं। जैसे लुहार की धौंकनी वृथा श्वास लेती है वैसे ही इनकी चेष्टा  व्यर्थ है। पूज्य बापू जीः जैसे लुहार की धौंकनी वृथा श्वास लेती है, …

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इसके सिवा अन्य कोई रास्ता नहीं


मुमुक्षा का उदय क्यों नहीं ? मनुष्य जन्म, जो बड़ा दुर्लभ था, आपको मिल गया है। यह वह साँचा है जिसमें परमात्मा समा जाता है। इसमें आपको वह शीशा मिला है जिसमें परब्रह्म-परमात्मा का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है। मनुष्य शरीर में भी श्रुति का यह सिद्धान्त, वह रहस्य समझ में आना दुर्लभ है जो कर्म …

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