ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

परिप्रश्नेन


साधिकाः बापू जी ! हमें पता है कि संसार नश्वर है, जो कुछ हमें भास रहा है वह नष्ट होने वाला है फिर भी मन इसी की ओर बार-बार क्यों दौड़ता है ? पूज्य बापू जीः यह आपने सुना है, अभी ठीक से जाना नहीं है, ठीक से माना नहीं है । जैसे साँप आ …

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परिप्रश्नेन…


साधकः भगवान सबके अंदर हैं फिर भी किसी के अंदर अच्छाई होती है, किसी के अंदर बुराई – ऐसा क्यों हो जाता है ? पूज्य बापू जीः अरे, देखो बबलू ! विद्युत के विभिन्न उपकरणों में विद्युत एक ही होती है लेकिन गीजर पानी गरम करता है और कसाईखाने की मशीनें गायों को, बकरों को, …

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सज्जनों और दुर्जनों का स्वभाव


मृदघटवत् सुखभेद्यो दुःसन्धानश्च दुर्जनो भवति । सुजनस्तु कनकघटवद्दुर्भद्याश्चाशु सन्धेयः ।। ‘दुर्जन मनुष्य मिट्टी के घड़े के समान सहज में टूट जाता है और फिर उसका जुड़ना कठिन होता है । सज्जन व्यक्ति सोने के घड़े के समान होता है जो टूट नहीं सकता और टूटे भी तो शीघ्र जुड़ सकता है ।’ नारिकेलासमाकारा दृश्यन्ते हि …

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