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अमृतवेला किसको बोलते हैं ?- पूज्य बापू जी


चार अमृतवेलाएँ हैं। एक सूरज उगने के सवा दो घंटे पहले से सूर्योदय तक (ब्राह्ममुहूर्त का समय) काल-दृष्टि से अमृतवेला है।

दूसरी देश (स्थान) की दृष्टि से अमृतवेला है। जिस देश में, जिस जगह में सत्संग, ध्यान, भजन होता हो, वहीं हम ध्यान-भजन करते हैं तो वह अमृतवेला है।

तीसरी अमृतवेला है संग की दृष्टि से। भगवद्भाव में मस्त, भगवद्भाव से छके हुए सत्संगी सजातीय विचार करते हों, भगवान की गुरु की लीलाओं की, महिमा की चर्चा करते हों तो वह अमृतवेला है।

चौथा – ब्रह्मवेत्ता, ब्रह्मज्ञानी गुरु का सान्निध्य मिले वह अमृतवेला है।

प्रभात की अमृतवेला सभी को सुलभ है। ब्रह्मज्ञानियों का संग, उच्च कोटि के भगवद्भक्त-गुरुभक्तों का संग तथा पवित्र स्थान या आश्रम में रहना सभी को सुलभ नहीं है लेकिन सत्संगियों को इन अमृतवेलाओं का लाभ कभी-कभी एक साथ मिलता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2016, पृष्ठ संख्या 21 अंक 279

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आशाओं के दास नहीं आशाओं के राम हो जाओगे


 

पूज्य बापू जी

मन में कुछ आया और वह कर लिया तो इससे आदमी अपनी स्थिति में गिर जाता है लेकिन शास्त्र-सम्मत जीवन जीकर, सादगी और संयम से रह के आवश्यकताओं को पूरी करे, मन के संकल्प-विकल्पों को काटता रहे और आत्मा में टिक जाये तो वह आशारहित पद में, आत्मपद में स्थित हो जाता है। फिर तो उससे संसारियों की भी मनोकामनाएँ पूरी होने लगती हैं।

पतिव्रता स्त्री का सामर्थ्य क्यों बढ़ता है ? क्योंकि उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती। पति की इच्छा में उसने अपनी इच्छा मिला दी। सत्शिष्य का सामर्थ्य क्यों बढ़ता है ? सत्शिष्य को ज्ञान क्यों अपने-आप स्फुरित हो जाता है ? क्योंकि सदगुरु की इच्छा में वह अपनी इच्छा मिला देता है। शिष्य लाखों-करोड़ों हो सकते हैं पर सत्शिष्यों की संख्या अत्यंत कम होती है। सत्शिष्य वह है जो गुरु की परछाई बन जाय, अपने को गुरु के अनुसार पूरा ढाल दे। उसको ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता। तोटकाचार्य शंकराचार्य जी के ऐसे सत्शिष्य थे और कबीर जी के ऐसे सत्शिष्य थे सलूका, मलूका।

सती और सत्शिष्य को वह सामर्थ्य प्राप्त होता है जो योगियों को तमाम प्रकार की कठिन योग-साधनाएँ करने के बाद भी मुश्किल से प्राप्त होता है। योग साधना करने के बाद जो उनकी अवस्था आती है, वह सती और सत्शिष्य को सहज में ही प्राप्त हो जाती है। सत्शिष्य अपनी इच्छा गुरु की इच्छा में मिला देता है। पतिव्रता स्त्री अपनी इच्छा पति की इच्छा में मिला देती है।

कोई सोचेगा, ‘यदि गुरु की इच्छा में अपनी इच्छा मिला दे तो गुरु की भी तो इच्छा हुई और जब तक इच्छा है तो गुरु नहीं….’। हाँ, गुरु के अंदर इच्छा तो है लेकिन वह इच्छा कैसी है ? गुरु की इच्छा शिष्य के हृदय में ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की है। गुरु इच्छा के दास नहीं, इच्छाओं के स्वामी हैं। उनकी इच्छा व्यवहार काल में दिखती है लेकिन अंतःकरण में उस इच्छा की सत्यता नहीं होती। गुरु की इच्छा कैसी होती है ? गुरु की इच्छा होती है कि शिष्य उन्नत हो। अतः गुरु की इच्छा में अपनी इच्छा मिला देने से शिष्य का कल्याण हो जाता है।

अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने के लिए अपने से उच्च पुरुषों की देखरेख में होना चाहिए। अपनी इच्छा पूरी करने से साधक की साधना में बरकत नहीं आती। संत कबीर जी ने कहा हैः

मेरो चिंत्यो होत नहिं, हरि को चिंत्यो होत।

हरि को चिंत्यो हरि करे, मैं रहूँ निश्चिंत।।

24 घंटे… केवल 24 घंटे यह निर्णय कर लो कि ‘मेरी कोई इच्छा नहीं। जो तेरी मर्जी हो वह स्वीकार है….’ तो आपको जीने का मजा आ जायेगा।

साधारण आदमी और संत में यही फर्क होता है कि संत बाधित इच्छा से कर्म करते हैं, इच्छारहित कर्म करते हैं। अतः उनके कर्म शोभा देते हैं और साधारण आदमी इच्छाओं के गुलाम होकर कर्म करते हैं। आशा करनी है तो राम की करो।

आशा तो एक राम की, और आश निराश।

‘ऐसे दिन कब आयेंगे कि मैं अपने राम-स्वभाव में जगूँगा, सुख-दुःख में सम रहूँगा ? मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि मुझे संसार स्वप्न जैसा लगेगा ? ऐसे दिन कब आयेंगे कि मैं अपनी देह में रहते हुए भी विदेही आत्मा में जगूँगा ?’ ऐसा चिंतन करने से निम्न (तुच्छ) इच्छाएँ शांत होती जायेंगी और बाद में उन्नत इच्छाएँ भी शांत हो जायेंगी। फिर तुम इच्छाओं के दास नहीं, आशाओं के दास नहीं, आशाओं के राम हो जाओगे। ॐ…ॐ…ॐ….

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 20 अंक 278

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आखिर कर्ण क्यों हारा ?


पूज्य बापू जी

ऋषि आश्रम में शिष्यों के बीच चर्चा छिड़ गयी कि ‘अर्जुन के बल से कर्ण में बल ज्यादा था। बुद्धि भी कम नहीं थी। दानवीर भी बड़ा भारी था फिर भी कर्ण हार गया और अर्जुन जीत गये, इसमें क्या कारण था ?’ कोई निर्णय पर नहीं पहुँच रहे थे, आखिर गुरुदेव के पास गयेः “गुरु जी ! कर्ण की जीत होनी चाहिए थी लेकिन अर्जुन की जीत हुई। इसका तात्त्विक रहस्य क्या होगा ?”

गुरुदेव बड़ी ऊँची कमाई के धनी थे। आत्मा-परमात्मा के साथ उनका सीधा संबंध था। वे बोलेः “व्यवस्था तो यह बताती है कि एक तरफ नन्हा प्रह्लाद है और दूसरी तरफ युद्ध में, राजनीति में कुशल हिरण्यकशिपु है, हिरण्यकशिपु की विजय होनी चाहिए और प्रह्लाद मरना चाहिए परंतु हिरण्यकशिपु मारा गया।

प्रह्लाद की बुआ होलिका को वरदान था कि अग्नि नहीं जलायेगी। उसने षड्यंत्र किया और हिरण्यकशिपु से कहा कि “तुम्हारे बेटे को लेकर मैं चिता पर बैठ जाऊँगी तो वह जल जायेगा और मैं ज्यों की त्यों रहूँगी।” व्यवस्था तो यह बताती है कि प्रह्लाद को जल जाना चाहिए परंतु इतिहास साक्षी है, होली का त्यौहार खबर देता है कि परमात्मा के भक्त के पक्ष में अग्नि देवता ने अपना निर्णय बदल दिया, प्रह्लाद जीवित निकला और होलिका जल गयी।

रावण के पास धनबल, सत्ताबल, कपटबल, रूप बदलने का बल, न जाने कितने-कितने बल थे और लात मारकर निकाल दिया विभीषण को। लेकिन इतिहास साक्षी है कि सब बलों की ऐसी-तैसी हो गयी और विभीषण की विजय हुई।

इसका रहस्य है कि कर्ण के पास बल तो बहुत था लेकिन नारायण का बल नहीं था, नर का बल था। हिरण्यकशिपु व रावण के पास नरत्व का बल था लेकिन प्रह्लाद और विभीषण के पास भगवद्बल था, नर और नारायण का बल था। ऐसे ही अर्जुन नर हैं, अपने नर-बल को भूलकर संन्यास लेना  चाहते थे लेकिन भगवान ने कहाः “तू अभी युद्ध के लिए आया है, क्षत्रियत्व तेरा स्वभाव है। तू अपने स्वाभाविक कर्म को छोड़कर संन्यास नहीं ले बल्कि अब नारायण के बल का उपयोग करके, नर ! तू सात्त्विक बल से विजयी हो जा !”

तो बेटा ! अर्जुन की विजय में नर के साथ नारायण के बल का सहयोग है इसलिए अर्जुन जीत गया।”

कई बुद्धिजीवियों में बुद्धि तो बहुत होती है, धन भी बहुत होता है, सत्ता कि तिकड़मबाजी भी बहुत होती है, फिर भी अकेला नर-बल होने से उनका संतोषकारक जीवन नहीं मिलेगा, बिल्कुल पक्की बात है।

जिस नर के जीवन में परमात्मा की कृपा का, परमात्मा के सामर्थ्य, ज्ञान और माधुर्य का योग है वह नर संतुष्टः सततं योगी….. अपने जीवन से, अपने अनुभवों से, अपनी उपलब्धियों से सतत संतुष्ट रहेगा। भोगी सतत संतुष्ट नहीं रह सकता।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।….. (गीताः 18.78)

जहाँ पुरुषार्थ करने वाला जीव होता है और ईश्वर की कृपा होती है, वहाँ श्री, विजय, विभूति और अचल नीति होती है। अब जो नर जितना उस योगेश्वर का आश्रय लेकर निर्णय करेगा, वह उतना विजयी रहेगा।

किसी के लिए मन में द्वेष न हो तो समझो नारायण का निवास है। किसी का बुरा नहीं सोचते हैं, फिर भी कोई गड़बड़ करता है तो अनुशासन के लिए बोल देते हैं लेकिन आपके हृदय में द्वेष नहीं है, सबके लिए हित की भावना है तो आप सबमें बसे नारायण के साथ जी रहे हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2016, पृष्ठ संख्या 30 अंक 278

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